राजनीतिक मौन में राजमाता
ब्रिटिश प्राइम मिनिस्टर डेविड कैमरन अपने पहले भारतीय दौरे पर आये हुए थे. उनके कार्यक्रमों की सूची में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और महासचिव राहुल गाधी से मुलाकात का कार्यक्रम भी दर्ज था. मगर अफसोस भारतीय सत्ता के इन दोनों संविधानेतर महाशक्तियों ने अंतिम समय में कैमरन से मिलने से शिष्टतापूर्वक इनकार कर दिया. सोनिया ने जहां अपनी नासाज तबीयत का बहाना बनाया, वहीं राहुल एक दिन पहले अचानक कैमरन के ही मुल्क ब्रिटेन की यात्रा पर निकल गये. आखिर ऐसा क्यों हुआ ?
अभी हाल में महंगाई को लेकर भारतीय संसद में विपक्षी सांसद जोरदार हंगामा कर रहे हैं और संसद में सोनिया के बयान की मांग की जा रही है. मगर सोनिया उपलब्ध नहीं हैं. इससे पहले सीबीआई के राजनीतिक इस्तेमाल को लेकर कांग्रेस पर आरोप लगाये गये पर इन आरोपों का जवाब देने के सोनिया मीडिया के सामने नहीं आईं या उन्होंने कोई बयान भी जारी नहीं किया. इसके पहले भोपाल गैस त्रासदी प्रकरण को लेकर बड़ा बवाल मचा. उनके स्वर्गीय पति पर गंभीर आरोप लगाये गये.
आपरेशन ग्रीन हंट को लेकर पार्टी के अंतर्विरोध बाहर आये, नक्सलवाद के खिलाफ सेना के इस्तेमाल पर दिग्विजय और चिदंबरम आमने-सामने हो गये. कामनवेल्थ को लेकर मणिशंकर अय्यर ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. पेट्रोलियम पदार्थों की मूल्य वृद्धि के वक्त कांग्रेस संदेश के संपादक अनिल शास्त्री ने सोनिया से हस्तक्षेप की गुहार लगाई. मगर राजमाता सोनिया गांधी अंतःपुर से बाहर नहीं निकलीं. न ही उनके सुपुत्र कांग्रेस के तथाकथित युवराज राहुल गांधी ने कोई टिप्पणी की. भोपाल गैस त्रासदी के फैसले से ठीक पहले स्पेनिश लेखक जैवियर मोरो अपनी किताब द रेड साड़ी के विवाद को लेकर भारत पहुंचे थे. सोनिया गाधी के जीवन पर केंद्रित इस पुस्तक में कई विवादास्पद मुद्दे टिप्पणियां थीं. मगर इस पुस्तक के खिलाफ भी दस जनपथ से कोई बयान जारी नहीं किया गया. दस जनपथ दो हाल-हाल तक भारतीय राजनीति का महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता था, अब इक्के दुक्के कांग्रेसी अपना झगड़ा सुलझाने वहां पहुंच रहे हैं. जो वहां जाते भी हैं उन्हें कोई सटीक जवाब नहीं मिलता. आखिर भारतीय राजनीति के महत्वपूर्ण अंग और कांग्रेसी राजनीति के माई-बाप माने-जाने ये दोनों पुरोधा पिछले छह माह से कहां गुम हैं ? क्या यह भारतीय राजनीति के लिये एक गंभीर सस्पेंस नहीं है ? आखिर इनके चुप्पी की वजह क्या है?
थोड़ी देर के लिये मान लेते हैं कि यही सच होगा, मगर क्या इन हालातों में कांग्रेसी भी उन्हें इस तरह उपेक्षित छोड़ देंगे जैसा कि इन दिनों नजर आ रहा है. यह ठीक है कि सोनिया-राहुल ने यूपीए-2 को कामकाज में दिलचस्पी कम कर दी है, मगर यूपीए-2 के पुरोधा जिन्हें मालूम है कि उन्होंने यह कुर्सी इन्हीं दो लोगों के बदौलत पाई है, क्यों इनकी खोज खबर नहीं ले रहे? क्या मौजूदा सरकार के काम-काज से जाहिर नहीं कि वे भी यह साबित करने की कोशिश में जुट गये हैं कि कांग्रेस को इन दोनों दिग्गजों के बैशाखी की जरूरत नहीं. सारे फैसले खुद लिये जा रहे हैं. चाहे आपरेशन ग्रीन हंट हो, पेट्रोलियम पदार्थों की मूल्य वृद्धि का मसला हो, पाकिस्तान के बातचीत के बिंदू हों या फिर मोदी से निपटने की स्ट्रैटजी. न तो किसी मसले पर उनसे सलाह ली जा रही है और न ही उनके स्टैंड का ख्याल रखा जा रहा है.
कहीं ऐसा तो नहीं कि सोनिया ने खुद को संविधानेतर शक्ति के संबोधन से मुक्त कराने और मनमोहन सिंह को असली किंग साबित करने के लिये एक और त्याग किया है. माना जा सकता है कि राजनीति में उनके आने का उद्देश्य कांग्रेस को भारतीय राजनीति के केंद्र में फिर से स्थापित करना भर था. अब चुकी यह लक्ष्य हासिल किया जा चुका है इसलिये वे चुपचाप बड़ी शालीनता से खुद को कांग्रेस की सबसे शक्तिशाली कुर्सी से अलग कर रही है. क्या यह सच हो सकता है ?जैसे, यह जगजाहिर है कि माओवाद से निबटने और पेट्रोलियम पदार्थों का कीमतों को बाजार पर छोड़ देने के फैसलों के मामले में दोनों उन फैसलों के खिलाफ होते जो सरकार ने लिये. मगर इसके बावजूद सरकार ने ऐसे फैसले बेहिचक लिये. दिग्विजय, अनिल शास्त्री और मणिशंकर अय्यर जैसे नेता ने संभवतः यही सोचकर अपनी ही सरकार की नीतियों पर सवाल खड़े कर रहे हैं कि उन्हें सोनिया और राहुल का समर्थन मिलेगा. मगर सरकार बड़ी बेरहमी से इन्हें खामोश करने के तरीके तलाश रही है.
इसका अर्थ कहीं यह तो नहीं कि कांग्रेस दो धड़े में बंट गयी है. मौजूदा सरकार में जिम्मेदार पदों पर काबिज कांग्रेसी हर हाल में सोनिया-राहुल जैसे वट वृक्षों की छाया से निकल कर अपना अस्तित्व साबित करने में जुट गयी है. हालांकि अगर वाकई ऐसा हो रहा है और कांग्रेस नेहरू-गांधी परिवार की छत्र-छाया से निकल कर आत्म निर्भर होने की कोशिश में है तो इसे सकारात्मक संकेत के रूप में देखा जाना चाहिये. मगर यहां परिस्थितियां थोड़ी अलग हैं. कांग्रेसी सोनिया-राहुल की छत्र-छाया से इसलिये बाहर नहीं निकल रहे कि वे आत्मनिर्भर होना चाहते हैं, बल्कि इसलिये यह कदम उठा रहे हैं, क्योंकि उन्हें कई जनविरोधी फैसले लेने हैं, जो वे सोनिया-राहुल के प्रभाव में रहते हुए नहीं ले सकते. चिदंबरम को खनिज संपन्न पूर्वी भारत को माओवादियों के कब्जे से मुक्त कराकर टाटा और जिंदल को सौंपना है. इस काम के लिये जरूरत हुई तो वे इन इलाकों में बमबारी तक करवाने में नहीं हिचकेंगे. और उन्हें मालूम है कि सोनिया या राहुल से उन्हें इस मसले पर समर्थन मिलने वाला नहीं.
वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी को बाजार की ताकतों को खुश करने के लिये कई ऐसे फैसले लेने हैं जो जनता में त्राहिमाम मचा सकते हैं. मनमोहन-मोंटक की अर्थशास्त्री जोड़ी का लक्ष्य वर्ल्ड बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोश जैसी संस्थाओं की नीतियों को भारत में लागू करना है. दोनों इन्हीं बैंकों के पूर्व कर्मी रह चुके हैं. वैसे यूपीए-2 पर वर्ल्ड बैंक, एशियन डेवलपमेंट बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोश के पूर्व कर्मियों का ही कब्जा है. सरकार ने जनोन्मुखी वाम दलों से पहले ही पीछा छुड़ा लिया है, अब वे अपनी पार्टी की जनोन्मुखी ताकतों को साइड करने में जुटे हैं, ताकि बाजारोन्मुखी फैसले लेने में कोई व्यवधान उत्पन्न न हो. कहा यह भी जा रहा है कि सरकार को ऐसा शेप अमेरिकी प्रभाव में दिया जा रहा ताकि भारत सरकार पूरी तरह अमेरिकी पिट्ठू की तरह काम करे.
लेकिन सबकुछ इतना आसान नहीं...
मगर जो कुछ भी करने की कोशिश की जा रही है वह इतना आसान नहीं. सोनिया गांधी न तो महात्मा गांधी है जिन्होंने आजादी के बाद नेहरू-पटेल द्वारा साइड-लाइन किये जाने की बात चुप-चाप सह ली और साबित कर दिया कि उन्होंने सत्ता भोगने के लिये आजादी की लड़ाई नहीं लड़ी थी. सोनिया गांधी भारतीय राजनीति का वह किरदार है जिसने लगभग डूब चुकी कांग्रेस को ऐसी राजनीतिक शक्ति में तब्दील कर दिया जो आज अजेय लगने लगी है.
अगर वह इस पार्टी के लिये ऐसा करिश्मा कर सकती है तो अपने पुत्र के राजनीतिक कैरियर के लिये जनता का रुख फिर से मोड़ सकती है. इसकी शुरुआत इसी महीने हो सकती है जब उन्हें इस बार लगातार तीसरे टर्म के लिये सर्वसम्मति से अध्यक्ष चुने जाने की कोशिश हो. संसद के मानसून सत्र के बाद यह कार्रवाई होगी. बहुत संभव है कि सोनिया इस मौके पर खुद ही अध्यक्ष पद स्वीकार न करे और किसी और का नाम आगे बढ़ाने की मांग कर दे. त्याग की राजनीति की माहिर खिलाड़ी सोनिया के इस कदम से पार्टी में जो उथल-पुथल मचेगी उससे मनमोहन-चिदंबरम कंपनी किस तरह निबटती है यह देखने वाला अनुभव होगा.
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- सुदर्शन का (कु) दर्शन
- सीआईए नहीं केजीबी एजंट कहिए जनाब
- सोनिया का सच जान बेकाबू क्यों होते हो?
- नये निजाम के दामन पर है ज्यादा बड़ा दाग
- अजमेर चार्जशीट और संघी उछल-कूद
- अपने होने पर ही हैरान
- भद्दा और बेदम रहा संघ का विरोध प्रदर्शन
- एनसीपी के 'दादा' का दांव
- पीएमओ वाले पृथ्वीराज
- गोली लगने के बाद क्या गांधी ने कहा था- हे राम ?



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दूसरा तरीका है, इलेक्ट्रोनिक वोटिंग का प्रयोग. वह तकनीक जो की खुद अमेरिका और यूरोप से बाहर की जा चुकी है. जिसकी विश्वसनीयता पर विकसित देशों में भी प्रश्नचिन्ह लगा हुआ है, जिसके सोर्स कोड वाली चिप में आसानी से बदलाव किया जा सकता है. और मतदाता के मतों का भौतिक सत्यापन भी नहीं हो सकता. सिर्फ एक आंकड़ा होता है, जिसे मानना हो माने वर्ना खाता न बही जो हम कहें वो सही. आपत्तियों को कागज की बर्बादी और बेबुनियाद कहकर ख़ारिज कर दो.
तीसरा तरीका है, चुनाव आयोग में अपने लोग फिट कर दो. जैसे नवीन चावला को किया गया था. अब आपके खिलाफ आने वाली धांधली की हर शिकायत रद्दी में जाएगी, और विरोधी पार्टियों की शामत.
चौथा, मीडिया में अपने कारनामों की ख़बरें आने से किसी भी तरह रोको. खुद मीडिया संस्थानों के मालिकों को अपने साथ ले लो. घोटालों में उन्हें भी भागीदार बनाओ, उन्हें भी मलाई चाटने दो. फिर वे खुद बा खुद चुपचाप आपका साथ देंगे. विरोधी पार्टियाँ सही भी करें तो मीडिया के ज़रिये हंगामा मचा दो. और छोटी सी गलती पर भी चढ़ ही बैठो.
पांचवा, सरकारी मशीनरी में केवल उन्ही लोगों को अहम् पद दो जो सब जानते हुए भी आपका साथ देने तैयार है. जो साथ न दें, उन्हें हर तरह से बेईज्ज़त करो.
छठा, जब यह सब चल रहा हो. तब परदे के पीछे जनसँख्या अनुपात बदलना शुरू कर दो, सेक्स, महंगाई, करियर, बाज़ार और मनोरंजन में पब्लिक खासकर युवाओं को इतना गाफिल रखो की वे सच्चाई जानना ही न चाहें, न समझने लायक बौद्धिक क्षमता और ऊर्जा बचने दो. कोई विरोध नहीं करेगा. इस तरीके को 'डम्ब डाउन करना' कहा जाता. इसके बारे में ज्यादा जानना चाहें तो सर्च में 'डम्ब डाउन द पब्लिक' या 'डम्ब डाउन द मीडिया' खोजकर पढ़ लें.
सांतवा, लोगों को बाँट दो. फूट डालो राज करो.
यह एक छोटी सी झाक्लक है की असल में चल क्या रहा है.
सिर्फ इतना भर नहीं कहा की जनता को जबाब देना जरूरी हो , और जबाब हो ही नहीं तो बेशर्मों की तरह अंतर्ध्यान नहीं , गायब हो जाओ.
भागने में माहिर हैं सोनिया जी .इमरजेंसी के बाद जब इंदिरा कांग्रेस हार गयीं तो सिर्फ इटली की नागरिकता ही याद आयी और अपने बच्चों सहित इटली के दूतावास में भाग कर शरण ली इस भगोड़ी ने .
कुछ समझे पुष्य मित्र जी ?
एक जानकारी भरी किताब आयी है इनके बारे में .यहाँ पर प्रतिबंधित है इस लिए शायद आप पढ़ नहीं पाए .वर्ना आपको ये लगता कि इनको सुनियोजित तरीके से ' प्रधान मंत्री निवास ' में प्लांट किया गया था पश्चिम द्वारा और अब तो ऐसे मुकाम पर पहुँच गयी हैं कि .........पूरा देश ही बेंच कर मानेंगी ये .
रोक सको तो रोक लो .
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