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इतिहास से आये ओबामा

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'कोई अश्वेत भी अमेरिका का राष्ट्रपति हो सकता है यह चालीस साल पहले तो क्या चार साल पहले भी नहीं सोचा जा सकता था. पर, इस बार होगा.' चुनाव प्रचार के दौरान अपने समर्थकों को भेजे ईमेल में खुद बराक ओबामा ने यह बात लिखी थी. डेनेवर में डेमोक्रेटिक पार्टी के अधिवेशन में भी उन्होंने यही घोषणा की थी. उनकी वह बात सही साबित हुई. जो चार साल पहले नहीं सोचा जा सकता था वह आज अमेरिका की सच्चाई है.

सन साठ में हुए केनेडी और निक्सन के बीच का चुनाव सभी जानते हैं. बहुत कम वोटों से केनेडी जीते पर उस जीत की असली सच्चाई थी- एक नया इतिहास. कहा जाता है कि अमेरिका का मतलब है वास्प.WASP (White anglo saxon protestent). कैनेडी कैथोलिक थे. शीत युद्ध के उस चरम पर केनेडी ने एक नये अमेरिका का वादा किया था. इस नये अमेरिका की रणनीति साफ थी जो दुश्मन के प्रति रक्षात्मक नहीं बल्कि आक्रामक होने जा रहा था. द्वितीय विश्वयुद्ध को १५ साल गुजर चुके थे. द्वितीय विश्वयुद्ध की भयावहता को अमेरिकी भूल नहीं पाये थे. साथ ही साथ इन पंद्रह वर्षों में अमेरिका अपनी शक्ति और समृद्धि के उस मुकाम पर था जहां मानव इतिहास में कोई राष्ट्र पहले पहुंच नहीं पाया था. वैभव का विस्तार आम अमेरिकी की पहुंच के भीतर नहीं तो करीब तो आ ही गयी थी. सवाल था उस वैभव पर लग सकनेवाले संभावित ग्रहण का, खतरों का. 

 

दूसरी बड़ी लड़ाई रूस और अमेरिकी दोनों ही खेमों ने साथ लड़ी और एक तरह से मिलकर जीती. फर्क सिर्फ यह था कि रूस समेत अधिकांश यूरोपी जापान और उस वक्त के समृद्ध देश तहस-नहस हो गये थे. लेकिन अमेरिकी उत्पादक मशीन न केवल साबूत बची रह गयी बल्कि युद्ध के दौरान और उसके बाद खूब फली-फूली और उन्नत होती रही. उस विनाश में अमेरिका के पास निर्माण के लिए माल था, बाजार और पूंजी थी जिसके निवेश और हासिल की गयी तकनीकि के बल पर अमेरिका अकूत ताकत का मालिक बन गया. लेकिन अमेरिका की शक्ति साधना निष्कंटक नहीं थी. रूस की अगुवाई में सर्वहारा की तानाशाही की तथाकथित मशीन के तहत कम से कम हथियारों और विनाश का सामर्थ््य एक नयी विचारधारा के पास भी थी जो पश्चिम की घोषित मुक्त बाजार की व्यवस्था से सीधे-सीधे विपरीत ध्रुव पर ही नहीं खड़ी थी बल्कि चुनौती दे रही थी. एशिया, अफ्रीका और लातिन अमेरिका के देश मुक्ति के बाद एक स्वप्न भी देख रहे थे. वाजिब भी था कि साम्राज्यवाद का जुआ उतारने के बाद समाधान साम्यवाद में ही दिखाई पड़ रहा था. दुनिया समृद्ध और वंचित में बंटी हुई थी.

 

अमेरिका वैभवशाली तो था लेकिन वह किसी वास्तविक या फिर काल्पनिक शत्रु से डरा हुआ था. इसे आप अमेरिका की नियति कह सकते हैं कि उसका दोस्त कोई हो न हो उनके दुश्मन जरूर रहते हैं. कहा भी जाता है कि अगर अमेरिका का कोई दुश्मन नहीं है तो वह अपना दुश्मन पैदा कर लेता है. अमेरिका समृद्ध था इसमें कोई शक नहीं लेकिन वह अपने अज्ञात शत्रु से निपटने के िलए लगातार बंकर भी बनाता जा रहा था था कि अगर कभी हमला होता है तो कहां छुपा जा सकता है. वह डर पारंपरिक बम, गोले या तलवार का नहीं बल्कि ज्यादा आधुनिक और संहारक हथियार परमाणु विकिरण का था. इस काल्पनिक डर से बचाव के उपाय भी काल्पनिक ही थे. ऐसे माहौल में केनेडी और निक्सन दो अलग-अलग संभावनाएं थीं. लेकिन निक्सन और केनेडी में कोई साम्य नहीं था. वे व्यक्तित्व और विचार दोनों ही तलों पर एक दूसरे से भिन्न थे. समानता थी तो सिर्फ यह कि दोनों ही युवा और उत्साही थे और दोनों ही बीसवीं सदी के अमेरिकी की उम्मीद की किरण थे. केनेडी कैथोलिक थे. अढ़तालीस साल पहले हुए इस चुनाव में कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट का मुद्दा उतना ही अहम था जितना आज ओबामा के समय में काले-गोरे का भेद. फिर भी, केनेडी नये अमेरिकी की जरूरत बनकर उभरे. जिन्होंने रेडियो पर बहस सुनी वे निक्सन के प्रभाव में आये और बहस को जिन्होंने टीवी पर देखा वे केनेडी के मुरीद हुए. क्या बिना टीवी के केनेडी की मोहकता वह ऐतिहासिक मुकाम पाती? उत्तर कठिन नहीं है.

 

आज की बात सब जानते हैं. इस बार भी इतिहास ने अपने आप को दोहराया है. अमेरिका जैसे मुल्क में संचार का माध्मय चुनने और उपलब्ध होने के बावजूद अगर इंटरनेट न होता तो ओबामा शायद डेमोक्रेटिक पार्टी की उम्मीदवारी ही न पाते. कम से कम तथ्य तो यही कह रहे हैं. ओबामा को प्रारंभिक समर्थन और मजबूत छोटी लेकिन विस्तृत जन समुदाय से मिली. लेकिन माध्यम ही सब कुछ नहीं था. यह माध्यम तो हिलेरी को भी उपलब्ध थे. और इस सबका का फायदा उन्हें ओबामा से ज्यादा होना चाहिए था क्योंकि उनके पास उनकी और बिल क्लिंटन की सामूहिक पहचान थी. फिर क्या हुआ?

 

जैसे ४८ साल पहले अमेरिका ने परंपरागत अलगाव और विभिन्नता से अलग हटकर तत्कालीन जरूरतों को वोट किया था वही इस बार भी उसने किया है. इस बीच के पचास सालों में दो पीढ़ियां बदल गयी हैं. यह बात दावे से कही जा सकती है कि अमेरिकी समाज में दूरियां घटी हैं. यह तो नहीं कह सकते कि सबकुछ बदल गया है लेकिन इतना दावा तो कर ही सकते हैं कि पुरानी खाईंया काफी हद तक पट गयी हैं. यह बात दूसरी है कि आर्थिक नीतियों के कारण नयी तरह की खाईंयों का भी निर्माण हुआ है. आतंकवाद के डर और गरीब हो जाने की चिंता ने अमेरिकी समाज को एक करने में मदद की है. पिछले कुछ सालों में अमेरिकी समाज में इंटरनेट की जैसी प्रभुता स्थापित हुई है उसने भी आम आदमी को सच्ची सूचनाओं के पास पहुंचने में मदद की है. इराक के मसले पर अमेरिकी मानस का विद्रोह इंटरनेट के बिना संभव नहीं था. सूचना तंत्र पर सरकार का एकाधिकार कम होता जा रहा है. 

 

अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में जो इतिहास लेखन हुआ है वह कोई सास बहु का सीरियल नहीं था, न ही कोई सोप ओपेरा. यह अमेरिकी राष्ट्रपति का चुनाव था जिसके परिणाम पूरी दुनिया पर दिखाई देगा. हम इस सच्चाई से इंकार नहीं कर सकते. 

(राजकुमार सिंह पिछले २० सालों से अमेरिका में रह रहे हैं और वहां कई प्रकार की सामाजिक, राजनीतिक गतिविधियों से जुड़े हुए हैं. rajsinh@hotmail.com)

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tulika ,bhumika singh on 28 November, 2008 22:58;41
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obama ki jeet america ke loktantra ke itihas me ek naye yug ki shuruaat hai aur is saccchaai ko koi bhi andekha nahi kar sakta.
best of luck to the great future of america.
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