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शिवसैनिकों से सहानुभूति की जरूरत

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महाराष्ट्र में शिवसेना और उसके शिवसैनिकों का उत्पात एक बार फिर चर्चा में है. वरिष्ठ पत्रकार शेष नारायण सिंह का मानना है कि अगर महाराष्ट्र में स्थायी शांति लानी है और भविष्य में मुंबई को उत्पात से बचाना है तो कांग्रेस और भाजपा की जिम्मेदारी है कि वे शिवसैनिकों के लिए अपने-अपने दलों के दरवाजे खोल दें ताकि वे मुख्यधारा की राजनीति में शामिल हो सकें.

पहली बार मुंबई की सड़कों पर शिवसेना अपमानित हुई है. इसके पहले कभी भी शिवसेना ने ऐसा दिन नहीं देखा था. परेल और दादर के औद्योगिक इलाकों में १९७० के आस पास इनकी ताक़त का अहसास होने लगा था. कम्युनिस्ट विधायक, कृष्णा देसाई की हत्या के बाद तो बहुत बड़ी संख्या में मिल मजदूर शिवसेना वालों से डरने लगे थे. दत्ता सामंत की हत्या के बाद से यह संगठन मुंबई और उसके उप नगरों में सबसे ताक़तवर जमात के रूप में माना जाने लगा था. बेरोजगार युवकों की टोलियाँ उन दिनों जार्ज फर्नांडीज़ के साथ भी जुड़  रही थीं लेकिन  वहां पैसा-कौड़ी नहीं था  लिहाजा ज़्यादातर नौजवान शिव सेना से जुड़ने लगे. आज तक यही हाल था. मोहल्ले में लोग शिव सेना के युवकों से डरते थे और चंदा देते थे. कांग्रेस और बीजेपी की सरकारें कभी भी शिव सैनिकों के खिलाफ सख्त कार्रवाई नहीं करती थीं. कभी कोई वारदात होती थी तो मुंबई पुलिस कुछ देर थाने में बैठाकर छोड़ देती थी. शायद इसीलिए शिव सेना में भर्ती होना राजनीति के साथ साथ आर्थिक विकास और मुकामी सम्मान का भी रास्ता माना जाता था लेकिन पिछले १० दिनों में सब कुछ बदल गया.

राहुल गाँधी की यात्रा और उनके पारिवारिक मित्र, शाहरुख खान की फिल्म को हिट करवाने के चक्कर में महाराष्ट्र की कांग्रेसी सरकार की पुलिस ने शिव सैनिकों को खूब पीटा. शरद पवार की पार्टी  का उपमुख्यमंत्री भी उन्हें  बचा न सका. पहली बार मुंबई की सडकों पर सरकार के हाथों शिव सैनिक पिटा है. जिसका नतीजा यह है कि वह निराश है. बाल ठाकरे की अपने बन्दों को बचा सकने की योग्यता पर पहली बार सवाल उठा है. ज़ाहिर है कि बड़ी संख्या में नौजवान हताशा का शिकार हुआ है. यह नौजवान बिलकुल निर्दोष है. इसे सामाजिक जीवन में जीने और अपने नेता की बात मानने की आदत पड़ चुकी है. इसको फिर से किसी राजनीतिक जमात में शामिल किये जाने की ज़रुरत है. इसलिए मुम्बई में सक्रिय राजनीतिक पार्टियों को चाहिए कि वे इन नौजवानों को अपने साथ ले कर इनका राजनीतिक पुनर्वास करें. अगर ऐसा न हुआ तो यह नौजवान किसी ऐसे संगठन में भी शामिल हो सकते हैं जिसके देशप्रेम का रिकॉर्ड संदिग्ध हो. इसलिए कांग्रेस,  बीजेपी और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी को तुरंत यह घोषणा कर देनी चाहिए कि अगर शिव सेना से निराश नौजवान चाहें तो उनको सम्मान पूर्वक मुख्य धारा की इन पार्टियों में शामिल किया जाएगा. यह बहुत ज़रूरी है क्योंकि शिव सेना के मालिकों की नीति कुछ भी हो, मराठी बेरोजगार नौजवान तो उनके साथ देश और समाज की सेवा के लिए जुडा था. उसका इस्तेमाल इन लोगों ने गलत काम के लिए कर लिया तो नौजवान का कोई दोष नहीं है. इसलिए उसे बदमाशी की राजनीति से बाहर लाकर मुख्य धारा में शामिल करने का यह अवसर गंवाया नहीं जाना चाहिए .

सवाल  उठ सकता है कि इन गुमराह नौजवानों को राजनीति के पचड़े से दूर रख कर किसी रचनात्मक काम में लगा  दिया जाए तो ज्यादा उपयोगी होगा. लेकिन इस तर्क में बुनियादी दोष है. पिछले १५-२० साल से जो लडके राजनीति में काम कर रहे हैं ,उन्हें और किसी भी काम में लगाना खतरे से खाली नहीं है. अव्वल तो राजनीति में शामिल ज़्यादातर नौजवानों के पास कोई ख़ास योग्यता नहीं होती और अगर होगी भी तो इतने दिनों तक शिव सेना की गुंडई और दादागीरी की राजनीति करके वे बेचारे सब कुछ भूल भाल गए होंगें. ऐसी हालत में उन्हें राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप  में ही पुनर्वास देने के बारे में सोचा जा सकता है. दूसरा सवाल यह उठ सकता है कि शिव सेना टाइप राजनीति करने के बाद क्या यह नौजवान मुख्य धारा की राजनीति में शामिल हो सकते हैं. जवाब हाँ में है क्योंकि बाकी पार्टियों में भी गुंडे ही बहुतायत में हैं. हाँ उनके यहाँ फर्क इतना है कि हर पार्टी का राष्ट्रीय नेतृत्व खुले आम बदमाशी को समर्थन नहीं करता जबकि शिव सेना वाले राष्ट्रीय नेता भी दादागीरी के पक्ष में भाषण देते पाए जाते हैं.

इस बहस को हल्के में लेने की ज़रुरत नहीं है क्योंकि इस बात का भी पूरा ख़तरा बना हुआ है कि  दिशा से बहक गए ये  नौजवान आतंकवादियों के हाथ भी लग सकते हैं. जहां तक महाराष्ट्र का सवाल है वहां बड़ी संख्या में आतंकवादी संगठनों के रिक्रूटिंग एजेंट घूम रहे हैं. मालेगांव में विस्फोट करने वालों को भी आतंकवादी गतिविधियाँ चलाने के लिए नौजवानों की ज़रुरत है और उनके लिए हिंदुत्व की ट्रेनिंग पा चुके इन नौजवानों का बहुत ही ज्यादा इस्तेमाल है. इन लोगों का इस्तेमाल पाकिस्तान में रहने वाले आतंकवादी भी कर सकते हैं. यहाँ यह बात भी साफ़ कर देने की ज़रुरत है कि आतंकवादी का कोई मजहब नहीं होता. पिछले ३० वर्षों का इतिहास देखें तो समझ  में आ जाएगा कि पाकिस्तान की आई एस आई ने पंजाब, असम और मुंबई में आतंकवादी गतिविधियों के लिए हिन्दू और सिख लड़कों का इस्तेमाल किया था. इसलिए सभी पार्टियों को शिव सेना की तबाही का जश्न मनाना छोड़कर फ़ौरन उन लड़कों को राष्ट्र की मुख्य धारा में लाने की कोशिश करनी चाहिए जो शिव सेना के चक्कर में रास्ते से बहक गए थे

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Prem Shukla on 16 February, 2010 14:31;01
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Shesnarayanji,Door ke dhol to aksar suhavane huaa karate hain,aapko Mumbai ki dhol bahut door se bhi karkash lag rahi hai.Shivsena ko algaavavadi dal samajhane ki Media ki samajh par taras aataa hai.Shivsena 80%samaajniti aur 20% Raajniti me bharossa rakhane waali party hai,shivsainik raajniti ki bajaay saamaajik sarokaaron me adhik samay lagaate hain, rahi Congress ki baat to woh to aayaatit Maal par hi jindaa party hai.
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aayush on 16 February, 2010 15:30;27
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I am fully agree with shesh narayan singh ji.
क्योंकि शिवसेना पहले हिन्दुओं की पार्टी थी, बाद में मराठियों की हो गई। इसी के‍ चलते
इनके साथ केवल सहानुभूति भी मराठियों की ही होगी (यदि होगी तो) अन्य किसी की भी नहीं। अब यह किसी भी मुद्‍दे पर देशवासियों को बरगला नहीं सकते। इनका असली चेहरा उजागर हो गया है। मराठियों का समर्थन भी केवल वोटों के लिए किया था और उन मराठियों ने भी इनको ठुकराकर विपक्ष में बैठा दिया। अब यह धोबी के कुत्ते की भाँति हैं जो न घर के रहे न घाट के। इनके साथ न सचिन है, न अंबानी, न अमिताभ। पुलिस के लठ इन्हें मुबारक।
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डी सिंह on 16 February, 2010 16:49;53
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भाई प्रेम ने सही फरमाया। एक सुझाव और है कि शेष को शेषन की तरह राजनीति का एक स्कूल खोल लेना चाहिए। ऐसे लोगों को मुख्यधारा वैसा ही शब्द हो गया है जैसे धर्मनिरपेक्षता जो खुद में कथित है
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Kamaal Hussan on 16 February, 2010 20:41;33
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मेरी समझ में एक बात नहीं आयी की शेष नारण जी जैसे लोगो को ये गलत्फह्मिकाब से और किस आधार पर हुई है की शिवसैनिको के लिए भाजपा और विशेषकर कांग्रेस के दरवाजे बंद है..कांग्रेस तो इतनी बड़ी धर्मनिरपेक्ष है की अगर उसका बस चले तो बक ठाकरे को भी पार्टी में लेले..पहले भी उसने संजय निरुपमं, नारायण राणे और छगन भुजबल जैसो को पार्टी सदस्य के तौर पर या सहयोग के नाम पर अपने साथ लिया ही है..जब तक ये उनके साथ रहे फिरका परस्त रहे और कांग्रेस ने इन्हें पाक साफ होने का सर्टिफिकेट दे दिया..और जनाब शेष नारायण जी जैसे (अ) पत्रकारों को लगता है की अभी दरवाजे खोलने की जरूरत है..तरस आता है आज की पत्रकारिता पर..
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prashant mehrishi on 16 February, 2010 20:51;36
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bhai shesh narayan ji mujhe to aap se ab wakai sahanubhuti hone lagi hai.
kuchh mere parichit logo ki industries hai agar aap chaho to ye muft ka lekh likhne ke sthan par aapka punarvas kisi factory main ho sakta hai.
aapko pata hai is desh ki sabse badi gundo, chor afsaro, baiman thekedaro , ki jamat congress hai jisne desh main bhrashtachar ka regularisation kar diya hai aur aaj is aadhunik yug main aadmi aise navdhanadyao ko hi pasand kar raha hai aap bhi vahi bhool kar rahe ho. shivsena se main sehmat nahi hoon par kam se kam congress ki gundagardi ko nutrralize to kar rahe hai.
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शेष नारायण सिंह on 16 February, 2010 21:53;47
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प्रशांत महर्षि जी ,
यह पुनर्वास वाली बात ठीक है.बात चलाइये.शायद कुछ बात बन ही जाए.
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Bajarang Pasi on 16 February, 2010 22:02;47
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अव्वल बात तो ये है कि लेखक को सहानुभूति की जरूरत है. फालतू में कलम घिसने की बजाय कोंग्रेस का टिकट लेकर सत्ता-सुख भोगते.
सच ये है कि मुम्बई और देश में शिवसेना जैसे संगठन नहीं होते तो मुम्बई कभी का दाउद इब्राहिम का चारागाह बन जाता है. आज भी शिवसेना सुप्रीमो की एक हुंकार से लाखो की तादाद में शिवसैनिक अपना सर देने को तैयार हो जाते हैं. शेष नारायण जी आप बताइए कि देश में सच को सच और झूठ को झूठ कहने की हिम्मत कितने नेताओं के पास है...?
अगर आप शिवसेना को ख़त्म करना हे चाते हैं तो कोंग्रेस, वामपंथियों की देश विरोधी और मुस्लिम तुष्टिकरण की नीतियों को ख़त्म कीजिए. ताकि शिवसेना जैसे डालो के पास कोई मुद्दा ही नहीं रहे.
बाकी आप समेत तमाम सेकुलर मीडिया कोंग्रेस के इशारों में पर किसी हीरो को विलेन साबित करने का अभियान चलाए तो क्या कहें?
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suneeldutt on 16 February, 2010 23:13;23
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sabhi ko mukhya dhara mein lana maane kya? kiski mukhyadhara? aap ki ya fir un yuvkon ki? sawal vahi hai ki yeh shabad vastav mein kya maane rakhte hain?secularism & mainstream are very wide terms & can we used for any ones benefit..
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ghakki on 16 February, 2010 23:32;01
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shesh ji is desh ki sabhi partiya sad chuki hai ab jaoorat hai ak naye kranti ki naye soch ki naye vicharoon ki na ki unhi ghise piti purani virus lagi partiyo ke gun gane au unhe sudharne ki
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Vicky G on 17 February, 2010 14:20;16
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शेष जी की धारा मुख्यधारा यानी गंगा और बाकी सभी धाराएं गंदा नाला? और यह निर्णय किसने सुनाया? खुद शेष जी ने! वाह साहब! यह है सेकुलर पत्रकारिता का उत्तम उदाहरण.
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image शेष जी शेष नारायण सिंह मूलतः इतिहास के विद्यार्थी हैं. शुरू में इतिहास के शिक्षक रहे. .बाद में पत्रकारिता की दुनिया में आये...प्रिंट, रेडियो और टेलिविज़न में काम किया. इन्होने १९२० से १९४७ तक की महात्मा गाँधी की जीवनी के उस पहलू पर काम किया है जिसमें वे एक महान कम्युनिकेटर के रूप में देखे जाते हैं..1992 से अब तक तेज़ी से बदल रहे राजनीतिक व्यवहार पर अध्ययन करने के साथ साथ विभिन्न मीडिया संस्थानों में नौकरी की. अब मुख्य रूप से लिखने पढने के काम में लगे हैं. एक अखबार में काम और विस्फोट.कॉम के सम्मानित स्तंभलेखक.
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