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आडवाणी को अकेला छोड़ देने का दुख

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सुधीन्द्र कुलकर्णी भाजपा के लिए नया नाम नहीं है. भाजपा के लिए पहली बार यह नाम तब सिरदर्द बना था जब इनकी सलाह पर भाजपा के कट्टरपंथी नेता इस्लामाबाद जाने पर उदार हो गये और जिन्ना को देशभक्त बता आये थे. आडवाणी को उसका खामियाजा अपने पूरे राजनीतिक कैरियर को दांव पर लगाकर भुगतना पड़ा था. लेकिन सुधीन्द्र कुलकर्णी आडवाणी के विश्वसनीय सिपहसालार बने रहे. और इस बार आमचुनाव में उन्होंने आडवाणी के पूरे प्रचार अभियान का जिम्मा संभाला. अब इन्हीं कुलकर्णी को भयानक दुख ने घेर लिया है कि संघ ने आडवाणी का कोई सहयोग नहीं किया इसलिए वे प्रधानमंत्री नहीं बन सके.

तहलका में लिखे एक लेख में कुलकर्णी ने लिखा है कि 'आमचुनाव के दौरान आरएसएस ने आडवाणी को अकेला छोड़ दिया. इससे वे कमजोर, निस्सहाय बने रहे और पार्टी पर पूरी तरह से नियंत्रण नहीं कर सके.' कुलकर्णी का यह कहना सरासर झूठ है और सिर्फ अपनी नाकामियों को छिपाने की कोशिश है. कुलकर्णी शब्दों के जादूगर हैं और ब्लिट्ज के तेज-तर्रार पत्रकार रहे हैं. इसलिए उनके लिए तर्क गढ़ लेना और सिद्धांत विकसित कर लेना कोई मुश्किल काम नहीं है. लेकिन उनका यह कहना कि संघ और भाजपा के नेताओं ने आडवाणी को फुल कमाण्ड नहीं दिया सही नहीं है.

पार्टी के अंदरखाने से जो जानकारी निकलकर बाहर आयी है वह यह समझने के लिए पर्याप्त है कि पंद्रहवीं लोकसभा के लिए हुए आमचुनाव में आडवाणी को स्थापित करने के लिए भाजपा को ही हाशिये पर धकेल दिया गया था. ऐसी अपुष्ट खबर है कि आडवाणी को मजबूत नेता दिखाने के लिए उनके प्रचार तंत्र पर कोई 2200 करोड़ रूपये खर्च किये गये. हालांकि ऐसे खर्चों का कोई आंकड़ा नहीं होता और न ही कहीं कोई हिसाब रखा जाता है लेकिन राजनीतिक हल्कों में इस बात की चर्चा आम है कि भाजपा के लिए यह अब तक का सबसे मंहगा आमचुनाव था. इस सारे खर्चे में भाजपा की बजाय आडवाणी को नेता के बतौर स्थापित करने की कोशिश की गयी. चुनाव के दौरान जो लोग भी भाजपा कार्यालय गये होंगे उन्होंने साफ तौर पर महसूस किया होगा कि पूरा भाजपा कार्यालय आडवाणी के सचिवालय और सहयोगी के तौर पर ही काम कर रहा था. यह आमचुनाव भाजपा नहीं लड़ रही थी बल्कि आडवाणी के लिए एक दोयम दर्जे के सचिवालय के बतौर काम कर रही थी.

भाजपा कार्यालय में चुनाव अभियान के दौरान दो ऐसे नेता तैनात किये गये थे जो सिर्फ आडवाणी के कार्यक्रमों के हिसाब से भाजपा कार्यालय को कोआर्डिनेट करते थे. पूरे चुनाव अभियान के दौरान भाजपा कार्यालय से सिर्फ तीन नेताओं के कार्यक्रम निर्धारित और संचालित किये गये. उसमें एक भाजपा अध्यक्ष थे, दूसरे नरेन्द्र मोदी और तीसरे लालकृष्ण आडवाणी. इसके लिए भाजपा कार्यालय के पास इस बार के आमचुनाव में कोई काम नहीं था. अगर भाजपा कार्यालय में आमचुनाव के दौरान काम नहीं हो रहा था तो फिर सारा प्रचार अभियान कहां से संचालित हो रहा था?

इस बार के आमचुनाव में भाजपा की ओर से सारा प्रचार अभियान 20-22 लोगों की एक टीम संचालित कर रही थी जिसका दफ्तर आडवाणी के घर के बगल में तुगलक क्रिसेन्ट में बनाया गया था. इस दफ्तर का वैसे तो नाम आडवाणी केम्पेन आफिस था लेकिन पूरी भाजपा में इस दफ्तर को वार रूम के रूप में जाना जाता था. पूरी भाजपा इसी वार रूम से कोआर्डिनेशन को ही अपना काम मान रही थी. पहले के आम चुनावों में भाजपा इस तरह से काम नहीं करती थी. पिछला आमचुनाव (2004) वाजपेयी जी के नेतृत्व में लड़ा गया था. भाजपा पांच साल सत्ता में रहकर आयी थी. प्रमोद महाजन पूरे चुनाव अभियान का संयोजन कर रहे थे. उस वक्त भी प्रमोद महाजन के लोगों ने एक वार रूम बनाया था. लेकिन वह वार रूम भाजपा के ऊपर होकर काम नहीं कर रहा था. लेकिन इस बार आडवाणी के लिए सुधीन्द्र कुलकर्णी के नेतृत्व में जो वार रूम बनाया गया था वह भाजपा और संघ सबके ऊपर होकर काम कर रहा था.

फिर कुलकर्णी किसे दोष दे रहे हैं और क्यों? जब सारा प्रचार तंत्र उनके हाथ में था और उनके वार रूम में अपने मुताबिक सारी गतिविधियों को संचालित किया तब भी हार मिली तो इसमें दोष किसका है? भाजपा में नेताओं का एक बड़ा वर्ग कुलकर्णी को पसंद नहीं करता है. संघ तो सिरे से उन्हें खारिज करता है. भाजपा और संघ में ऐसे लोग भी हैं जो यह मानते हैं कि कुलकर्णी के ही कारण आडवाणी की छवि धूमिल हुई है. यह कुलकर्णी का ही कुनबा था जिसने आडवाणी को हाईटेक प्रचार के जरिए दूसरा ओबामा बनने की सलाह दी थी. कुलकर्णी का ही कुनबा था जिसने आडवाणी को आम आदमी की बजाय खास लोगों का नेता दिखने की रणनीति पर काम किया. आडवाणी को सर्वोपरि बनाने के लिए केवल भाजपा को ही नहीं बल्कि संघ को किनारे कर दिया. शायद कुलकर्णी और उनके कुनबे को उम्मीद थी संघ की छवि धोकर आडवाणी देश के सर्वमान्य नेता हो जाएंगे. इसलिए केवल आडवाणी पर ही सारा प्रचार का फोकस किया गया. भाजपा की गतिविधियों पर पैनी नजर रखनेवाले एक पत्रकार बताते हैं कांग्रेस के तीन रूपये किलो चावल देने के जवाब में भाजपा ने दो रूपये किलो चावल देने का वादा अपने घोषणापत्र में किया है. लेकिन पूरे देश में एक भी होर्डिंग नहीं लगी जिसमें यह बताया गया हो कि भाजपा सत्ता में आयी तो वह दो रूपये किलो चावल देगी. भाजपा का सारा प्रचार कमजोर नेता मजबूत नेता में ही उलझकर रह गया.

कुलकर्णी अगर आडवाणी को अकेला छोड़ देने का दुख जता रहे हैं तो उसका मकसद साफ है. वे यह स्वीकार नहीं करना चाहते कि आडवाणी के इस राजनीतिक पतन के लिए वे भी जि्म्मेदार हैं. अगर वे सब सीमाओं के परे जाकर आडवाणी के लिए रणनीति बना रहे थे और उसका पालन करवा रहे थे तो अब वे दोष किसी दूसरे पर क्यों लाद रहे हैं? कारण साफ है. दूसरा कोई आप पर अंगुली उठाये इसके पहले आप दूसरे पर अंगुली उठा दीजिए. दुर्भाग्य यह है कि अपनी कमियों को छिपाने के लिए आडवाणी खेमा जिस तरह से पूरी भाजपा और संघ को दोषी ठहरा रहा है उसका नुकसान आडवाणी के बचे-खुचे राजनीतिक कैरियर को ही होगा.  

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deepak on 09 June, 2009 00:43;53
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aadwaniji ne jaisa kiya vaisa hee is chunav me bhugta hai. atalji ke patrachar ko dekh unhone bjp ko kattatwadi chavi ka banaya aur yahi unhe le duba par kulkarni jaise logon ko aap kyon badhawa de rahe hain, kya koi santha-ganth ho gayi hai?
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