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चेहरा बदलने आये थे, मोहरा बनकर रह गये

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संघ की शाखाओं में स्वयंसेवकों को नेतृत्व क्षमता के बारे में सिखाया जाता है, "नेतृत्व वही, जिसके पास निर्णय क्षमता हो." लेकिन फिलहाल तो स्वयंसेवक गडकरी में इसका अभाव दिखता है. गडकरी की बड़े नेताओं के बीच संतुलन साधने और पार्टी के सभी गुटों को खुश रखने की रणनीति संगठन पर भारी पड़ रही है. कड़े फैसले लेकर पार्टी को सही दिशा देने की बजाए गडकरी नेताओं के महत्वाकांक्षाओं के खेल में मोहरा बन रहे हैं.

नितिन गडकरी के भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के करीब सात महीने गुजर चुके हैं और माना जाने लगा है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत ने नितिन गडकरी को पार्टी का अध्यक्ष बनवा कर गुटबाजी और सत्ता संघर्ष पर विराम लगा दिया है.  कल तक आपस में लड़ने वाले पार्टी के बड़े नेता भी ऊपरीतौर पर यह दिखाने में लगे हैं कि वे गडकरी के साथ मिलकर पार्टी को मजबूत करने में जुटे हैं.  लेकिन हकीकत इससे जुदा है. भाजपा में ऊपर से भले ही सब कुछ ठीक दिख रहा हो, लेकिन अंदरखाने अभी भी शह-मात का खेल चल रहा है और सत्ता व पद के लिए नए राजनीतिक समीकरण बन रहे हैं. पार्टी मुख्यालय के बंद कमरों में संगठन को मजबूत करने की बजाए नेता अपना कद बढ़ाने और दूसरे का पर काटने के लिए बिसात बिछा रहे हैं.  गुटों में बटी भाजपा के क्षत्रपों पर नकेल कसने के लिए ही संघ ने नितिन गडकरी को महाराष्ट्र से दिल्ली भेजा था. लेकिन अब इन पर न तो संघ का डंडा चल पा रहा है और न ही गडकरी का. भाजपा का चेहरा-मोहरा बदलने के लिए संघ ने जिस नितिन गडकरी को अध्यक्ष बनाया है, वह कमजोर साबित हो रहे हैं. आलम यह है की नितिन गडकरी भले ही पार्टी अध्यक्ष हों लेकिन फैसले आडवाणी गुट ही कर रहा है. नितिन गडकरी उस पर अपनी मोहर लगा रहे हैं.

संघ प्रमुख ने जिस डी-फोर (अरुण जेटली, सुषमा स्वराज, वेंकैया नायडू और अनन्त कुमार) को भाजपा में गुटबाजी का जिम्मेदार मानते हुए गडकरी को अध्यक्ष बना कर "पावरलेस" करने की कोशिश की, वह पिछले सात महीनों में और ताकतवर बन कर उभरी है.  2009 में लोकसभा चुनाव में हार के बाद पार्टी में पद और सत्ता को लेकर जबरदस्त घमासान मचा हुआ था.  तब संघ प्रमुख मोहन भागवत ने भाजपा को टेकओवर करते हुए गुटबाजी के लिए पार्टी के शिखर नेता लालकृष्ण  आडवाणी के चहते अरुण जेटली, सुषमा स्वराज, वेंकैया नायडू और अनन्त कुमार को डी-फोर (दिल्ली-फोर) की संज्ञा देते हुए उन्हें ही पार्टी में गुटबाजी के लिए जिम्मेदार बताया था और कहा था की इनमें से कोई भी पार्टी अध्यक्ष नहीं बनेगा.  संघ की योजना नितिन गडकरी के जरिए इन "ड्राइंगरूम" नेताओं को दरकिनार कर पार्टी से गुटबाजी खत्म कर संगठन को नरे सिरे से खड़ा करने की थी, जिसमें जमीनी नेताओं और कार्यकर्ताओं को ज्यादा महत्व दिया जाए. लेकिन गडकरी के अध्यक्ष बनने के बाद डी-फोर कमजोर होने की बजाए और ताकतवर हुआ है. गडकरी के अध्यक्ष बनने के बाद आडवाणी ने हस्तक्षेप करते हुए अपने खासमखास अरुण जेटली को राज्यसभा और सुषमा स्वराज को लोकसभा में प्रतिपक्ष का नेता मनोनीत कर दिया.  तो अनन्त कुमार पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव के साथ साथ पार्टी की नीति निर्धारक संसदीय बोर्ड के भी सचिव हैं.  सारे अहम फैसले संसदीय बोर्ड में ही लिए जाते हैं. अनन्त और एम वेंकैया नायडू के साथ साथ अरुण जेटली और सुषमा स्वराज भी पार्टी की संसदीय बोर्ड की सदस्य हैं.     

"आडवाणी एंड कंपनी" ने गडकरी को पूरी तरह से अपने दबाव में ले लिया है और गडकरी बेबस हो उनके फैसलों को मानने भी लगे हैं. संसद सत्र शुरु होने से पहले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के भोजन के आमंत्रण पर भाजपा का कोई नेता नहीं जाएगा, यह फैसला लेते वक्त लालकृष्ण आडवाणी ने पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी से कोई राय मशवरा नहीं लिया.  अरुण जेटली और सुषमा स्वराज से गुफ्तगू के बाद लालकृष्ण आडवाणी ने यह अहम फैसला लिया.  भाजपा संसद में जातिगत जनगणना का विरोध नहीं करेगी, यह फैसला लेते हुए भी आडवाणी ने बातचीत तो दूर गडकरी को इसकी जानकारी तक नहीं दी.  जब कि न ही आरएसएस और न ही गडकरी इसके पक्ष में थे. जाहिर है ये फैसले पार्टी अध्यक्ष की सहमति से नहीं हुए. पार्टी के संविधान और नियमों के मुताबिक अध्यक्ष का ही निर्णय अंतिम होता है. जबकि संघ चाहता था कि उमा भारती की पार्टी में वापसी हो और संजय जोशी को संगठन में महत्वपूर्ण पद दिया जाए, लेकिन आडवाणी कैंप के विरोध के कारण नितिन गडकरी ऐसा नहीं कर पाए.  इसी तरह से संघ जिन्ना के समर्थक जसवंत सिंह की पार्टी में कतई वापसी नहीं चाहता था, लेकिन आडवाणी के दबाव में गडकरी को जसवंत सिंह को पार्टी में वापस लाना पड़ा.   

भाजपा में समानांतर सत्ता के कई केंद्र बन चुके हैं जिनके सामने नितिन गडकरी बौने साबित हो रहे हैं. आडवाणी खेमा पूरी तरह से संघ के चहेते नितिन गडकरी को फ्लाप करने में जुटा हुआ है.  ताकि अगला पार्टी अध्यक्ष संघ की नहीं, आडवाणी की मर्जी से बने.  अरुण जेटली, सुषमा स्वराज,  नरेंद्र मोदी, अनन्त कुमार, वेंकैया नायडू और राजनाथ सिंह पार्टी के नए सत्ता के केंद्र बन कर उभरे हैं. संघ प्रमुख मोहन भागवत की नसीहत के बावजूद ये लोग पार्टी में सामूहिक नेतृत्व पैदा करने की बजाए अपनी-अपनी छवि सुधारने और विरोधियों को ठिकाने लगाने में जुटे हैं. आडवाणी के चहेते अरुण जेटली की इस समय संगठन में सबसे ज्यादा चल रही है. जेटली ने राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण दिल्ली, बिहार और उत्तर प्रदेश का अध्यक्ष अपने चहेतों को तो बनवाया ही, संगठन में सबसे महत्वपूर्ण माने जाने वाले युवा मोर्चा की कमान भी उन्होंने अपने करीबी अनुराग ठाकुर के हाथों में सौंपवा दी. बिहार के अध्यक्ष डा. सीपी ठाकुर और उत्तर प्रदेश के पार्टी अध्यक्ष सूर्य प्रताप शाही का प्रदेश में अपना कोई व्यापक जनाधार नहीं है. कार्यकर्ता इन्हें लेकर गडकरी पर अंगुली उठाने लगे हैं.  अरुण जेटली कितने ताकतवर हैं इसका अंदाजा इस वाकए से लगाया जा सकता है.  पार्टी के पूर्व संगठन महामंत्री संजय जोशी को जब नितिन गडकरी ने बिहार में चुनाव पूर्व सर्वे की जिम्मेदारी दो तो जोशी ने गडकरी से साफ कहा कि सर्वे का क्या फायदा जब टिकटों का बंटवारा होगा तो अरुण जेटली की ही चलेगी.

पहले पार्टी में आडवाणी को वटवृक्ष और उनके चहेते अरुण जेटली, सुषमा स्वराज,  नरेंद्र मोदी, अनन्त कुमार और वेंकैया नायडू को उनकी शाखाएं माना जाता था. लेकिन अब ये शाखाएं बट वृक्ष बनने का प्रयास कर रही हैं, जिससे पार्टी में जबरदस्त रूप से शह-मात का खेल खेला जा रहा है.  आडवाणी के ये चहेते अपनी महत्वाकांक्षा को पूरी करने में एक दूसरे को निपटाने में जुटे हुए हैं. राजनीतिक विश्लेषक डा. सुव्रोकमल दत्ता कहते हैं,  "पार्टी के बड़े नेता यह दिखाने की कोशिश कर रहे हैं कि अब सब कुछ सामान्य है, लेकिन हकीकत है कि पार्टी में गुटबाजी अगर बढ़ी नहीं है तो कम भी नहीं हुई है. पहले वाले गुट बरकरार हैं और उनमें सत्ता संघर्ष जारी है. संघ ने गडकरी को मजबूत अध्यक्ष के रूप में पेश कर डी-फोर पर लगाम लागे की कोशिश की थी, लेकिन फिलहाल तो गडकरी पूरी तरह से आडवाणी और उऩकी जुंडली के प्रभाव में हैं. " अरुण जेटली और नरेंद्र मोदी दोनों दोस्त हैं.  लेकिन दोनों ही प्रधानमंत्री की कुर्सी का सपना संजोए हैं.  अरुण जेटली अटल बिहारी वाजपेयी की राह पर चलते हुए अपने को पार्टी का उदारवादी चेहरा साबित करने पर जुटे हुए हैं तो मोदी खुद को आडवाणी का स्वाभाविक उत्तराधिकारी मानते हैं.  एक कानूनविद के रूप में भाजपा और संघ परिवार में अरुण जेटली की काफी प्रतिष्ठा है.  जब पार्टी या संघ किसी कानूनी दांवपेज में फंसती हैं तो निगाहें जेटली की तरफ उठती हैं.  नरेंद्र मोदी ने अरुण जेटली का पार्टी में कद कम करने के लिए ही प्रसिद्ध वकील और कानूनविद राम जेठमलानी को पार्टी टिकट पर राज्य सभा में भिजवाया है.  मोदी के दोस्त जेटली ने राम जेठमलानी को राज्य सभा टिकट देने का जम का विरोध भी किया, लेकिन जीत मोदी की ही हुई.  रामजेठमलानी को राज्यसभा में भेज कर मोदी ने पार्टी में अरुण जेटली की लकीर छोटी करने की कोशिश की है तो अरुण जेटली ने भी सियासी दांव चलते हुए उमा भारती की पार्टी में वापसी की वकालत कर एक तीन से दो निशाने साधने की कोशिश की है.  जबकि यह वही उमा भारती हैं जिसने संघ नेताओं और पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के सामने जेटली पर "ड्राइंगरूम पॉलिटिक्स" करने और मीडिया में खबरे प्लांट कराने का खुला आरोप लगाया था.  उमा की वापसी से सुषमा स्वराज, जिनका जेटली से छत्तीस का आंकड़ा है, के वर्चस्व को चुनौती मिलेगी,  साथ ही उनके फायर ब्राड हिंदुत्व की झंडाबरदार होने की वजह से मोदी की राह में भी कांटे बाए जा सकेंगे.  पार्टी के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं,  "संघ के हस्तक्षेप और गडकरी के अध्यक्ष बनने के बाद लग रहा था कि पार्टी के बड़े नेता एकजुट हो कर संगठन के लिए काम करेंगे. लेकिन वे संगठन को मजबूत बनाने की बजाए अपनी व्यक्तिगत महत्वकाक्षांओं को पूरा करने में और तेजी से जुट गए हैं.  दुख यह है कि गडकरी इन पर लगाम कसने की बजाए जाने-अनजाने उनके हितों को ही पूरा कर रहे हैं. ”
 
इधर बदले समीकरण में आडवाणी के विरोधी गुट के सरदार राजनाथ सिंह ने सुषमा स्वराज से हाथ मिला लिया है. जेटली को मात देने के लिए ये दोनों गडकरी के सामने सुर में सुर मिलाने लगते हैं. आडवाणी के एक दूसरे सिपहसालार अनंन्त कुमार की महत्वाकांक्षा कर्नाटक के मुख्यमंत्री बनने की है.  इसलिए वे खनन माफिया और कर्नाटक सरकार में मंत्री रेड्डी बंधुओं की मदद से राज्य की यदुरप्पा सरकार का तख्ता पलट करना चाहते हैं. हर अच्छे बुरे में जेटली का साथ देने वाले अनन्त कुमार को इस बारे में जेटली का समर्थन नहीं मिल रहा है. कर्नाटक का मुख्यमंत्री बनते ही अनन्त का कद और बढ़ जाएगा और वे भी प्रधानमंत्री पद के दावेदार हो जाएगे. इसलिए जेटली अनन्त की बजाए यदुरप्पा का साथ दे रहे हैं.  तो अनन्त ने भी समय की नजाकत को देखते हुए जेटली की धुर विरोधी सुषमा स्वराज से निकटता बढ़ा कर उन्हें रेड्डी बंधुओं के पक्ष में कर लिया है.  सुषमा के इसारे पर वह उमा भारती की पार्टी में वापसी का विरोध कर रहे हैं.  उधर राजनाथ सिंह ने भी जेटली की काट के लिए सुषमा और वेकैंया से हाथ मिला लिया है.

नितिन गडकरी पार्टी का चाल, चरित्र और चेहरा बदलना चाहते हैं.  इसके लिए उन्होंने कहा था कि वे हवाई नेताओं की जगह जमीनी नेताओं को महत्व देंगे और "चेहरे" की जगह कार्यकर्ताओं की "रिपोर्टकार्ड" देखेंगे. पार्टी के पदाधिकारी ड्राइंगरूम से निकल कर गांवों और कस्बों में जाकर काम करेंगे. जबकि गडकरी के टीम में "नेता" कम और "चेहरे" ज्यादा हैं. उनकी टीम में बॉलीवुड के लोगों की भरमार है.  पार्टी के एक युवा नेता कहते हैं, "हेमामालिनी, स्मृति इरानी, वाणी त्रिपाठी, अनुराग ठाकुर, नवजोत सिंह सिद्धू का रिपोर्ट कार्ड सबको पता है.  क्या ये नेता गांवों और कस्बों में जाकर कार्यकर्ताओं के घर रुक पाएंगे. एसी से निकलते ही इन्हें चक्कर आने लगेगा. गडकरी की कथनी और करनी में साफ फर्क नजर आ रहा है. उऩके जैसे युवा और जमीनी नेता के अध्यक्ष बनने से युवा और कर्मठ कार्यक्रताओं में आशा जगी थी. लेकिन सात महीने में हमें 'अपेक्षा' की जगह 'उपेक्षा' मिली है.”  गडकरी किस कदर पार्टी वरिष्ठ नेताओं के दबाव में हैं इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि अपनी टीम गठित करने में उन्हें चार महीने लग गए और उन्हें राज्यों का प्रभार और बांटने में सात महीने. संघ को भी आभाष होने लगा है कि जो वह चाहता है, वह गडकरी नहीं कर पा रहे हैं. इसीलिए उसने लंबे समय बाद 29 जून को दिल्ली में गोवा के सांसद श्रीपाद नाइक के घर पर संघ और भाजपा नेताओं की समन्वय बैठक भी की और भाजपा को संघ के एजेंडे पर चलने के लिए आगाह भी किया.

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JASBIR CHAWLA on 13 August, 2010 11:58;41
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Dhaak ke 3 Paat hote hain.Taash me 52 Patte tatha 1 Joker hota hai.Patte kitne bhee feent lo, Patte to wahee rahenge.kuch samikaran badal sakte hain.BJP pe yahee comment.
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वीरेन्द्र जैन on 13 August, 2010 13:08;21
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यह सच का बहुत छोटा सा अंश है। जहाँ सता नहीं है वहाँ पद के लिए और जहाँ सत्ता है वहाँ धन के लिए लूटमार मची हुयी है। वो तो सेठों के पूरे मीडिया के लिए खजाने खोल दिये गये हैं इसलिए मीडिया घी पिये बैठा है। केवल कुछ छोटे अखबार और वेव पत्रिकाएं ही कुछ साहस दिखा पाती हैं। बहरहाल keep on
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KG sharma on 23 August, 2010 18:50;23
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ये ही लेख 'अक्स' पत्रिका के १६-३१ ऑगस्ट 2010 के अंक में धेरेंद्रे महर्षि के नाम से पेज १६-१७ पर छपा है. वास्तव में ले लेख किसका है. विस्फोट.कॉम पर अनिल पाण्डेयजी का या फिर महर्षि साहेब का.
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admin on 23 August, 2010 21:14;37
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यह लेख तो अनिल पाण्डेय का ही है. लेकिन वेब ने लेखकीय लोकतंत्र को पूरी तरह से स्वच्छंद कर दिया है. हो सकता है महर्षि जी ने इसी स्वच्छंदता का लाभ ले लिया हो. फिलहाल कोई निंदा करने की जरूरत नहीं है. पत्रकारों को यह समझना चाहिए कि मौलिक लेखन ही पत्रकारिता है जो आपको स्थापित करेगा. उधार के लेखों पर अपना नाम धर देने से तो कोई फायदा नहीं.

विस्फोट की ऐसी नीति है कि हम और हमारे लेखक कापीराईट नीति को खारिज करते हैं. विस्फोट तो साभार आदि का भी विरोध करता है और घोषणा करता है कि विस्फोट का जिक्र करना कत्तई जरूरी नहीं है. लेकिन लेखकों के नाम का उल्लेख जरूर होना चाहिए. अगर ऐसा नहीं होता तो सचमुच बहुत दुख होता है.
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KG Sharma on 25 August, 2010 11:12;44
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धन्यवाद, परन्तु अक्स पत्रिका के पिछले अंको का भी अवलोकन अवस्य कीजियेगा.
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अनिल पाण्डेय ने भाजपा में हो रहे आंतरिक यादवी संघर्ष का सटीक चित्रण किया है .भारतीय जनता पार्टी में आज जनाधारहीन नेताओं का वर्चस्व कायम हो गया है जिसके कारण भाजपा की जड़े कमजोर होती जा रही हैं.यदि दो तीन बरसों में भाजपा की स्थिति भी कमुनिस्ट पार्टी की तरह से ही हो जायेगी ऐसा लगता है .इसमें आर एस एस भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है.आर एस एस से भेजे गये संगठन महा मंत्री भाजपा की शाख और प्रभाव दोनों को घटाने में जुटे हुए हैं. नये पार्टी अध्यक्ष गडकरी ने तो अपने वाणी , वयवहार और कार्य से भाजपा को नुकसान ही पहुचाया है .इनके द्वरा बनायीं गयी भाजपा के केंद्रीय टीम किसी फिल्म की नकली कहानी जैसी लग रही है.
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image अनिल पाण्डेय पत्रकारिता में मास्टर डिग्री. नई दिल्ली से प्रकाशित दैनिक समाचारपत्र जनसत्ता में पांच साल तक संवाददाता. इसके बाद माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग में पांच साल तक व्याख्याता के तौर पर कार्य किया. वर्तमान में 13 भाषाओं में प्रकाशित साप्ताहिक पत्रिका द संडे इंडियन में प्रमुख संवाददाता के रुप में कार्यरत.
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सात रेसकोर्स पर दस जनपथ का दावा
दस जनपथ से अगर आप सात रेसकोर्स पहुंचना चाहें तो बमुश्किल सात मिनट का समय लगता है. लेकिन इन दिनों कांग्रेस के शीर्ष पर शुरू हुए सत्ता संघर्ष ने लुटियंस जोन के इन दो सड़कों की दूरिया बढ़ा दी हैं. पिछले कुछ दिनों में कांग्रेस के अंदर कुछ वही राजनीति शुरू हो गई है जिसे किनारे लगाने की राजनीति कह सकते हैं। अक्सर जो किनारे लगाने की कांग्रेस स्टाइल है, उसी स्टाइल में काम की शुरूआत हुई है।...
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सुप्रीम कोर्ट का सवाल और प्रधानमंत्री का मलाल
आखिरकार प्रधानमंत्री का दुख प्रकट हो ही गया. संपादकों के साथ बातचीत में उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट सरकार के काम काज के लिए नीति निर्धारण न करे. प्रधानमंत्री का यह दुख प्रशासन की उस चिंता से प्रकट होता है जो न्यायालयों के हस्तक्षेप से जुड़ा है. पहले भी कई मौकों पर न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच टकराव के मौके आये हैं. अनाज के सड़न के सवाल पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से एक बार फिर वह सवाल उठ खड़ा हुआ है, जिस पर प्रधानमंत्री अपनी आपत्ति जाहिर कर रहे हैं....
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राजनीतिक हिन्दुत्व पर दिग्गी का दांव
हिन्दुओं का ठेकेदार बनने की आरएसएस और उसके मातहत संगठनों की कोशिश को चुनौती मिल रही है. भगवान् राम के नाम पर राजनीति खेलकर सत्ता तक पंहुचने वाली बीजेपी के लिए और कोई तरकीब तलाशनी पड़ सकती है क्योंकि कांग्रेस की नयी लीडरशिप हिन्दू धर्म के प्रतीकों पर बीजेपी के एकाधिकार को मंज़ूर करने को तैयार नहीं है. कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह ने साफ़ कहा है कि हिन्दू धर्म पर किसी राजनीतिक पार्टी के एकाधिकार के सिद्धांत को वे बिल्कुल नहीं स्वीकार करते....
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