कांग्रेस के 'बाबा' बहादुर
कांग्रेस के बाबा राहुल गांधी अपनी मां की उस नाकामी को कामयाबी में बदलना चाहते हैं जो उन्हें दस साल के कांग्रेस आलाकमान के रूप में मिली है. बाबा उत्तर प्रदेश और बिहार में कांग्रेस को लौटा लाना चाहते हैं. हाल में युवक कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव करने के लिए उन्होंने सीधे साक्षात्कार का सहारा लिया है.
यह अलग बात है कि इंटरव्यू लेने वाले राहुल बाबा खुद कोई इंटरव्यू देकर राजनीति में नहीं आए। लेकिन बिहार युवक कांग्रेस अध्यक्ष तय करने के लिए इंटरव्यू लिए। चर्चा है कि पहला चक्र पास करने वाले पांच उम्मीदवार रायबरेली जाकर पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ कुछ दिन काम करें। कार्यकर्ता जिसको पास करेंगे वही बिहार युवक कांग्रेस अध्यक्ष बनेगा। राहुल युवक कांग्रेस के प्रभारी है। रायबरेली उनका प्रशिक्षण केंद्र है। यह अलग बात है कि इस जिले की कांग्रेस अपने को उत्तर प्रदेश इकाई से परे मानती है। यह शहर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी का संसदीय क्षेत्र है और दिल्ली से संचालित होता है। लेकिन राहुल बाबा रायबरेली को केंद्र में रखना चाहते हैं। जहां तक बाबा के राजनैतिक हुनर की बात है, तो कांग्रेसियों ने कबसे मान रखा कि मछली के बच्चे को तैरना नहीं सिखाया जाता। इसलिए उनके बाबा सब जानते हैं तब वह बाबा क्यों हैं। आखिर उनके पिता राजीव गांधी ने सीधे देश के प्रधानमंत्री की टोपी पहन ली थी। यह अलग बात है कि उनका अनुभवहीन शासन तमाम विवादास्पद फैसलों-विवादों-कांडों के कारण जाना गया। हो सकता है कि अतीत से सबक लेकर नेहरू परिवार बाबा से इतनी वर्जिश कराना चाहता हो कि वह अतीत की बचकानी चूक से बचे और तब उसको टोपी पहनाई जाए।
दिलचस्प है कि दस साल तक संसदीय राजनीति करने और कांग्रेस महासचिव बनने के बाद भी दिल्ली के सियासी गलियारों में राहुल गांधी को लोग राहुल के नाम से कम बाबा के नाम से ज्यादा जाना जाता है। बाबा के मायने ही सीखने की उम्र है। पश्चिम बंगाल में परिवार में छोटे बच्चों या बुजुर्ग को बाबा कहा जाता है क्योंकि दोनों को विशेष परवरिश की जरूरत होती है। लेकिन उम्र के चौथे दशक की आखिरी सीढ़ी पर खड़े राहुल को कांग्रेसियों ने अपने पुराने अनुभव से बाबा बना दिया ताकि उनसे कोई गड़बड़झाला हो तो बाबा, नहीं तो भविष्य का चिराग का पट्टा है उसके पास। मछली और बाबा के विरोधाभासों के बीच फलती-फूलती-सिमटटी कांग्रेस में उसके नेता अपनी स्थायी जमीन तलाशते हैं।
बहरहाल, यह बाबा मुद्दों पर संघर्ष के बजाय युवाओं पर विशेष निगाह रखना चाहते हैं। क्योंकि संघर्ष की बात वह देश को याद दिलाते रहते हैं कि आजादी और आंतकवाद से निपटने के लिए उनके परिवार ने कितनी कुरबानियां दी। इसलिए उनकी कोशिश है कि संघर्ष के बजाय युवाओं को अपना अभिमन्यु बनाया जाए। देश भर में कोई दस हजार कालेज हैं। हरेक कालेज में कम से कम सौ छात्रों को छांटकर उनको अपनी टोली में शामिल करना जिनसे उनका सीधा संवाद हो। उनके टेलेंट हंट से प्रभावित एक युवा कांग्रेसी नेता का कहना है कि राहुल का जब यह सपना साकार होगा तब वह देश के युवाओं के अकेले नेता होंगे। इन पढ़े-लिखे एक लाख नौजवान के दम पर राहुल भारत की तस्वीर बदल देंगे। उनकी हंट प्रतिभा का प्रयोग और भर्ती की खबर सुर्खियां बटोरती रहती है। यह अलग बात है कि उनके इस अभिनय प्रयोग पर पार्टी के कई नेता चुप्पी साध लेते हैं। बाबा यही चाहते हैं। देश में कोई चालीस फीसदी मतदाता युवा है। राहुल जब अपने को उनका नेता स्थापित नहीं कर लेते तब तक वह बाबा से ज्यादा कुछ नहीं। बाबा को अपने प्रयोग पर पूरा भरोसा है।
तथ्य है कि वह किसी कालेज जाते हैं तो सब पर उनका जादू बढ़-चढ़कर बोलता है। इसलिए कभी दिल्ली तो गुजरात के किसी कालेज पहुंच जाते हैं। हाल में गुजरात में राज्य सरकार ने युवाओं के बीच कार्यक्रम की अनुमति नहीं दी तो कालेज के कैंटीन पहुंच गए। कुछ महीने पहले उत्तर प्रदेश में कानपुर में चंद्रशेखर कृषि विद्यालय में उनके कार्यक्रम को इजाजत नहीं मिली तब भी वहां पहुंच गए। केंद्र सरकार के संकेत पर राज्यपाल टी राजेश्वर राव के गुस्से का नजला विश्वविद्यालय के उप-कुलपति पर पड़ा। लेकिन गैर-कांग्रेसी सरकारों का कोई भी विरोध मीडिया में राहलु का भाव बढ़ा देता है। अपने रोड-शो के जरिए लोगों का ध्यान खींचने की कोशिश की जिसमें वह सफल रहे लेकिन उसको वोट में तब्दील करने में असफल रहे। उत्तर प्रदेश का सामाजिक समीकरण वह तेजाब है जिससे कांग्रेस झुलसती ही जा रही है।
हालांकि राहुल अभी देश की तस्वीर के काले-उजले पन्नों को थोड़ा-बहुत उलटकर वाहवाही लूटते हैं। कभी वह कहते हैं कि सभी पार्टियों में लोकतंत्र का अभाव है। कुछ राजनैतिक पंडितों ने सवाल उठाया कि कांग्रेस खुद कोई लोकतांत्रिक पार्टी नहीं है। लेकिन कांग्रेसियों ने खूब वाहवाही कि बाबा बड़ा होने लगे हैं, लोकतंत्र की बात करने लगे है। कांग्रेस का कमाल है कि उसके पास लोकतंत्र की बात करने वाला महासचिव हैं। दिल्ली विधानसभा चुनाव प्रचार के दरम्यान एक कालेज में एक सवाल पर बाबा के मुंह से निकल गया कि जिसकी उन्होंने सिफारिश की वह टिकट पा गया। यह घटना लोकतंत्र पर उनके उच्च विचार के बाद की है। इसलिए अपने नेताओं के बीच वह बाबा कहलाते हैं। दरअसल भारतीय लोकतंत्र का पानी पहले की तुलना में कुछ भारी हो गया है जिसकी थाह लेने में बाबा को दिक्कत आ रही है।बाबा बयान बहादुर भी है। अयोध्या पर उन्होंने यह बयान देकर सनसनी फैला दी कि अगर कोई गांधी देश का प्रधानमंत्री होता तब अयोध्या में बाबरी मस्जिद नहीं ढहती। यह बयान देकर साबित किया कि डा. मनमोहन सिंह से कोई गड़बड़ी हो जाए तो उनका परिवार जिम्मेदार नहीं होगा। शिलान्यास उनके पिता राजीव गांधी के काल में हुआ जिन्होंने अपनी पार्टी का चुनाव अभियान भी अयोध्या से शुरू किया था। बचाव में कुछ चारण आए और दबी आवाज में कहा कि वह अभी बाबा है। उनके बाबा ने डंका पीटा कि हमारा (गांधी) परिवार कोई काम ठान लेता है तो उसे पूरा करता है। गांधी परिवार के सदस्यों ने उन लक्ष्यों को हासिल किया जो उन्होंने तय किए थे, जैसे भारत की आज़ादी, पाकिस्तान को तोड़ना और देश को 21वीं सदी तक ले जाना। लेकिन बाबा फिलहाल दलितों के घर रोटी-रात गुजारने और उजबक बयान देकर मीडिया में रहेंगे।
देश की गरीबी के बारे राजीव गांधी को कम चिंता नहीं थी। उन्होंने सत्ता को दलालों से दूर रखने के साथ यह वायदा भी किया था कि केंद्र के एक रूपये में से केवल पंद्रह पैसा ही नीचे आम आदमी के पास पहुंचता है। उसका जिक्र कर बाबा अभी भी तालियां लूटते हैं। राजीव के बाद कम से कम दस साल कांग्रेस इस देश पर और राज कर चुकी है, लेकिन मामला अभी भी पंद्रह पैसे पर अटका है। लेकिन उसके लिए नेहरू परिवार को दोश मत दीजिए क्योंकि उनके घर का कोई प्रधानमंत्री नही रहा। हो सकता है कि बाबा किसी दिन यह बयान दे दें। लेकिन पिछले पांच साल में पंद्रह पैसे के बजाय पच्चीस पैसा नीचे पहुंचता तो माना जाता कि बाबा अब बाबा नहीं रहा। इसलिए बाबा को कुछ बड़ा होने का इंतजार कीजिए।
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- जंतर मंतर पर लोकतंत्र जब्त
- रामदेव का राजनीतिक रंग
- वेदांता को विस्तार न दे सरकार
- माला तो माया की, पर मालामाल कौन नहीं?
- चंबल घाटी में लौट रहे हैं गिद्ध



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