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जा तुझको माफ कर दिया, तू मुझको माफ कर!

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पंजाब विधानसभा के उपाध्यक्ष सतपाल गोसाई द्वारा विधानसभा अध्यक्ष निर्मल सिंह काहलो को लिखे पत्र के संदर्भ में जब पंजाब विधानसभा में चर्चा चली तो कांग्रेस विधायक मक्खन सिंह ने कहा कि राज्य की राजनीति में राजनीतिक रंजिश के कारण कड़वाहट पैदा हो गई है। इस कड़वाहट को समाप्त करने के लिए उपाध्यक्ष गौसाई द्वारा लिखे पत्र में प्रकट विचारों पर विचार कर राजनीति में आई कड़वाहट को समाप्त करना चाहिए।

यहां यह उल्लेखनीय है कि जब 2002 में पंजाब की सत्ता कांग्रेस के हाथ में आई थी और बागडोर कै. अमरेन्द्र सिंह के हाथ में थी तब स. प्रकाश सिंह बादल उनके बेटे सुखबीर सिंह बादल तथा बादल परिवार की महिलाओं विरुद्ध भी मुकद्दमें दर्ज हुए थे जो न्यायालयों में आज भी चल रहे हैं। बेशक आए दिन गवाहों के पीछे हटने से यह मुकदमे कमजोर होते चले जा रहे हैं। अकालियों के अन्य कई नेताओं और कार्यकर्ताओं के विरुद्ध भी कांग्रेस सरकार द्वारा समय-समय पर जिला स्तर पर मुकद्दमे होते रहे। कै. अमरेन्द्र सिंह ने तो 2002 विधानसभा चुनावों से पहले ही बादल को सबक सिखाने की घोषणा कर दी थी। असैम्बली में बादल विरुद्ध बोलते हुए कै. अमरेन्द्र सिंह ने स. प्रकाश सिंह बादल को सम्बोधित करते हुए जिस भाषा का इस्तेमाल किया था उसको विधानसभा के भीतर और बाहर नापसंद ही किया गया था 2007 के विधानसभा चुनावों में जब अकाली भाजपा गठबंधन सत्ता में आया तो फिर कै. अमरेन्द्र सिंह उसके परिवार और कांग्रेसी नेताओं पर मुकद्दमे दर्ज होने का सिलसिला शुरू हुआ। देश में नकारात्मक राजनीति का दौर 1970 के दशक के शुरुआती दौरे में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने किया था। आपातकालीन के दौरान करीब विपक्ष के सभी नेता राजनीतिक रंजिश के शिकार हुए थे आज पंजाब में ही नहीं बल्कि हरियाणा तथा हिमाचल प्रदेश तथा देश के कई अन्य प्रांतों में राजनीतिक रंजिश के चलते एक दूसरे पर मुकदमे दर्ज करने का सिलसिला शुरू है।

गौसाई द्वारा लिखे पत्र में स. प्रकाश सिंह बादल जिन पर आमदन से अधिक सम्पत्ति का मुकदमा मोहाली में चल रहा है के नाम के साथ कैप्टन अमरेन्द्र सिंह का नाम भी है। उल्लेखनीय है कि सतर्कता ब्यूरो ने कैप्टन सहित अन्यों के विरुद्ध मामला दर्ज किया था इसकी भी सुनवाई मोहाली की अदालत में चल रही है। पत्र में काहलों सहित आदि कई नेताओं के नाम हैं, जिन पर भ्रष्टाचार के मामलों में अदालतों में घसीटे जाने का जिक्र है। याद रहे कि विस अध्यक्ष काहलों के विरुद्ध केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने भ्रष्टाचार का मामला 1997-2002 की रा'य की अकाली- भाजपा सरकार के शासन में उनके ग्रामीण विकास एवं पंचायत मंत्री रहते हुए पंचायत सचिवों की भर्तियों में हुई अनियमितताओं को लेकर दर्ज किया था। पत्र में विपक्ष की नेता राजेंद्र कौर भट्ठल के विरुद्ध विशेषाधिकार हनन मामले में सुनाई गई निलंबन की सजा को माफ करने के लिए काहलों की सराहना भी की गई है। याद रहे कि विधानसभा अध्यक्ष के विरुद्ध आपत्तिजनक टिप्पणियां करने, सदन में हंगामा और अनुशासनहीनता और मार्शलों के साथ धक्कामुक्की के लिए पार्टी के सदस्यों को उकसाने के आरोपों में विशेषाधिकार समिति ने भट्ठल को सदन से कम से कम सात दिन के लिए निलंबित करने की सजा की सिफारिश की थी। गोसाई ने अपने पत्र में काहलों की प्रशंसा करते हुए कहा है कि उन्होंने सदन में अ'छा माहौल बनाने में पहल की है। इसी पहल की दुहाई देते हुए उन्होंने बदले की राजनीति के तहत नेताओं पर दर्ज किए गए मुकदमों में भी इसी तरह का कदम उठाए जाने की अपील की है। उन्होंने कहा कि इस दिशा में उठाया जाने वाला उनका कदम राज्य की राजनीति में पैदा हुई कड़वाहट को दूर करने में मील का पत्थर साबित होगा। गोसाई का यह पत्र स्वयं काहलों ने उस समय सदन में पढ़ा, जब कांग्रेस विधायक मक्खन सिंह ने सदन में संबंधित पत्र का मामला उठाया।

इस दौरान भट्ठल ने सरकार से राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं के विरुद्ध दर्ज किए गए मामले भी वापिस लेने की मांग की। उद्योग एवं वाणि'य मंत्री मनोरंजन कालिया ने उपाध्यक्ष के सुझाव का स्वागत करते हुए कहा कि ऐसे में जब अधिकतर मामले अदालतों में चल रहे हैं तो यह बेहतर होगा कि पीठासीन अध्यक्ष पत्र पर कोई कार्रवाई करने से पूर्व राज्य के महाधिवक्ता से उक्त मामलों पर कानूनी सलाह-मश्वरा कर लें। मंत्री की इस बात का समर्थन कांग्रेस विधायक लाल सिंह ने भी किया। कानूनी विचार विमर्श कर 26 मार्च को सदन को इसकी जानकारी देंगे। भाजपा नेता व मंत्री मनोरंजन कालिया की सलाह पर विधानसभा अध्यक्ष ने अमल करते हुए महाधिवक्ता से कानूनी विचार विमर्श कर 26 मार्च को सदन को जानकारी देने की बात कही है प्रश्न यह उठता है कि क्या एक ही झटके में सभी नेताओं व कार्यकर्ताओं के विरुद्ध आपराधिक मामलों से जुड़े मुकदमे समाप्त करना उचित होगा, शायद नहीं। राजनीतिक रंजिश के कारण या किसी और कारण दर्ज हुए मुकदमों को एक झटके में समाप्त करने से लोगों के मन में संदेह पैदा होना स्वाभाविक है। आए दिन एक दूसरे को कोसने वाले नेता क्या अपने आपको कानूनी जाल में फंसते देखकर तो एकजुट नहीं हो रहे।

पिछले कई वर्षों से चले आ रहे मुकदमे अपने अंतिम पड़ाव में है सो इन मुकदमों को निर्णय आने से पहले समाप्त कर देने का अर्थ होगा जैसे जन्म लेने से पहले कोख में ही बच्चे की हत्या करना राजनीतिक रंजिश किन केसों में है या नहीं इस बात का निर्णय अदालतों पर ही छोड़ देना चाहिए। सरकार को तो प्रत्येक मामले में अपनी कानूनी राय ही देनी चाहिए। अगर तथ्य सही होंगे तो सत्य के आधार पर ही  न्यायापालिका फैसला कर देगी। लोगों को न्यायापालिका में विश्वास करने का संदेश देने वाले नेताओं को खुद भी न्यायापालिका पर विश्वास करते हुए चल रहे मुकदमों पर देश की न्याय प्रक्रिया पर विश्वास करते हुए अंतिम निर्णय न्यायालय पर छोड़ देना चाहिए। राजनीतिक रंजिश समाप्त करने के नाम पर कसूरवार को रियायत नहीं मिलनी चाहिए। राजनीतिक स्वार्थ सिद्धि तथा व्यक्तिगत लाभ के लिए विभिन्न दलों के तथा विभिन्न विचारों वाले दल तथा नेता कैसे एकजुट हो जाते हैं उपरोक्त घटनाक्रम से स्पष्ट हो जाता है इससे पहले विधायकों व सांसदों को मिलने वाले वेतन व भत्ते इत्यादि से संबंधित प्रस्ताव को एकजुट हो पारित करते देखा गया है। अब बात मुकदमे की वापसी कि है तो फिर एकजुटता दिखाई जा रही है। आमजन इस एकजुटता के पीछे छुपी भावना को तथा राजनीतिज्ञों की चतुराई को भी समझ रहा है लेकिन है बेबस इसलिए इस समय कुछ विशेष करने की स्थिति में नहीं है इस बात को नेता लोग समझ रहे हैं और राजनीति में कड़वाहट को समाप्त करने के नाम अपनी जान कानून के हाथ से छुड़ाना चाह रहे हैं।

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Sanjeet Tripathi on 21 March, 2010 01:23;15
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bahut hi satik mudde par satik baat kahi hai aapne.
aapki is bat se ki
"पिछले कई वर्षों से चले आ रहे मुकदमे अपने अंतिम पड़ाव में है सो इन मुकदमों को निर्णय आने से पहले समाप्त कर देने का अर्थ होगा जैसे जन्म लेने से पहले कोख में ही बच्चे की हत्या करना राजनीतिक रंजिश किन केसों में है या नहीं इस बात का निर्णय अदालतों पर ही छोड़ देना चाहिए। सरकार को तो प्रत्येक मामले में अपनी कानूनी राय ही देनी चाहिए। अगर तथ्य सही होंगे तो सत्य के आधार पर ही न्यायापालिका फैसला कर देगी। लोगों को न्यायापालिका में विश्वास करने का संदेश देने वाले नेताओं को खुद भी न्यायापालिका पर विश्वास करते हुए चल रहे मुकदमों पर देश की न्याय प्रक्रिया पर विश्वास करते हुए अंतिम निर्णय न्यायालय पर छोड़ देना चाहिए। राजनीतिक रंजिश समाप्त करने के नाम पर कसूरवार को रियायत नहीं मिलनी चाहिए।"
se pure tauar par sehmat hu, baki ab dekhte hain aage kya hota hai.
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image इरविन खन्ना पंजाब की पत्रकारिता में एक अलग वजूद रखनेवाले इरविन खन्ना संघर्ष की पत्रकारिता के लिए जाने जाते हैं. दैनिक जागरण में सहायक संपादक रहे इरविन खन्ना वर्तमान में पंजाब से प्रकाशित दैनिक उत्तम हिन्दू के मालिक और संपादक हैं. (uttamhindu@hotmail.com)
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