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राहुल की राजनीति पर शरद पवार की कूटनीति

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शरद पवार ने सब कबाड़ा कर दिया। राहुल गांधी मुंबई आकर सिर्फ चार घंटे में ही शिवसेना को उसकी औकात दिखा कर गए थे। पर, पवार ने राहुल गांधी के किए – कराए पर कीचड़ उड़ेल दिया। शिवसेना के मुखिया बाल ठाकरे की विरोध की धमकी की परवाह किए बिना राहुल गांधी सड़कों पर चले, लोकल ट्रेनों में घूमे और भीड़ में घुसकर लोगों से भी मिले। मगर बाल ठाकरे और उनकी शिवसेना राहुल गांधी का कुछ भी नहीं बिगाड़ पाई। राहुल गांधी के दौरे के बाद पूरी मुंबई के सामने यह साबित हो गया था कि शिवसेना के आतंक और उसके धमकीतंत्र की कोई बहुत बड़ी औकात नहीं है।

लेकिन राहुल के दौरे के तत्काल बाद ही केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार ने बाल ठाकरे को बहुत ताकतवर साबित करने की दिल खोल कर कोशिश की। वौसे, तो पवार महाराष्ट्र में अपने आप से ज्यादा मजबूत नेता किसी को भी नहीं मानते। पर, फिर भी उन्होंने आईपीएल के क्रिकेट मैचों के दौरान शांति बनाए रखने की बाल ठाकरे के घर जाकर हाथ जोड़कर विनती की।

अभी तो, राहुल गांधी के दौरे से मुंबई में शिवसेना की औकात कितनी कम हुई है, इसकी समीक्षा भी पूरी तरह से नहीं हुई थी, कि शरद पवार ने बाल ठाकरे से करबद्ध प्रार्थना करके उनका मान बढ़ा दिया। राहुल गांधी 5 फरवरी को मुंबई आए थे। और शरद पवार 7 फरवरी को ठाकरे के घर पहुंच गए। वे पता नहीं किस बात के लिए बाकायदा फूलों का गुलदस्ता देकर बाल ठाकरे का अभिनंदन भी कर आए। शरद पवार क्रिकेट मैतों के दौरान ठाकरे से सहयोग की भीख मांगने उनके घर पहुंचे थे। ठाकरे के घर ‘मातोश्री’ में दोनों नेताओं के बीच आईपीएल में पाकिस्तानी और आस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों को शामिल किए जाने पर शिवसेना के विरोध पर विचार विमर्श हुआ। पवार के साथ उनकी बीसीसीआई के अध्यक्ष शशांक मनोहर भी मौजूद थे। उन्होंने ठाकरे से आस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों की सुरक्षा की भी गारंटी मांगी। लेकिन अपनी समझ में यह नहीं आता कि आखिर ठाकरे क्रिकेट के कौनसे माई बाप हैं, या कोई पुलिस के मुखिया हैं जिनसे किसी की सुरक्षा के बारे में बात की जा सके। अरे भाई, आप दुनिया की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक सरकार के बहुत ताकतवर मंत्री हैं...! महाराष्ट्र में आपकी अपनी सरकार है...! और सबकी सुरक्षा का जिम्मेदार पुलिस महकमा चलाने वाला गृह मंत्रालय भी जब आपकी ही पार्टी के पास है, तो फिर बाल ठाकरे क्या सरकार से भी ऊपर की कोई चीज हो गए। जो आप उनके सामने जाकर आप गिड़गिड़ा रहे हैं ? आईपीएल मैचों के लिए सुरक्षा के नाम पर शरद पवार के ठाकरे के सामने नतमस्तक होने को एक केंद्रीय मंत्री की कायरता से ज्यादा कुछ नहीं कहा जा सकता।   

शरद पवार राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं। उन्हीं की पार्टी का एक निहायत मम्मू और हद दर्जे का ऐसा डरपोक आदमी महाराष्ट्र का गृह मंत्री है, जो मुंबई पर 26 / 11 के इतिहास के सबसे खतरनाक आतंकवादी हमले के वक्त दुबक कर अपने घर में बैठा था। छगन भुजबल अपनी रिवाल्वर निकालकर सड़क पर आ गए थे। भुजबल ने गृह मंत्री आरआर पाटिल से कहा भी था कि चलो, मैं साथ हूं। फिर भी वह आदमी घर में ही पड़ा रहा। इसीलिए, शरद पवार को यह बात अच्छी तरह से पता है कि महाराष्ट्र के गृहमंत्री के रूप में आदमी की शक्ल में जिस मिट्टी के माधो को उन्होंने बिठा रखा है, उस पर कोई बहुत भरोसा नहीं किया जा सकता। लेकिन मुंबई पुलिस की ताकत पर तो विश्वास कीजिए पवार साहब। जिस मुंबई पुलिस ने शिवसेना की धमकियों की परवाह नहीं करते हुए राहुल गांधी को गली – गली पैंया – पैंया घुमते रहने के दौरान बाल ठाकरे के जमूरों से सुरक्षित रखा, वह क्या हमारे विदेशी मेहमान खिलाडियों को सुरक्षा नहीं दे सकती।

पर, अपन जानते हैं कि शरद पवार इतने मूरख नहीं हैं। वे यह यह सब अच्छी तरह जानते हैं कि बाल ठाकरे कोई सरकार से बड़ी ताकत नहीं है। फिर भी वे उनके घर गए। तो, इसके पीछे सबसे बड़ी और एक अकेली वजह यह भी है कि मुंबई में वे बाल ठाकरे की ताकत को घायल हालत में ही सही, जिंदा रखना चाहते हैं। ठाकरे की धमकियां जिंदा रहेगी, तभी पवार कांग्रेस को डराकर रख सकते हैं। दरअसल, पवार और ठाकरे के बीच आपस में काफी अच्छे संबंध रहे हैं, और आज भी हैं। इसीलिए, हर बार यह कहा जाता रहा है कि पवार अगर कभी कांग्रेस से अलग हुए तो वे शिवसेना के साथ जा सकते हैं। पता नहीं, कोई भी यह क्यों नहीं कहता कि पवार भाजपा के साथ जा सकते हैं। वैसे वह दिन अभी नजदीक आता नहीं दिखता। फिर भी पवार बहुत दूर की सोचते हैं, सो यह करना जरूरी था। शरद पवार काफी गहन और गूढ़ राजनीति की पैदाइश कहे जाते हैं। लेकिन उनकी यह राजनीति दिल्ली में भले ही फेल हो जाती है। पर, महाराष्ट्र में भरपूर चलती है।

पवार ने बाल ठाकरे के घर जाकर मुंबई में शिवसेना को सांसत में डालने वाले राहुल के रुतबे को कम करने की कोशिश की है, यह साफ समझ में आ रहा है। पता नहीं, वे कांग्रेस से किस जनम का बदला ले रहे हैं। विलास राव देशमुख ने महाराष्ट्र के विधान सभा चुनावों से बहुत पहले ही यह साफ साफ कह दिया था कि कांग्रेस को प्रदेश में विधान सभा का चुनाव अकेले ही लड़ना जाहिए। ताकि राष्ट्रवादी कांग्रेस और उसके अगुआ शरद पवार को उनकी औकात का अहसास हो जाए। देशमुख सहित कई नेता भी पवार की पार्टी से समझौता करने के मूड़ में बिल्कुल नहीं थे। लेकिन आखरी पलों में समझौता हो गया और कांग्रेस के साथ पवार की पार्टी भी सत्ता में आ गई। वरना, इस बार जो हालात थे, अकेले लड़ने पर पवार की पार्टी का क्या होता, यह सभी जानते हैं। 

लाखों लोगों के अब तक तो यही लगता था कि पता नहीं क्यों बेचारे पवार के बारे में यह सत्य कुछ ज्यादा ही प्रचलित है कि वे भरोसे की राजनीति कभी नहीं कर सकते। लेकिन ठाकरे के घर जाकर राहुल गांधी के किए – कराए पर पानी फेर देने की पवार की कोशिश के बाद यह धारणा और मजबूत हो जानी चाहिए कि पवार कोई बहुत भरोसे के काबिल राजनेता नहीं है। अगर ठाकरे और शिवसेना की धमकियों का पवार डटकर मुकाबला करते तो वे राहुल गांधी से भी हजार गुना ऊंचे नेता के रूप में सम्मान पाते। वे पद के लिए कुछ भी करने और सत्ता में बने रहने के लिए किसी भी हद तक जाने वाले नेता के रूप में तो जाने ही जाते हैं। लेकिन सिर्फ इस एक ताजा घटना की वजह से आज देश शरद पवार को एक कायर, हीन और लाचार होने के साथ साथ अपने ही गृहमंत्री पर भरोसा न करने वाले नेता के रूप में भी देखने लगा है। ठाकरे के चालीस साल के आतंकराज की सिर्फ चार घंटे में ही राहुल गांधी ने जो बखिया उधेड़ डाली थी, ठाकरे को कुछ दिन तो उसके दर्द में डूबे रहने देते पवार साहब। आपको इतनी जल्दी क्या थी ?

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सुरेश चिपलूनकर on 08 February, 2010 12:55;13
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शायद ये पत्रकार महोदय मुम्बई की ज़मीनी हकीकत से वाकिफ़ नहीं हैं, या फ़िर शायद इन्हें भी भ्रम हो गया है कि मीडिया प्रायोजित Raul Vinci कि मुम्बई यात्रा महज नौटंकी थी…। जब 25000 जवान सिर्फ़ एक व्यक्ति की सुरक्षा के लिये सड़क पर उतार दिये जायेंगे और लोकल ट्रेन में चलने का पूर्वाभ्यास पहले ही किया जा चुका हो तब शिवसेना की क्या औकात थी राहुल के पास भी फ़टकने की…। राहुल की चरणवन्दना करते-करते ये साहब भूल गये कि इस साल राहुल के "बालसखा" उमर अब्दुल्ला के राज में 19 साल बाद पहली बार श्रीनगर के लाल चौक पर तिरंगा नहीं फ़हरा…। राहुल को काबुल या तिब्बत जाने को नहीं कह रहे, लेकिन इन्हीं 25000 जवानों को कश्मीर ले जाते और तिरंगा फ़हराते तो बात बनती… लेकिन उसके लिये भी हिम्मत और नैतिकता चाहिये होती है…
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bny on 08 February, 2010 15:08;41
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to mumbai ki jamini hakikat kya hai chiplunkar mahraj?Thakre ki gunda gardi?????
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arajkishore Pandey on 08 February, 2010 15:29;04
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ये चिपलूणकर की बौखलादट दिख रही है। मुंबई की हकीकत यही है कि ठाकरे की गुंडागरदी। शरद पवार के चमचे महाराष्ट्र के गृहमंज्ञी है। वे अगर राहुल गांघी की सुरक्षा की गारंटी दे सकते हैं, तो फिर क्रिकेट मैच सुरक्षित ढेग से क्यों नहीं करवा सकते। राष्ट्रवादी कांग्रेस के गृहमंत्री जब 25000 जवान सिर्फ़ राहुल गांधी जैसे एक एक व्यक्ति की सुरक्षा के लिये सड़क पर उतार सकते हैं, तो फिर अपने आका शरद पवार के क्रिकेट के शौक को पूरा करने के लिए पुलिस बंदोबस्त क्यों नहीं कर सकते। यह सवाल हर कोई पूछ रहा है। वासतविक बात यही है कि शरद पवार से मुंबई में राहुल गांधी की बढ़ती हुई ताकत हजम नहीं हुई। अत: वह ठाकरे शरणम गच्छामि में ही शुख देख रहे हैं। सुरेश चिपलूणकर के लेखन और उनके संकीर्ण सोच का उदाहरण यही है कि उनको राहुल जैसे नए राजनेता की कमजोरियां तो दिखती है लेकिन पवार जैसे बेईमान और विशवासघाती राजनेता के ठाकरे को मिलने के कारनामे सही लगते हैं।
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Niranjan Parihar on 08 February, 2010 15:54;39
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मित्रो, मेरी विनम पार्थना है कि मेरे ज्ञान, मेरी जानकारी और मेरी क्षमताओं पर शक करने का आपको सहज अधिकार प्रप्त है। लेकिन किसी को भी मेरी पत्रकारीय ईमानदारी पर शक करने की कोई जरूरत नहीं हैं। अपन जैसे भी हैं, वैसे ही बिल्कुल सही है। किसी के लिए भी लेखकीय सच्चाई के साथ छल कपट अपने से नहीं होता और ना ही अपन कभी कर सकते। 20 साल से अपन स्थायी रूप से मुंबई में ही हैं और राजनीति को शुरू से ही कवर करने री वजह से उसकी सारी एबीसाडियों से किसी भी और के मुकाबले ज्यादा अच्छी तरह वाकिफ हैं। मैं किसी सुरेश चिपलूणकर को नहीं जानता, मगर वे अपने आप को पत्रकार कहते हैं फिर भी उनको शरद पवार का खुद का गृह मंत्री होने और खुद एक ताकतवर मंत्री होने के बावजूद बाल ठाकरे के घर जाकर क्रिकेट मैच के लिए उनसे सुरक्षा की गुहार लगाना उनको वाजिब लगता है। तो, यह ज्ञान उनको मुबारक। अपनी नजर में ठाकरे के घर जाकर पवार ने कायरता का परिचय दिया है। कोई बेवकूफ भी इसे सही नहीं कहेगा कि आपकी खुद की सरकार का गृह मंत्रालय जब राहुल गांधी को ठाकरे की धमकियों से सुरक्षित निकाल सकता है, तो फिर मैच सुरक्षित करवाने में उसकी नानी क्यों मर जाती है, जिससे गृह मंत्री के नेता को बाल ठाकरे के घर जाकर कायरतापूर्वक विनती करनी पड़े। पूरा देश इस घटना को पवार के पावरलेस हो जाना कह रहा है और सुरेश चिपलूणकर को पवार गलत नजर नहीं आते। सुरेश चिपलूणकर को अपनी सलाह है कि वे अपनी अकल का इलाज करवा लें, और अपने दायरे के बाहर के विषयों पर अपना दिमाग नहीं ही दौडाएं तो उनकी सेहत के लिए ज्यादा ठीक रहेगा।
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KS on 08 February, 2010 16:07;24
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सुरेश चिपलूनकर, vicky jaise churkat logo ke saamne safaai dene kee kya jarurat hai. jaisa ki main pahle he kah chuka hoo ki yah to maansik mareej hai. inhe ghambhirta se lene kee bajay tarash khaane ya usse bhi bade kahee ilaaj karwaane kee jarurat hai.
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Baba on 08 February, 2010 18:19;43
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Bhai Sureshji Aap Lokhate Achchha hai. Kintu Aap sankirn Vichardhara ke hai.. Aapa Har Likha huaa Ghum-Firkar Soniya, Congress, Rahul Par Aa hi Jata hai.Aapaki Lekhani main Congress ke Prati KHUNNAS Saf Nazar aati hai.
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Ajit on 08 February, 2010 18:25;41
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Parihar sahab,

agar aap public melikhte hai to aapko apni alochana sahne ke bhi naitik sahas hona chahiye, yadi aap sochate hai ki jo aapne likh diya wo aapke 20 saal ke anubhav ki wajah se brahmsaty hai to mujhe nahi pata ki kisko ilaaz ki jarurat hai....

Agara aap apne vicharo me sahi hai to Mr Chiplunkar apne vicharo me sahi hai..to kya aapko lagta hai ki jis Maharashtr sarkar ne aaj tak uttar hartiyo ko sirf jakhm diye, taxi permit vivad paida karke in nakli shero ko ek naya hathiyaar ded diya unnhone Rahul ji ke liye 25000 sipahi utar kar achcha kiya...

likhte hai to sahna sikhiye, waajib jawaab dijiye mashavira nahi

dhanywaad
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सुरेश चिपलूनकर on 08 February, 2010 19:14;32
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मैंने कभी भी ठाकरे-द्वय की गुण्डागर्दी का समर्थन नहीं किया, बल्कि अपने ब्लॉग पर राज ठाकरे को कई बार जमकर गरियाया भी है… इसलिये इस मामले में मुझे सफ़ाई देने की जरूरत नहीं। रही बात लेखक महोदय की सलाह की तो सिर्फ़ 20 साल मुम्बई में रहने भर से कोई अकल वाला नहीं हो जाता… :)
इन पत्रकार महोदय ने ये नहीं बताया कि इनके प्रिय "बहादुर" राहुल बाबा लाल चौक में तिरंगा फ़हराने कब जाने वाले हैं… :)
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Ajit on 08 February, 2010 19:48;57
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Bhaiyo aap dono se kshama chahta hu, lekin thoda sanyam, ab ye bahas rajnaitik se jyada vyaktigat hoti ja rahi hai..Thakerey kamakl hai to Rahul ji jaise logo ko bhi sachchai me desh se koi matlab nahi lagta , Lalchaowk ka mamla nishchay gambheer hai lekin iske liye apas me arop prtyarop arne ke bajaay sarkar se kyu nahi poochhte aap log apne blog ke madhyam se..
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KS on 08 February, 2010 20:04;50
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MAIN NA KAHTA THA सुरेश चिपलूनकर PAAGAL HAI. USSE BAAT KARNA ... KO MUH LAGAANE KE BARAABAR HAI. AB BHUGTO. DEKHO KAHEE KAAT NA KKHAYE. NAHI TO 14 INJECTION LAGAAGE.
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image निरंजन परिहार मीडिया में प्रभाष जोशी और एसपी सिंह के प्रति बेहद कृतज्ञ निरंजन परिहार ने पंद्रह साल तक प्रिंट और सन 2000 के बाद से टीवी की खबरों को जो धार बख्शी, वह मुंबई की पत्रकारिता के लिए मिसाल हैं। बेजान खबरें लिखे जाने की परंपरागत शैली को उलटकर रख देने वाले परिहार का सफर नवभारत टाइम्स से शुरू हुआ और जनसत्ता में एक दशक तक रहने के बाद दो साल तक प्रात:काल दैनिक के स्थानीय संपादक भी रहे। सहारा समय टीवी नेटवर्क में संपादकीय समन्वयक और आइटीएन टीवी में सीनियर एडीटर भी रहे। और डॉक्यूमेंट्री फिल्में भी बनाई। संपर्क: niranjanparihar@hotmail.com
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सुप्रीम कोर्ट का सवाल और प्रधानमंत्री का मलाल
आखिरकार प्रधानमंत्री का दुख प्रकट हो ही गया. संपादकों के साथ बातचीत में उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट सरकार के काम काज के लिए नीति निर्धारण न करे. प्रधानमंत्री का यह दुख प्रशासन की उस चिंता से प्रकट होता है जो न्यायालयों के हस्तक्षेप से जुड़ा है. पहले भी कई मौकों पर न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच टकराव के मौके आये हैं. अनाज के सड़न के सवाल पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से एक बार फिर वह सवाल उठ खड़ा हुआ है, जिस पर प्रधानमंत्री अपनी आपत्ति जाहिर कर रहे हैं....
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राजनीतिक हिन्दुत्व पर दिग्गी का दांव
हिन्दुओं का ठेकेदार बनने की आरएसएस और उसके मातहत संगठनों की कोशिश को चुनौती मिल रही है. भगवान् राम के नाम पर राजनीति खेलकर सत्ता तक पंहुचने वाली बीजेपी के लिए और कोई तरकीब तलाशनी पड़ सकती है क्योंकि कांग्रेस की नयी लीडरशिप हिन्दू धर्म के प्रतीकों पर बीजेपी के एकाधिकार को मंज़ूर करने को तैयार नहीं है. कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह ने साफ़ कहा है कि हिन्दू धर्म पर किसी राजनीतिक पार्टी के एकाधिकार के सिद्धांत को वे बिल्कुल नहीं स्वीकार करते....
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