भ्रष्टाचार को शिष्टाचार बनाना चाहती है भाजपा
पहले राजनीतिक बदले की भावना से प्रेरित होकर भ्रष्टाचार का मामला दर्ज करो। विजिलेंस की जांच करवाओ। कोर्ट में चालान पेश हो जाए। और इसके बाद एक प्रस्ताव आए, अभी तक राजनीतिक विरोध और बदले की भावना से दर्ज मामले वापस लिए जाए। वो भी राज्य के विधानसभा में। भाजपा विधायक और पंजाब विधानसभा के डिप्टी स्पीकर सतपाल गोसाई ने कुछ इस तरह का ही प्रस्ताव पंजाब विधानसभा में रखा है।
इस प्रस्ताव को उन्होंने पंजाब विधानसभा स्पीकर के पास भेजा है और विधानसभा में स्पीकर निर्मल सिंह काहलों ने इस प्रस्ताव को पढ़कर सुनाया। भबदले की भावना से दर्ज मामले को वापस लेने का प्रस्ताव भाजपा रखे, पहले तो यहीं पर एक दिलचस्प स्थिति पैदा होती है। लेकिन दूसरी दिलचस्प स्थिति तब पैदा होती है जब यह पता चलता है कि प्रस्ताव से फायदा भाजपा को नहीं, बल्कि कांग्रेस और अकाली दल के नेताओं को होगा जिनके नेताओं पर पिछले आठ साल के दौरान राजनीतिक विरोध की बदले की भावना से भ्रष्टाचार के कई मामले दर्ज हुए। जबकि भाजपा के किसी नेता पर मामला पर दर्ज नहीं है। सतपाल गोसाई ने प्रस्ताव रखते हुए बदले की भावना से दर्ज मामले को वापस लेने की मांग तो कर दी, लेकिन उन्हें इस बात की कोई परवाह नहीं की कि यह मामले भ्रष्टाचार के है जिससे सबसे ज्यादा नुकसान जनता को हुआ है। और अभी तक इनकी जांच में सरकार ने कई करोड़ रुपये खर्च कर दिए। इसमें कांग्रेस और अकाली दल दोनों की सरकारें शामिल है।वीरवार को पंजाब विधानसभा के डिप्टी स्पीकर सतपाल गोसाई के इस प्रस्ताव को पंजाब विधानसभा में स्पीकर निर्मल सिंह काहलों ने पढ़कर सुनाया। प्रस्ताव था कि राज्य हित में पिछले आठ सालों में राजनीतिक बदले की भावना से दर्ज सारे मामले वापस लिए जाए, क्योंकि यह राज्य के हितों के खिलाफ जाता है।
प्रस्ताव में कांग्रेस औऱ अकाली दल के नेताओं पर दर्ज सारे मामले वापस लिए जाने की मांग की गई। इस प्रस्ताव को सदन के पटल पर रखे जाने से एकाएक वहां उपस्थित लोगों जिसमें कांग्रेस, भाजपा और अकाली दल के विधायक शामिल थे हैरान हो गए। क्योंकि प्रस्ताव भाजपा ने रखा था और भाजपा के किसी नेता पर बदले की भावना से कैप्टन अमरिंदर सिंह ने अपने कार्यकाल में मामला दर्ज नहीं किया था। फिर भाजपा ने भ्रष्टाचार के दर्ज मामले को वापस लेने का प्रस्ताव क्यों रखा, इस पर लोगो को हैरानी हो रही है। खुद विधानसभा में भाजपा विधायक दल के नेता मनोरंजन कालिया ने कहा कि पहले इस पर एडवोकेट जनरल से सलाह ली जाए और इसके बाद विधानसभा कोई प्रस्ताव पास करे। कांग्रेस के कार्यकाल में कैप्टन अमरिंदर सिंह ने वर्तमान मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल, उनके बेटे सुखबीर बादल, पत्नी सुरेंद्र कौर समेत अकाली दल के छ मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के मामले दर्ज करवाए थे। इन सारे मामलों पर पंजाब विजिलेंस ब्यूरो ने अमरिंदर सिंह के कार्यकाल में अपना चालान पेश कर दिया। लेकिन दिलचस्प बात है कि जब मुख्यमंत्री के तौर पर प्रकाश सिंह बादल आए तो पंजाब विजिलेंस ब्यूरो कोर्ट में अपने चालान से पलट गया, क्योंकि निजाम बदल गया था बादल के खिलाफ विजिलेंस के जिन गवाहों ने कोर्ट में ब्यान दिया था वे भी कोर्ट में अपने ब्यान से पलट गए। उन्होंने कहा कि कैप्टन अमरिंदर सिंह के दबाव में बादल और उनके परिवार के खिलाफ ब्यान दिया था। दिलचस्प स्थिति तो यह थी कि बादल के सता में आने के कुछ दिन बाद ही पंजाब विजिलेंस ब्यूरो ने कैप्टन अमरिंदर सिंह के खिलाफ आय से अधिक संपति बनाने का एक मामला दर्ज करने समेत भ्रष्टाचार के दो और मामले दर्ज कर दिए। इसके बाद अमरिंदर सिंह परेशान रहे है और अभी भी इन मामलों में पेशियां भुगत रहे है। पर वीरवार की घटना ने एक दिलचस्प मोड़ पैदा किया है। प्रस्ताव एक एसे राजनीतिक दल ने रखा है जिसका इन मामलों से लेना देना नहीं है। मामला कांग्रेस और अकाली दल का है। पर प्रस्ताव भाजपा ने रखा है। इस खेल में क्या है इस पर जोरदार चर्चा है। चर्चा है कि अमरिंदर और सुखबीर दोनों डरे है।
सुखबीर बादल मुख्यमंत्री बनने के प्रयास में है। उनकी सरकार का कार्यकाल अब दो साल ही रहा है। उन्हें डर है कि अगले दो साल बाद कांग्रेस ही आएगी। उन्हें यह डर है कि कांग्रेस के आने के बाद कई और मामले उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के दर्ज होंगे। इसलिए उन्होंने यह पहल भाजपा से करवा कांग्रेस को एक मैसेज दिया है। मैसेज साफ है हम सारे मामले को कोर्ट से बाहर सुलझाएंगे और आगे से बदले की भावना से राजनीति नहीं करेंगे। अर्थात जो भी कुछ भी है आपस में मिल बैठकर सुलझा लेंगे।उधर अमरिंदर सिंह भी परेशान है। अपनी पाकिस्तानी महिला पत्रकार मित्र अरूशा आलम के कारण कांग्रेस में परेशानी झेल रहे अमरिंदर सिंह को कांग्रेस ने अभी तक पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष पद पर ताजपोशी नहीं की है। उन्हें यह समझ में नहीं आ रहा है कि आखिर माजरा क्या है। हालांकि कांग्रेस हाईकमान उनकी पाकिस्तानी महिला प्रेम से परेशान है। कांग्रेस हाईकमान आगे भी उन्हें इतनी आसानी से अध्यक्ष बनाने के तैयार शायद ही हो। इसलिए अमरिंदर सिंह भी अपने खिलाफ दर्ज मामले को वापस लेना चाहते है। पर अमरिंदर सिंह के खास लोगों का कहना है कि अमरिंदर सिंह के खिलाफ दर्ज मामला वापस हो या न हो उससे उन्हें फर्क नहीं पड़ता। वो अगर सता में आए तो बादल के बेटे सुखबीर को सबक सिखाएंगे ही। जब तीन साल विपति में काट लिया तो दो साल के लिए सुखबीर से समझौता क्यों करे।
हालांकि विधानसभा अगर सारे मामले को वापस लेने संबंधी प्रस्ताव पारित भी कर दे तो यह जरूरी नहीं कि मामला वापस ही जाए। पंजाब विजिलेंस ब्यूरो के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार यह कोर्ट पर निर्भर करेगा कि मामला वापस हो या न हो। अगर सरकार मामला वापसी की अर्जी भी कोर्ट में देती है तो कोर्ट इस पर फैसला लेगी कि मामला वापस होने लायक है या नहीं। क्योंकि राजनीतिक बदले की भावना से दर्ज मामले कोई साधारण मामले इसलिए नहीं है कि इसमें सारे मामले भ्रष्टाचार के है। फिर भ्रष्टाचार के मामले तथ्यों के आधार पर होता है। सिर्फ बदले की भावना इसमें नहीं होती। अगर बदले की भावना हो भी तो कहीं न कहीं भ्रष्टाचार होता है। बस मामला दर्ज करते हुए बदले की भावना को तव्वजो दी जाती है। बाद में तो सारा काम कानून के हिसाब से होता है। अगर कोई नेता ने भ्रष्टाचार नहीं किया गया होगा तो कोर्ट से ही बरी हो जाएगा। इसलिए मामला वापस लेने की क्या जरूरत है।
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roj bakwas kar ho,
tumhe aur kuch nahi dikhta hai,
tum to aise ho kimahangai ke liye bhi bjp ko jimmewar bataoge.
tum jaise bised aur kalam ke bi-iman logo ki article,
agar visfot jaise nispaksh site par chapta raha to hum MOHALLA ki tarah iska bicott karna parega.
Sanjiv Tiwari ji kripua dhyan den
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