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गडकरी की टीम गरीब और दलित विरोधी

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आखिर, जो सोचा था वही हुआ। न तो सोच बदली है न दृष्टि। सोचने की शक्ति भी वहीं की वहीं है। देखने की क्षमता में भी कोई सुधार नहीं हुआ है। नितिन गडकरी ने अपनी टीम की घोषणा कर दी है। टीम देखकर लगता है कि पूरा कोटे का इस्तेमाल हुआ है। वही लोग, वही टीम, वही सोच। जो लोग जमीन पर फेल हो गए, आधारहीन रहे, वही एक बार फिर गडकरी की टीम में आ गए हैं।

और तो और कुछ लोगों ने उन  समझदारों को बाहर किया जो पार्टी को मजबूत करते। कुछ लोगों ने कोटे की पद्वति से अपने समर्थकों का नाम डलवा दिया। दिलचस्प बात है कि पूरी टीम में कहीं भी सामंजस्य, सामाजिक समता और जनाधार नहीं दिखता। कुछ नाराज न हो इसलिए टीम में रखे गए है तो कुछ इसलिए रखे गए है कि वे किसी के खास है। कुछ एसे लोग है जो नाराज भी हो जाए तो कोई समस्या नहीं, क्योंकि न तो इनके पास कोई आधार है न दम, फिर भी वे टीम में अपनी जगह बना गए। गडकरी की टीम में शामिल महिलाओं की पृष्टभूमि को देख मुलायम सिंह और लालू प्रसाद यादव के उस आरोप में दम नजर आता है कि 33 प्रतिशत आरक्षण से देश की एलिट और शहरी महिलाएं गरीब और पिछड़े महिलाओं की हक मार लेंगी।

नितिन गडकरी की टीम में शांता कुमार, कलराज मिश्र, विनय कटियार, भगत सिंह कोश्यारी, मुख्तार अब्बास नकवी, करुणा शुक्ला, नजमा हेप्तुल्ला, हेमा मालिनी, विजय चक्रवर्ती, पुरुषोत्तम रूपाला और श्रीमती किरण घई बतौर उपाध्यक्ष आए है। जबकि थावरचंद गहलौत, अनंत कुमार, वसुंधरा राजे, विजय गोयल, अर्जुन मुण्डा, रविशंकर प्रसाद, धर्मेन्द्र प्रधान, नरेन्द्र सिंह तोमर, जगत प्रकाश नड्डा, बतौर महासचिव आए है। रामलाल, वी सतीश और सौदान सिंह संगठन महामंत्री के तौर पर आए है। जबकि  संतोष गंगवार, श्रीमती स्मृति इरानी, श्रीमती सरोज पाण्डे, श्रीमती किरण माहेश्वरी, श्री तापिर गाव, नवजोत सिंह सिद्धू, अशोक प्रधान, वरुण गांधी, मुरलीधर राव, किरीट सोमैया, डॉ लक्ष्मण, कैप्टन अभिमन्यु, श्रीमती आरती मेहरा, भूपेन्द्र यादव और कुमारी वाणी त्रिपाठी सचिव के तौर पर आयी है।

पहली बार महाराष्ट्र से बाहर निकले नितिन गडकरी ने पूरी तरह से अपनी टीम में ग्रामीणों, दलितों और पिछड़ों की उपेक्षा की है। शुरूआत उपाध्यक्ष से की जाए तो बेहतर होगा। शांता कुमार को इसलिए टीम में रखा गया है कि वे प्रेम कुमार धूमल से नाराज न हो। हिमाचल प्रदेश से बाहर जनाधारहीन शांता कुमार को इसलिए सिर्फ टीम में लिया गया है कि वे प्रेम कुमार धूमल के खिलाफ बगावत को और न हवा दे। हालांकि चार सीटों वाले हिमाचल प्रदेश में जो काम भाजपा ने किया है वही उतरांचल में किया है। वहां के नाराज भगत सिंह कोश्यारी रमेश पोखरियाल निशंक को नुकसान न कर दे इसलिए उन्हें भी टीम में ले लिया गया है। उधर कलराज मिश्र की स्थिति सारे जानते है। उतर प्रदेश के जनाधारहीन कलराज मिश्र को टीम में लेकर राजनाथ सिंह को चिढ़ाया गया है। उपाध्यक्ष पद पर दो मुसलमान है। पर दोनों शो पीस है। नजमा हेपतुल्ला कांग्रेस में शो पीस रह चुकी है। जबकि मुख्तार अब्बास नकवी मुसलमानों में आज तक आधार नहीं बना पाए। राजेंद्र सिंह रज्जू भईया के दामाद होने का फायदा नकवी आजतक उठा रहे है। जबकि वे रामपुर जैसे मुसलिम बहुल इलाके में जमानत तक जब्त करा चुके है।

दिलचस्प बात है कि गडकरी की टीम में जो मुसलमान रखे गए है वे जनाधारहीन है। दूसरी तरफ मध्यवर्ती किसान जातियों को जगह नहीं मिली है। बिहार और उतर प्रदेश से मध्यवर्ती किसान जातियों को गडकरी ने पूरी तरह से खारिज किया है जिसका खामियाजा गडकरी को भुगतना पड़ सकता है। बिहार से किसी भी राजपूत या भूमिहार को टीम में जगह नहीं दी गई है, जबकि इस साल अक्तूबर में ही बिहार में चुनाव है। जबकि बिहार से ही पिछड़े यादव और कुर्मी को भी टीम में जगह देना गडकरी ने उचित नहीं समझा है। बिहार के राजपूत और भूमिहार भाजपा समर्थक है। अब टीम में उनकी जाति को जगह नहीं मिलने का खामियाजा तो भाजपा को भुगतना पड़ेगा। क्योंकि उपरोक्त दोनों जातियों को राजद, कांग्रेस और जद (यू) तीनों पार्टिया महत्व दे रही है। बिहार से दो लोग जो आए है उनका आधार ही बिहार में नहीं है। रविशंकर प्रसाद कायस्थ है और उनका आधार बिहार में न के बराबर है। रविशंकर प्रसाद की जाति का वोट बिहार में आधे प्रतिशत के करीब ही है। किरण घई बिहार से है। उनका भी आधार बिहार में जीरो है और पंजाबी वोटर बिहार में न के बराबर है। किरण घई के पति कायस्थ है और उन्हें उपाध्यक्ष बनाकर भाजपा ने कायस्थों को ही खुश किया है। बिहार में ही नहीं  उतर प्रदेश में चौकीदार की भूमिका में पहुंच चुकी भाजपा ने जातीए संतुलन को पूरी तरह से नजर अंदाज कर दिया है। यादव, लोध, शाक्य, अति पिछड़ा गडकरी की टीम से गायब है। बिनय कटियार पिछड़े जरूर है पर पिछड़ों के नेता होने के बजाए वो विश्व हिंदू परिषद के कोटे से टीम में जगह पा गए है। सोनिया गांधी से जमानत जब्त करवाने के बाद कटियार पूरी तरह  से जमीन से उखड़ चुके है।

निश्चित तौर पर भाजपा ने संगठन में 33 प्रतिशत महिलाओं को रखा है। पर जो महिलाएं टीम में ली गई है वो मुलायम सिंह और लालू यादव के आरोपों को सही ठहराती है। दोनों लोकसभा और विधानसभा में 33 प्रतिशत आरक्षण का विरोध कर रहे है। विरोध कारण है कि एलिट महिलाएं लोकसभा में आएंगी और गरीब महिलाओं को आने का मौका नहीं मिलेगा। इसलिए वे पिछड़ों और मुसलमानों की आरक्षण की मांग कर रहे है। दिलचस्प बात है कि टीम गडकरी में एलिट शहरी महिलाओं ने ही कब्जा जमाया है। चाहे वो नजमा हेपतुल्ला हो या हेमा मालिनी या स्मृति ईरानी। करूणा शुक्ला अटल बिहारी वाजपेयी की रिश्तेदार है। एक वाणी त्रिपाठी है वो भी एलिट या शहरी क्लास से ही है। किरण घई और आरती मेहरा भी शहरी महिला है जिनका गांव से गरीबी से कोई लेना देना नहीं है। एक पटना शहर की एलिट है तो एक दिल्ली की एलिट है। गांव देहात की महिलाएं गडकरी की टीम से गायब है। सिर्फ सरोज पांडेय है जो चुनाव जीतकर लोकसभा में आयी है और शायद जमीनी महिला है। भाजपा की महिला टीम को देख मुलायम के आरोप सही नजर आते है।

दिलचस्प बात है कि टीम में उस अर्जुन मुंडा को महासचिव बनाया गया है जो राजनाथ सिंह के हुक्मदार थे। भाजपा को राजनाथ सिंह के इशारे पर झारखंड में खत्म करने वाले अर्जुन मुंडा ही थे। लेकिन झारखंड के परिणाम से सीख लेने के बजाए भाजपा ने अर्जुन मुंडा को टीम में रख लिया है। जबकि उस बाबू लाल मरांडी को टीम में लाने की कोई कोशिश भाजपा ने नहीं की जो अपने दम पर झारखंड में दस सीट ले गया। वहीं नरेंद्र मोदी का विरोध और पक्ष दोनों का ख्याल गडकरी ने रखा। संगठन को मजबूत करने वाले और मजबूत करने की आगे भी क्षमता रखने वाले संजय जोशी को नरेंद्र मोदी के विरोध के कारण टीम में जगह नहीं मिली। संजय जोशी को लेकर एलके आडवाणी और अरुण जेतली भी मोदी के साथ थे। वहीं मोदी की सिफारिश पर पुरूषोतम रूपाला को राष्ट्रीय टीम में गडकरी ने रख लिया है।

यह तय है कि भाजपा का अब जल्द भला नहीं होगा। एक बार पार्टी पूरी गर्त में जाएगी। इस पार्टी में दलितों, पिछड़ों और ग्रामीणों के लिए कोई जगह नहीं है। जो पिछड़े आए है वो पिछड़े होने के कारण नहीं आए है। वे कोटे से आए है। निश्चित तौर पर उतर प्रदेश में भाजपा को वर्तमान टीम कोई जगह नहीं दिला पाएगी। क्योंकि यूपी के जो नेता टीम में लिए गए है वे हवाई है। बिहार में इस साल अक्तूबर में चुनाव है। चुनाव में भाजपा का प्रदर्शन इस बार देखने लायक होगा। पहले से ही कमजोर हो रही भाजपा इस टीम की घोषणा के बाद और कमजोर होगी। क्योंकि बिहार से जो लोग टीम में आए है वो बिहार की धरती पर जीरो है। वे न तो जनता के बीच अपनी कोई पकड़ रखते है न खुद ही चुनाव लड़ने की क्षमता रखते है।

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Kalyan Meena on 17 March, 2010 02:46;28
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बड़ी गलती हो गयी. गडकरी ने आपसे पूछा नहीं...!
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संजीव पाण्डेय on 17 March, 2010 11:27;55
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कल्याण मीणा जी ध्यान से पढ़ ले

नितिन गडकरी की टीम में 33 प्रतिशत महिला। मुलायम और लालू के आरोप सही। एक भी ग्रामीण, दलित या पिछड़े पृष्ठभूमि की महिला नहीं। सारी शहरी एलिट महिला टीम में। शो पीस ज्यादा, जनता के बीच आधार कम। स्मृति ईरानी, हेमा मालिनी वाणी त्रिपाठी ग्लैमर के बल पर। जबकि किरण घई, नजमा हेपत्तुल्ला आधारहीन। करूणा शुक्ला अटल बिहारी वाजपेयी की रिश्तेदार। जमीन से आयी हुई सिर्फ सरोज पांडेय। सारी महिलाएं शहरी पृष्ठभूमि की। कोई भी ग्रामीण परिवेश की नहीं। दलित और पिछड़ी जातियों की महिला की टीम में पूरी उपेक्षा। महिलाओं को रखते हुए भी क्षेत्रीए संतुलन का ध्यान नहीं। मुख्य टीम में स्मृति ईरानी, हेमा मालिनी वाणी त्रिपाठी मुंबई से। आरती मेहरा दिल्ली से। किरण घई पटना से। देश के चार बड़े शहरों से चार महिला। जबकि मुख्य टीम में आयी अन्य दो महिला सरोज पांडेय और करूणा शुक्ला छतीसगढ़ से।

मुख्य टीम में आए मुसलमान नेता भाजपा का मुसलमानों में आधार बढ़ाने के बजाए भाजपा में सिर्फ मुसलमान होने का फायदा उठाते है। भाजपा को शो पीस मुसलमानों को दिखाने के लिए। मुख्तार अब्बास नकवी जनाधारहीन, तो शहनवाज हुसैन को बोलने की अक्ल तक नहीं। पिछले बीस सालों में एक भी नए मुसलमान को खोजने में भाजपा विफल। दोनों मुसलमानों को अपने हल्के में मुसलमानों के वोट ही नहीं मिलते। हिंदुओं के वोट पर जीतकर आते है। मतलब भाजपा को इन दो मुसलमानों से कोई फायदा नहीं, पर इन्हें मुसलमान होने का जोरदार फायदा भाजपा में मिलता है।

किसान मध्यवर्ती जातियों की उपेक्षा। गडकरी की टीम में किसान मध्यवर्ती जातियों को नकार दिया गया है। इससे पता चलता है कि भाजपा बनियों की पार्टी फिर बन रही है। मुख्य टीम में मध्यवर्ती किसान जातियां भूमिहार, राजपूत, गुर्जर, लोध, यादव और दक्षिण की किसान जातियां रेड्डी, कापू, कम्मा आदि की घोर उपेक्षा। पूरी तरह से टीम को देखकर लगता है कि ब्राहमणों और बनियों की पार्टी। उपाध्यक्ष टीम में ही करूणा शुक्ला, शांता कुमार और कलराज मिश्र ब्राहमण है।
पूरी तरह से क्षेत्रीए असंतुलन। चार सीट वाले हिमाचल प्रदेश से दो लोग मुख्य टीम में। पांच सीट वाले उतरांचल से एक मुख्य टीम में। जबकि चालीस सीट वाले बिहार से दो लोग टीम में, वो भी ग्रामीण बिहारी नहीं। किरण घई की पृष्ठभूमि बिहार की नहीं। दो लोग बिहार से। कायस्थ रविशंकर प्रसाद। पंजाबी किरण घई। उनके पति भी कायस्थ है। उतर प्रदेश को भी लगभग हिमाचल प्रदेश के बराबर प्रतिनिधित्व। क्योंकि यहां से अस्सी सीटें आती है। कुल मिलाकर भाजपा ने अपने गिरते जनाधार को यूपी स्वीकार में किया है। पर उसमें सुधार की सोच नहीं आयी है।

गडकरी की टीम में दक्षिण के राज्य पूरी तरह से साफ। आंध्र प्रदेश, तामिलनाडू, केरल से मुख्य टीम में कोई नहीं। कुल मिलाकर भाजपा ने खुद माना कि पिछले पचास सालों में भाजपा का इन राज्यों में कोई काम नहीं हुआ। यही कारण है कि इन प्रदेशों से कोई राष्ट्रीय स्तर के नेता भाजपा को नहीं मिला। एक वेकैंया नायडू आंध्र प्रदेश से। अपने ही जाति बिरादरी में स्वीकार्य नहीं। पूरी टीम में से बंगाल जैसे बड़ा और मह्तवपूर्व प्रदेश भी गायब। यानि की लगभग डेढ सौ सीटों वाले चार राज्यों से एक भी व्यक्ति भाजपा की मुख्य टीम में नहीं। इससे पता चलता है कि भाजपा का जनाधार अभी भी कितना सिमटा है। एसे में कांग्रेस के बराबर राष्ट्रीय पार्टी का दावा भाजपा का कितना सच है। इन राज्यों में कांग्रेस का विकल्प क्षेत्रीए दल ही अभी भी है।

उतर प्रदेश के जाट भाजपा के वोटर। पर भाजपा की राष्ट्रीय टीम में यूपी के जाट नहीं। कुल मिलाकर भाजपा ने अब खुद ही जाटों को अजीत सिंह के पाले में जाने का संदेश दे दिया है। वहीं हरियाणा के जाट कांग्रेस के वोटर पर भाजपा ने उस अभिमन्यू सिंह को टीम में लिया जो लोकसभा भी हार गए है और विधानसभा भी हार गए।
कांग्रेस कई राज्यों में अब अपने दम पर लड़ने की तैयारी में। वहीं भाजपा को देश के आधे से ज्यादा राज्यों में सहयोगी दलों की बैशाखी की जरूरत। झारखंड जैसे राज्य में भी अब छोटा सहयोगी बनना पड़ा। बंगाल, उड़ीसा से भाजपा साफ हो गई है। उतर-पूर्व में भाजपा का आधार ही नहीं बना है। उतर भारत के हरियाणा और पंजाब में भाजपा सहयोगियों की बैशाखी रहती है। दक्षिण के आंध्र प्रदेश, केरल, तामिलनाडू में भाजपा के पास तो अब सहयोगियों भी नहीं है। महाराष्ट्र जैसे राज्य में भाजपा शिवसेना के छोटे भाई की भूमिका में। बिहार में जद यू के छोटे भाई के रुप में। यूपी में छोटे भाई तो छोड़े अब सिर्फ चौकीदार या द्वारपाल की भूमिका रहेगी भाजपा की। भाजपा के लोग अब सपा, बसपा या कांग्रेस के दरवाजे खोलने या बंद करने का काम करेंगे।
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Nandan on 17 March, 2010 12:05;43
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kyon bakwas kar ho, kabhi kahte ho
गडकरी की टीम गरीब और दलित विरोधी hai aur age kehte ho
बिहार से किसी भी राजपूत या भूमिहार को टीम में जगह नहीं दी गई है,
PAGAL TO NAHI HO YAR TUM,
kya tuhe lena chahiye tha.
ya sirf kuch bhi karo
"APAN TO BJP KA VIRODH KAREGA HI"
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Vicky G on 17 March, 2010 12:09;04
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-३३ प्रतिशत को जगह दी, पर ग्रामीणों को क्यों नहीं दी?
-छत्तीसगढ को जगह दी, पर फ़लां राज्यों को क्यों नहीं दी?
-उत्तर को खूब प्रतिनिधत्व मिला, पर दक्षिण को क्यों भूल गए? वेंकैया को लिया भी तो उनका कोई मोल नहीं.
-उत्तर से भी फ़लां-फ़लां को क्यों ले लिया? यह तो ऐसा है, वह तो ऐसा है.
- इसे बोलना ही नहीं आता, इसे क्यों ले लिया?
- इसे बोलना तो आता है, पर इसका कोई जनाधार नहीं, इसे क्यों ले लिया?
- यह जनाधार वाला वक्ता है, पर इसकी जाति ठीक नहीं. यह शहरी भी है, इसे क्यों लिया?
- यह तो नाम का मुसलमान है, इसे क्यों ले लिया? - दाऊद इब्राहीम, अफ़जल गुरू इत्यादि का खूब जनाधार है, उन्हें क्यों नहीं लिया?
- धन्यवाद.
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sanjiv panday on 17 March, 2010 12:42;06
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उपरोक्त दो महोदयों के लिए
भईया गरीब, दलित और किसान विरोधी भाजपा अगर नहीं होती तो अपने दम पर सता में आती। साठ साल हो गए, बैशाखियों पर चल रही है। दम है तो अपने दम पर सता में आए। मित्रों भूमिहार और राजपूत को अगड़ी जाति नहीं, मध्यवर्ती किसान के रुप में ले।
ज्यादा देर नहीं लगेगी। अक्तूबर में पता चल जाएगा। बिहार में चुनाव होने वाला है। जो लोग भाजपा में पदाधिकारी बने है उनकी औकात सब जानते है। दाऊद इब्राहिम को लेने की जरूरत नहीं है। क्योंकि दाऊद इब्राहिम के पैसे पर पलने वाले भाजपा में कई नेता है। उनकी रोजी रोटी दाऊद इब्राहिम ही चलाते है। अब बेचारे उपरोक्त दो महोदय भाजपा में दरी बिछाने का काम करते है तो उसमें हमारी कोई गलती नहीं है। उनका काम है दरी बिछाने और अपने नेताओं को भगवान राम के रुप में देखा।
अरे भाइयों भाजपा ने तो राम को भी नहीं छोड़ा। राम को बेच दिया। सता आयी तो राम को भूल गए। समय बताएगा कि गडकरी की टीम कितना कामयाब होती है। लेकिन भाइयों इतना तय है कि बिहार और यूपी में गडकरी की टीम दरवाजा ही खोलेगी। सता में आने का ख्वाब भूल जाए। राम को बेचने वालों को देश की जनता माफ नहीं करेगी। नाम राम का लेते है और माल दाउद इब्राहिम से खाते है।
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Vick y G on 17 March, 2010 13:11;42
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लगता है श्री पांडेय को दरी बिछाने का काम भी नहीं मिला, इसलिए मज़बूरी में खुद को पत्रकार कहने लगे हैं. :-)
बाकी, उन्होंने जिस भाषा-शैली में जवाब देने की कोशिश की है, उससे भी उनके बौद्धिक स्तर का पता चल जाता है.
(नंदन की टिप्पणी में भी भाषा का स्तर अच्छा नहीं है, लेकिन हम एक पाठक और स्वनामधन्य पत्रकार से एक जैसी भाषा की उम्मीद नहीं करते.)
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Nandan on 17 March, 2010 14:30;55
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BJP ki 5 rajyon me satta kisi Sanjiv Pandey jaise FARZI patrkar (jiski bhasha kisi parti vishesh ke nichle star ke karykarta jaisi ho)ke badaulat nahi hai,
Lagta hai aap kisi khas apne ke na liye jane se itni ahat hain.
मित्रों भूमिहार और राजपूत को अगड़ी जाति नहीं, मध्यवर्ती किसान के रुप में ले।
agar ye kathit agri jatiyan nahi hai to kya sirf AAP JAISE BRAHMAN HI AGRI JATI HAI kya PANDEYJI.
Ek muft ki salah aur PATRKARIT mat kariye aap, koi BJP virodhi parti join karen,
aur Nukkad sabha kare, aur vahi ye betuki, satahi aur chichli bate karnen,
bahut tarakki karenge aap.
BEST OF LUCK
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शेष नारायण सिंह on 17 March, 2010 14:47;20
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संजीव पाण्डेय एक बेहतरीन लेखक हैं .. ज़ाहिर है कि उनकी बात से बी जे पी वाले असहमत होंगें लेकिन जो बात वे कहना चाहते हैं , बहुत ही स्पष्ट तरीके से कह देते हैं . उनका तर्जेबयाँ बहुत ही उच्च कोटि का है और भाषा टेलीग्राफिक .टिप्पणी करने वाले इन लोगों की बात का बुरा नहीं मानना चाहिए क्योंकि यह अपनी राजनीति के पक्ष में बात करते हैं . उनकीं बात से आप असहमत हो सकते हैं लेकिन उन्हें खारिज नहीं कर सकते. इन में से ज़्यादातर नौजवान हैं . इनकी राजनीतिक समझ में अगर कोई कमी है तो उसके लिए इन्हें दोषी मानना ठीक नहीं होगा.पूरा समाज ज़िम्मेदार है. क्योंकि फासिस्ट ताक़तों ने हर जगह डेरा जमा रखा है और जनवादी ताक़तों के लोग ढूँढने से भी नहीं मिलते .यह सारे नौजवान अभी किसी न किसी पार्टी के लिए काम करते हैं . जिस दिन यह नौजवान अपने हित में काम करना शुरू कर देगें, समाज में परिवर्तन और क्रान्ति के शुरुआत हो जायेगी.
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Vicky G on 17 March, 2010 15:18;04
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किसी के नाम और उसके द्वारा लिखी दो-चार पंक्तियों से ही यह जाना जा सकता है कि-
- वह नौजवान है या बुज़ुर्ग.
- उसकी राजनीतिक समझ में कमी है.
- वह फ़ासिस्ट शक्तियों के असर में है.
- वह किसी पार्टी के लिए काम करता है.
- वह अपने हित में काम नहीं करता.
यह "जनवाद" का कौन सा जादू है?
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aayush on 17 March, 2010 16:45;17
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Sahee likha hai sanjee bhai. Lekin lekhak aur patrakar ko feedback par is tarah kee pratikriya dena shobha naheen deta. Jinhen virodh karana hain karane den. Journalist hone ke naate hum to apane kaam par dhyaan den. Aapaka reply dena mujhe achchha naheen laga. Pls dont take otherwise.
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image संजीव पाण्डेय छात्र राजनीति से पत्रकारिता में आये संजीव पाण्डेय ने कई अखबारों के लिए काम किया है. हाल-फिलहाल तक अमर उजाला में कार्यरत थे. वर्तमान में चंडीगढ़ में रहकर स्वतंत्र पत्रकारिता और लेखन. विस्फोट.कॉम के नियमित स्तंभलेखक.
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शिव सेना की राह पर अकाली दल
पंजाब में सारा कुछ ठीक चल रहा था। कुछ दिन पहले ही निचली अदालत से बादल परिवार को आय से अधिक संपति के मामले में राहत मिली थी। पर यह राहत ज्यादा देर नहीं चली। घर में विस्फोट हो गया है। मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के भतीजे मनप्रीत सिंह बादल ने यह विस्फोट किया है। कुछ दिन पहले उन्होंने अपने ही राज्य सरकार की नीतियों की आलोचना कर केंद्र सरकार की नीतियों की तारीफ कर दी है। यह तब किया है जब राज्य में खुद मनप्रीत सिंह बादल वित्त मंत्री है।...
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न अचार है न मुरब्बा है, राहुल खाली डब्बा है
सबसे पहले तो उत्तर प्रदेश भाजपा को बधाई कि उसने राहुल गांधी का संघ ज्ञान बढ़ाने के लिए संघ विचारधारा को समझानेवाली पुस्तकों का सेट भेजा है. मध्य प्रदेश की तीन दिवसीय यात्रा में उन्होंने जिस प्रकार से संघ को सिमी के करीब ठहरा दिया उससे साबित होता है कि संघ विचारधारा के बारे में तो उन्हें तनिक भी अंदाज नहीं है, साथ ही यह भी आभास होता है कि वे राजनीतिक रूप से टीन और कनस्टर के ऐसे खाली डिब्बे हैं जो जैसे चाहे अपने हित के लिए इस्तेमाल कर सकता है. ...
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कंगाल पड़े बंगाल में रा-हुल-रा-हुल
कांग्रेस के चिकने चुपड़े युवराज राहुल गाँधी को तीन दिन के बंगाल दौरे से वहां की उबड़-खाबड़ सियासी जमीन का अंदाज जरुर लग गया होगा. पार्क स्ट्रीट के रेस्तरां में मुर्ग मसल्लम उड़ाने से लेकर शांति निकेतन में नौजवान लड़कियों के रा-हुल रा-हुल नारों की मस्ती के बीच राहुल ने फुर्सत के क्षणों के लुत्फ़ जरूर उठाया, लेकिन बात जब सियासी जमीन पर कुछ कहने की आई तो ममता बनर्जी की पार्टी के साथ कांग्रेस के स्वाभिमान की बात उठा कर उन्होंने नयी मुसीबत मोल ले ली. राहुल गाँधी ने यहाँ कहा कि अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस तृणमूल के साथ हाथ जरूर मिलाएगी पर सर झुका कर नहीं. बंगाल में कांग्रेस के हाल से वाकिफ समझदार लोग सवाल कर रहे हैं कि यहाँ जब कांग्रेस ही नहीं बची है तो स्वाभिमान किसका?...
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नेहरू से नौ कदम आगे निकलने की चाह
आम तौर पर प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के बारे में टिप्पणी करने से बचने वाली कांग्रेस को उनका यह बयान रास नहीं आया कि मौजूदा सरकार सबसे ‘एकजुट‘ सरकारों में से एक है- यहां तक कि पंडित नेहरू के नेतृत्व वाली पहली सरकार से भी। डॉ. सिंह के इस बयान ने सबको चौंकाया क्योंकि कांग्रेस के भीतर से कोई नेता पंडित जवाहरलाल नेहरू, स्व. इंदिरा गांधी या स्व. राजीव गांधी के बारे में अप्रत्यक्ष टिप्पणी भी करे तो वह एक बड़े जोखिम का काम है। लेकिन डॉ. सिंह बार-बार सिद्ध कर चुके हैं कि वे राजनीति के गुर आजमाने में निष्णात किसी खुर्राट नेता की तरह नहीं हैं। उन्होंने जो कहा वह उनकी सीधे-सादे और बेबाक इंसान की छवि के अनुरूप ही था।...
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राजनीतिक एनकाउण्टर का बढ़ता खतरा
क्या देश में अब एनकाउण्टर के नाम पर राजनीतिक हत्याकाण्ड का दौर शुरू हो गया है? पिछले एक डेढ़ साल में हुई राजनीतिक हत्याओं पर नजर दौड़ाएं तो यह सवाल बिल्कुल ही बेकार नजर नहीं आता. अभी हाल में ही मध्य प्रदेश पुलिस ने भिंड युवक जिला कांग्रेस के पद पर कार्यरत अमजद खान को एनकाउण्टर में मार गिराया. जिस पर मध्य प्रदेश विधानसभा के उपनेता चौधरी राकेश सिंह और मध्य प्रदेश कांग्रेस उपाध्यक्ष डॉ. गोविन्द सिंह नें भिंड पुलिस के ऊपर आरोप लगाया है कि भिंड पुलिस नें 22 अगस्त को एक मुठभेड़ दिखाकर अमजद खान की हत्या कर दी।...
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लालू-पासवान का मुख्यमंत्री हो मुसलमान!
बिहार में चुनावी बिगुल बज चुका है लेकिन उससे पहले पाटलिपुत्र के युद्ध में हर दल या मोर्चा-दूसरे मोर्चे की राजनीतिक जमीन अपने पक्ष में करने की कोशिश में जुटा है। राजनीति के इस खेल में कौन किस पर भारी पड़ेगा, इसकी कुंजी तो जनता जनार्दन के पास है। लेकिन उससे पहले नेता वोट की राजनीति को जात-पात, सामाजिक ध्रुवीकरण के इर्द-गिर्द केंद्रित करने की कोशिश में जुटे हैं। पिछले बिहार विधानसभा चुनाव में मात खाए लालू यादव और रामविलास पासवान ने राजनीतिक इच्छा व्यक्त की है कि राज्य में एक मुस्लिम उपमुख्यमंत्री हो?...
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सात रेसकोर्स पर दस जनपथ का दावा
दस जनपथ से अगर आप सात रेसकोर्स पहुंचना चाहें तो बमुश्किल सात मिनट का समय लगता है. लेकिन इन दिनों कांग्रेस के शीर्ष पर शुरू हुए सत्ता संघर्ष ने लुटियंस जोन के इन दो सड़कों की दूरिया बढ़ा दी हैं. पिछले कुछ दिनों में कांग्रेस के अंदर कुछ वही राजनीति शुरू हो गई है जिसे किनारे लगाने की राजनीति कह सकते हैं। अक्सर जो किनारे लगाने की कांग्रेस स्टाइल है, उसी स्टाइल में काम की शुरूआत हुई है।...
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सुप्रीम कोर्ट का सवाल और प्रधानमंत्री का मलाल
आखिरकार प्रधानमंत्री का दुख प्रकट हो ही गया. संपादकों के साथ बातचीत में उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट सरकार के काम काज के लिए नीति निर्धारण न करे. प्रधानमंत्री का यह दुख प्रशासन की उस चिंता से प्रकट होता है जो न्यायालयों के हस्तक्षेप से जुड़ा है. पहले भी कई मौकों पर न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच टकराव के मौके आये हैं. अनाज के सड़न के सवाल पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से एक बार फिर वह सवाल उठ खड़ा हुआ है, जिस पर प्रधानमंत्री अपनी आपत्ति जाहिर कर रहे हैं....
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राजनीतिक हिन्दुत्व पर दिग्गी का दांव
हिन्दुओं का ठेकेदार बनने की आरएसएस और उसके मातहत संगठनों की कोशिश को चुनौती मिल रही है. भगवान् राम के नाम पर राजनीति खेलकर सत्ता तक पंहुचने वाली बीजेपी के लिए और कोई तरकीब तलाशनी पड़ सकती है क्योंकि कांग्रेस की नयी लीडरशिप हिन्दू धर्म के प्रतीकों पर बीजेपी के एकाधिकार को मंज़ूर करने को तैयार नहीं है. कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह ने साफ़ कहा है कि हिन्दू धर्म पर किसी राजनीतिक पार्टी के एकाधिकार के सिद्धांत को वे बिल्कुल नहीं स्वीकार करते....
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