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जहरीली राजनीति का योगी

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पिछले कुछ सालों से पूर्वी उत्तर प्रदेश के गोरखपुर और उसके आस-पास के जिलों में हिन्दू सांप्रदायिक राजनीति एक नए प्रकार के प्रयोग के दौर से गुजर रही है. जाति, धर्म, अपराध और साम्प्रदायिकता के मिश्रण की इस राजनीति के नेता हैं गोरखपुर स्थित गोरखनाथ मठ के उत्तराधिकारी तथाकथित 'बाबा' योगी आदित्यनाथ. यों तो आदित्यनाथ भाजपा के टिकट पर गोरखपुर से निर्वाचित सांसद हैं लेकिन इस क्षेत्र में वे भाजपा के एजेंडे पर नहीं बल्कि अपने एजेंडे पर चलते हैं.

यह एजेंडा है तो हिंदुत्व का ही लेकिन मठ के पूर्ववर्ती नेताओं के विपरीत आदित्य नाथ की राजनीतिक महत्वाकांक्षा और उनके आक्रामक स्वाभाव ने इसे नयी धार दे दी है. यह धार है हिंदुत्व की राजनीति को और अधिक जहरीली और आक्रामक बनाने वाली. गोरखपुर और उसके आस -पास के दर्जनों जिलों में छोटे-छोटे सामान्य झगड़ों और आपराधिक मसलों को सांप्रदायिक रंग देकर आदित्य नाथ ने समाज को अभूतपूर्व रूप से विभाजित और हिंसाग्रस्त किया है.

आदित्यनाथ भाजपा  के टिकट पर सिर्फ चुनाव लड़ते हैं और उसके सांगठनिक गतिविधियों में हस्तक्षेप करते हैं तथा उसके पदों पर अपने समर्थकों को बैठाते  हैं लेकिन अपनी गतिविधियों को वे स्वतंत्र रूप से गोरख नाथ मठ के उत्तराधिकारी के रूप में हिन्दू युवा वाहिनी और हिन्दू महासभा के बैनर तले चलाते हैं. आदित्यनाथ हिन्दू युवा वाहिनी के संरक्षक हैं. इसके अलावा हिन्दू जागरण मंच, केसरिया सेना, केसरिया वाहिनी, कृष्ण सेना आदि अनेक ऐसे संगठन हैं  जो  उनके अग्रिम संगठन के रूप में काम करते हैं. और भी कई संगठन हैं जो समाज के अलग-अलग वर्गों को संगठित करने के क्रम में तैयार किये गए हैं, जैसे फुटपाथ पर गुजारा करने वालों को ' राम प्रकोष्ठ' के अंतर्गत और जो लकड़ी या बांस का काम करते हैं उन्हें 'बांसफोड़ हिन्दू मंच' के बैनर तले संगठित किया जाता है. जाहिर है कि, इस तरह के जन संगठन बनाने की  प्रेरणा उन्होंने आरएसएस से ली है. इनकी विचारधारा और राजनीतिक एजेंडा भी वही है जो आरएसएस का है लेकिन एक व्यक्ति की महत्वाकांक्षा कैसे एक बड़े एजेंडे को अपनी शैली से प्रभावित करती है और उसमें अपनी जगह बनाती है, आदित्य नाथ की राजनीति इसी दास्ताँ को बयाँ करती है.

आज देखते हैं तो अफ़सोस  के साथ कहना  पड़ता  है कि आदित्य  नाथ और उनके  कुछ पूर्वजों ने एक  प्रगतिशील और धर्मनिरपेक्ष  साधना-संप्रदाय को  पथभ्रष्ट और पतित करके सवर्णवादी हिन्दू सांप्रदायिक और क्षेत्रीय फासीवादी राजनीतिक संगठन में बदल दिया है.
आदित्य नाथ की असली ताकत और पूँजी है 'धर्म' और उसका आश्रय स्थल है गोरखनाथ मठ. मठ की धार्मिक साख और आर्थिक पूँजी इतनी अधिक है कि उसके आधार पर उस क्षेत्र में बड़े - से -बड़ा सामाजिक  और राजनीतिक परिवर्तन किया जा सकता है. गोरख नाथ मंदिर की हिन्दू जनता में बड़ी प्रतिष्ठा है, इसके मुख्य पुजारी और महंत होने से उनकी भी प्रतिष्ठा वैसी ही है. उनकी दूसरी सबसे बड़ी ताकत है हिंदुत्व का एजेंडा और भाजपा. इस मठ का हिंदूवादी राजनीतिक संगठन हिन्दू महासभा  से सम्बन्ध आजादी से पहले से चला आ रहा है. १९५२ में संपन्न हुए पहले आम चुनावों से लेकर अब तक के चुनावों में इस मठ के प्रतिनिधि कुछेक बार को छोड़कर हमेशा लड़ते रहे हैं. तत्कालीन महंत दिग्विजय नाथ ने १९५२, १९६२ का चुनाव लड़ा किन्तु उन्हें पहली जीत १९६७ के चुनावों  में मिली. महंत अवेद नाथ ने चुनाव लड़ा था. इसके बाद १९८९ और १९९१ में  वे लड़े और जीते भी. मठ के तीसरी  पीढ़ी के नेता १९९६, १९९८, १९९९ , २००४ और २००९ के चुनाव लड़ते  और जीतते आ रहे हैं. गोरखपुर सीट के चुनावी इतिहास को देखने पर यह स्पष्ट होता है कि मठ कि राजनीतिक साख तभी बढ़ी जब उसने भाजपा के साथ अपने आपको जोड़ा.

योगी आदित्यनाथ का राजनीतिक अंदाज़ बाल ठाकरे  और नरेन्द्र मोदी की तरह का है. उनकी हिदू युवा वाहिनी भारत की शिव सेना और जर्मनी के हिटलर की 'स्टॉर्म ट्रुपर' की पद्धति की है.यों तो योगी आदित्य नाथ इसे सांस्कृतिक संगठन कहते हैं लेकिन इस इलाके में इसकी छवि बेरोजगार और असामाजिक नौजवानों की टोली की है. ऐसे ही युवाओं को संगठित करके महाराष्ट्र में बाल ठाकरे ने शिव सेना को एक राजनीतिक ताकत बनाया. योगी ने भी बाल ठाकरे की तर्ज़ पर बेरोजगार और छोटे-मोटे अपराधियों को शामिल कर युवा वाहिनी का गठन किया है. बाल ठाकरे के पास धार्मिक ताकत नहीं थी जबकि योगी के पास धार्मिक साख है. इससे  पूर्वांचल में  सांप्रदायिक और फासीवादी राजनीति का  खतरा बढ़ जाता है. वाहिनी योगी  की राजनीतिक ताकत को आधार प्रदान करती है और राजनीतिक  अपसंस्कृति को बढाती है. इसे सांस्कृतिक संगठन कहना सफेद झूट है. इस संगठन पर दंगे भड़काने के अनेक आरोप हैं. इस संगठन ने एक नारा चलाया है, " उत्तर प्रदेश में रहना है, तो योगी-योगी कहना है." यह नारा योगी आदित्य नाथ के व्यक्तित्व और उनकी राजनीति की आक्रामकता और आतंक को व्यक्त करता है.किसी जुलूस इत्यादि में इस नारे और ऐसे कई और नारों को लगाते हुए योगी समर्थक जब चलते हैं तो एक प्रकार की दहशत का माहौल बन जाता है.

नरेन्द्र मोदी और गुजरात का उनका सांप्रदायिक प्रयोग आदित्यनाथ को काफी आकर्षक लगता है तभी तो वे बार-बार विभिन्न क्षेत्रों को गुजरात बना देने की बातें करते हैं. गौतम बुद्ध की जन्म स्थली कुशी नगर के पडरौना में अल्पसंख्यकों को लूटने और उनका घर और धन लूटने-जलाने के बाद जो नारा लगा था उससे योगी की इस महत्वाकांक्षा  का पता चलता है. नारा था-" उत्तर प्रदेश गुजरात बनेगा, पडरौना शुरुआत करेगा." उत्तर प्रदेश जाति और धर्म की राजनीति के लिए कुख्यात हो गया है. बाबा धर्म के साथ -साथ जाति की भी राजनीति करते हैं, ठाकुर जाति के हैं और ठाकुरों की हर सही और गलत बात का समर्थन करते हैं. यही नहीं उनके लोग जातीय संघर्षों में भी सक्रिय भूमिका  निभाते हैं.कोई साधु स्वभाव नेता जाति और धर्म की राजनीति नहीं कर सकता लेकिन बाबा करते हैं. अगर उन्हें भी  साधारण  नेताओं  की तरह ही राजनीति करनी है तो जनता की  धार्मिक आस्था का शोषण क्यूँ करते हैं.

जाहिर है, आदित्य नाथ की राजनीति वैचारिक गिरावट और सैद्धांतिक दिवालियेपन का प्रतीक है.जो अपने समय की राजनीतिक  और सांस्कृतिक बिडम्बना को उजागर करती है. नाथ सम्प्रदाय की परम्परा पर एक नजर डालने से यह बिडम्बना बोध और गहरा हो जाता है. नाथ संप्रदाय सामाजिक रूप से प्रगतिशील और समतावादी तथा धार्मिक रूप से समरस संप्रदाय था. एक ओर जहाँ वह वर्ण व्यवस्था विरोधी था वहीं दूसरी ओर वह सभी धर्मों के मानने वालों के लिए समान रूप से खुला था.अपने इसी स्वाभाव के कारण नाथ संप्रदाय निचली जातियों में अधिक लोकप्रिय था. १९२१ की जनगणना के अनुसार मुसलमान योगियों की संख्या ३११५८ थी जो  नाथ पंथियों की कुल संख्या का करीब चालीस प्रतिशत थी. इसके साथ-साथ इस संप्रदाय का स्वरुप न केवल अखिल भारतीय था बल्कि अंतर्राष्ट्रीय भी था.

आज गोरखपुर एक शहर है जिसके मुहल्लों और बाज़ारों के  नाम हिन्दूकरण किया  जा रहा है. मियां बाज़ार का माया बाज़ार, अलीनगर का  आर्य नगर, उर्दू बाज़ार का हिंदी बाज़ार के रूप  में नामकरण  किया जा गया  है. हिन्दुओं ने इस नामकरण को तो आसानी से स्वीकार कर लिया लेकिन मुसलमानों ने नहीं स्वीकार किया है. फलस्वरूप एक ही  बाज़ार का नाम हिन्दू दूकानदार ने हिंदी बाज़ार लिखा रखा है तो उसके पड़ोसी मुसलमान दूकानदार ने उर्दू बाज़ार. पहली नजर में यह दृश्य हास्यास्पद लगता है लेकिन जल्द ही यह ऐतिहासिकता के साथ एक  खिलवाड़ और उससे भी अधिक किसी संस्कृति अथवा किसी दिल के टूटने कि पीड़ा का एहसास करा देता  है. इस बर्बादी के लिए दोषी है, आदित्य नाथ कि जहरीली राजनीति.

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भारतीय नागरिक on 12 June, 2010 17:30;53
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मुख्तार अंसारी, अतीक अहमद के बारे में भी इसी तरह के लेख आपकी कलम से कब मिलेंगे.....
बरेली के दंगों के बारे में आपके नेक खयालात....
वैसे मुझे इस लेख पर आश्चर्य नहीं हुआ...
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anand on 12 June, 2010 17:37;54
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आप यह तो मानते हैं न कि योगी कि राजनीति, व्यक्तित्व और व्यवसाय नहीं, अतीक अहमद और मुख़्तार अंसारी से भिन्न नहीं है. आजमगढ़ से रमाकांत यादव को भाजपा के टिकट पर संसद बनवाने में योगी जी कि ही भूमिका थी.
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dr.vedvyathit on 12 June, 2010 17:44;26
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jhan asli jhr ugla ja rha hai vh to aap ko kbhi nhi dikhega
mgr is trh likh kr ssti pokpriyta paa kr apne agrjon ko to gali mt do doosre hi bhut hain is kam ke liye
yogi ne hindu dhrm ki trf se aisa kya kha hai jo islam ki kitabon me drj hai
pr aap ko kaise dikhega use to aap dekh kr bhi nhi dekh skte kyon ki dr ke mare kya bologe
ved vyathit
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abhay on 12 June, 2010 17:45;46
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तथाकथित योगी आदित्यनाथ और उनके पूर्वजों ने एक प्रगतिशील और धर्मनिरपेक्ष पंथ का संप्रदायीकरण करके कबाड़ा कर दिया. ऐसे लेख धारदार तरीके से साम्प्रदायिकता के चेहरों को उजागर करते हैं. बाबा ने गोरखपुर की सभ्यता और संस्कृति के साथ खिलवाड़ करने का कम किया है. अब समय आ गया है जब धर्म उनका साथ छोड़ देगा. और वे अधर्म की राजनीति के मसीहा बन जायेंगे. ऐसे धारदार और प्रतिबद्ध लेख के लिए आनंद पाण्डेय को बधाई.
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sanjiv panday on 12 June, 2010 17:58;46
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आनंद पांडेय डुमरियागंज चुनाव के परिणाम से आहत है। न तो हिंदू न मुसलमान कांग्रेस को वोट नहीं मिला। पांचवे या छठे नंबर पर पार्टी गई। आनंद पांडेय को राहुल गांधी के यात्राओं से कोई फायदा नजर नहीं आ रहा है। बेचारे क्या करे, मुसलमान चले गए पीस पार्टी की तरफ। राहुल गांधी के दबाव में मुसलमानों के खिलाफ आनंद पांडेय नहीं लिख सकते है। अगर मुख्तार, अफजाल के खिलाफ लिखेंगे तो मुस्लिम नाराज होंगे, नुकसान कांग्रेस को होगा। इसलिए पांडेय जी की मजबूरी समझे। योगी अलावा वे किसी के खिलाफ नहीं लिख सकते है। मायावती के खिलाफ नहीं लिखेंगे क्योंकि मायावती के सहयोग से केंद्र की सरकार पांच साल चलानी है। अब कांग्रेस की समस्या है कि आखिर करे तो क्या करें।
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anup on 12 June, 2010 18:49;15
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एक दम बकवास लेख.
लेखक को गोरखपुर के बारे में कुछ नहीं पता है और न आदित्य जी के बारे में.
योगी जी ना हो तो गोरखपुर को पाकिस्तान बनाने में देर नहीं लगे गा....
इस तरह का लेख विस्फोट पे सोभा नहीं देता है.
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anup on 12 June, 2010 18:52;49
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इस तरह का लेख सोभा नहीं देता....
विस्फोट का मकसद इस तरह का लेख नहीं होना चाहिए.
संजय जी इस पर विचार करे?
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Yugal Mehra on 12 June, 2010 18:55;27
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गलत सोच और तुष्टिकरण सोच वाला लेख, विस्फोट का नाम खराब करने वाला लेख
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Sushil Gangwar on 12 June, 2010 19:46;43
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Jab mai RSS or BJP ki kowi news padta hu to mujhe apna bachpan yaad aa jata hai. RSS or BJP ka choli daman ka sath hai. Sach kaha jaye to RSS maa hai to BJP beta hai. RSS ke kuchh Pracharak kushal neta ban jaate hai kuchh ghar bapas chale jaate hai. Mai shuru se RSS se juda raha hu. Mere dil dimag me RSS ke prati samman hai. Hamare ghar me RSS pracharako ka ana jana rahta tha. Kabi kabhi subha or sham khana hamare ghar par karte the.. Ek din Hamare ghar Pranta Pracharak ji aaye to mujhse puchha ki bete kis class me Padte ho . Hamare papa bole , Bhai saheb maine apne bachho ko hindi medium me pada raha hu. Es par tapaak se Prachark ji bole .. Gangwar ji aapne theek kiya . Agar ye log English medium se padege to esaai ban jayege . Hamari nasho me easaai or musalmano ke khilaf dharm ka teekha jahar bhara jaa raha tha. jise dharma ke thekedaar bakhubi apna kaam karna jante the. Bachpan me sarri baate samjh se pare thi. Jo prachaarak Enlgish medium school ka viroad karte the . unke ghar ke bachhe English school me padte the. Mai ek ese sanghi ko janta, hu jo padaee ke sath tution padya karta tha. Uska chakkar ek sanghi parivaar ki ladki se chal gaya . Dono ne bhagkar shadi kar li or English medium school chala raha hai. Mai bhi esaai or Muslim se dur rahne laga . Etna dur ki baat bhi nahi karta tha. jab mai class 8th me aaya to meri mulakaat muslim boy se huee. Uska mijaaj hindu boy jaisa tha. Dheere dheere usse dosti ho gayee . Mujhe mahsus huaa are ye RSS ke log to dharam ke naam par logo ko bhadka rahe hai. Aaj bhi vah muslim boy mera achaa dost hai. Mai vachpan se hi RSS ki shakha me jaata tha . Unke kuchh shivir attend kiya par mujhe maja nahi aaya . RSS ke pracharak shuru se hi neta banne ka sapna pal lete hai .RSS ke kitne prachark kushal neta hai. Jo musalmano or esaai se dur rahne ki baat karte the vah Apna vote bank badane ke liye musalmano or esaai se samjhota kar lete hai. Us samya Hindu dharma ko taak par rakhkar bhul jaate hai ki kabhi RSS ke Pracharak the. Ramlala ki jai jaikaar karne vali RSS - BJP mandir mudda bhul chuki hai . Hamare mama ne apne baal nahi katwaye , Vah RSS ki dhara me bah kar bole , bhanje ye baal tab tak nahi katege .jab tak Ram mandir nahi ban jayega. Mama ke sar ke baal udh gaye, magar mandir nahi bana . Har paach saal vaad BJP ka Candidate vote ki bheek magne pahuch jata hai. vah RSS or Ram mandir ki duhaai deta hai . Hinduoo ke sapne adhure hai. kya Ram mandir ban payega ?
www.sakshatkar.com
www.sakshatkar-tv.blogspot.com
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Pushkar on 12 June, 2010 20:53;13
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Paid News ! Allegations without susbstance.
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image Anand Pandey छात्र राजनीति से जुड़े आनंद पाण्डेय समकालीन साहित्यिक राजनीतिक विषयों पर लिखने में रुचि रखते हैं. वर्तमान समय में जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में शोधरत.
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सुप्रीम कोर्ट का सवाल और प्रधानमंत्री का मलाल
आखिरकार प्रधानमंत्री का दुख प्रकट हो ही गया. संपादकों के साथ बातचीत में उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट सरकार के काम काज के लिए नीति निर्धारण न करे. प्रधानमंत्री का यह दुख प्रशासन की उस चिंता से प्रकट होता है जो न्यायालयों के हस्तक्षेप से जुड़ा है. पहले भी कई मौकों पर न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच टकराव के मौके आये हैं. अनाज के सड़न के सवाल पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से एक बार फिर वह सवाल उठ खड़ा हुआ है, जिस पर प्रधानमंत्री अपनी आपत्ति जाहिर कर रहे हैं....
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राजनीतिक हिन्दुत्व पर दिग्गी का दांव
हिन्दुओं का ठेकेदार बनने की आरएसएस और उसके मातहत संगठनों की कोशिश को चुनौती मिल रही है. भगवान् राम के नाम पर राजनीति खेलकर सत्ता तक पंहुचने वाली बीजेपी के लिए और कोई तरकीब तलाशनी पड़ सकती है क्योंकि कांग्रेस की नयी लीडरशिप हिन्दू धर्म के प्रतीकों पर बीजेपी के एकाधिकार को मंज़ूर करने को तैयार नहीं है. कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह ने साफ़ कहा है कि हिन्दू धर्म पर किसी राजनीतिक पार्टी के एकाधिकार के सिद्धांत को वे बिल्कुल नहीं स्वीकार करते....
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