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मुलायम को माफ नहीं करेगा मुसलमान

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मुलायम सिंह यादव ने अपनी 'सल्तनत' बचाने के लिए मुसलमानों से माफी मांगी है। लेकिन अब इतनी देर हो गयी है कि मुसलमानों से माफी मांगने से काम नहीं चलने वाला है। हालांकि माफी के बाद मुलायम सिंह यादव के बंगले पर कुछ उलेमाओं ने 'हाजिरी' देकर मुलायम सिंह यादव की माफी की कद्र की और उनकी शान में 'कसीदे' जरूर पढ़े हैं। पता नहीं इस देश के सियासतदां यह कब समझेंगे कि मुसलमान सियासत में उलेमाओं की हर बात नहीं मानता।

और उलेमा भी कब इस बात को समझेंगे कि यह जरुरी नहीं है कि उलेमाओं की हर बात पर मुसलमान 'लब्बेक' कहें। सियासत के मामले में मुसलमानों की अपनी पसंद और सोच है। इसी तरह किसी उलेमा की सोच और पसंद भी अलग-अलग सियासी पार्टी की बाबत अलग-अलग हो सकती है। इसलिए कुछ उलेमाओं द्वारा माफी को 'काफी' मान लेना जल्दबाजी होगी। सवाल यह है कि आम मुसलमान मुलायम सिंह यादव के बारे में क्या राय रखता है ? वह मुलायम की माफी को 'काफी' मानता है या 'नाकाफी' मानता है ? यह ठीक है कि अक्टूबर 1990 में जब पूरा संंघ परिवार कारसेवा के नाम पर बाबरी मस्जिद को ढहाने के लिए अयोध्या में जमा हो गया था तो उन्होंने कानून का सहारा लेकन एक बड़े हादसे को टाल दिया था। उस एहसान का बदला भी मुसलमानों उन्हें भरपूर समर्थन देकर अदा किया था। लेकिन दिक्क्त तब पैदा हुई, जब मुलायम सिंह ने मुसलमानों को केवल एक वोट बैंक के रुप में देखा। वोट के बदले मुसलमनों को सत्ता में भागीदारी के नाम पर एक दो मुसलमान को मंत्री बनाना ही काफी समझ लिया। सरकारी नौकरियों में केवल यादवों को तरजीह दी गयी। मुलायम सिंह यादव की सरकार एक तरह से यादवों की सरकार रही। मुसलमान केवल वोट देकर सरकार बनवाने तक ही सीमित रहे।समाजवादी पार्टी में पार्टी की बुनियाद के पत्थर कहे जाने वाले आजम खान, राजबब्बर, सलीम शेरावानी, शफीर्कुरहमान बर्क और बेनी प्रसाद वर्मा सरीखे लोगों को हाशिए पर डाल दिया गया। मुलायम सिंह यादव परिवार मोह में ऐसे फंसे कि फिरोजाबाद उपचुनाव में अपनी बहु डिम्पल को उतार दिया। मुलायम सिंह यादव का यह कदम आत्मघाती था। प्रदेश के सभी वर्ग के लोगों को यह लगा कि मुलायम सिंह यादव का परिवार ही सत्ता का सुख भोगना चाहता है.

समाजवादी पार्टी में समाजवाद खत्म किया गया। मुसलामन भी यह देखकर दुखी होते थे कि सपा में पूंजीपतियों का राज कायम हो गया था। अमर सिंह ने सपा को समाजवाद के रास्ते से भटका कर पूंजीवादी पार्टी बनाने के साथ ही उसे पूंजीपतियों और फिल्मों सितारों से सजाकर ग्लैमरस कर दिया था। मुलायम सिंह के परिवार के कुछ सदस्य पथभ्रष्ट हुए। पूरा परिवार पैसा बनाने में जुट गया था। सैफई में फिल्मी अभिनेत्रियों को नचाया गया। इन्हीं सब बातों से खफा पार्टी का एक वर्ग समाजवाद से भटक कर पूंजीवाद को थामने का विरोध करता आ रहा था। इसमें मुसलमान भी शामिल थे। जैसे इतना ही काफी नहीं था। मुलायम सिहं यादव ने यह समझ लिया था कि मुसलमान समाजवादी पार्टी का 'अंध भक्त' है, इसलिए कुछ भी किया जा सकता है। इसलिए सपा से उस साक्षी महाराज को राज्यसभा में भेजा गया, जिसने गर्व से कहा था कि बाबरी मस्जिद पर सबसे पहला फावड़ा उसने चलाया था। मुसलमानों ने इसे भी बर्दाश्त किया। फिर कल्याण सिंह के बेटे राजबीर सिंह को मंत्री बनाया। मुसलमानों ने इसे भी सहा। लेकिन जब 2009 लोकसभा चुनाव में कल्याण सिंह के जिन्दाबाद के नारे लगवाए गए तो मुसलमानों के सब्र का बांध टूट गया। मुसलमान पहले से ही सपा से खफा चल रहा था। कल्याण सिंह की आमद ने नाराजगी को चरम पर पहुंचा दिया। यही वजह रही कि उत्तर प्रदेश में हाशिए पर पड़ी कांग्रेस फिर से 20 सीटें जीतकर मुख्य धारा में आ गयी। मुसलमान इस बात को नहीं पचा पाए कि जिस कल्याण सिंह को मुसलमान अपना दुश्मन मानते रहे हैं, उस आदमी को कैसे समाजवादी पार्टी में बर्दाश्त किया जा सकता है।

अब आजम खान की बात करते हैं। आजम खान सपा का तेजतर्रार मुस्लिम चेहरा रहे हैं। उन्होंने मुसलमानों के लिए कुछ किया हो, याद नहीं पड़ता। जब 1987 में मलियाना कांड हुआ था तो उनके दिल में मलियाना के लोगों के लिए बहुत दर्द था। उन पर मेरठ में घुसने की पाबंदी थी। वह बार-बार पाबंदी तोड़कर छुपकर मलियाना आते थे। मेरठ स्टेशन पर कई बार मैंने उन्हें रिसीव किया। मलियाना का दौरा कराया। बड़ी-बड़ी बातें करते थे। कहते थे कि उत्तर प्रदेश में जनता दल की सरकार आयी तो मलियाना कांड की दोषी पीएसी और पुलिस को सजा दिलवाएंगे। 1989 को उत्तर प्रदेश में जनता दल की सरकार बन गयी। आजम खान श्रम मंत्री बने। उसके बाद से उनकी शक्ल मलियाना के लोगों ने नहीं देखी। मेरठ बहुत बार आए, लेकिन मलियाना आना गंवारा नहीं किया। आजम खान अपने भाषणों में मलियाना और हाशिमपुरा का जिक्र करके राजनैतिक लाभ जरुर लेते रहे।  मलियाना कांड की न्यायिक जांच रिपोर्ट सरकार के पास है, मुलायम सिंह यादव की तीन बार प्रदेश में सरकार बनी। हर सरकार में आजम खान मंत्री बने, लेकिन जांच रिपोर्ट अलमारी रखी धूल फांकती रही। सच यह भी है कि आजम खान को इस बात पर नाराजगी नहीं थी कि कल्याण सिंह को सपा में ले लिया गया। उनकी असली नाराजगी तो इस बात पर थी कि रामपुर से जया प्रदा को टिकट क्यों दिया गया। यदि रामपुर सीट मामले में मुलायम सिंह यादव आजम खान की मान लेते तो यकीन जानिए उन्हें कल्याण सिंह कबूल थे। कल्याण सिंह को तो उन्होंने केवल ढाल बनाया था। इस बात का सबूत यह है की जब सपा ने साक्षी महाराज को राज्यसभा में भेजा था और कल्याण सिंह के बेटे राजबीर सिंह को मंत्रीमंडल में शामिल किया था तो आजम खान ने आपत्ति नहीं की थी।

मुलायम सिंह यादव की माफी का अब इसलिए भी महत्व नहीं है कि भाजपा और सपा बाबरी मस्जिद बनाम राममंदिर की पैदाइश थीं। राममंदिर मुद्दा अब राख में तबदील हो चुका है। भाजपा और सपा एक दूसरे को ताकत देने का काम करती थीं। भाजपा खत्म हुई है तो सपा को भी खत्म होना ही था। ऐसे में मुलायम सिंह यादव की माफी सपा को फिर से खड़ा कर सकेगी, इसमें संदेह है। उत्तर प्रदेश में अब दो राजनैतिक ताकतें रह गयी हैं। भाजपा को रोकने के लिए मुसलमानों के पास अब कांग्रेस और बसपा के रुप में दो विकल्प हैं।

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vivek on 26 July, 2010 15:28;41
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सलीम मियां क्यों तथ्यों को तोड़ते हो अयोध्या में टूटने वाला ढांचा विवादित कहलाता है उसे बाबरी मस्जिद कैसे कह रहे हो क्या तुमको पता नहीं है की अभी न्यायालय का निर्णय नहीं आया है की वहा बाबरी मस्जिद थी या प्रभु राम का मंदिर. तुमने अपने आप फैसला कर लिया मक्कार कही के .
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सलीम अख्तर सिद्दीकी on 26 July, 2010 19:09;38
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विवेक मेंने पहले भी कहा था की बात करते वक़्त विवेक नहीं खोना चाहए. में तुमसे भी बुरी ज़बान में बात कर सकता हूँ. लेकिन मेरे संस्कार ऐसे नहीं हैं. आर एस एस वालों के ज़रूर हो सकते हैं. लगता है तुम्हारे अन्दर गडकरी की आत्मा आ गयी है.
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मुकुल शुक्ल on 26 July, 2010 21:14;13
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अच्छा है की मुलायम का सूपड़ा साफ़ हो | बहुत बेवक़ूफ़ बना कर उत्तर प्रदेश को लूटा है इस मुलायम ने | अगर मुसलमान ये समझ ले की माया और मुलायम दोनों ही उनको बेवक़ूफ़ बना रहे है तो फिर इनका राजनैतिक धरातल ख़त्म होते देर नहीं लगेगी | पर मुसलमान की सबसे बड़ी समस्या यही है की वो उलेमाओ और मौलवियों की सलाह आँख बंद कर के मानता है और हमेशा वोट देने में भेड़ चाल ही चलता है | इस देश में जितनी राजनैतिक पार्टिया कम होगी उतना ही भ्रष्टाचार कम होगा | लोग जब तक वोट बैंक की जानवरों वाली मानसिकता से बाहर निकल कर अपने आप को भारतीय मान कर वोट नहीं करेंगे तब तक न तो हमारा व्यक्तिगत विकास होगा और न ही इस देश का विकास होगा |
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deepak on 26 July, 2010 21:35;05
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सलीम मियां आर एस एस वाले को ही हर दोष देते हो , कल अपने पैदा होने का दोष भी दे डालो तो आप का ठिकाना नहीं, मगर वो भी झूट ही होगा, आर एस एस जैसे संगठन से आप जैसे लोगों की रूह क्यों कांपती है, ये आप ही जाने हम तो इतना जानतें है आर एस एस देशभक्तों का सम्मान करता है और गदारों की फाड़ देता है, और अपनी फटने के डर आपकी लेखनी पहले फट रही है,
संस्कार की आप बात करते हो किसी ने मक्कार कहा तो टुचेपन पे आ गए और आर एस एस को ही गाली देने लगे? ये ही तो संस्कार है तुमारे . तुमारी माँ की मारे कोई और बाप कहो किसी और को.
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vivek on 27 July, 2010 12:35;07
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सलीम मिया तुम्हारे संस्कार सच्चाई को समझने और मानने के खिलाफ है. जब मीडिया और तुम जैसे मीडिया के भोंपू और तथाकथित धर्मनिरपेक्ष नेता और बुद्धिजीवी किसी सच्चाई को स्वार्थ के लिए बार बार गलत लिखते है तो कोई भी विवेक खो सकता है. जब कोई मामला न्यायालय में विचारधीन है तो तुम कैसे विवदित धंचे को बाबरी मस्जिद लिख रहे हो. तुम्हारा आशय क्या जनसमुदाय को भ्रमित करने का नहीं है अगर तुम मीडिया की आड़ लेकर अपने स्वार्थ की खातिर गलत लिख रहे हो तो क्या तुम मक्कार नहीं हो यदि नहीं तो मक्कार किस को कहते है जरूर बताना.
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sanjay modi on 27 July, 2010 17:54;55
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सलीम मियां, विवादित ढांचे को मस्जिद कहते हो? ये तुमरे दिमाग का दिवालियापन ही तो है, फिर मुलायम को दोष देते हो? अरे मुलायम जब अपनी ही कौम का नहीं तो तुमारा क्या होगा? ये अब्ब समझ आ रही है? लालू, मुलायम, सोनिया, मायावती सब एक ही ठेल्ली के चट्टे बट्टे है. तुम लोगों की बड़ी समस्या ये है की तुम अपनी ही कौम में से किसी को लीडर नहीं चुन सकते , जो मुस्लमान नहीं होता उसे काफ़िर कहते हो फिर उन काफिरों को ही नेता चुनते हो ? ये संस्कार है तुमारे.
मुलायम को तुम लोग माफ़ नहीं करोगे तो क्या उसकी नानी मर जाएगी? वो तो फिर भी तुमारी ऐसे नहीं तो वैसे ले ही लेगा क्योंकि वो तुम सब से ४ कदम बड़ा कमीना है, और कमीनों की कमज़ोर नस बड़े कमीने से जयादा कौन जनता है?
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सलीम अख्टर सिद्दकी on 27 July, 2010 20:40;30
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मुझे नहीं पता था की संघियों के दिलों में इतना ज़हर भरा हुआ है. आप मुझे गाली दे रहें हैं इसका मतलब यह की आप हताश और निराश हैं. कमज़ोर भी हैं क्योकी कमज़ोर आदमी ही गालिया देता है. भगवन आप सबको सब्र पर्दान करे.
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shailendra kumar on 28 July, 2010 03:17;54
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सलीम जी उस पार्टी का नाम बताये जिसने मुसलमानों के साथ इंसाफ किया हो और उस मुसलमान नेता का नाम बताये जिसने सत्ता में आने के बाद मुसलमानों के लिए कुछ किया हो
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sanjay modi on 28 July, 2010 09:58;38
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सलीम संघ के लोगों को जब जब तुम गलियां देतें हो, गद्किरी के नाम पे रोते हो तो तुमरे तालिबानी संस्कार अच्छे होते है और तुमको कोई तुमारी ओकात बताये तो भगवन और संस्कार याद आतें hai? दोगले नहीं तो क्या हुए तुम? तुम जैसे मुसलमानों ने ही मुलायम की गोद में बैठ कर अपनी कौम की ऐसी तैसी कराई अब्ब संघ को और गडकरी को गाली दे रहे हो, अरे अब तो थोड़ी सी अक्ल लगाओ , तुमारा बलात्कार किया मुलायम ने फिर गाली संघ को ,
ऐसी सोच रही तो अमेरिका ही मुसलमानों का भगवान् बनेगा. पैसे अमेरिका के और खून बहाने वाला भी मुस्लिम और खून करने वाला भी मुस्ल्लिम, जयादा ओलाद पैदा करोगे तो यही न होगा.
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image सलीम अख्तर देश के अनेक समाचार-पत्रों में सामायिक मुद्दों पर लेख आदि लिखने के साथ ही टेक्निकल पुस्तकों का स्वतन्त्र लेखन। लेखन या पत्रकारिता का कोई कोर्स नहीं किया। लिखने की शुरुआत 1984 से दिल्ली से प्रकाशित होने वाले 'हिन्दुस्तान' और 'नवभारत टाइम्स' में सम्पादक के नाम पत्रों से की थी। हौसला बढ़ा तो सम्पादकीय पेज पर छपने के लिए लिखना शुरु किया। मशहूर पत्रकार स्व0 उदयन शर्मा मेरे आइडियल रहे हैं। इसलिए कलम का इस्तेमाल हमेशा ही फिरकापरस्त ताकतों के खिलाफ और दबे-कुचले लोगों के पक्ष में चली है। जनवादी लेखक संघ से भी जुड़ा हुआ हूँ। संपर्क: saleem_iect@yahoo.co.in
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