Home | राजनीति | कौन से राम कहां का मंदिर?

कौन से राम कहां का मंदिर?

image भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी बार बार राम मंदिर की दुहाई क्यों देते हैं?

लालकृष्ण आडवाणी तथा अन्य भाजपा नेताओं को बार-बार यह सफाई क्यों देनी पड़ती हे कि हमने राम मंदिर के मुद्दे को छोड़ा नहीं है? उन्होंने अगर इस मुद्दे को छोड़ा नहीं होता, तो यह बात छिपानेवाली नहीं थी। आम जनता को भले ही न दिखे, पर पत्रकारों को तो दिख जाता। हमारे पत्रकार इतने सूक्ष्मदर्शक हो गए हैं कि जहां कोई चीज नहीं होती है, वहां भी वे उसे देख लेते हैं। इसलिए राम मंदिर का मुद्दा अगर किसी भी स्तर पर और किसी भी रूप में जीवित है, तो यह उनकी नजर से छिपा नहीं रह सकता था।

आश्चर्य की बात यह है कि तब भी वे भाजपा नेताओं से इसकी पुष्टि करना आवश्यक समझते हैं कि क्या भाजपा ने राम को भुला दिया है? सर, आप परेशान क्यों हो रहे हैं? भाजपा ने अगर राम को भुला दिया है, तो अच्छा ही किया है। इसके लिए आपको भाजपा का धन्यवाद करना चाहिए, उसे बधाई देनी चाहिए। लेकिन आप कुरेद-कुरेद कर राम मंदिर के मुद्दे को नया जीवन देना चाहते हैं। शायद यह पत्रकारिता के हित में है कि राम मंदिर का मुद्दा न केवल जीवित, बल्कि टहलता रहे। तभी अखबारों के प्रथम पृष्ठ पर और टीवी चैनलों के प्राइम टाइम में तनाव और सनसनी बनाए रखना संभव है।

राम मंदिर का मामला भाजपा के लिए हमेशा शर्म की बात बनी रहेगी। आडवाणी ठीक कहते हैं कि जब हम अकेले सत्ता में आएंगे, तब अयोध्या में भगवान श्रीराम का भव्य मंदिर बनाएंगे। इसमें बस दो मुश्किलें हैं। पहली मुश्किल यह है कि फिलहाल तो भाजपा के अकेले सत्ता में आने की संभावना दूर-दूर तक दिखाई नहीं पड़ती। भाजपा के लिए दिल्ली अभी दूर है, बहुत दूर है। दूसरी मुश्किल कानूनी है। अगर किसी विशेष परिस्थिति में भाजपा ने दिल्ली फतह कर ली, तब भी वह उस जगह पर राम मंदिर नहीं बना सकेगी, जहां बाबरी मिस्जद हुआ करती थी। वह जमीन न तो बिकाउ है और न न्यायालय की अनुमति के बगैर सरकार उसका अधिग्रहण कर सकती है। मुद्दा कई अदालतों में है और कोई भी अदालत, खासकर देश की सबसे बड़ी अदालत, सांप्रदायिक वातावरण बनाने की अनुमति नहीं दे सकती। इसलिए मान लेना चाहिए कि अयोध्या में भाजपा के राम का भविष्य उज्ज्वल नहीं है। भाजपा ने अपने राम के साथ ज्यादतियां भी तो कम नहीं की हैं।

जो पत्रकार भाजपा नेताओं से राम मंदिर के भविष्य के बारे में पूछते रहते हैं, उन्हें अयोध्या विवाद के मर्म का ज्ञान नहीं है। चूंकि भाजपा अयोध्या आंदोलन के दौरान बार-बार राम जन्मभूमि मंदिर का सवाल उठाती रही, इसलिए लोगों को भ्रम हो गया कि यह पार्टी राम की उपासक है। इससे बड़ा भ्रम कुछ और नहीं हो सकता। भाजपा को राम से थोड़ा भी लगाव होता, तो वह राम के करुणामय जीवन और राम राज्य के उच्चतम आदशो± पर चलने की कोशिश करती। केंद्र में भाजपा के छह वषो± के शासन में राम के एक भी आदर्श की इज्जत नहीं की। राम ने तो लोकापवाद से बचने के लिए सीता का त्याग कर दिया था, पर वाजपेयी सरकार के मंत्रियों पर बार-बार कलंक लगने के बाद भी सरकार ने न तो कोई प्रायश्चित किया और न ही गद्दी छोड़ी। चलिए, मान लिया कि हम मर्त्यों में इतनी शक्ति कहां कि जो हम ठान लें, उस पर चलते रहें। राम की असली पूजा अगर संभव नहीं है, तो दिखाउ पूजा के लिए ही सही राम के मंदिरों का तो जीर्णोद्धार किया ही जा सकता है और शहर-शहर में, जैसे अम्बेडकर की मूर्ति लगी हुई है, वैसे ही एक उम्दा राम मंदिर तो बनाया जा सकता है। भाजपा नेताओं ने इसमें भी रूचि नहीं ली। दरअसल, राम उनके लिए मर्यादा पुरुष नहीं, एक सक्षम राजनीतिक औजार थे। इसीलिए भाजपा ने देश के सभी शहरों से राम नामी ईटें अयोध्या लाने का अभियान तो चलाया, ताकि मुस्लिम विरोध के वातावरण को घना किया जा सके, पर उन ईटों का इस्तेमाल करने के बारे में गंभीरता से कभी नहीं सोचा।

बात बहुत सीधी है। भाजपा को मंदिर बनाना ही नहीं था। उसे तो बाबरी मिस्जद को मिसमार करना था। राम जन्मभूमि मंदिर का सारा टंटा इसीलिए खड़ा किया जा रहा था ताकि बाबरी मिस्जद को तोड़ने का माहौल बनाया जा  सके। भाजपा निर्माण की नहीं, विध्वंस की पार्टी है। अयोध्या आंदोलन के पीछे उसका एकमात्र लक्ष्य मुसलमानों को नीचा दिखाना था। मध्य युग में मुस्लिम बादशाहों द्वारा की गई ज्यादतियों का बदला लेना था। बदला लेना एक सामंती और मध्ययुगीन अवधारणा है। आधुनिक चेतना माफी मांगने और मिलजुल कर रहने की है। इसी चेतना के तहत जापान ने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान चीन और कोरिया में अपने सैनिकों के द्वारा किए गए जुल्मों के लिए माफी मांगी। पोप ने अतीत में कैथलिक ईसाइयों द्वारा किए गए अत्याचार के लिए माफी मांगी। लेकिन भाजपा की कनपटियां मुसलमानों से बदला लेने के लिए जल रही थीं। आज भी उसे हर मुसलमान देशद्रोह नजर आता है। किसी अन्य समुदाय के धर्मस्थल को टूटते देखकर कोई भी सहृदय व्यक्ति हंस नहीं सकता। लेकिन जब बाबरी मिस्जद टूट रही थी, तब उमा भारती आडवाणी से लिपट गई थीं और कलयाण सिंह प्रमुदित थे कि उनके मुख्यमंत्री काल में एक ऐतिहासिक काम को अंजाम दे दिया गया। अगले दिन दिल्ली में जगह-जगह यह स्टिकर चिपकाया हुआ मिला -जो कहते हैं, वो करते हैं। लेकिन इन धर्म वीरों में से एक भी आज तक अदालत में यह स्वीकार करने नहीं पहुंचा कि हां, बाबरी मिस्जद को तोड़नेवालों में मैं भी था। भीड़ की हिंसा हमेशा कायरों की हिंसा होती है। 1984 के सिख हत्याकांड का भी कोई कर्ताधर्ता आज तक सामने नहीं आया है कि मैंने इतने सिखों की हत्या की है और इसकी जिम्मेदारी मैं स्वीकार करता हूं।

यही वजह है कि बाबरी मस्जिद नेस्तनाबूद हो गई, तो भाजपा के दिल का एक कांटा निकल गया। उसके दिल में अभी भी ताजमहल, लालकिला आदि इमारतें चुभ रही हैं। लेकिन इन मुद्दों को उठा कर अब गर्मी नहीं लाई जा सकती। राम मंदिर के सवाल पर गर्मी लाई सकी, तो इसलिए कि बहुतों को यह राम बनाम बाबर का द्वंद्व लगता था। माहौल ही ऐसा बनाया गया था। पर अब जनता जान गई है कि भाजपा हिंदू देवी-देवताओं से कुछ भी लेना-देना नहीं है। उसका मकसद तो मुसलमानों का मान-मर्दन करना है। हिंदू समाज में मुसलमानों या उनके आक्रमणकारी पूर्वजों के प्रति चाहे जितनी नापसंदगी हो, पर वह सामाजिक शांति और सांस्कृतिक सौहाद्र चाहता है और रक्तपात को नापंसद करता है। इसीलिए सांप्रदायिकता के शोले बीच-बीच में भड़कते जरूर हैं, पर वे जंगल की आग की तरह फैल नहीं पाते।

भाजपा और संघ परिवार के लोग यह अच्छी तरह जानते हैं कि भीड़ के बल पर कोई चीज तोड़ी तो जा सकती है, पर बनाई नहीं जा सकती। आज अगर लाख लोग श्रमदान से राम मंदिर बनाने के लिए एकत्र हो जाएं, तो वे एक ईट भी नहीं बैठा पाएंगे। मिस्जद तोड़कर भागा जा सकता है, पर मंदिर खड़ा करने के लिए सतयाग्रह करना पड़ेगा और जेल जाना पड़ेगा। भाजपा नेताओं में न इतना आत्मबल है, न वे कष्ट उठाने के लिए तैयार हैं। इसलिए राम मंदिर उनके लिए कोई मुद्दा नहीं है, न भविष्य में हो सकता है। उन्हें इसकी फिक्र भी नहीं है, क्योंकि उनका जो मूल मकसद था, वह पूरा हो चुका है। अब कौन से राम और कहां का मंदिर?

(राजकिशोर वरिष्ठ पत्रकार और टिप्पणीकार हैं. आप उन्हें raajkishore@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं.)

Subscribe to comments feed Comments (2 posted):

anil kant on 11 February, 2009 19:42;17
avatar
भाई राम की चिंता छोडो .....उन्हें अब अपनी रोटी की पड़ी होगी ....की पाँच साल तो गए अगर अगले पाँच साल गए तो क्या होगा ...उनकी दाल रोटी का क्या होगा ...इसी लिए उन्होंने जनता की भुकमरी की चिंता छोड़ राम का नाम जपना शुरू कर दिया है ...सोच रहे हैं की जनता बिना पेट भरे भी राम का नाम जप्ती रहेगी ....मगर भूल गए की "भूखे बजन न होये"

http://www.meraapnajahaan.blogspot.com/
Thumbs Up Thumbs Down
0
neelam on 13 February, 2009 13:38;38
avatar
are bhai Savi party ko gade mudde ko ukhad ukhad ke jinda kr ke chunav ke samay logo ku dikhana hota hai ki ye mudda avi v jinda hai mara nhi hai, aur aap chahte hain ki mudda uhi jinda rhe to vote hume hi de.
Thumbs Up Thumbs Down
0
total: 2 | displaying: 1 - 2

Post your comment comment

Type in Hindi (हिन्दी में कमेन्ट करने के लिए यहां रोमन में लिखिए यह अपने आप हिन्दी में बदल देगा.)

Title :
Body
Powered by Vivvo CMS v4.1.2
Share |
  • email Email to a friend
  • print Print version

ईमेल से विस्फोटः अपना ईमेल यहां भरें और सब्सक्राइब करें:

Delivered by FeedBurner

Author info
visfot news network विस्फोट.कॉम इंटरनेट पर नये दौर की पत्रकारिता में परंपरागत मूल्यों को स्थापित करने की दिशा में लगातार काम कर रहा है, जो कि पूरी तरह से जनकेन्द्रित, वास्तविक और निहित स्वार्थी तत्वों के प्रभाव से मुक्त है. हमारा संपर्क है visfot@visfot.com
Rate this article
5.00
More from राजनीति
Previous
image
ठाकरे परिवार में कौन बनेगा सरकार?
महाराष्ट्र की राजनीति में पिछले विधानसभा चुनाव में जो नहीं हुआ वह एक महानगरपालिका के चुनाव में हो रहा है. शिवसेना सुप्रीमो बाल ठाकरे अपने ही भतीजे से उलझ गये हैं. कल्याण-डोंबिवली महानगरपालिका चुनाव में जैसे ही राज ठाकरे ने बाल ठाकरे पर छींटाकसी की, बाल ठाकरे ने पलटकर ऐसा वार किया कि महाराष्ट्र की राजनीति गर्म हो गयी. चुप रहने की बजाय राज ठाकरे ने फिर जवाब दिया और आपसी ठसक परिवार की चौखट से निकलकर राजनीतिक के अखाड़े की जंग बन गयी. ...
image
नहीं, राहुल जेपी नहीं हो सकते!
दो दिन पहले अखिल भारतीय कांग्रेस कमिटी के प्रवक्ता मोहन प्रकाश ने राहुल गाँधी द्वारा छात्रों और युवाओं की समस्याओं को प्राथमिकता देने और उनसे संवाद करने की वजह से उनकी तुलना जवाहरलाल नेहरु, एपीजे अब्दुल कलाम और जेपी से की तो इसकी आलोचना भाजपा और रामविलास पासवान ने की. मोहन प्रकाश के बयान को देखें तो पता चलेगा कि उन्होंने जेपी के व्यक्तित्व और राजनीति से नहीं, युवाओं से उनकी संवाद-शैली कि तुलना की है. उनका पूरा बयान इस प्रकार है, " (जवाहरलाल) नेहरु के बाद कलाम (पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम) थे जिन्होंने बच्चों को संबोधित किया. इसीप्रकार, जयप्रकाश नारायण के बाद, राहुल गाँधी हैं जिन्होंने युवाओं की जरूरतों, आकाँक्षाओं और देश में उनके भविष्य को संबोधित किया है."...
image
बादल के घर गरजा बादल
सताधारी अकाली दल की समस्या खत्म होने का नाम नहीं ले रही है। अब बगावत घर में है। पहले बगावत घर से बाहर होती थी। प्रकाश सिंह बादल अपने राजनीतिक जीवन के सबसे गंभीर संकट को झेल रहे है। इस संकट से होने वाला नुकसान उन्हें पता है। उनके चेहरे पर इसके नुकसान की छाया दिख रही है। चेहरा उतरा हुआ है और आवाज में अब वो दमखम नहीं है।...
image
बिहार की राजनीति में मायावती का प्रवेश क्रांतिकारी
बिहार चुनाव में एक और आयाम जुड़ गया है . बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावाती ने बुधवार को बिहार में अपना पहला चुनावी दौरा करके यह साबित कर दिया है कि वे बिहार को अपनी पार्टी की राजनीतिक प्राथमिकताओं में बहुत ऊपर रख कर चल रही हैं. इसके बाद भी मायावती बिहार में चुनाव प्रचार करने जायेगीं और हर दौर के पहले कुछ चुनिन्दा विधानसभा क्षेत्रों में लोगों से वोट मागेगीं....
image
राजनीति के समंदर में धनतंत्र के धुरंधर
ग्राम से सेवाग्राम यात्रा के लिए आयोजित पत्रकार सम्मेलन में महाराष्ट्र कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष माणिकराव ठाकरे और प्रदेश के पूर्व मंत्री सतीश चतुर्वेदी के बीच रैली के लिए धन उगाही की प्रक्रिया पर चर्चा जिस अंदाज में स्टार माझा पर प्रसारित हुई उसने भले ही महाराष्ट्र कांग्रेस की राजनीति में भूकंप नहीं लाया हो लेकिन राजनीतिक दलों के संचालन में धनतंत्र की भूमिका को जरूर बेनकाब किया है. गौरतलब है कि स्टार माझा समेत तमाम चैनलों पर कांग्रेस की बखिया उधेड़ने के कार्यक्रम के बावजूद कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्षा सोनिया गांधी ने मुख्यमंत्री अशोक चह्वाण और प्रदेश अध्यक्ष माणिकराव ठाकरे की पीठ को थपथपाने का काम करके इस बवंडर को खत्म करने की चतुराई दिखाई है. ...
image
सब्सिडी की राजनीति पर संकट के बादल
पंजाब के प्रभावशाली बादल परिवार में शुरू हुए राजनीतिक गृहयुद्ध ने कई चर्चाएं शुरू कर दी है। क्या क्षेत्रीय राजनीतिक दलों की राजनीति जब परिवार के गृह युद्व में उलझ जाती है तो कुल की राजनीति करने वाला राजनीतिक दल जल्द ही समाप्त हो जाता है? क्या क्षेत्रीय राजनीतिक दल परिवार से ऊपर उठ कर राज्य के हित में नहीं सोच सकते? फिर सता में बने रहने के लिए क्या छोटे राजनीतिक दल लोकलुभावनी योजनाओं को बढ़ावा ही देते रहेंगे? पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के भतीजे मनप्रीत सिंह बादल को अकाली दल से निलंबित किए जाने के बाद अब देश के क्षेत्रीय राजनीतिक दलों की राजनीति को लेकर नयी बहस छिड़ चुकी है। चूंकि नई बहस इसलिए कि इस विवाद में एक गंभीर आर्थिक मसला है, जो अभी तक क्षेत्रीय दलों में हुए पारिवारिक युद्व से अलग है। वह गंभीर मसला है, राज्य की खराब होती आर्थिक स्थिति और सब्सिडी की राजनीति।...
image
दिल्ली शिफ्ट हुआ कर-नाटक
अब दिल्ली शिफ्ट हो गया कर-नाटक। सोनिया-आडवाणी के घर फैसलाकुन बैठकों का दौर चला। राष्ट्रपति राज के खौफ में बीजेपी ने अपने 105 एमएलए दिल्ली बुला लिए ताकि राष्ट्रपति के सामने परेड करा राजनीतिक मुद्दे को धार दे सके पर तेल की धार देख कांग्रेस ने खुद को फिसलने से बचा लिया। बिहार, झारखंड, गोवा जैसी जल्दबाजी नहीं की, गवर्नर हंसराज भारद्वाज तो बेनकाब हो चुके। सो फैसले पर फौरन मोहर लगाने की तोहमत नहीं ली अलबत्ता बीजेपी को भी बेनकाब करने की रणनीति बनाई।...
image
सिमी से भी खतरनाक है संघ का स्वरूप
अपनी मध्य प्रदेश यात्रा के दौरान अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के महासचिव राहुल गाँधी द्वारा आरएसएस की तुलना सिमी से करने पर समूचा संघ परिवार बौखला गया है. इस बौखलाहट की वजह यह है कि जिस सिमी का विरोध कर संघ परिवारी अपनी राष्ट्रभक्ति का रंग चोखा करते थे उसी सिमी से संघ की तुलना उसे अप्रत्याशित क्षति पहुंचा सकती है. भारत और दुनिया के अकादमिक जगत के लोग, नेता और पत्रकार सभी संघ की स्थापना से लेकर अब तक यह कहते रहे की संघ एक सांप्रदायिक,फासीवादी और भारतीय संविधान की भावना के विरुद्ध खड़ा संगठन है. आज भी संघ के इस घातक चरित्र पर किसी को संदेह नहीं है....
image
शिव सेना की राह पर अकाली दल
पंजाब में सारा कुछ ठीक चल रहा था। कुछ दिन पहले ही निचली अदालत से बादल परिवार को आय से अधिक संपति के मामले में राहत मिली थी। पर यह राहत ज्यादा देर नहीं चली। घर में विस्फोट हो गया है। मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के भतीजे मनप्रीत सिंह बादल ने यह विस्फोट किया है। कुछ दिन पहले उन्होंने अपने ही राज्य सरकार की नीतियों की आलोचना कर केंद्र सरकार की नीतियों की तारीफ कर दी है। यह तब किया है जब राज्य में खुद मनप्रीत सिंह बादल वित्त मंत्री है।...
image
न अचार है न मुरब्बा है, राहुल खाली डब्बा है
सबसे पहले तो उत्तर प्रदेश भाजपा को बधाई कि उसने राहुल गांधी का संघ ज्ञान बढ़ाने के लिए संघ विचारधारा को समझानेवाली पुस्तकों का सेट भेजा है. मध्य प्रदेश की तीन दिवसीय यात्रा में उन्होंने जिस प्रकार से संघ को सिमी के करीब ठहरा दिया उससे साबित होता है कि संघ विचारधारा के बारे में तो उन्हें तनिक भी अंदाज नहीं है, साथ ही यह भी आभास होता है कि वे राजनीतिक रूप से टीन और कनस्टर के ऐसे खाली डिब्बे हैं जो जैसे चाहे अपने हित के लिए इस्तेमाल कर सकता है. ...
image
कंगाल पड़े बंगाल में रा-हुल-रा-हुल
कांग्रेस के चिकने चुपड़े युवराज राहुल गाँधी को तीन दिन के बंगाल दौरे से वहां की उबड़-खाबड़ सियासी जमीन का अंदाज जरुर लग गया होगा. पार्क स्ट्रीट के रेस्तरां में मुर्ग मसल्लम उड़ाने से लेकर शांति निकेतन में नौजवान लड़कियों के रा-हुल रा-हुल नारों की मस्ती के बीच राहुल ने फुर्सत के क्षणों के लुत्फ़ जरूर उठाया, लेकिन बात जब सियासी जमीन पर कुछ कहने की आई तो ममता बनर्जी की पार्टी के साथ कांग्रेस के स्वाभिमान की बात उठा कर उन्होंने नयी मुसीबत मोल ले ली. राहुल गाँधी ने यहाँ कहा कि अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस तृणमूल के साथ हाथ जरूर मिलाएगी पर सर झुका कर नहीं. बंगाल में कांग्रेस के हाल से वाकिफ समझदार लोग सवाल कर रहे हैं कि यहाँ जब कांग्रेस ही नहीं बची है तो स्वाभिमान किसका?...
image
नेहरू से नौ कदम आगे निकलने की चाह
आम तौर पर प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के बारे में टिप्पणी करने से बचने वाली कांग्रेस को उनका यह बयान रास नहीं आया कि मौजूदा सरकार सबसे ‘एकजुट‘ सरकारों में से एक है- यहां तक कि पंडित नेहरू के नेतृत्व वाली पहली सरकार से भी। डॉ. सिंह के इस बयान ने सबको चौंकाया क्योंकि कांग्रेस के भीतर से कोई नेता पंडित जवाहरलाल नेहरू, स्व. इंदिरा गांधी या स्व. राजीव गांधी के बारे में अप्रत्यक्ष टिप्पणी भी करे तो वह एक बड़े जोखिम का काम है। लेकिन डॉ. सिंह बार-बार सिद्ध कर चुके हैं कि वे राजनीति के गुर आजमाने में निष्णात किसी खुर्राट नेता की तरह नहीं हैं। उन्होंने जो कहा वह उनकी सीधे-सादे और बेबाक इंसान की छवि के अनुरूप ही था।...
image
राजनीतिक एनकाउण्टर का बढ़ता खतरा
क्या देश में अब एनकाउण्टर के नाम पर राजनीतिक हत्याकाण्ड का दौर शुरू हो गया है? पिछले एक डेढ़ साल में हुई राजनीतिक हत्याओं पर नजर दौड़ाएं तो यह सवाल बिल्कुल ही बेकार नजर नहीं आता. अभी हाल में ही मध्य प्रदेश पुलिस ने भिंड युवक जिला कांग्रेस के पद पर कार्यरत अमजद खान को एनकाउण्टर में मार गिराया. जिस पर मध्य प्रदेश विधानसभा के उपनेता चौधरी राकेश सिंह और मध्य प्रदेश कांग्रेस उपाध्यक्ष डॉ. गोविन्द सिंह नें भिंड पुलिस के ऊपर आरोप लगाया है कि भिंड पुलिस नें 22 अगस्त को एक मुठभेड़ दिखाकर अमजद खान की हत्या कर दी।...
image
लालू-पासवान का मुख्यमंत्री हो मुसलमान!
बिहार में चुनावी बिगुल बज चुका है लेकिन उससे पहले पाटलिपुत्र के युद्ध में हर दल या मोर्चा-दूसरे मोर्चे की राजनीतिक जमीन अपने पक्ष में करने की कोशिश में जुटा है। राजनीति के इस खेल में कौन किस पर भारी पड़ेगा, इसकी कुंजी तो जनता जनार्दन के पास है। लेकिन उससे पहले नेता वोट की राजनीति को जात-पात, सामाजिक ध्रुवीकरण के इर्द-गिर्द केंद्रित करने की कोशिश में जुटे हैं। पिछले बिहार विधानसभा चुनाव में मात खाए लालू यादव और रामविलास पासवान ने राजनीतिक इच्छा व्यक्त की है कि राज्य में एक मुस्लिम उपमुख्यमंत्री हो?...
image
सात रेसकोर्स पर दस जनपथ का दावा
दस जनपथ से अगर आप सात रेसकोर्स पहुंचना चाहें तो बमुश्किल सात मिनट का समय लगता है. लेकिन इन दिनों कांग्रेस के शीर्ष पर शुरू हुए सत्ता संघर्ष ने लुटियंस जोन के इन दो सड़कों की दूरिया बढ़ा दी हैं. पिछले कुछ दिनों में कांग्रेस के अंदर कुछ वही राजनीति शुरू हो गई है जिसे किनारे लगाने की राजनीति कह सकते हैं। अक्सर जो किनारे लगाने की कांग्रेस स्टाइल है, उसी स्टाइल में काम की शुरूआत हुई है।...
image
सुप्रीम कोर्ट का सवाल और प्रधानमंत्री का मलाल
आखिरकार प्रधानमंत्री का दुख प्रकट हो ही गया. संपादकों के साथ बातचीत में उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट सरकार के काम काज के लिए नीति निर्धारण न करे. प्रधानमंत्री का यह दुख प्रशासन की उस चिंता से प्रकट होता है जो न्यायालयों के हस्तक्षेप से जुड़ा है. पहले भी कई मौकों पर न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच टकराव के मौके आये हैं. अनाज के सड़न के सवाल पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से एक बार फिर वह सवाल उठ खड़ा हुआ है, जिस पर प्रधानमंत्री अपनी आपत्ति जाहिर कर रहे हैं....
image
राजनीतिक हिन्दुत्व पर दिग्गी का दांव
हिन्दुओं का ठेकेदार बनने की आरएसएस और उसके मातहत संगठनों की कोशिश को चुनौती मिल रही है. भगवान् राम के नाम पर राजनीति खेलकर सत्ता तक पंहुचने वाली बीजेपी के लिए और कोई तरकीब तलाशनी पड़ सकती है क्योंकि कांग्रेस की नयी लीडरशिप हिन्दू धर्म के प्रतीकों पर बीजेपी के एकाधिकार को मंज़ूर करने को तैयार नहीं है. कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह ने साफ़ कहा है कि हिन्दू धर्म पर किसी राजनीतिक पार्टी के एकाधिकार के सिद्धांत को वे बिल्कुल नहीं स्वीकार करते....
Next
Tags
No tags for this article
सर्वाधिकार (अ)सुरक्षित

विस्फोट.कॉम में प्रकाशित सामग्री पर हमारी ओर से कोई कापीराइट नहीं है.

Powered by Vivvo CMS v4.1.2