मनमोहन का मंत्री माओवादियों का मुखौटा
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह चाहे जितने भी अराजनीतिक हांे पर वे यह तो समझते ही होंगे कि ममता बनर्जी को मंत्रिमंडल में नहीं रखा जाना चाहिए। ममता बनर्जी को चुनावी राजनीति से कोई रोक नहीं सकता। लेकिन प्रधानमंत्री को इतना साहस तो करना ही चाहिए कि उनका एक मंत्री माओवादियों का मुखौटा न बन जाए।
ममता बनर्जी की लालगढ़ रैली सफल रही। इस कारण भी वह इन दिनों गहरे राजनीतिक विवाद के केंद्र में है। रैली के कई अर्थ निकाले गए हैं। जो जिस हिसाब से उसे समझ रहा है वैसा ही अर्थ निकाल रहा है। ममता बनर्जी को बंगाल की मुख्यमंत्री की कुर्सी नजदीक लगने लगी है। उसी के वास्ते उन्होंने मनमोहन सिंह की सरकार को ऐसे गढ्ढे में पहुंचा दिया है कि वह उससे शायद ही निकल पाए। रैली 9 अगस्त को थी। वह स्वाधीनता संग्राम का ऐतिहासिक दिन है। जहां रैली थी उस क्षेत्र के लोगों ने 1942 में अपने को अंग्रेजों से आजाद करा लिया था। ममता बनर्जी को यही दिन सूझा तो इससे उस दिन की महिमा इसलिए घट गई, क्योंकि मकसद चुनावी राजनीति था। ‘करेंगे या मरंेगे’ के दिन को चुनावी दंगल के लिए इससे पहले कभी इस्तेमाल किया गया होगा इसके उदाहरण खोजने पड़ेंगे।
रैली के आयोजक उसे अराजनीतिक बताते हैं। अगर अराजनीतिक जमावड़ा ऐसा ही होता है तो फिर शब्दकोष बदलने पड़ेंगे। कौन इसपर यकीन करेगा कि वह अराजनीतिक रैली थी। क्या वह इसलिए अराजनीतिक हो जाती है, क्योंकि उसे संत्रास विरोधी जनसाधारण समिति के बैनर किया गया था। पहले वह रैली तृणमूल कांग्रेस की होनी थी। माओवादियों ने बहिष्कार की धमकी दी। किसने उनको समझाया और कैसे बात बनी? यह थोड़े लोग ही जानते हैं। इसे सभी जानते हैं कि एक हफ्ते पहले वह धमकी वापस ले ली गई। माओवादियों ने रैली के लिए अपने-अपने इलाके में फरमान जारी किए और लोगों को वहां पहुंचाया। जिन लोगों ने देखा वे मानते हैं कि वह रैली माओवादियों की थी। गृहमंत्री पी. चिदंबरम को अभी तक इसका प्रमाण नहीं मिला है। क्या खुफिया एजेंसियों ने उन्हें इसकी जानकारी नहीं दी?
यह ज्यादा मायने नहीं रखता। जिसे लोगों ने देखा है उसके लिए गृहमंत्री का प्रमाण पत्र नहीं चाहिए। इससे ज्यादा महत्वपूर्ण मामला यह है कि यूपीए एक गठबंधन के तौर पर विरोधाभासी राजनीतिक हितों का जमघट साबित हो रहा है। जिसके शासन में मर्यादाएं टूट रही हैं। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नीतिगत वक्तव्य पर सफाई मांगी जा रही है। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव प्रकाश करात ने विजयवाड़ा से पूछा कि केंद्र सरकार माओवादियों के प्रति अपनी नीति स्पष्ट करे। यह पूछना ही उस दर्द पर हाथ रखना है, जिससे यूपीए घायल है। प्रधानमंत्री एक नहीं, अनेक बार कह चुके हैं कि माओवादियों की हिंसा राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सबसे गंभीर खतरा है। यही उन्हें राज्यसभा में भाजपा के नेता अरुण जेटली ने और लोकसभा में गोपीनाथ मुंडे ने याद दिलाकर सवाल उठाए जिसका जवाब प्रणव मुखर्जी के पास नहीं था। जो उन्होंने कहा वह अधिक हास्यास्पद है कि वे ममता बनर्जी से पूछेंगे।
बंगाल का लालगढ़ क्षेत्र उस जंगल महल का हिस्सा है जहां से विधानसभा में 41 सदस्य चुने जाते हैं। जिसमें पश्चिम मिदनापुर, बांकुरा और पुरूलिया जिले पड़ते हैं। पिछले चुनाव में वाम मोर्चा ने अपने विरोधियों का सफाया कर दिया था। वह क्षेत्र लोकसभा के चुनावों से पहले माकपा का मजबूत गढ़ माना जाता था। 2008 में उसी इलाके में मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य पर घातक हमला हुआ। वह इस बात की सूचना थी कि माकपा के दिन लद गए। उनसे ही छिटककर जो समूह चुनौती दे रहा है वह माओवादी के रूप मंे पहचाने जा रहे हैं। उन्हें कलतक बंगाल की सत्ता का पूरा संरक्षण प्राप्त था। साफ है कि वहां नागनाथ और सांपनाथ की लड़ाई छिड़ी हुई है। नंदीग्राम और सिंगूर ने रास्ता दिखाया है। लड़ाई सत्ता की है। जो लड़ रहे हैं वे दोनों पक्ष हिंसा में विश्वास करते हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि वहां माओवादियों के खिलाफ सुरक्षा बलों का अभियान जारी है। वह केंद्र और राज्य सरकार का साझा अभियान है। उसे सही ढंग से चलने देने के लिए गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने वहां का दौरा किया था। एक तरफ अभियान चल रहा है तो दूसरी तरफ ममता बनर्जी शांति और सद्भावना कायम करने के बहाने वोट की राजनीति इस हद तक जाकर कर रही हैं कि सरकार में मंत्री बने रहने के औचित्य पर प्रश्न चिन्ह लग गया है। वे वहां कह चुकी हैं कि आंध्र प्रदेश में आजाद को मारा गया। सरकार उसे मुठभेड़ बताती है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह चाहे जितने भी अराजनीतिक हांे पर वे यह तो समझते ही होंगे कि ममता बनर्जी को मंत्रिमंडल में नहीं रखा जाना चाहिए। ममता बनर्जी को चुनावी राजनीति से कोई रोक नहीं सकता। लेकिन प्रधानमंत्री को इतना साहस तो करना ही चाहिए कि उनका एक मंत्री माओवादियों का मुखौटा न बन जाए। रैली का घोषित उद्देश्य कुछ और था और असली कुछ और। इसी हिसाब से वहां भाषण हुए। ममता बनर्जी ने माओवादियों से हमदर्दी जताई। इसी लिए कहा कि उनके खिलाफ चल रहा अभियान रोका जाए। असल में सुरक्षाबलों के अभियान से माओवादियांे के पैर उखड़ गए थे। उन्हें पनाह चाहिए। वह ममता बनर्जी दे रही हैं। वे उनसे यह नहीं पूछ रही हैं कि क्या वे हिंसा का रास्ता छोड़ेंगे। इसी तरह वे खुद से भी नहीं पूछ रही हैं कि एक केंद्रीय मंत्री को क्या यह सब शोभा देता है जो वे कर रही हैं। अगर वे अपना राजनीतिक विवेक खो चुकी हैं और यह नहीं समझ पा रही हैं कि माओवादियों की खतरनाक राजनीति को उनसे बल मिल रहा है तो यह काम प्रधानमंत्री को राष्ट्रीय हित में करना होगा।
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