कांग्रेस पर सत्ता संघर्ष भारी, अब राहुल गांधी की बारी
एक अजीब से घटना है। जिस दिन राहुल गांधी अपने आपको उड़ीसा में आदिवासियों के सिपाही घोषित करते है, उसके अगले दिन ही एक खबर छपती है। खबर अखबार के पहले पन्ने की लीड है, जिसमें कहा गया है कि भारत युवाओं का देश है, पर प्रधानमंत्री बुजुर्ग है। साथ ही दुनिया के कई देशों का उदाहरण दिया गया है, जिसमें युवा लोग प्रधानमंत्री के तौर पर विराजमान है। ये एक सामान्य घटना कहेंगे या एक संयोग या एक राजनीतिक खेल? जो युवराज अभी तक कारपोरेट है, वही एकाएक आदिवासियों के सिपाही हो जाते है।
उस मांग को मनवा लेते है जिसके लिए अरूंधति राय ने मोर्चा सम्हाला और नक्सलियों ने सरकार के नाको दम कर दिया। क्या यह खेल इतना सामान्य है जितना दिख रहा है। सवाल कई है, जिसका जवाब ढूंढा जा सकता है। यह एक तीर से कई शिकार है। इसके शिकार मनमोहन सिंह भी हुए, पी चिंदबरम भी हुए। नक्सलियों का दबाव भी है। महंगाई के बाद राजस्थान में हुई हार भी एक कारण है। यानि की खेल उतना सीधा नहीं, जितना दिख रहा है।
सारा कुछ एकाएक होता है। सक्सेना कमेटी की रिपोर्ट आती है। जयराम रमेश अड़ते है। और वेदांता का बाक्साइट खनन संबंधी आवेदन को रद्द कर दिया जाता है। यह वही नियामगिरि हिल्स है जहां पर बाक्साइट खनन को लेकर अरूंधति राय ने मुद्दा बनाया। कहा था कि इससे जहां पर्यावरण को नुकसान होगा, डोंगरिया कौंध जैसी जनजातियां समाप्त हो जाएगी। अरूंधति राय की इस राय को भारतीय अखबारों ने प्रमुखता से नहीं छापा था। लेकिन जब यही बात राहुल गांधी ने की तो मीडिया ने जोरदार कुलांचे मारी। सारा श्रेय राहुल गांधी को दिया गया, वेदांता प्रोजेक्ट को रद्द करने को लेकर। लेकिन इसके बाद ही सवाल उठने खड़े हो गए। क्योंकि वेदांता भी उसी कारपोरेट राजनीति का एक हिस्सा जिसपर केंद्र की कांग्रेस सरकार चल रही है। अगर मुकेश अंबानी की नजदीकियां मुरली देवड़ा समेत कई और मंत्रियों से है तो वेदांता भी गृह मंत्री पी चिंदबरम की नजदीकी है।
यह एक अलग आंकड़ों भरा सवाल होगा कि वेदांता ने नियामगिरि को कितने में खरीदा और कितने में आगे इसे बेचना था। इस लूट में कितना वेदांता को बचना था यह भी आंकड़ों से भरा सवाल है। लेकिन यह सच्चाई भी है कि वेदांता प्रोजेक्ट को रद् हो जाने से स्थानीय आदिवासियों को राहत मिली है। पर दिलचस्प बात है कि देश के दूसरे राज्यों में जो अवैध खनन हो रहा है, उस पर कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी चुप है। इसलिए आदिवासियों के सिपाही का तमगा देना काफी जल्दी होगा। यह काफी कुछ वही राजनीतिक खेल या चाल है जो अक्सर इस देश के राजनेता लॉलीपाप देकर करते है। राहुल गांधी अभी तक छतीसगढ़ के गोंड आदिवासियों के सिपाही दिल्ली मे नहीं बने है। वहीं आंध्र प्रदेश में हो रहे अवैध खनन को लेकर राहुल गांधी चुप है। कर्नाटक में रेड्डी बंधुओं की दादागिरी के आगे भी युवराज की चुप्पी चर्चा योग्य है। इस चुप्पी को कांग्रेस या भाजपा के बीच लूट के हिस्से के लिए एक मौन समझौता कहेंगे या कुछ और। क्योंकि रेड्डी बंधुओं के विरोध में स्थानीय कांग्रेसियों ने आंदोलन तो चलाया, पर वह दिखावा मात्र था। इसमें दिल्ली से कोई सहयोग नहीं मिला। क्या इस चुप्पी को दिल्ली में कई मसलों पर कांग्रेस को भाजपा से मिलने वाले समर्थन के एवज में देखा जाए। क्योंकि सुष्मा स्वराज, एलके अडवाणी जैसे नेता कई मसलों पर कांग्रेस को पूरा सहयोग दे रहे है, इसमें कोई शक की गुंजाइश नहीं है। ताजा मसला परमाणु करार को लेकर है। खैर कई ताजा सहयोग के पीछे खेल दोनों दलों की आतंरिक स्थिति भी है। सीबीआई नरेंद्र मोदी पर हमला बोल रही है, बेशक यह सारा कुछ कांग्रेस के इशारे पर हो रहा है। पर यह भी सच्चाई है कि नरेंद्र मोदी के बढ़ते कद से एलके आडवाणी, उनके शिष्य अरूण जेतली और सुषमा स्वराज भी परेशान है।
आदिवासियों के अधिकारों को छीनने का मामला सिर्फ उड़ीसा में नहीं है। वन कानूनों का उल्लंघन सिर्फ उड़ीसा में नहीं हो रहा है। उड़ीसा के जगतसिंहपुर में पास्को के प्रस्तावित प्लांट के विरोध हो रहा है। कालाहांडी में वेदातां के प्रोजेक्ट का विरोध हो रहा था। लेकिन झारखंड और छतीसगढ़ में भी कई कंपनियों ने आदिवासियों के अधिकारों को छीना है। यहां पर वन कानूनों का उल्लंघन हुआ है और अवैद्य तरीकों से सरकारी भूमि और आदिवासियों की भूमि पर कब्जा किया गया है। इस समय छतीसगढ़ में जिंदल ग्रुप के प्रस्तावित प्रोजेक्ट का विरोध हो रहा है। टाटा और एस्सार के प्रस्तावित प्रोजेक्ट का विरोध भी छतीसगढ़ में आदिवासी कर कर रहे है। खुद अजीत जोगी के बेटे अमित जोगी का कहना है कि बैलाडीला में खनन से स्थानीय लोगों को प्रदूषित पानी पीने को मिल रहा है और तमाम बीमारियां स्थानीय लोगों को हो रही है। डूंगरिया कोंध के तरह ही छत्तीसगढ़ के गोंडों का भी हाल बुरा है। यही कुछ हाल झारखंड में भी है। कुछ कंपनियां इन इलाकों में जोरदार तरीके से संसाधन लूट में लगी हुई है। देश के कई बड़े नेताओं ने इस लूट में सहयोग देना शुरू कर दिया है और सारी लूट पार्टी लाइन से ऊपर हो रही। उन्होंने लूट वाली कंपनियों में अपना हिस्सा भी डाल दिया है। इसलिए राहुल गांधी सिर्फ सिर्फ दिल्ली में आदिवासियों के सिपाही बता अपनी जान न छुड़ाए। राहुल गांधी पूरे देश में वन कानूनों के उल्लंघन और आदिवासियों के अधिकारों के हनन का जो षड़यंत्र हो रहा है, उसे तुरंत रोकने के लिए कदम उठाए।
पी चिदंबरम जैसे नेताओं को हाशिए पर लाने की तैयारी हो चुकी है। यह किसके इशारे पर हो रहा है, कांग्रेसी ज्यादा समझते है। पहले नक्सली आंदोलन को निपटने को तौर तरीकों को लेकर पी चिंदबरम की औकात मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने बतायी थी। उसके बाद चिंदबरम के खास कारपोरेट वेदांता के खनन प्रोजेक्ट को रद्द कर उनकी औकात बतायी गई है। इसके बाद सैफर्न टेरर को लेकर जनार्दन द्विवेदी और दिग्विजय सिंह ने फिर ब्यान देकर चिंदबरम की बोलती बंद कर दी है। कुल मिलाकर कांग्रेस के अंदर चल रहे संघर्ष को आप इन ब्यानों के अंदर देख सकते है। बताया जाता है कि कुछ कारपोरेट हाउस ने ही चिंदबरम को गृह मंत्री बनाने में अहम भूमिका अदा की थी, जिन्होंने चिदंबरम के वित्त मंत्री रहते खासा फायदा उठाया। उन्हें लगता था कि चिदंबरम के पास जादू की छड़ी है, वो सारी समस्या का हल कर देंगे। लेकिन कुछ नहीं हुआ। नक्सलियों ने हर जगह चिंदबरम को मात दी है।
वेदांता के प्रोजेक्ट रद्द करने के खेल के पीछे जो खेल है अगर उसकी विवेचना करे तो पता चलेगा कि कांग्रेस में कई तरह के खेल शुरू हो चुके है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के बढ़ते कद को कम करने की तैयारी शुरू हो चुकी है। राहुल गांधी को अब देश का सबसे बड़ा नेता बताने की मुहिम चल गई है। पहले राहुल गांधी उतर प्रदेश में अलीगढ़ के पास आंदोलनरत किसानों के रहनुमा के तौर पर पेश होते है, फिर नियामगिरि के आदिवासियों के सिपाही बताए जाते है। इसके बाद एक कांग्रेसी खेमा मनमोहन सिंह को अखबारों मे काफी बुजूर्ग बताने की कवायद में शामिल हो गया है। मनमोहन सिंह की उम्र की तुलना ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरून के उम्र से की जाती है। इसे भी एक संयोग माने की राहुल गांधी और कैमरून की उम्र लगभग बराबर है। युवाओं के देश में बुजूर्ग प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह। इसका पूरा प्रचार शुरू किया जा चुका है। एक और सच्चाई है। मनमोहन सिंह लंबे समय तक राज करने वाले तीसरे प्रधानमंत्री बन गए है। यानि कि वे राज काज के मामले में राजीव गांधी से आगे निकल गए है। क्या इसे दस जनपथ बरदाश्त करेगा। मनमोहन सिंह से आगे सिर्फ जवाहर लाल नेहरू और इंदिरा गांधी है।
आंतरिक रुप से कांग्रेस कहीं न कहीं नक्सलियों के बढ़ते विस्तार से भयभीत है। कांग्रेस को यह भी पता है कि जहां पर नक्सलियों का प्रभाव बढ़ा है वहां पर उनके सहयोग के बिना कोई भी राजनीतिक दल चुनाव नहीं जीत सकता है। कांग्रेस को यह भी पता है कि बड़े पैमाने पर नेता, कारपोरेट और नौकरशाही नक्सल प्रभावित राज्यों में नक्सलियों को पैसे का भुगतान कर रहे है। कांग्रेस को यह भी पता है कि नक्सलियों ने शुरू से वेदांता के नियामगिरि हिल्स प्रोजेक्ट को रद्द करने के लिए संघर्ष छेड़ रखा था। यह भी सच्चाई है कि नक्सिलयों का सबसे ज्यादा विस्तार 2004 के बाद हुआ जब केंद्र में मनमोहन सिंह की सत्ता आयी। मनमोहन सिंह की कारपोरेट लूट नीति ने नक्सलियों के प्रभाव को बढ़ाया। लेकिन यह खेल कांग्रेस के युवराज समर्थक नेताओं को काफी देर के बाद समझ में आयी है। नियामगिरि प्रोजेक्ट के रद्द होने के बाद नक्सलियों का मनोबल और बढ़ेगा। क्योंकि पहले ही वे पश्चिम बंगाल में खुलकर कई प्रोजेक्टों का विरोध कर रहे है और उसमें ममता बनर्जी का अपरोक्ष सहयोग उन्हें मिलता है। यहां तक की नंदीग्राम में भी सलेम कंपनी के जमीन अधिग्रहण के विरोध में शामिल जनता में ज्यादातर नक्सली शामिल थे। कांग्रेस का एक वर्ग अभी भी सम्हलने की नसीहत दे रहा है। क्योंकि 2014 तक चुनाव होने है। उस समय तक देश में स्थिति और भयावह होगी। मनमोहन सिंह की नीतियों का कारण नक्सली कई और राज्यों में फैल चुके होंगे। जबकि बढ़ती महंगाई शहरी मध्यवर्ग को कांग्रेस का खिलाफ करेगा। खुद ग्रामीण विकास मंत्री सीपी जोशी ने राजस्थान के स्थानीय निकायों के चुनाव में हार का कारण महंगाई बताया है।
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चारों तरफ़ लूट का माहौल है, किसी को भी कानून का डर नहीं है और हम बेवकूफ़ों की तरह महाशक्ति बताने और मेरा भारत महान के भजन गाने में लगे हुए हैं…
जन्माष्टमी के अवसर पे मुसलमानों की इफ्तार पार्टी में जाना याद रहा मगर कृष्ण मंदिर में गए? ये मुस्लिम परस्ती नहीं तो क्या? अरे बेटा नहीं गया तो उसकी माँ ही जा आती.
लेकिन ये हिन्दू विरोधी है. देश विरोधी है.
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