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एटा-मैनपुरी का यादव, कृष्ण का सच्चा वंशज

image मुलायम सिंह यादव

हमारे मित्र प्रेम सिंह लाइलाज समाजवादी हैं। ऐसे कि राममनोहर लोहिया की जन्म शताब्दी से मुलायम सिंह यादव का कोई भी लेना देना उन्हें बर्दाश्त नहीं है। वे मानते हैं कि मुलायम सिंह लोहिया की जन्मशती का इस्तेमाल अपने सरासर समाजवाद विरोधी जीवन और राजनीति पर समाजवाद का झूठा ठप्पा लगवाने में करेंगे। उनमें न समाजवाद के विचार के लिए कोई समझ और सम्मान है न लोहिया के लिए। मुलायम सिंह बेपेंदे के लोटे और अवसरवादी हैं। सत्ता के लिए कुछ भी कर सकते हैं.

अब प्रेम सिंह को कौन समझाए कि लोहिया जी की जन्म शताब्दी उनके जैसे नैष्ठिक समाजवादियों से तो मनेगी नहीं। वे मनाएंगे तो जंगल में मोर नाचा किसने देखा जैसी मन जाएगी शताब्दी! देश और दुनिया में लोहिया जी को याद करना है तो समाजवाद के विचार ओर उसमें लोहिया का योगदान समझना और उसे किसी तरह पुनर्जीवित करने की कोशिश करना तो सबसे कम जरूरी है। सबसे आवश्यक संसाधन हैं और उनके जरिए ऐसा तमाशा खड़ा करना जिसकी तरफ आम और खास दोनों का ध्यान खिंचे और सारा संसार सालभर लोहिया जी का नाम ले। ऐसे साधन और ऐसा नाम तो सिर्फ मुलायम सिंह यादव के पास है। वही सबसे बड़े और जाने माने समाजवादी हैं। उन्हीं की पार्टी समाजवादी पार्टी है। वही देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश पर राज कर चुकी है। दिल्ली में केंद्रीय सरकार की भी भागीदारी रह चुकी है। संसद में उसके छत्तीस सदस्य थे जिसने भारत से अमेरिका के परमाणु करार और मनमोहन सिंह की सरकार को बचा कर भारत और अमेरिका दोनों पर अहसान किया। इसका कोई मतलब नहीं कि तब तक मुलायम सिंह ओर समाजवादी पार्टी करार, अमेरिका और मनमोहन सरकार तीनों का विरोध करते रहे थे। महत्व की बात यह है कि जब देश और सरकार पर संकट घिरा तो मुलायम सिंह ने नया अवतार लेकर दोनों को बचाया। राजनीति और सत्ता में रहने के धर्म पर जब-जब संकट आता है एटा-मैनपुरी का यादव, कृष्ण का सच्चा वंशज नया अवतार लेता है।

प्रेम सिंह और उनके जैसे समाजवादियों की समस्या यह है कि वे मुलायम सिंह यादव में यह जो ईश तत्व- भगवान का अंश- है उसे समझते नहीं हैं। उनसे ज्यादा समझ तो अमिताभ बच्चन और उनके पूरे परिवार में है जिन्होंने मुलायम में यह ईश तत्व साक्षात देखा, उसकी भक्ति की और अपने नाना प्रकार के संकटों से मुक्ति पाई। संकटों में घिरा मुन्ना भाई भी इस ईश तत्व के कारण शरण में आया। अपनी बहनों को छोड़ा, अपने पिता की और परिवार की कांग्रेस परंपरा का लिहाज नहीं किया और लखनउ से चुनाव लड़कर जनता की सेवा करने राजनीति के मैदान में उतर आया। मुलायम सिंह और उनके हनुमान अमर सिंह की सेवा में गांधीगिरी करने का इससे बेहतर अवसर कहां मिल सकता था। यह ठीक भी है कि जो तत्व अमिताभ बच्चन और संजय दत्त को दिखता है वह प्रेम सिंह और उनके जैसे सिरसिफरे समाजवादियों को नहीं दिख सकता। ईश तत्व को देखने के लिए आस्था और विश्वास चाहिए और ऐसी लगन चाहिए जो सालों साल लगी रह सके। अब राजनीति में रुचि रखने वाला पूरा देश जानता है कि समाजवादियों में आस्था और विश्वास की ही जन्मजात कमी नहीं होती। लगन तो उनकी लगती ही नहीं है। वे स्वभाव से ही मूर्तिभंजक होते हैं। उनसे न सिर्फ दूसरों की सफलता नहीं देखी जाती वे दूसरों के सुख और प्रतिष्ठा को भी सहन नहीं कर सकते। इसलिए जितनी भी पार्टियां बनाते हैं उन्हें तोड़े बिना नहीं रह सकते। जितने भी गठबंधन करते हैं उन्हें खोले और तोड़े बिना उन्हें चैन नहीं पड़ती। सत्ता और प्रतिष्ठान में रहने के लिए जो सहनशीलता, समझौते करने की समझ और क्षमता, धीरज और क्षमाशीलता चाहिए वह आपको समाजवादियों में नहीं मिलेगी। समाजवादियों से ज्यादा सच्चे विघ्नसंतोषी आपको किसी पार्टी संगठन और समाज में ढूंढ़े नहीं मिलेंगे।

मुलायम सिंह बरसों सच्चे समाजवादी रहे और लंगोटी लगाए घूमते रहे। सम्मेलनों और गोष्ठियों और सभाओं में लंगोटा भी घुमाते रहे। दंड पेलते रहे। उठक बैठक लगाते रहे। जांघ ठपकार कर चुनौती देते और दांव-पेच से लड़ते रहे। अखाड़ों में उनका घर रहा। जुलूस निकाले, बंद कराए, हल्ला बुलवाए और मूर्तियों पर पत्थर फिंकवाए। लेकिन धीरे-धीरे समझ में आया कि लोहिया और समाजवाद के रास्ते तो अब राजनीति पैसे के बिना नहीं हो सकती। जुलूस निकाल कर तोड़-फोड़ करने वाले भी पैसे मांगते हें। पैसों से समर्थन और तारीफ और जनाधार भी पाया जा सकता है। मुलायम से राजनीति साधने के लिए पैसे का रास्ता पकड़ लिया। लेकिन जमाने में जाने तो समाजवादी और लोहिया के पक्के शिष्य की तरह थे। अपनी यह पहचान छोड़ देते तो भीड़ में मिल जाते। जैसे दूसरे समाजवादी और लोहिया का नाम लेने वाले दूसरी पार्टियों, संगठनों और प्रतिष्ठानों में खो गए हैं वैसे ही मुलायम भी खो जाते। फिर उन्होंने पहचान की राजनीति को समझा। पाया कि पहचान तो ब्रांड की तरह है। उसे मजबूत करने और चमकाने के लिए जरूरी नहीं कि आप उनका पक्का आचरण ईमानदारी से करें जिनसे आपकी पहचान बनी है। पहचान, पहचान पर लगातार जोर देने और दुनिया का ध्यान खींचे रहने से पक्की और बलशाली होती है। मुलायम सिंह समाजवाद को लाल टोपी की तरह और ज्यादा पहनने लगे और लोहिया का नाम दिन रात जपते रहे। जो भी बनाते और बिगाड़ते रहे उस पर लोहिया का नाम चिपकाने लगे। लोग लोहिया के साथ मुलायम का नाम पढ़ने लगे। फिर लोहिया का नाम मुलायम में मिल गया।

समाजवाद का लोहियावादी ब्रांड बन गया तो राजनीति के बाजार में उसे बेचना और उससे कमाई करना जरूरी हो गया। अब अखाड़े और जुलूस बंद वाले पुराने समाजवादी साथी भीड़ लगाने, हल्ला करने और रैली निकालने में तो ठीक थे पर ब्रांड को बेचने में बिल्कुल निकम्मे थे। तब मुलायम सिंह ने अमर सिंह का साथ लिया जो बिड़ला घराने के बाल-बच्चों की कंपनियों में छोटी-मोटी दलाली करते हुए राजनीति की बड़ी कंपनियों की तक पहुंच रहे थे। मुलायम को भी अपनी समाजवादी पार्टी को एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी में बदलना और फलना-फूलाना था। अमर सिंह का अनुभव और कौशल उन्हें अपने काम का लगा। अमर सिंह की ख्याति और हैसियत ऐसी थी कि कोई और पार्टी उन्हें हाथ नहीं लगाती। इसे अमर सिंह और मुलायम सिंह दोनों समझते थे। अमर सिंह ने बड़ी लगन से काम किया। मुलायम को कारपोरेट इंडिया में प्रवेश करवाया, बॉलीवुड के सितारों से जोड़ा और इस तरह नई राजनीति के दो बड़े कारक उनसे जुड़ गए। संकट में पड़े सदी के महानायक का सहारा और मुलायम से उद्धार करवाया। आपस में लड़ते अंबानी भाइयों में से अनिल को समाजवादी पार्टी और उत्तर प्रदेश से जोड़ा। एक तरफ अमिताभ बच्चन और दूसरी ओर अनिल अंबानी-लंगोटबाज मुलायम का नया ब्रांड बनवाने में काम आए। बड़ा मंच मिला तो अमर सिंह की दलाली भी बड़े पैमाने पर चमकी। राजनीति के बड़े खिलाड़ी तो वे बन ही गए। एक दिन ऐसा आया कि अमेरिका ने भी उनकी प्रतिभा का लाभ लेना तय किया। अमर सिंह अमेरिका बुलाए गए और उन्होंने वह कर दिखाया जो कोई कर नहीं पा रहा था। वामपंथियों को सरकार के समर्थन से बाहर करके मनमोहन सिंह की सरकार और अमेरिका से परमाणु करार दोनों को बचा लिया। छोटी-मोटी कंपनी से शुरू हुई दलाली अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ऐसी कारगर साबित हुई।

लेकिन अमर सिंह समाजवादी पार्टी के महासचिव ही नहीं, समाजवादी के रूप में भी प्रतिष्ठित हुए। मुलायम सिंह का ईश तत्व ऐसा प्रभावी निकला कि दलाली करने वाले छोटे-मोटे भड़वई पूंजीपति अमर सिंह भी समाजवादी बनकर छा गए। ईश्वर में ही यह प्रताप होता है कि दलाल भी उससे लिपटे तो वह दलाल नहीं होता। समाजवादी हो जाता है। समाजवादी मुलायम के ईश तत्व ने अमर सिंह को समाजवाद में अमर कर दिया। मुलायम के इस ईश तत्व का एक और चमत्कार दुनिया जल्द ही देखने वाली है। कुसुम राय के शिकंजे में फंसे और अपने बेटे राजवीर के मारे कल्याण सिंह ऐसी घायल और दयनीय अवस्था में थे कि न घाट के रहने वाले थे न घर के। जाहिर है कि ऐसे लोगों को तो कोई अवतार ही बचा सकता है। कल्याण सिंह सब कुछ छोड़-छाड़ कर मामेंक शरणम् व्रज आए। और मुलायम सिंह ने उन्हें गले लगा लिया। कल्याण सिंह लोध हैं। लोध और दूसरी छोटी जातियां चुनाव में मुलायम के यादव और मुसलमानों का साथ दे दें तो दलित मायावती और भाजपा दोनों को कमजोर किया जा सकता है। कल्याण की मुश्किल को अपने फायदे में बदलने में मुलायम लग गए। लेकिन कल्याण सिंह के मुख्यमंत्री रहते बाबरी मिस्जद गिराई गई थी। कल्याण राम मंदिर आंदोलन के दलित संघी चेहरे और नेता थे। लेकिन मुख्यमंत्री के नाते बाबरी मस्जिद की रक्षा उनका कर्तव्य था। कल्याण सिंह उसे पूरा नहीं कर पाए तो न सिर्फ सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें एक दिन की जेल की सजा दी, वे देशभर के मुसलमानों और सेकुलर लोगों के दुश्मन नंबर एक हो गए और रहे। अब वे परिवार को छोड़ कर मुलायम सिंह के पास आ गए हैं। मुलायम के धर्मनिरपेक्ष ईश तत्व को एक चमत्कार और करना है। जैसे अमर सिंह समाजवादी हुए हैं वैसे कल्याण सिंह को सेकुलर बनाना है। मुलायम जिसके माथे पर हाथ धर दें वह सेकुलर हो जाता है। प्रेम सिंह आपको भी वे लोहियावादी बना सकते हैं।

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nt on 10 February, 2009 16:33;51
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is lekh ki bhasa sahi nahi hai .
khas tor par aap jaise bujurag lekhak ko to is ister par nahi aana chahiye .
yadav huye to kya pap hua .
amar singh jaise aur log bhi is desh me rajniti kar rahe hai bade miya kuch unki taraf bhi dekh lete .
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anup on 11 February, 2009 11:36;14
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Mr. NT ,
aap kiske lekh ko sahi nahi baata rahe hai?
Prabhas Joshi ka likhaa kabhi galat nahi hota.

NT sahab, Satya kaduwa hota hai....isi liye aap ke aiyse vichar hai


anup
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parshuram (Fire on orkut) on 11 February, 2009 12:08;33
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दोस्त सत्य तो कड़वा होता है. मुलायम और लालू की यादव गर्दी का कहीं तो अंत होगा. या फिर वो कुछ भी करे तो जनता बिना सोचे समझे सेकुलर नामक अफीम का रस पान करते बस इन्ही को वोट दे. इन दोनों ने तो धरतीपुत्र होने का मजा लूटा हैं और इटली को जाकर चारण भाटगिरी की है. उस पर भी तुरा ये की हम यादव डूब मरने की बात है. यादव क्या यह चाहते हैं की हिन्दुओ का मान मर्दन करते रहो.
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sahid ahmad on 14 February, 2009 00:26;59
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JOSI JI, MULAYAM-AMAR KI YE DASTAN BHALE UNKE CHANGUO-MANGUO KO HAJAM NA HO , PAR BAAT SAU FISDI SACH HAI
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image प्रभाष जोशी वरिष्ठ पत्रकार प्रभाष जोशी अंग्रेजी पत्रकारिता से हिन्दी में आये. जनसत्ता को शिखर पर ले जाने वाले संपादक के रूप में प्रभाष जी का काम हिन्दी पत्रकारिता में मीलपत्थर है. पत्रकारिता के जाने-माने हस्ताक्षर जो अब हमारे बीच नहीं है.
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