उद्धव का उद्भव, अजीत की जीत
27 जुलाई को उद्धव ठाकरे पचास साल के पूरे हो गये. मंगलवार को उनकी जीवन यात्रा के इस पड़ाव पर पूरे महाराष्ट्र में शिवसैनिकों ने कोई सात से आठ हजार स्थानों पर छोटे बड़े कार्यक्रम किये और उनके शतायु होने की कामना की. शिवसेना के मुखपत्र ने भी उद्धव ठाकरे का जन्मदिन जमकर मनाया और 12 पेज के अखबार के साथ 96 पेज का परिशिष्ट वितरित किया. मराठी में जन्मदिन को वाढ़दिवस कहते हैं. और किसी के लिए बाढ़ आयी हो या न आयी हो सामना अखबार के लिए शुभेच्छा देनेवाले विज्ञापनों की बाढ़ जरूर आ गयी.
विज्ञापन देनेवालों में कार्यकर्ताओं, नेताओं के अलावा शाहरुख खान की रेड चिली कंपनी है तो जेट एयरवेज, सहारा इण्डिया, रिलायंस समूह और महाराष्ट्र के दर्जनों बिल्डर, सैकड़ों कारोबारी भी शामिल हैं. शिवसेना से जुड़े लोगों का कहना है कि उद्धव जी के जन्मदिन पर वह रिकार्ड टूटने से रह गया जब बालासाहेब के जन्मदिन पर 165 पेज का अखबार प्रकाशित किया गया था जो कि अपने आप में एक रिकार्ड है. जाहिर है उस वक्त भी शिवसेना से जुड़े उनके शुभेच्छुओं ने सामना अखबार में शुभिच्छाओं की बाढ़ ला दी होगी. राजनीति में इस तरह की विज्ञापनबाजी का सीधा अर्थ और सपाट शास्त्र क्या होता है इसे समझाने बताने की जरूरत नहीं है. लेकिन इस अर्थशास्त्र का सीधा संपर्क बाल ठाकरे की उस राजनीति से भी है जो अपनी अकड़ में कभी भी पूंजीपतियों से पैसे नहीं पकड़ते हैं. बाल ठाकरे की कार्यशैली को जाननेवाले बताते हैं कि उन्होंने कभी भी राजनीति में उद्योगपतियों से चन्देबाजी और चढ़ावे को प्रोत्साहित नहीं किया. राजनीति को वित्तपोषित करने के उन्होंने जो रास्ते तैयार किये उसमें एक रास्ता मुखपत्र का प्रकाशन भी है और अखबारों में विज्ञापन कम से कम अखबार के संचालन के लिए सबसे अधिक जरूरी तो होता ही है. बाल ठाकरे की राजनीति में सामना की क्या भूमिका है, इसे अक्सर समाचार माध्यमों से हम जानते समझते रहते हैं.
लेकिन उद्धव ठाकरे का पचासवां जन्मदिन सिर्फ विज्ञापन बटोरने या फिर प्रदेशभर में सात-आठ हजार छोटे बड़े कार्यक्रम आयोजित करने तक ही सीमित नहीं है. पांच दिन पहले 23 जुलाई को राज्य में शरद पवार के भतीजे अजीत पवार का भी जन्मदिन मनाया गया. अजीत पवार को महाराष्ट्र में अजीत 'दादा' पवार के नाम से संबोधित किया जाता है. अजीत पवार के जन्मदिन पर पूरे महाराष्ट्र का आंकलन तो नहीं लेकिन मुम्बई और पुणे के बीच हजारों की संख्या में होर्डिंग्स लगाये गये और 'दादा' के शतायु होने की कामना करते हुए उन्हें शत शत नमन कर रहे थे. मुंबई महाराष्ट्र की राजधानी है इसलिए अजीत पवार राजनीतिक कामों से मुंबई में रहते हैं लेकिन पुणे से भी उनका गहरा नाता है. पुणे के लोग बताते हैं कि पिंपरी चिंचवड़ में 'दादा' की मर्जी के खिलाफ एक पत्ता भी नहीं हिलता. पिंपरी-चिंचवड़ महाराष्ट्र का प्रमुख औद्योगिक केन्द्र है जहां मर्सिडीज बेंज से लेकर बजाज आटो तक ने अपने कारखाने स्थापित कर रखे हैं. हाल में ही यहां राजीव गांधी आईटी पार्क की स्थापना की गयी है जिसकी बदौलत पुणे बंगलौर के बाद दूसरे नंबर का आईटी सिटी बनने की ओर अग्रसर है. इस समृद्ध शहर पर राजनीतिक नहीं बल्कि आर्थिक रूप से अजीत दादा पवार का अघोषित कब्जा है. कोई भी अंदाज लगा सकता है कि अजीत पवार की आर्थिक हैसियत महाराष्ट्र की राजनीति में कितने हजार करोड़ की होगी.
कभी चाचा के आज्ञापालक भतीजे ने चाचा के नाम पर पहले अपना आर्थिक उत्थान किया और जब जेब भारी हो गयी तो चाचा की राजनीतिक विरासत पर दावा ठोंक दिया. महाराष्ट्र की राजनीति में शरद पवार के लिए कांग्रेस या शिवसेना से बड़ी राजनीतिक चुनौती अजीत पवार हैं जो कि उनके बाद राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी की कमान अपने हाथ में लेना चाहते हैं. शरद पवार अपनी बेटी सुप्रिया सुले को अपना राजनीतिक उत्तराधिकार सौंपना चाहते हैं लेकिन उनके रास्ते में सबसे बड़ा रोड़ा अजीत पवार हैं. राष्ट्रवादी कांग्रेस के लगभग सभी विधायकों पर अजीत पवार की 'दादागीरी' चलती है इसलिए शरद पवार चाहकर भी अजीत को राजनीतिक रूप से किनारे लगाने की ओर कदम नहीं उठा सकते. हाल में अजीत पवार के ही इशारे पर छगन भुजबल को दिल्ली भेजनेवाली खबरें प्रकाशित हो गयी जिसकी तोड़ में छगन भुजबल ने कहना शुरू कर दिया कि वे उपमुख्यमंत्री के बाद अब प्रदेश का मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं. साफ है, अजीत पवार महाराष्ट्र की राजनीति में एकमात्र विश्वस्त छगन का भुज बल कम कर देना चाहते हैं ताकि एनसीपी पर उनका एकाधिकार हो जाए जिसके बाद चाचा न चाहते हुए भी उन्हें अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दें.
ये दोनों ही उदाहरण महाराष्ट्र की राजनीति में परिवारवाद के नायाब नमूने हैं. अजीत पवार अपने तरीके से महाराष्ट्र में एनसीपी पर काबिज होने की कोशिश कर रहे हैं तो उद्धव ठाकरे शिवसेना की उसी राजनीतिक परम्परा को आगे बढ़ा रहे हैं जिसकी शुरूआत कार्टूनिस्ट बाल ठाकरे ने की थी. उद्धव ठाकरे के पचास साल पूरे होने पर शिवसेना का उत्साह बताता है कि उनकी स्वीकार्यता सर्वस्वीकार्यता की ओर बढ़ रही है. उद्धव ठाकरे शिवसेना पर सांगठनिक रूप से सबल हैं लेकिन अभी भी उन्हें न केवल महाराष्ट्र की राजनीति में जनता के बीच अपनी स्वीकार्यता स्थापित करनी है बल्कि शिवसेना के भीतर भी उन्हें बाल ठाकरे के उपजनेवाली संभावित कमी को भरने का विश्वास दिलाना होगा. उनका पचासवां जन्मदिन उनके योजनाकारों की ओर से इसी रूप में मनाया गया. महाराष्ट्र की राजनीति में हो न हो उनके पचासवें जन्मदिन पर शिवसेना के भीतर उद्धव ठाकरे का विधिवत उद्भव जरूर हो गया. दूसरी ओर अपने जन्मदिन के बहाने अजीत पवार ने भी एनसीपी के उत्तराधिकार पर अनौपचारिक जीत घोषित कर दी है. महाराष्ट्र की राजनीति के भविष्य का आंकलन करना हो तो इन दोनों नेताओं के इन वाढ़दिवसों पर दिख रहें संकेतों को अनदेखा नहीं किया जा सकता. हां, महाराष्ट्र की भविष्य की राजनीति में राज ठाकरे जरूर कहीं न कहीं होंगे. वे कहां होंगे इसका आंकलन इससे भी कर सकते हैं कि उद्धव ठाकरे के जन्मदिन पर मुंबई के ही एक अखबार डीएनए ने एक संक्षिप्त सर्वे जारी किया जिसमें बताया कि महाराष्ट्र की राजनीति में बाल ठाकरे आज भी सबसे लोकप्रिय व्यक्तित्व हैं. तो फिर बाल ठाकरे के बाद कौन? सर्वे के अनुसार लोकप्रियता के मामले में राज ठाकरे बाल ठाकरे के बाद दूसरे लोकप्रिय व्यक्तित्व हैं. उद्धव ठाकरे के सामने यही वह चुनौती है जिसका सामना भविष्य में उन्हें करना होगा.
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सारे राष्ट्र की भाषा हिंदी है और राष्ट्र की बात आती है तो हर प्रान्त से पहले राष्ट्र की अहमियत मानी जाती है तो फिर भाषा की क्यों नहीं? ये समझ इन तीनो कुएं के मेढकों को समझ नहीं आने वाली, इन तीनो को कुछ महीने महाराष्ट्र से ताड़ी पर की सजा दी जाये तभी शायद समझ आयेगा की हिंदुस्तान क्या है?
ये तीनो महाराष्ट्र के एक होने की बात करतें है , ठाकरे ठाकरे ही पहले एक तो हो जाओ, कितने दिन बर्गालाओगे गुंडों को (शिव सैनिकों को) , नारायण राणे वगैरह ने तो इनके पिछवाड़े पे लात मारी ही , जब आम जनता मारेगी तब क्या होगा.
आज फ़िल्मी सितारों को धमका के मर्दानगी दिखातें है , इतना ही खुद में जोश था तो भेजा होता ४ शिव सैनिकों को पाकिस्तान की माँ बहन एक करने , बदले की करवाई के लिए . मराठी नहीं बोलेगे तो इनकी नानी मरती है और मरठी का खून बहता है तो इनको सकूँ मिलता है?
ये समाज के कीड़ेहै ,
अगर ठाकरे परिवार की तरफ झुकाव कुछ ज्यादा ही नहीं रहा होता तो यह सबसे बेजोड़ आलेखों में से एक भी हो सकता था.
सादर
आपका
शिरीष
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