कौन से राम कहां का मंदिर?
लालकृष्ण आडवाणी तथा अन्य भाजपा नेताओं को बार-बार यह सफाई क्यों देनी पड़ती हे कि हमने राम मंदिर के मुद्दे को छोड़ा नहीं है? उन्होंने अगर इस मुद्दे को छोड़ा नहीं होता, तो यह बात छिपानेवाली नहीं थी। आम जनता को भले ही न दिखे, पर पत्रकारों को तो दिख जाता। हमारे पत्रकार इतने सूक्ष्मदर्शक हो गए हैं कि जहां कोई चीज नहीं होती है, वहां भी वे उसे देख लेते हैं। इसलिए राम मंदिर का मुद्दा अगर किसी भी स्तर पर और किसी भी रूप में जीवित है, तो यह उनकी नजर से छिपा नहीं रह सकता था।
आश्चर्य की बात यह है कि तब भी वे भाजपा नेताओं से इसकी पुष्टि करना आवश्यक समझते हैं कि क्या भाजपा ने राम को भुला दिया है? सर, आप परेशान क्यों हो रहे हैं? भाजपा ने अगर राम को भुला दिया है, तो अच्छा ही किया है। इसके लिए आपको भाजपा का धन्यवाद करना चाहिए, उसे बधाई देनी चाहिए। लेकिन आप कुरेद-कुरेद कर राम मंदिर के मुद्दे को नया जीवन देना चाहते हैं। शायद यह पत्रकारिता के हित में है कि राम मंदिर का मुद्दा न केवल जीवित, बल्कि टहलता रहे। तभी अखबारों के प्रथम पृष्ठ पर और टीवी चैनलों के प्राइम टाइम में तनाव और सनसनी बनाए रखना संभव है।
राम मंदिर का मामला भाजपा के लिए हमेशा शर्म की बात बनी रहेगी। आडवाणी ठीक कहते हैं कि जब हम अकेले सत्ता में आएंगे, तब अयोध्या में भगवान श्रीराम का भव्य मंदिर बनाएंगे। इसमें बस दो मुश्किलें हैं। पहली मुश्किल यह है कि फिलहाल तो भाजपा के अकेले सत्ता में आने की संभावना दूर-दूर तक दिखाई नहीं पड़ती। भाजपा के लिए दिल्ली अभी दूर है, बहुत दूर है। दूसरी मुश्किल कानूनी है। अगर किसी विशेष परिस्थिति में भाजपा ने दिल्ली फतह कर ली, तब भी वह उस जगह पर राम मंदिर नहीं बना सकेगी, जहां बाबरी मिस्जद हुआ करती थी। वह जमीन न तो बिकाउ है और न न्यायालय की अनुमति के बगैर सरकार उसका अधिग्रहण कर सकती है। मुद्दा कई अदालतों में है और कोई भी अदालत, खासकर देश की सबसे बड़ी अदालत, सांप्रदायिक वातावरण बनाने की अनुमति नहीं दे सकती। इसलिए मान लेना चाहिए कि अयोध्या में भाजपा के राम का भविष्य उज्ज्वल नहीं है। भाजपा ने अपने राम के साथ ज्यादतियां भी तो कम नहीं की हैं।
जो पत्रकार भाजपा नेताओं से राम मंदिर के भविष्य के बारे में पूछते रहते हैं, उन्हें अयोध्या विवाद के मर्म का ज्ञान नहीं है। चूंकि भाजपा अयोध्या आंदोलन के दौरान बार-बार राम जन्मभूमि मंदिर का सवाल उठाती रही, इसलिए लोगों को भ्रम हो गया कि यह पार्टी राम की उपासक है। इससे बड़ा भ्रम कुछ और नहीं हो सकता। भाजपा को राम से थोड़ा भी लगाव होता, तो वह राम के करुणामय जीवन और राम राज्य के उच्चतम आदशो± पर चलने की कोशिश करती। केंद्र में भाजपा के छह वषो± के शासन में राम के एक भी आदर्श की इज्जत नहीं की। राम ने तो लोकापवाद से बचने के लिए सीता का त्याग कर दिया था, पर वाजपेयी सरकार के मंत्रियों पर बार-बार कलंक लगने के बाद भी सरकार ने न तो कोई प्रायश्चित किया और न ही गद्दी छोड़ी। चलिए, मान लिया कि हम मर्त्यों में इतनी शक्ति कहां कि जो हम ठान लें, उस पर चलते रहें। राम की असली पूजा अगर संभव नहीं है, तो दिखाउ पूजा के लिए ही सही राम के मंदिरों का तो जीर्णोद्धार किया ही जा सकता है और शहर-शहर में, जैसे अम्बेडकर की मूर्ति लगी हुई है, वैसे ही एक उम्दा राम मंदिर तो बनाया जा सकता है। भाजपा नेताओं ने इसमें भी रूचि नहीं ली। दरअसल, राम उनके लिए मर्यादा पुरुष नहीं, एक सक्षम राजनीतिक औजार थे। इसीलिए भाजपा ने देश के सभी शहरों से राम नामी ईटें अयोध्या लाने का अभियान तो चलाया, ताकि मुस्लिम विरोध के वातावरण को घना किया जा सके, पर उन ईटों का इस्तेमाल करने के बारे में गंभीरता से कभी नहीं सोचा।
बात बहुत सीधी है। भाजपा को मंदिर बनाना ही नहीं था। उसे तो बाबरी मिस्जद को मिसमार करना था। राम जन्मभूमि मंदिर का सारा टंटा इसीलिए खड़ा किया जा रहा था ताकि बाबरी मिस्जद को तोड़ने का माहौल बनाया जा सके। भाजपा निर्माण की नहीं, विध्वंस की पार्टी है। अयोध्या आंदोलन के पीछे उसका एकमात्र लक्ष्य मुसलमानों को नीचा दिखाना था। मध्य युग में मुस्लिम बादशाहों द्वारा की गई ज्यादतियों का बदला लेना था। बदला लेना एक सामंती और मध्ययुगीन अवधारणा है। आधुनिक चेतना माफी मांगने और मिलजुल कर रहने की है। इसी चेतना के तहत जापान ने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान चीन और कोरिया में अपने सैनिकों के द्वारा किए गए जुल्मों के लिए माफी मांगी। पोप ने अतीत में कैथलिक ईसाइयों द्वारा किए गए अत्याचार के लिए माफी मांगी। लेकिन भाजपा की कनपटियां मुसलमानों से बदला लेने के लिए जल रही थीं। आज भी उसे हर मुसलमान देशद्रोह नजर आता है। किसी अन्य समुदाय के धर्मस्थल को टूटते देखकर कोई भी सहृदय व्यक्ति हंस नहीं सकता। लेकिन जब बाबरी मिस्जद टूट रही थी, तब उमा भारती आडवाणी से लिपट गई थीं और कलयाण सिंह प्रमुदित थे कि उनके मुख्यमंत्री काल में एक ऐतिहासिक काम को अंजाम दे दिया गया। अगले दिन दिल्ली में जगह-जगह यह स्टिकर चिपकाया हुआ मिला -जो कहते हैं, वो करते हैं। लेकिन इन धर्म वीरों में से एक भी आज तक अदालत में यह स्वीकार करने नहीं पहुंचा कि हां, बाबरी मिस्जद को तोड़नेवालों में मैं भी था। भीड़ की हिंसा हमेशा कायरों की हिंसा होती है। 1984 के सिख हत्याकांड का भी कोई कर्ताधर्ता आज तक सामने नहीं आया है कि मैंने इतने सिखों की हत्या की है और इसकी जिम्मेदारी मैं स्वीकार करता हूं।
यही वजह है कि बाबरी मस्जिद नेस्तनाबूद हो गई, तो भाजपा के दिल का एक कांटा निकल गया। उसके दिल में अभी भी ताजमहल, लालकिला आदि इमारतें चुभ रही हैं। लेकिन इन मुद्दों को उठा कर अब गर्मी नहीं लाई जा सकती। राम मंदिर के सवाल पर गर्मी लाई सकी, तो इसलिए कि बहुतों को यह राम बनाम बाबर का द्वंद्व लगता था। माहौल ही ऐसा बनाया गया था। पर अब जनता जान गई है कि भाजपा हिंदू देवी-देवताओं से कुछ भी लेना-देना नहीं है। उसका मकसद तो मुसलमानों का मान-मर्दन करना है। हिंदू समाज में मुसलमानों या उनके आक्रमणकारी पूर्वजों के प्रति चाहे जितनी नापसंदगी हो, पर वह सामाजिक शांति और सांस्कृतिक सौहाद्र चाहता है और रक्तपात को नापंसद करता है। इसीलिए सांप्रदायिकता के शोले बीच-बीच में भड़कते जरूर हैं, पर वे जंगल की आग की तरह फैल नहीं पाते।
भाजपा और संघ परिवार के लोग यह अच्छी तरह जानते हैं कि भीड़ के बल पर कोई चीज तोड़ी तो जा सकती है, पर बनाई नहीं जा सकती। आज अगर लाख लोग श्रमदान से राम मंदिर बनाने के लिए एकत्र हो जाएं, तो वे एक ईट भी नहीं बैठा पाएंगे। मिस्जद तोड़कर भागा जा सकता है, पर मंदिर खड़ा करने के लिए सतयाग्रह करना पड़ेगा और जेल जाना पड़ेगा। भाजपा नेताओं में न इतना आत्मबल है, न वे कष्ट उठाने के लिए तैयार हैं। इसलिए राम मंदिर उनके लिए कोई मुद्दा नहीं है, न भविष्य में हो सकता है। उन्हें इसकी फिक्र भी नहीं है, क्योंकि उनका जो मूल मकसद था, वह पूरा हो चुका है। अब कौन से राम और कहां का मंदिर?
(राजकिशोर वरिष्ठ पत्रकार और टिप्पणीकार हैं. आप उन्हें raajkishore@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं.)
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