लोकतंत्र की लटों में उलझ गया नेपाल
नेपाल में तब तक कोई खास बदलाव आपको नजर नहीं आयेगा जब तक आप काठमाण्डू शहर के अंदर न पहुंच जाएं. वीरान नारायणहिति में तांक-झांक करने पर एक गार्ड दिख जाता है
नारायणहिति के सामने ही अमरीकी दूतावास है. वहां भी कोई खास चहल-पहल नहीं है. यदा-कदा वाईसीएल की मोटरसाईकिलों की झुंड में इधर से उधर जाते नौजवानों को छोड़ दें तो उस थियेटर में भी कोई खास गहमा-गहमी नजर नहीं आती जहां चुनकर आये 575 सदस्य बैठते हैं और जो फिलहाल सारी सरगर्मियों का केन्द्र बना हुआ है. इस थियेटर जो कि अब यहां की अस्थाई संसद है, में घण्टों विचार-विमर्श होता है लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकलता. नेपाल की राजनीति में कल क्या होगा किसी को पता नहीं. इसे बतानेवाला भी कोई नहीं है. ज्यादातर सांसद ऐसे हैं जो अपनी पार्टियों के सामान्य कार्यकर्ता थे. यह लोकतंत्र का चमत्कार है कि आज वे नेपाल में जनप्रतिनिधि के तौर पर भविष्य निर्धारण के महत्वपूर्ण काम में लगे हैं.
लेकिन यह भविष्य निर्धारण क्या होगा? सरकार कब गठित होगी? प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति कौन होगा? कौन-कौन पार्टियां सरकार में शामिल होंगी? इन प्रश्नों का सटीक उत्तर किसी के पास नहीं है. उनके पास भी नहीं जो इस पूरी कवायद के कर्णधार हैं. आप जिस सभासद या सांसद से बात करिए, वह यही कहेगा कि कुछ दिनों में मामला सुलझ जाएगा. किन्तु राजनीतिक स्थिति उतनी आसान नहीं है. माओवादी अपनी विचारधारा के अनुसार राष्ट्रपति शासन प्रणाली चाहते थे और पार्टी ने प्रचण्ड को राष्ट्रपति के उम्मीदवार के रूप में ही लड़ाया था. किन्तु बहुमत के सामने उनकी एक न चली. अंततः प्रधानमंत्री के पास सारे कार्यकारी अधिकार रहने और राष्ट्रपति के नाममात्र के प्रधान होने पर सहमति बनी तथा संविधान सभा ने इस आम सहमति को पारित भी कर दिया. हालांकि प्रचण्ड के रूख में बहुत बदलाव आया है और वे अब सधा हुआ बयान देते हैं लेकिन दूसरे दल उन पर विश्वास करने को तैयार नहीं हैं. माओवादी बाहर चाहे जो प्रचार करें लेकिन दिल से कोई भी पार्टी उनके साथ जाने के लिए तैयार नहीं है.
इस समय मुख्यतः तीन बातों पर नेपाल में गतिरोध बना हुआ है. पहला, राष्ट्रपति कौन होगा? दूसरा सरकार में कौन कौन से दल शामिल होंगे? और तीसरा सरकार के भाग्य का फैसला सामान्य बहुमत से हो या दो-तिहाई से.
पहली चुनौती राष्ट्रपति के चुनाव की है. राष्ट्रपति के चयन के बाद ही सरकार के गठन की प्रक्रिया आरंभ हो सकती है. बहुमत का दावा राष्ट्रपति के सामने पेश और वही नेता कोसरकार गठन के लिए आमंत्रित करेगा. संविधान सभा ने सेना की कमान राष्ट्रपति के हाथों में सौंप दी है. इस कारण भी माओवादियों की नजर में राष्ट्रपति पद महत्वपूर्ण हो गया है और वे हर हाल में राष्ट्रपति पद चाहते हैं. प्रधानमंत्री गिरिजा प्रसाद कोईराला भी राष्ट्रपति बनने की चाहत रखते हैं. अपनी यह इच्छा उन्होंने सभी दलों के प्रमुख नेताओं तक किसी न किसी रूप में पहुंचा दी है. उन्होंने अपना नाम प्रस्तावित भी करवाया लेकिन उनके समर्थन में कम स्वर हैं. केवल माओवादियों ने ही उन्हें राष्ट्रपति के रूप में अस्वीकार नहीं किया है बल्कि स्वयं उनकी ही पार्टी के शेरबहादुर देउबा, आचार्य नरहरि भी विरोध कर रहे हैं. एमाले भी गिरिजा बाबू की विरोधी है. मधेशी संगठन भी चुनाव में बड़ी ताकत के रूप में उभरे हैं और वे चाहते हैं कि किसी भी प्रकार से गिरिजा प्रसाद कोईराला को राष्ट्रपति नहीं बनने देना है. फिलहाल पेंच-दर-पेंच यह मामला उलझता ही जा रहा है.
दूसरा मुद्दा, सरकार में कौन-कौन शामिल होगा. इस प्रश्न पर अभी एक पक्ष की ही तस्वीर साफ है. सबसे ज्यादा स्थान मिलने के कारण सरकार के नेतृत्व का दावा माओवादियों का बनता है. इससे सभी सहमत हैं. इसलिए उनके द्वारा सरकार गठन को लेकर कोई विवाद नहीं है. लेकिन माओवादियों के साथ जाने में हर दल हिचक रहा है. एमाले के माधव नेपाल माओवादियों के साथ सरकार में शामिल होने को तैयार नहीं हैं. उनका कहना है कि "हमारी गलतियों से ही माओवादी इतनी संख्या में जीतकर आये हैं.अब हम वह गलती दोबारा दोहराने को तैयार नहीं हैं." पार्टी के दूसरे प्रमुख नेता केपी शर्मा ओली भी इसी पक्ष के हैं. जबकि वामदेव गौतम और खनाल का पक्ष अलग है. गौतम माओवादियों के साथ जाने के लिए तैयार हैं. खनाल की स्थिति बीचवाली है. उनके माओवादियों से अच्छे संबंध हैं पर वे अभी हां-ना के बीच तय नहीं कर पा रहे हैं. जाहिर है अगर निर्णय करने का वक्त आता है तो पार्टी में टूट की संभावना बन सकती है.इसी संभावित टूट को बचाने के लिए माधव नेपाल ने कहा है कि वे माओवादियों की सरकार का समर्थन करेंगे लेकिन उसमें उनकी भागीदारी नहीं होगी.
मधेशी जनाधिकार फोरम पहले ही दिन से स्पष्ट करके चल रहा है कि वे किसी भी सरकार में शामिल नहीं होंगे. सरकार को मुद्दों पर समर्थन देंगे. दूसरे मधेशी संगठनों के सामने समस्या है कि वे चाहकर भी सरकार में शामिल नहीं हो सकते. क्योंकि मधेश की मांग पूरा न होने की अवस्था में पूरी तराई में जैसा विरोध का माहौल खडा होगा उससे उनका राजनीतिक अंत हो सकता है.
तीसरी बात. नेपाल में माओवादियों और नेपाली कांग्रेस को छोड़कर सभी राजनीतिक पार्टियां यह चाहती हैं कि दो तिहाई बहुत का प्रावधान समाप्त हो जाए और सामान्य बहुमत को मान्यता मिले. ऐसा सोचने के पीछे कारण है. कांग्रेस पार्टी को लेकर दूसरे दलों में वितृष्णा का भाव है. उसकी ताकत बढ़े यह न ऐमाले चाहती है और न ही माओवादी और मधेशी पार्टियां. लेकिन एक संभावना उभर रही है कि कांग्रेस और माओवादियों में सहमति हो जाए. ऐसे में अन्य दल तो सरकार में सहभागिता शायद ही करें इसलए प्रबल संभावना यही दिखाई देती है कि नेपाल में माओवादियों और कांग्रेस की मिली-जुली सरकार बने. लेकिन इस प्रबल संभावना के मूल में वही अविश्वास है जिसके कारण अभी तक नेपाल किसी निर्णय पर नहीं पहुंच पाया है. कुल मिलाकर संसदीय लोकतंत्र की ओर कदम बढ़ाते नेपाल का राजनीतिक परिदृश्य बिल्कुल उलझा हुआ एवं नेपाल के भविष्य के लिए सहज ही चिंता पैदा करता है.(प्रप्र)
(अवधेश कुमार वरिष्ठ पत्रकार, टिप्पणीकार और आंदोलनों से जुड़े रहनेवाले सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता हैं.awadheshkum@gmail.com)
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