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उस दिन मैं भी नेक्सन की तरह रोया था

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अपने भी देश-समाज में गोरे रंग की बड़ी महिमा है. लेकिन सोलह गुण संपन्न कृष्ण को सांवरा बनाकर हमने गौर-वर्ण को फीका कर दिया. अपने यहां भी भेदभाव और ऊंच-नीच बहुत है. लेकिन किसी एक जाति के सभी लोग इसलिए भेदभाव के शिकार नहीं होते कि उनकी चमड़ी काली होती है. अपने यहां भेदभाव की कई परतें हैं. इसलिए रंगभेद उतना निंदनीय और वांछनीय नहीं होता जितना पश्चिम में होता है. ऐसे में काले ओबामा का ह्वाईट हाउस में बैठना अपने को उतना उल्लेखनीय नहीं लगता जितना अमेरिका के श्वेत-अश्वेत लोगों को लगता होगा.

सच पूछिये तो बराक हुसैन ओबामा उस तरह के दलित हैं भी नहीं जैसे हमारे रामविलास पासवान या मायावती हैं. उनकी मां एन डनहम अमेरिकी मध्यवर्ग की थी. पढ़ने-लिखने के साथ उनकी रूचि समाज कार्य में भी थी. उनके पिता बराक ओबामा सीनियर जरूर अफ्रीकी देश केन्या के बकरी पालनेवाले गड़रिया परिवार के थे और हवाई में छात्रवृत्ति पर पढ़ने आये थे. गोरी एन का काले बराक से प्रेम हुआ और एन जब महज १८ साल की थीं तो उन्होंने बराक जूनियर को जन्म दिया. इस तरह ओबामा गोरी मां और काले पिता के बेटे हैं. बराक के जन्म के दो साल के बाद ही एन और बराक की शादी टूट गयी.

एन ने अपने मां-बाप की मदद से बराक जूनियर को पालपोसकर बड़ा किया. फिर बराक जूनियर को अपने मां-बाप के पास छोड़कर एन दूसरा विवाह करने इंडोनेशिया चली गयीं. नाना-नानी ने पहले बराक को होनुलूलू में पढ़ाया, फिर कोलंबिया विश्वविद्यालय और हारवर्ड ला स्कूल में. बराक पहले समाज संगठन के कार्य में लगे, कोलंबिया विश्वविद्यालय में कानून पढ़ाया और नागरिक अधिकारों के मामलों के वकील हो गये. हार्वर्ड ला रिव्यू के पहले अश्वेत संपादक बनने पर पहली बार दुनिया की आंखों में आये. सन छियानबे में इलिरायस सीनेट के लिए चुने गये. सन २००० में हारे, लेकिन चार साल बाद डेमोक्रेट के रूप में अमेरिकी सीनेट पहुंच गये. यहीं एक भाषण ने उन्हें होनहार राजनेता बना दिया. उनकी नानी मैंडलीन की मृत्यु कैंसर से हुई, वह भी उनके चुनाव अभियान के आखिरी दिन. वे अपने नाती को राष्ट्रपति निर्वाचित होते नहीं देख सकीं.

अब यह जीवनवृत्त बराक हुसैन ओबामा को खांटी भारतीय दलित नहीं बनाता, न उन्हें भारतीय दलित की छवि में फिट करता है. खुद ओबामा ने कहा है कि मेरी कहानी तो सिर्फ संयुक्त राज्य अमेरिका में ही लिखी जा सकती है. लेकिन हमारे यहां एक हिन्दी और एक अंग्रेजी चैनल ने इस बात पर बहुत उदासी और खेद जताया कि हमारा कोई दलित नेता ओबामा क्यों नहीं हो रहा है? एक नेता एक देश समाज की बिल्कुल अपनी सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और ऐतिहासिक परिस्थितियों में से फूटकर फलता-फूलता है. ऐसा नहीं हो सकता कि किसी पौधे को कहीं से उठाकर कहीं भी रोपा जा सके और वह फल-फूलकर वृक्ष हो जाए. लेकिन दुनिया में कहीं भी कुछ विशेष हो रहा हो तो हम हिरसने लगते हैं कि हाय, हमारे यहां ऐसा क्यों नहीं हो रहा है? खासकर अमेरिका में हो रहा हो तो हमारे मध्यवर्ग की हीनग्रंथि एकदम वाचाल हो जाती है. देखिए एक दलित अमेरिका में ओबामा हो सकता है, लेकिन हमारा पासवान पासवान ही रह जाता है. मायावती मायावती से ज्यादा कुछ नहीं होती. एक अखबार ने १९ साल से क्रिकेट खेल रहे सचिन को ओबामा बना दिया फिर कुछ लज्जा आई होगी तो ओबामा को सचिन बना दिया. बेचारे, न क्रिकेट समझते हैं न राजनीति.

ओबामा का ऐसे लोकप्रिय बहुमत से राष्ट्रपति चुना जाना ऐतिहासिक है लेकिन अमेरिकी संदर्भ में ही जहां सवा सौ साल पहले तक अफ्रीकियों को लाकर दास बनाकर रखा जाता था. ऐसे ही दास लोगों में से कोई व्यक्ति लोकतांत्रिक पद्धति से राष्ट्रपति चुना जाए तो यह निश्चित ही ऐतिहासिक है. नागरिक अधिकारों के लिए लड़ने वाले जेसी नेक्सन उस रात ओबामा का भाषण सुनते हुए रोये थे. वे जानते हैं कि यह किस तरह से एक दास का राष्ट्रपति बनना अमेरिकी समाज में हो रहे बुनियादी बदलाव का नतीजा है. हमारे यहां भी राष्ट्रपति हुए नारायणन केरल के ऐसे ही दलित थे. वे शपथ लेकर राष्ट्रपति भवन की सीढ़ियो पर खड़े हुए और सलामी गारद को सलामी देने लगे तो मैं भी जेसी नेक्सन की तरह रोया था. जिस दिन मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने थे तो मैंने बीबीसी पर कहा था कि अब यूरोप वाले हमें अल्पसंख्यकों के बारे में उपदेश न दें. हमारा राष्ट्रपति मुसलमान, प्रधानमंत्री सिख और सबसे शक्तिशाली राजनीतिक नेता ईसाई है. यह सब उस देश में जहां अस्सी प्रतिशत से ज्यादा लोग हिन्दू हैं.

इसलिए ओबामा का राष्ट्रपति चुना जाना भारत में सिखावन की तरह देखे जाने की जरूरत नहीं है. हमारे समाज में विषमता, भेदभाव और ऊंचनीच है और सदियों से चली आ रही है. अमेरिका तो अभी जुम्मा-जुम्मा आठ दिन का है. वहां भी भेदभाव और विषमता है. ओबामा उसी में से एक समस्या की तरह निकलकर आये हैं. बड़ी बात है. लेकिन केवल इसलिए ही हम मायावती के प्रधानमंत्री बनने की संभावना को नाकुछ क्यों बताएं? पासवान दुनिया में सबसे बड़े बहुमत से जीतकर आये सांसद हैं. वे सिर्फ दलितों के वोट से जीतकर रिकार्ड बना सकते थे. लेकिन उन्हें सर्व समाज ने चुनकर भेजा है. पासवान को चुनने वाला समाज भी एक है जैसे ओबामा को चुननेवाला अमेरिका एक है. अगर समाज को विघटिक करनेवाली शक्तियां कम नहीं हैं तो उन्हें एक रखनेवाली शक्तियां भी कम नहीं है.

अमेरिकी राष्ट्रपति दुनिया का सबसे ताकतवर नेता होता है और अमेरिका में चुनाव लोकतंत्र की जीत हैं. ये ऐसे अमेरिका के अपने मुहावरे हैं जिन्हें हम अपने मूरखपन में दोहराते हैं. भारत में भी चुनाव लोकतंत्र की छोटी-मोटी जीत नहीं होते. भारतीय समाज की जटिलताओं को अगर आप समझें तो यहां के आम चुनाव लोकतंत्र की कई गुना बड़ी जीत दिखाई देंगे. आखिर भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, सबसे शक्तिशाली भले ही न हो. मैं जानता हूं कि भारत में ऐसे कई बुद्धिजीवी और संपादक हैं जिन्हें मलाल है कि वे अमेरिकी नागरिक क्यों नहीं है? वे अमेरिकी नागरिक होते तो वहां के राष्ट्रपति चुनाव में भागीदारी करते. इनमें से ज्यादातर भारत के आम चुनावों को बड़ी हिकारत की नजर से देखते हैं और इन चुनावों को लोकतंत्र का मखौल करार देते हैं. इनका स्वर्ग लोकतंत्र में नहीं अमेरिका में है. इनकी नजर से आप अमेरिका के चुनाव देखेंगे तो आपके हाथ हीनता लगेगी.

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P.N. Subramanian on 09 November, 2008 11:03;56
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अमरीका और भारत की परिस्थितियाँ भिन्न हैं. वहीं ओबामा की स्थिति भी भिन्न है. यदि वह शुद्ध अश्वेत माँ बाप का बेटा होता तो निश्चित रूप से बड़ी उपलब्धि मानी जा सकती थी.
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हर्षवर्धन on 09 November, 2008 19:05;05
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अरसे बाद प्रभाषजी को पढ़ा। बहुत शानदार है। सारी बातों से सहमत हूं और ये मुझे भी बर्दाश्त नहीं होता कि कोई भी चीज पश्चिम की नकल करके वैसी की वैसी थोपने-लादने-खोजने की कोशिश भारत में की जाए। इलाहाबाद विश्वविद्यालय को ऑक्सफोर्ड ऑफ ईस्ट कहने का मै सख्त विरोधी थी। लेकिन, भारत में ओबामा खोजने की कोशिश इस संदर्भ में देखी जानी चाहिए कि इस देश का कोई एक नेता ऐसा होगा क्या जिसे सुनकर देश के हर हिस्से में लोगों का खून गरम हो। लोग कुछ करने की सोचें और कर गुजरें।
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visfot .com on 09 November, 2008 19:08;25
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और अरसे बाद आपकी प्रतिक्रिया देखकर भी अच्छा लग रहा है.
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नरेश सोनी on 09 November, 2008 19:42;08
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टीवी चैनलों और अखबारों ने वाकई खूब शोर मचाया कि हमारा ओबामा कहां है, लेकिन सच यही है कि हमें इसकी जरूरत क्या है।
अमेरिका में ओबामा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि ये वो देश है जहां आज भी कालों के साथ जबरदस्त भेदभाव होता है... कुछ सालों पहले तक 'Only Whites' के रेस्तरां आम थे। ऐसे में ओबामा का राष्ट्रपति बनना वाकई एक बहुत बड़ा बदलाव है।
लेकिन भारत की स्थिति अलग है... हमारे यहां अस्सी प्रतिशत हिंदू होने के बावजूद, हमें मुसलमान को राष्ट्रपति और सिख को प्रधानमंत्री बनाने में कोई दिक्कत नहीं होती... भेदभाव के मोर्चे पर हमें अमेरिका से कुछ भी सीखने की जरूरत ही नहीं
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prakash chandalia on 09 November, 2008 22:44;13
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आदरणीय प्रभाष जी,
श्री नरेश सोनी की टिपण्णी पर कुछ कहना चाहेंगे?
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visfot .com on 09 November, 2008 22:49;32
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प्रकाश भाई, प्रभाष जी ने अपने लेख में भी यही लाईन ली है जो नरेश सोनी जी लिख रहे हैं.
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RAJKUMAR SINGH on 10 November, 2008 06:54;43
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अगर ध्यान से देखें तो अमेरिका और भारत दोनों की सामाजिक संचरना की बुनियाद में ही भेदभाव है, शोषण और गुलामी की परंपरा है. आर्थिक दोहन का इतिहास है. मेरी नजर में भारत के हजारों सालों के इतिहास को अमेरिका ने सिर्फ कुछ सौ सालों में ही जी लिया है.
सिर्फ २० साल की अवधि में (१९८८ के राष्ट्रपति चुनाव से २००८ तक) अमेरिकी मानस में इस परिवर्तन को घटते हुए मैंने देखा है. और मैं सड़कों और गलियों की बात कर रहा हूं जिसे अमेरिका में मेन स्ट्रीट का जाता है. जैसा कि प्रभाष जी ने इंगित किया है कि अश्वेत वर्ण के जेसी नेक्सन डेमोक्रेटिक पार्टी के नामांकन के शुरूआती दौर में ही उड़ गये. अगर तुलना करनी हो तो आज के ओबामा के प्रभामंडल की तुलना में जैक्शन कई गुना ज्यादा मंडित थे. उन्हीं को जीतना चाहिए था पर उनका वर्ण ही उनकी अयोग्यता बनी.

इस बार अमेरिका ने एक व्यावहारिक निर्णय लिया है. परंपरा से हटकर (और जब भी जरूरी होता है, अमेरिका यही करता है) आर्थिक जागतिक अमेरिकी सवालों का जवाब ओबामा के पास बेहतर था. और नागरिक हकों की लड़ाई के प्रसिद्ध अश्वेत नेता मार्टिन लूथर किंग का वह भाषण कि......... 'I HAVE A DREAM 'सपना सच्चाई बन गया.

सबसे शुभ बात यह हुई है कि युवा पीढ़ी ही एक तरह से ओबामा को ले आयी है. रंग और नस्ल को खासकर युवावर्ग ने सबसे ज्यादा नकारा है. इसलिए भारत के संदर्भ में एक शुभ अभिलासा पालने का मन करता है कि क्या भारत में एक व्यावहारिक, नैतिक राजनीतिक शक्ति बन सकती है जो धर्म जाति प्रांत भाषा या लिंग से पर एक हिन्दुस्तान की बात करे. और सिर्फ कागज पर ही नहीं व्यावहारिक धरातल पर.
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दीपक on 10 November, 2008 14:19;36
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आपको पढकर अनेक भ्रम टुटते है !अत्यंत सटीक विवेचना की है आपने !
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पांच सदी ्के देश की , तुलना क्या भारत से.
लाख बीसीयों बीतते, महिमा है भारत की.
महिमा है भारत की, सबको इसने पचाया.
मरती मानवता को कितनी बार बचाया.
कह साधक अमरीका है भट्टी शोषण की.
उदार भारत से तुलना पांच सदी के देश की!
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image प्रभाष जोशी वरिष्ठ पत्रकार प्रभाष जोशी अंग्रेजी पत्रकारिता से हिन्दी में आये. जनसत्ता को शिखर पर ले जाने वाले संपादक के रूप में प्रभाष जी का काम हिन्दी पत्रकारिता में मीलपत्थर है. पत्रकारिता के जाने-माने हस्ताक्षर जो अब हमारे बीच नहीं है.
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