सामना का संपादकीयः शर्मनाक फिसड्डी बम
सामना के जिस संपादकीय में बाल ठाकरे ने "तुल्यबल हिन्दू आतंकवाद" की बात की हैं, विस्फोट वह पूरा संपादकीय संदर्भरूप में प्रकाशित कर रहा है.
"कुछ दिनों पहले ठाणे के गड़करी रंगायतन में विस्फोट हुआ. उस विस्फोट में चार-पांच लोग घायल हो गये. विस्फोट फिसड्डी निकला. उससे गड़करी रंगायतन के कागजी मुखौटे भी नहीं फटे. उस विस्फोट का फिसड्डीपन देखकर हमें पूरा विश्वास हो गया था कि यह काम किसी आतंकवादी संगठन का नहीं है. इस्लामी आतंकवादी इस तरह के फिसड्डी बम नहीं फोड़ा करते. जिस विस्फोट में सौ-पचास हिन्दुओं की जान न चली जाए वैसा विस्फोट तो कर ही नहीं सकते. बम के फिसड्डीपने को देखकर हम समझ गये थे कि यह काम किसी हिन्दू का है. अभी पुलिस के आतंक विरोधी दस्ते ने सनातन प्रभात और हिन्दू जनजागृति संगठन के होने का दावा करनेवाले दो युवकों को गिरफ्तार कर हमारी आशंका की पुष्टि की है. पुलिस का दावा है कि इन युवकों ने "आम्ही पाचपुते" नामक मराठी नाटक में हिन्दू देवी देवताओं के अपमान से क्षुब्ध होकर इस काम को अंजाम दिया था. इससे क्या हो गया? क्या हिन्दू देवी-देवताओं का अपमान करनेवाले भयभीत हो गये? उलटे इस तरह के फिसड्डी विस्फोट के कारण "आम्ही पाचपुते" जैसे सड़े हुए नाटक को मुफ्त का प्रचार मिल गया. उसे मराठी नाट्यरसिकों ने नकार दिया था. ऐसे काण्ड में जो प्रचार मिला है उससे लोगों में उत्कंठा बढ़ी है. इससे पहले इसी तरह के फिसड्डी बम पनवेल के एक सिनेमाघर और वाशी के विष्णुदास भावे नाट्यगुह में रखे गये थे. वे बम तो इतने फिसड्डी थे कि फूटे तक नहीं. इसके चलते हमारे हिन्दू रसिक जख्मी होने से बच गये. इसका श्रेय किसे दें? हिन्दू देवी देवताओं को या फिसड्डी बम को? ये सारी हरके मूर्खतापूर्ण और हास्यास्पद हैं.
यह एक कटुसत्य है कि हिन्दुस्थान में लगातार इस्लामी आतंकवाद में इजाफा हो रहा है. इस इस्लामी आतंकवाद से टक्कर लेने के लिए तुल्यबल हिन्दू आतंकवाद का निर्माण होना चाहिए. अगर हिन्दू समाज को अपना अस्तित्व बचाना है तो हिन्दू समाज के आत्मरक्षार्थ हिन्दू आत्मघाती दस्तों का गठन होना चाहिए. इतिहास साक्षी है कि मुगलों का आतंकवाद तभी थमा छत्रपति शिवराय की तलवार तडपी. शिवराय लड़े इसलिए हिन्दू बचे वरना सारे हिन्दुओं की सुन्नत हो जाती. स्वतंत्रता आंदोलन में हिन्दुत्व की धर्मध्वजा को लोकमान्य तिलक का स्वाभिमानी कंधा मिला. लोकमान्य तिलक के प्रज्वलित विचारों के चलते कांग्रेसी राजनीति में हिन्दुत्व के हित की अनदेखी करने का साहस कोई नहीं जुटा पाता था. आजादी के आंदोलन में छद्म सेकुलरवादियों ने मुस्लिम तुष्टीकरण का जो बीज बोया उससे उपजी बिषबेल ने मां भारती का बंटवारा कर दिया. मुसलमान मजहब के नाम पर पाकिस्तान ले गये. कुछ दिनों बाद हिन्दुओं के हिस्से में आये हिन्दुस्थान में फिर मुस्लिम तुष्टीकरण का दौर शुरू हो गया. मतों की लाचारी का खेल समझते ही मस्जिदों और मदरसों से फिर आवाज उठने लगी मांग कर लिया है पाकिस्तान, लड़कर लेंगे हिन्दुस्थान.
हमारे राजनेता पाकिस्तान की आवाम के लिए राहत पैकेज भेजते रहे और पाकिस्तानी कबायली भेजकर कश्मीर पर कब्जे का दुष्चक्र रचते रहे. हम दोस्ती का हाथ बढ़ाते रहे और वे हमारी सीमाओं में घुसपैठ करते रहे. हमारे प्रधानमंत्री दोस्ती का पैगाम लेकर लाहौर जाते हैं और वो कारगिल पर हमले के लिए सेना चढ़ा देते हैं. उनके आतंकवादी संसद पर हमला करते हैं. अक्षरधाम, रघुनाथ मंदिर, रामलला, संकटमोचन सब जगह खून बहाते हैं. दिवाली, होली, दशहरा हमारे हर त्यौहार पर आतंक का साया रहता है. इस्लामी आतंकवाद की लपलपाती जीभ हिन्दुओं के रक्त चाटती है और हमारे लोग उसका मुकाबला फिसड्डी बम से करने की सोचते हैं. बम भी कहां रखा? विष्णुदास भावे के गड़करी रंगायतन में. वहां हिन्दुओं का नहीं तो किसका खून बहता? जोधाबाई पर नाराज होते हो तो क्या हिन्दुओं का खून बहाओगे? जोधा अकबर की कहानी इतिहासकार या कहानीकार की कोरी कल्पना? क्या इसके लिए हिन्दुओं का खून बहाया जाना चाहिए?
अगर इस्लामी बम का मुकाबला करना है तो हिन्दू बम तैयार करो. हिन्दू जन जागृति समितिवालों ने ऐसा कोई बम तैयार किया होता जिसे देखकर इस्लामी बम का फ्यूज निकल जाता तो संस्था के लोगों का नाम क्रांतिकारियों की सूची में आता. लेकिन बम भी बनाया तो फिसड्डी जिसकी ताकत से किसी आतंकवादी की रूह नहीं कांपी. उल्टे हिन्दुत्व के निर्दोष और पाक साफ दामन पर आतंकवाद का दाग लग गया. हिन्दु बम की इस देश को जरूरत है. जिसे देखकर सच्चर बम बनानेवालों के होश फाख्ता हो जाएं. जब इस्लामी बम बनता है और हिन्दू बस्तियों में फटता है तो हिन्दुओं की जान लेता है. हिन्दू जनजागृति के युवकों ने लगता है उस इस्लामी बम से कुछ सीखा ही नहीं. तभी तो समितिवालों को अपना हाथ खड़ा करना पड़ा. वरना इस देश में कभी जैश लश्कर व हिजबुल को आपने सुना है कि किसी हमले में पकड़े गये अपने आतंकियों की जिम्मेदारी नकारते हों. वे जिम्मेदारी स्वीकार कर अपने आत्मघातियों को शहीद का दर्जा देते हैं. माना हमारे यहां शहीद नहीं लेकिन ऐसे फिसड्डी बम बनाकर हिन्दुत्व की प्रतिष्ठा को बट्टा तो मत लगाओ."
सामना, 18 जून 2008
Title :
Body
- बंगाल में सियासी सुनामी से आतंकित हैं वामपंथी
- जीएम फसलों पर जोरजबर्दस्ती
- संघ से डरने डराने वाले लोग
- नर्मदा के सौंदर्य पर जादू-टोने का अमावस
- उधर दौलत की बेटी के घर जश्न, इधर दलित की बेटी पर सितम
- जंतर मंतर पर लोकतंत्र जब्त
- रामदेव का राजनीतिक रंग
- वेदांता को विस्तार न दे सरकार
- माला तो माया की, पर मालामाल कौन नहीं?
- चंबल घाटी में लौट रहे हैं गिद्ध



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jai hind
jai hindu rashtra
jai maharashtra
इस पुरे लेख का आपके विस्फ़ोट पर देखना ओर वो भी बिना आपके राय के कुछ अबुझ सा लग रहा है। वैसै हमेशा से आतंक की बात करने वाले मराठा से भारतिय सभ्यता ओर तहजीब की अपेक्षा भी हम नही रखते, क्या बाला साहब अपने बेटे को पहला मानव बम बना कर उदाहरण रखेंगे।
सवार्थ ओर लोलुप राजनिति का सबसे बडा उदाहरण है ये शिव-सेना
जय भारती
जय हिन्द
जय हिन्दी
जिसे अपने ‘हिन्दुस्थान’ की चिन्ता है वे ऐसा अनर्गल प्रलाप नहीं कर सकते। कुछ अच्छा सोचने और करने की जरूरत है।
ऐसी प्रस्तुतियां मात्र संदर्भ रूप में होती है जिसे पूरा करना एक पत्रकार का अनिवार्य कर्म होता है. इसमें मेरी निजी सहमति-असहमति की कोई गुंजाईश नहीं है. हां, जब मैं इस संपादकीय पर अपने विचार लिखूंगा तो उसे आप बारूद पर पढ़ सकते हैं.
इसे यहां देने का मकसद सिर्फ रिसोर्स उपलब्ध कराना है, ताकि अगर कोई सामना के संपादकीय को पढ़कर राय व्यक्त करना चाहे तो उसे वह रिसोर्स उपलब्ध हो जिससे वह अपनी निष्पक्ष राय कायम कर सके.
कोई भी धर्म बम के दम पर न तो जी सकता है और न ही चल सकता है । जिस हिन्दू धर्म की दुहाई बाल ठाकरे देते हैं उसमें सहिष्णुता के सिवाय और कुछ भी नहीं है ।
वैसे भी ये लोग न तो हिन्दू हैं और न ही हिन्दू धर्म के हित चिन्तक । उसके रखवाले तो बिलकुल ही नहीं हैं । इनके संगी 6 दिसम्बर को हिन्दू शौर्य दिवस मानते हैं लेकिन जब 'बाबरी मस्जिद ढहाने की जिम्मेदारी लेने की बात आती है तो 'छोटे सरदार' सहित तमाम हिन्दुत्ववादी इंकार कर जिम्मेदारी लेने से इंकार कर देते हैं ।
कोई भी धर्म बम से नहीं, आत्म बल से और उस पर आचरण से चलता है ।
Sampadkiye unki apni rai hai , is-se desh ke jan-manas per koi farka nahin parega.
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