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नो, यू कैन नाट मि. ओबामा !

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गोलमेज सम्मेलन के लिए महात्मा गांधी लंदन गये तो लौटते हुए फ्रांस भी गये थे. उनके सामने प्रस्ताव आया कि आपको अमेरिका भी जाना चाहिए. बार-बार दबाव डालने के बावजूद महात्मा ने अमेरिका जाने से मना कर दिया. जब उनके पूछा गया कि आप मना क्यों कर रहे हैं तो उन्होंने कहा था अभी वह वक्त नहीं आया है कि मैं अमेरिका जाऊं. महात्मा गांधी भले ही अमेरिका न गये हों लेकिन बराक ओबामा के निजी दफ्तर में महात्मा गांधी की फोटो लगी हुई है. आर्थिक और सामाजिक भ्रंस के कगार पर खड़े अमेरिका में ओबामा का राष्ट्रपति बनते ही क्या वह वक्त आ गया है कि महात्मा गांधी जैसी चेतना कह सके कि हां, अब वह वक्त आ गया है जब मुझे अमेरिका जाना चाहिए?

नहीं, वक्त तो शायद अभी भी नहीं आया है. पिछले ४८ घण्टों से भारतीय मीडिया ने जिस तरह का रूख अख्तियार किया है उससे दो बातें साफ हो रही हैं. एक, अमेरिका ने लंबे समय से भारत में जो बौद्धिक पूंजी निवेश किया था उसका परिणाम सामने आ रहा है और दो, भारत में एक बड़ा अमरीकी फोटोकापी वर्ग खड़ा हो गया है जो हर लिहाज से अमेरिका को भारत से बेहतर मानता है. बात जब लीडरशिप की हो तब भी. दिल्ली के अमेरिकन सेन्टर और दूतावास में वहां के स्थानीय निवासियों के लिए कुछ सुविधाएं उपलब्ध करवायी गयी हैं कि अमेरिकी इस ऐतिहासिक क्षण में अपने देश के साथ जुड़ सकें. लेकिन अगर आप वहां जाएं तो पायेंगे कि वहां अमेरिकियों से ज्यादा अमेरिकी मानसिकता के भारतीयों का जमावड़ा है. वे अोबामा में "होप" की तलाश कर रहे हैं. "यस, वी कैन" की शब्दावली ऐसे रट रहे हैं मानों अमेरिका नहीं भारत में राष्ट्रपति का चुनाव पूरा हुआ है. माफ करिए, ये इतनी बड़ी समझ वाले लोग नहीं है जो विदेश नीति के जानकार हैं और इस ऐतिहासिक मौके पर भारत की भविष्य की रणनीतिक को देखते हुए योजनाएं बना रहे हैं. ये अस्तित्वहीन लोग हैं. ऐसे चमगादड़ जो मौका मिलते ही किसी भी डाल से चिपक जाते हैं.

अमेरिका ने लंबे समय से जो बौद्धिक पूंजीनिवेश किया था ये जमात उसी की पैदाईश है. मीडिया में भी वैसे ही लोगों की भरमार है जो अमेरिका को अपना स्वर्ग मानते हैं, इसलिए भांति-भांति से अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव जैसी एक खबर को २४ घण्टे का अभियान बना दिया गया है. महात्मा गांधी अगर इस मानस के होते तो वे भी आज के नव-धनाढ्यों के स्वर्ग अमेरिका जाते और दलील देते कि क्योंकि आज हमारे देश में अमेरिका प्रेमियों की संख्या बहुत बढ़ गयी है इसलिए कूटनीतिक स्तर पर अमेरिका जाने में कोई बुराई नहीं है. लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया था. शायद इसीलिए वो महात्मा गांधी थे क्योंकि वे अपनी जमीन पर खड़ा होना जानते थे. और शायद इसीलिए ओबामा के निजी कार्यालय में महात्मा गांधी की तस्वीर भी लगी हुई है. आज जो लोग अमेरिकी चुनाव को इस तर्क के साथ भारतीय जनमानस तक पहुंचा रहे हैं कि अमेरिका दुनिया का शीर्षस्थ देश है और भारत उभरता अमीर तो उसे अमीरी का यह प्रदर्शन करना ही चाहिए, वे बौद्धिक रूप से लकवाग्रस्त हैं. यह जानते हुए कि अमेरिका भ्रंस पर आ खड़ा हुआ है और उस भ्रंस में धंसने से पहले अमेरिका ओबामा के रूप में अंतिम सांस ले रहा है. यह अमेरिका तो जाएगा. अगर ओबामा सफल होते हैं तो अमेरिका वह अमेरिका नहीं रह जाएगा जो अब तक था. फिर भी हमारी मीडिया जिस अमेरिका के प्रभाव में अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव को विश्लेषण कर रही है वह वही अमेरिका है जिसके दुष्प्रभाव में खुद अमेरिका और पूरी दुनिया है.

भारत में आज बीपीओ और काल सेंटरों के जरिए कोई १५००० करोड़ का कारोबार हो रहा है. इसमें बड़ा हिस्सा अमेरिका का है. यही हाल साफ्टवेयर उद्योग का है. इन दो क्षेत्रों के अलावा एक तीसरा क्षेत्र भी है जहां अमेरिका सबसे बड़ा आयातक है. वह है आध्यात्मिक आयात. ओबामा का उदय पिछले सौ-सवा सौ साल में अमेरिका गये आध्यात्मिक उत्पादों का परिणाम है. ओबामा कोई व्यक्ति नहीं बल्कि उस मानसिकता का प्रतीक हैं जो वर्तमान अमेरिकी जीवन शैली को तिलांजलि देना चाहते हैं. वे उस नर्क से बाहर आना चाहते हैं जिसे अब तक विकास और आधुनिकता के नाम पर ढोंग की तरह ढोते रहे हैं. अपने पूरे चुनाव अभियान के दौरान ओबाना ने आध्यात्मिक पूंजी को सहेजने की सबसे जोरदार वकालत की थी. यह आध्यात्मिक पूंजी निजी तौर पर आंतरिक उन्नति और समाज के तौर पर शोषणमुक्त समाज का रास्ता दिखाती है. क्या भारतीय मीडिया ने इस लिहाज से ओबामा की जीत को देखा है? अगर हां तो वे तत्व कहां हैं जो अमेरिका को ओबामा तक ले आये हैं और अगर नहीं तो हमारी वह भारतीय दृष्टि कहां चली गयी जो महात्मा गांधी के पास थी.

बराक हुसैन ओबामा केवल अमेरिका के लिए होप नहीं है. वे अमेरिका के फोटोकापी भारतीयों के लिए भी होप दिखाई दे रहे हैं. अमेरिकी और अमेरिका के फोटोकापी भारतीय दोनों ही यह भूल रहे हैं कि अमेरिकी राष्ट्रपति दुनिया का सबसे ताकतवर व्यक्ति होने के बावजूद अमेरिकी व्यवस्था के सामने सबसे कमजोर व्यक्ति है. वह सिर्फ रबर स्टैम्प है जिसे अमेरिकी नेशनस्टेट बहुत लोकतांत्रिक तरीके से चुनकर इस्तेमाल करता है और फेंक देता है.

बराक ओबामा की मशहूर पुस्तक "ओडेसिटी आफ होप" उनके उम्मीदों के दुस्साहस के बारे में ही होगी. शायद इसीलिए वे अपने भाषणों में "यस, वी कैन" का नारा लगवाते हैं. ठीक वैसे ही जैसे कोई नेता अपनी जनता में उम्मीद की किरण भर सकता है वे भरते हैं. लेकिन यह नारा अमेरिका के उस टूट चुके मनोबल को भी दर्शाता है जो उसे इस भ्रंस तक खींच लाया है. हो सकता है अमेरिका में उपभोग के सामानों की कोई कमी न हो और लोग "सुख" से जी रहे हों लेकिन सुख को अनुभव करनेवाली जो आत्मा होती है क्या वह अमेरिका के पास बची है? क्या अमेरिका और अमेरिका के फोटोकापी भारतीयों को इस बात का तनिक अंदाजा है कि बराक ओबामा कुछ नहीं कर सकते. चुनावी वादे और नारे आकर्षक व्यक्तित्व के जरिए आप उस प्रतिष्ठान तक जरूर पहुंच सकते हैं जिसे सत्ता कहते हैं लेकिन सत्ता में आने के बाद आप सत्ता के हिस्से होते हैं. अमेरिकी नेशन स्टेट ओबामा क्या इराक से सेना हटाने की इजाजत देगी? क्या ओबामा में इतनी हिम्मत है कि वे इराकी तेल कुओं पर अमेरिकी कंपनियों के अवैध कब्जों को खत्म करवा सकें? क्या ओबामा दक्षिण मध्य एशियाई देशों की नीतियों में बदलाव ला सकते हैं. क्या वे इरान की नीतियों में बदलाव करेंगे? क्या वे अमेरिकी कंपनियों पर लगाम लगाने की कोशिश करेंगे जो पूरी दुनिया में घूम-घूम कर आम आदमी का खून चूसती हैं? क्या वे दूसरे देशों में नीतिगत हस्तक्षेप को बंद करवा देंगे? अगर ऐसा कुछ करते हैं तो फिर अमेरिका का वह रूतबा ही खत्म हो जाएगा जिस रूतबे के कारण भारत के टुंटपुजिया न्यूज चैनल भी लाईव रिपोर्टिंग करने अमेरिका जा पहुंचे हैं. क्या अमेरिका एक नेशन स्टेट के रूप में अपना रूतबा घटाकर बराक ओबामा को स्वीकार करने के लिए तैयार है?

शायद नहीं. कभी नहीं. बराक ओबामा जिस दिन अमेरिका के राष्ट्रपति की शपथ लेंगे उस दिन वे अमेरिका के राष्ट्रपति होंगे और उन्हीं नीतियों को समर्थन करेंगे जिन नीतियों के कारण अमेरिका अमेरिका बना हुआ है. अगर सत्ता प्रतिष्ठान में पहुंचकर बदलाव संभव होता तो महात्मा गांधी भी देश के पहले प्रधानमंत्री बन जाते. महात्मा गांधी शायद इस बात को समझते थे कि गांधी सत्ता में जाने के बाद महात्मा नही रह पायेगा. सत्ता का अपना एक चरित्र होता है, जिसे बदला नहीं जा सकता. निश्चित रूप से बराक ओबामा अमेरिका और अमेरिका के फोटोकापी भारतीयों के लिए उम्मीद की एक किरण हैं लेकिन तभी तक जब तक वे व्हाईट हाउस में नहीं पहुंचते. जिस दिन वे ह्वाईट हाउस के अंदर होंगे उस िदन उनके निर्णय भले ही ज्यादा संतुलित हों लेकिन दुनिया के लिए अमेरिका के चेहरे को रत्तीमात्र भी नहीं बदल सकते. अगर उन्होंने ऐसा करने की कोशिश की तो अमेरिका ओबामा को भी बर्दाश्त नहीं करेगा. यही अमेरिकी नेशन स्टेट का चरित्र है और यही उसकी सफलता का राज भी. 

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प्रत्यक्षा on 05 November, 2008 17:18;09
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बहुत सटीक विश्लेषण !
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सुरेश चिपलूनकर on 05 November, 2008 18:55;16
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"...ये अस्तित्वहीन लोग हैं. ऐसे चमगादड़ जो मौका मिलते ही किसी भी डाल से चिपक जाते हैं..." बेहतरीन विश्लेषण किया है आपने… अमेरिका का राष्ट्रपति कोई भी बने कोई खास फ़र्क नहीं पड़ने वाला, हारे हुए प्रत्याशी जॉन मेक्केन ने भी अपने बधाई संदेश में कहा है कि "हम पहले अमेरिकी हैं फ़िर बाद में रिपब्लिकन या डेमोक्रेट और भले मुझमें और ओबामा में मतभेद हों, अमेरिका का हित सबसे पहले देखा जायेगा…" इसी से सारी बात साफ़ हो जाती है…
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दीपक on 05 November, 2008 19:25;37
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अमेरीका की नितीया और व्यस्था सारी दुनिया को प्रभावित करती है इसलिये वहा के चुनाव मे लोगो की रुची स्वाभविक है !!मगर यह भी सत्य है कि अमेरीका ढोल पीटने वाले इसमे से अधिकांश सिर्फ़ अमेरीकन फ़ोटोकापी वाले भारतीय है !!
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dhiru on 05 November, 2008 21:06;21
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बहुत सही लिखा आपने . हम भारतीय गाँधी जी की फोटो ,हनुमान की मूर्ति देख कर ओबामा पर फ़िदा हो गए .इब्तदा इश्क है रोता है क्या ,आगे आगे देखिये होता है क्या
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atma ram on 05 November, 2008 21:25;29
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तेवारी तुम दूसरे गांधी हो। बस पहचाने नहीं जा पा रहे हो।
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Ghost Buster on 05 November, 2008 22:23;03
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Excellent.
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विष्‍णु बैरागी on 06 November, 2008 16:46;17
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ओबामा कहें कुछ भी, अमरीका को अपने मनोनुकूल नहीं बदल पाएंगे । बदलना तो ओबामा को ही है । बुश की भाषा बोलते हुए ओबामा को जल्‍दी देखेंगे - हम लोग ।
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Sanjeet Tripathi on 07 November, 2008 00:42;48
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सटीक!
एकदम सही!
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on 07 November, 2008 01:03;55
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भारत में एक बड़ा अमरीकी फोटोकापी वर्ग खड़ा हो गया है जो हर लिहाज से अमेरिका को भारत से बेहतर मानता है. बात जब लीडरशिप की हो तब भी. दिल्ली के अमेरिकन सेन्टर और दूतावास में वहां के स्थानीय निवासियों के लिए कुछ सुविधाएं उपलब्ध करवायी गयी हैं कि अमेरिकी इस ऐतिहासिक क्षण में अपने देश के साथ जुड़ सकें. लेकिन अगर आप वहां जाएं तो पायेंगे कि वहां अमेरिकियों से ज्यादा अमेरिकी मानसिकता के भारतीयों का जमावड़ा है
bahut achchha vislesan hai.
AAAAA
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RAJKUMAR SINGH on 08 November, 2008 23:13;25
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sanjay tiwari ka vishleshan 'amreekee' bhartiyon ke sandarbh me sahee hai.kuch 'desee' log jinkee deh yahan aur atma amerika me bastee hai unkee mansikta kee baat bhee sahee hee hai.lekin amerikee vidhayika nyaypalika aur karyapalika me samvaidhanik " checks and balances " ko samjhe bina sahee nishkarsh naheen nikale ja sakte . aur karyapalika ke chune huye sabse unche vyakti 'PRESIDENT' me asaadharan adhikar nihit hain aur pichle do sau salon se jyada ke amrikee itihas ko dekhen to payenge ki nirankush to sambhav hee naheen lekin apne adhikaron ke chalte rashtrapati bahut hee shaktisampanna hota hai.yahan tak kee Truman ko Nagasakee aur hiroshma pe atom bomb dagne ke liye sirf ungalee uthanee thee.OBAMA ko aap bhale kam aanke jis se main naheen sahmat hoon par amrikee rashtrapati kee shaktiyon ko kam na anken.
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