बैतालों से कैसे निपटेंगे बीजेपी के विक्रमादित्य?
राख से तो नहीं, पर गोबर से उठने की कोशिश जरूर कर रही बीजेपी। जब बीजेपी में काल, कपाल, महाकाल एपीसोड चल रहा था। अनुशासन हांफ रहा था। तब संघ प्रमुख मोहन भागवत ने भी कहा था। राख से भी उठ खड़ी होगी बीजेपी। पर जब नेतृत्व परिवर्तन की रेस खत्म हो गई। गडकरी, सुषमा, जेतली मैडल पा गए। तो अब समूची बीजेपी का ढर्रा बदलेगा।
बीजेपी का इन्दौरी माहौल तो कल ही आपको बताया। अब बुधवार को प्यारेलाल खण्डेलवाल सभागार में बीजेपी की वर्किंग कमेटी शुरू होकर खत्म भी हो गई। पर सभागार की सज्जा अद्भुत। बीजेपी फाइव स्टार संस्कृति से हट गांवों की ओर जाती दिखी। बीजेपी अभी तक सिर्फ शहरी पार्टी के तौर पर जानी जाती रही। पर पिछले चुनाव में शहरी आधार भी हवा हो गया। सो अब गांवों की ओर लौट नए आगाज की तैयारी। अब राहुल गांधी भले दलितों की झोंपड़ी में जाकर सुर्खियां बटोरें। पर बीजेपी ने खुद झोंपड़ी में चौपाल जमाई। खेत, खलिहान, बैलगाड़ी, साइकिल तो थे ही। खाने को भी गाजर-मूली, भुने हुए छोलिए आदि ताकि बीजेपी वर्किंग कमेटी के मेंबरों को गांवों का अहसास बारीकी से हो। झोंपड़ीनुमा सभागार में ग्रामीण भारत की अद्भुत झलक। बैट्री चालित गाड़ियों से आडवाणी-गडकरी समेत तमाम गैस्ट पहुंचे। साइकिल सिर्फ वर्करों तक ही सीमित रही। झोंपड़ी के आजू-बाजू में छोटे-छोटे मण्डप लगाए गए। ताकि मेंबर जब बौद्धिक सुनते-सुनते ऊबने लगें। तो बाहर मण्डप में लगी चारपाई पर टांगें सीधी कर सकें।
अब गुरुवार को राजमाता विजया राजे सिंधिया सभागार में दो दिनी महाचौपाल जमेगी। तो नितिन गडकरी बीजेपी के औपचारिक दूल्हा बनेंगे। पर बुधवार को बीजेपी का गांव बसा तो मुखिया के तेवर भी बदल गए। अब गडकरी ने हुंकार भरी। तो फिर क्या छोटे और क्या बड़े। वैसे भी गडकरी ने अध्यक्षी राजनीतिक महत्वाकांक्षा से नहीं सम्भाली। अलबत्ता संगठन को दुरुस्त करना ही तीन साल का एजण्डा। सो उनने बौद्धिक की गाड़ी बिना ब्रेक दौड़ाई। बोले- "पार्टी के लिए छोटे वर्कर परेशानी पैदा नहीं कर रहे। बड़े नेता ही परेशानी पैदा कर पार्टी पर सवाल उठने का मौका दे रहे।" अब गडकरी ने नाम तो नहीं लिया। पर इशारा राजनाथ के टर्म में पार्टी की फजीहत कराने वाले नेताओं की ओर। राजनाथ बनाम जेतली विवाद और वसुंधरा राजे की रार के अलावा जसवन्त-यशवन्त-शौरी का चिट्ठीनामा पार्टी अनुशासन में पलीता लगा चुका। सो गडकरी ने मंच से कड़ी हिदायत दे डाली। खुद सुधर जाओ, वरना हम तो सुधार ही देंगे। यानी गडकरी ने जता दिया, उम्र में छोटे हुए तो क्या हुआ। संगठन के मुखिया की कुर्सी पर हैं। सो कम से कम सीनियर छोटा बच्चा समझने की न सोचें। सो गडकरी ने खुले दिल से बीजेपी की कमियां कबूलीं। माना, बीजेपी न कमजोर हुई और ना ही धार कम। पर इतना जरूर हुआ कि नेताओं का दिल छोटा हो गया। यानी नागपुर से दिल वालों की दिल्ली आए गडकरी को दिल्ली के बड़े नेताओं का दिल छोटा दिख रहा।
वाकई बीजेपी के तमाम विवाद में सीनियर नेताओं की भूमिका किसी से छुपी नहीं। सो उम्र में छोटे गडकरी ने बड़ी नसीहत देने में कसर नहीं छोड़ी। गंवई परिवेश में गडकरी ने ठेठ संघी अन्दाज में बता दिया। बड़े दिखाएं बड़प्पन, पाएं आदर। सीनियर नेता जबरन सम्मान न मांगें। सम्मान नेता के आचरण से मिलता है, न कि अपेक्षा से। सो छोटे दिल से बड़ा काम नहीं होता। नेता दूसरों की लकीर छोटी करने के बजाए अपनी बड़ी लकीर खींचें। गडकरी ने सीनियरों को वाजपेयी की कविता भी सुनाई। वाजपेयी ने लिखा है- "छोटे दिल से बड़ा काम नहीं होता, टूटे मन से कोई खड़ा नहीं होता।" सवा घंटे के लंबे भाषण में गडकरी ने नेताओं को मन्थन की नसीहत दी। तेरा-मेरा से ऊपर उठ संगठन की सेवा में जुटने को भी कहा। अब तेवर-ए-गडकरी देख आप खुद अन्दाजा लगा लो। छोटे गडकरी इतनी बड़ी नसीहत किसके इशारे पर दे रहे। याद है ना, अपने जयपुर में संघ प्रमुख मोहन राव भागवत ने कहा था- "बीजेपी को मेडीसिन की जरूरत है या सर्जरी की या कीमोथेरैपी की, यह बीजेपी खुद ही जाने।"
वैसे भी भागवत पशुओं के डाक्टर ठहरे सो नेता का इलाज कैसे करते? पर संघ प्रमुख ने इलाज का पूरा खाका बनाया। गडकरी को अध्यक्ष बनवा भेजा तो दवाई की परची भी थमा दी, सो जैसे ही गडकरी ने समान सम्भाली। तत्काल बीजेपी का अन्दरूनी घमासान ठहर गया। यानी पहले राउण्ड में गडकरी की मेडीसिन असरकारक हुई। तो अब इन्दौर अधिवेशन में सर्जरी की तैयारी हो गई। वर्किंग कमेटी के बन्द कमरे वाली मीटिंग में गडकरी ने सर्जरी का अपना तरीका बता दिया। छोटे दिल को बड़ा करने का इलाज बताया। यानी बीजेपी की सर्जरी सीधे दिल से शुरू होगी। और फिर भी बीजेपी अपने पुराने ढर्रे पर नहीं लौटी। तो सीनियर हो या जूनियर, नितिन गडकरी सीधे कीमोथेरैपी आजमाएंगे। भले कीमोथेरेपी से दर्द होगा। पर संघ और गडकरी के फार्मूले में तब कोई चारा भी नहीं बचेगा। सो गडकरी की सर्जरी अब कितने सीनियरों को रास आई। यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा। यों फिलहाल सबको इन्तजार है टीम-ए-गडकरी का। अब भले गडकरी का क्वदिल मांगे मोर।ं गडकरी पदासीन हुए, तो राजनाथ जमाने का दर्द जुबां पर था। राजनाथ भी पीड़ा नहीं छुपा पाए। कहा- "अध्यक्ष का पद राजा विक्रमादित्य के समान।" यानी गडकरी बीजेपी के विक्रमादित्य हो गए, पर अभी बैताल कम नहीं। देर शाम तक कार्यकारिणी वसुंधरा की बाट जोहती रही और प्रवक्ता सवाल टालते रहे।
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