25 साल पुराने समझौते पर सुलग रहा है पंजाब
इस समय पंजाब फिर गर्म हो गया है। गर्मी दो फ्रंट पर है। एक तरफ पूरे पंजाब में जहां भिंडरावाले के पोस्टर कई जगह सरेआम नजर आ रहे है, वहीं राजनीतिक फ्रंट पर राजीव-लोंगोवाल समझौते को लेकर विवाद शुरू हो गया है। विवाद ठीक 25 साल बाद शुरू हुआ है। विवाद शुरू करने का समय भी बड़ा वाजिब है। विवाद तब शुरू हुआ है जब शिरोमणी गुरूद्वारा प्रबंधक कमेटी के चुनाव नजदीक है और ठीक डेढ़ साल बाद पंजाब विधानसभा का चुनाव होने है। एक बार फिर जख्म हरे करने की कोशिश हो रही है।
विवाद इस कदर उठा है कि मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल खुलकर अर्जुन सिंह और कांग्रेस के खिलाफ आ गए है। वहीं अकाली राजनीति में ही बादल के घोर विरोधी सुरजीत सिंह बरनाला और उनकी पत्नी सुरजीत कौर बरनाला ने प्रकाश सिंह बादल को झूठा करार दिया है। उधर इस मौके का फायदा कांग्रेसी नेता अमरिंदर सिंह भी उठा रहे है। उन्होंने भी संत हरंचद सिंह लोंगोवाल को महान संत बताते हुए बादल को धोखेबाज करार दिया है।
राजीव लोंगोवाल समझौता के 25 साल हो गए। यह समझौता आजतक लागू नहीं हो पाया। न तो हरियाणा पंजाब के पानी की मसला हल हुआ, न चंडीगढ़ पंजाब को ट्रांसफर किया गया। लेकिन ठीक 25 साल बाद इस मसले पर माहौल को गर्म कर दिया गया है। जबकि माहौल को गर्म करने वाले सारे नेताओं को यह समझौता लागू करवाने का पूरा मौका मिला। लेकिन जब मौका मिला तो उन्होंने चुप्पी साधी। जहां राज्य और केंद्र में कांग्रेस सता में रहने के बावजूद इस समझौते को लागू नहीं कर पायी वहीं मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल जब पिछली बार सता (1997-2002)में थे तो उनकी सहयोगी पार्टी भाजपा केंद्र में थी। लेकिन उस समय खुद बादल ने यह कोशिश नहीं कि राजीव-लोंगोवाल समझौते को लागू किया जाए। कुल मिलाकर सारे मसले पर राजनीति हो रही है।
पिछले तीन चार दिनों में जोरदार ब्यान आए है। ये ब्यान सारे पंजाब की राजनीति से संबंधित नेताओं के है। तामिलनाडू के गर्वनर सुरजीत सिंह बरनाला ने ब्यान दिया कि मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने संत हरचंद लोगोंवाल को धोखा दिया। उन्होंने समझौते के वक्त टांग अड़ायी थी और मजबूरी में लोगोंवाल को बादल के बिना समझौता करना पड़ा था। जबकि मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने कहा है कि समझौता पूरी तरह से धोखा था। उन्होंने संत जी को समझाया था कि केंद्र धोखा देगा। लेकिन अकाली दल के कुछ दगाबाज लोगों ने संत जी गुमराह किया। वे अर्जुन सिंह से मिले थे। और राजीव गांधी के पास लेकर जाने वाले संत लोगोंवाल को यही लोग थे। बादल का निश्चित तौर पर इशारा सुरजीत सिंह बरनाला की तरफ था। उस समय एसजीपीसी के तत्कालीन अध्यक्ष गुरचरण सिंह तोहड़ा प्रकाश सिंह बादल के थे। बेशक तोहड़ा को बाद में बादल ने बेइज्जत कर बाहर निकाला और उनकी राजनीतिक हैसियत खत्म करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।
अब सवाल उठता है कि आखिर यह राजनीति पच्चीस साल बाद क्यों हो रही है? बादल जिंदा, बरनाला जिंदा है। पर इस पूरे खेल के दो खिलाड़ी तोहड़ा और लोगोंवाल इस दुनिया में नहीं है। इस खेल के एक और अहम खिलाड़ी अमरिंदर अभी भी राजनीति में है जो बादल के लिए सबसे बड़े सरदर्द है। दिलचस्प बात है कि इस घटनाक्रम के बीच गृह राज्य मंत्री अजय माकन का ब्यान आया है, कि पंजाब में कुछ आतंकी संगठन अपनी जमीन तलाश रहे है। वे बेरोजगार युवकों को अपनी तरफ खींच सकते है। इन्हें विदेशों से फंडिंग भी है। इन सवालों का जवाब तलाशना जरूरी है। पंजाब में जल्द ही शिरोमणी गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी का चुनाव होना है। इन चुनावों को लेकर इस बार अकाली दल को चुनौती सुरजीत सिंह बरनाला की पत्नी सुरजीत कौर बरनाला दे रही है। उन्हें दिल्ली गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के परमजीत सिंह सरना समेत कांग्रेस का भी अंदरूनी समर्थन है। कांग्रेस का अमरिंदर सिंह धड़ा पूरी तरह से बादल विरोधी उम्मीदवारों को समर्थन देने की तैयारी कर चुका है। बादल को डर है कि कहीं एसजीपीसी उनके हाथ से निकल जाएगा। पंजाब पुलिस का इंटेलिजेंस विंग जो मुख्यमंत्री प्रकाश सिहं बादल के खास एडवाइजर में से एक है, किसी भी चुनौती को नहीं मानता है। इंटेलिजेंस विंग का कहना है कि लाख चुनौती के बावजूद बादल धड़ा 100 से उपर सीट जीत जाएगा। हालांकि हरियाणा के इलाके में इस बार बादल को करारा झटका लगने की उम्मीद है। इस स्थिति में रोपड़, संगरूर, पटियाला भटिंडा आदि में अगर कांग्रेसी समर्थन से बादल विरोधी गुट जीतता है तो बादल को भारी परेशान होगी। गौरतलब है कि कांग्रेस सीधे तौर पर एसजीपीसी के चुनावों में भाग नहीं लेती न ही हस्तक्षेप करती है।
मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल इस समय राजनीति जीवन के कठिन दौर से गुजर रहे है। पिछले साढे तीन सालों में उनकी सरकार की उपलब्धि न के बराबर है। उनकी अंतिम इच्छा बेटे सुखबीर बादल को मुख्यमंत्री बनाने की है। वो इच्छा पूरी नहीं हो पा रही है। भाजपा रास्ते में रोड़ा बनती है। अब बादल की उम्र भी काफी है। इसलिए वे किसी भी कीमत पर अपनी राजनीतिक गर्मी को बनाए रखना चाहते है। चुकिं उपलब्धि बताने के नाम पर उनके पास कुछ नहीं है, इसलिए वे अब राजीव-लोंगोवाल समझौते को गर्मा रहे है। ताकि केंद्र से संबंध तनावपूर्ण हो और उनकी खामियां छुप जाए। बादल अपने साढ़े तीन साल की नाकामी को छुपाने के लिए इस मुद्दे को उठा रहे है ताकि पंजाब के लोगों को बताया जा सके कि पंजाब के साथ होने वाले भेदभाव के केंद्र जिम्मेवार है। राज्य की आर्थिक हालत खराब है। बेरोजगार युवकों की बाढ़ आ गई है। राज्य में पांच लाख से ज्यादा युवक युवती बेरोजगार है, जिनके पास काम करने की योग्यता है। इन युवकों को कोई भी बरगला सकता है।
इस गर्मी के बीच बुरी खबर और है। राज्य में संत जरनैल सिंह भिंडरावाले के पोस्टरों की बाढ़ आ गई है। गाड़ियों के पिछले और अगले शीशों पर आम भिंडरावाले के पोस्टर लगे नजर आ रहे है। कई जगहों पर कट्टर संगठनों की गतिविधियां बढ़ गई है। पिछले एक साल में कुछ कट्टर लोगों को पंजाब पुलिस ने गिरफ्तार भी किया है। खुद गृह राज्य मंत्री अजय माकन ने भी आतंकी गतिविधियों की सुगबुगहाट को स्वीकार किया है। इन परिस्थितियों में राजनीतिक दलों द्वारा राजीव लोंगोवाल समझौते को उठाना काफी महंगा पड़ सकता है। हालांकि कुछ लोगों का यह भी मानना है कि इस खेल में केंद्र सरकार का भी हाथ हो सकता है। वो अकाली दल के दूसरे गुटों को महत्वपूर्ण बनाने के लिए इस खेल में अपना हाथ बंटा रही हो। क्योंकि सुरजीत सिंह बरनाला कांग्रेस के नजदीक है, यह सारे जानते है। तामिलनाडू के गर्वनर के रुप में उन्हें एक्सटेंशन कांग्रेस की सरकार ने ही दी। कैप्टन अमरिंदर सिंह से उनकी नजदीकी काफी पुरानी है।
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