सिंहासन पर गुरूजी
शिबू सोरेन के बारे में हमारी धारणा आमतौर पर ठीक नहीं है. शिबू सोरेन का नाम आते ही हमें झामुमो रिश्वत काण्ड, और शशिनाझ झा हत्याकाण्ड में शामिल एक ऐसे व्यक्ति की तस्वीर मन में उभरती है जो राजनीति का अपराधी होने का आभास देता है. लेकिन शिबू सोरेन के बारे में हमें किंचित यह पता नहीं है कि वे आदिवासियों के दिसाम गुरू हैं. ऐसा गुरू जो उनके हर भटकाव में उन्हें सही रास्ते पर आने की प्रेरणा देता है. एक आदिवासी लड़के का दिसाम गुरू हो जाने की कहानी जाने बिना न हम झारखण्ड आन्दोलन को समझ सकते हैं और न ही शिबू सोरेन को.
दुमका संथाल परगना का कमिश्नरी हेडक्वार्टर है। संथाल परगना के संथालों का लोकजीवन शिबू सोरेन से जुड़ी किवदन्तियों से अटा पडा है। ये किवदन्तियां ही शिबू सोरेन की पूंजी है, जिसके बूते शिबू सोरेन दिसाम गुरु कहलाते हैं। संथाल परगना के आदिवासियों के बीच उनकी पूजा होती है। शिबू सोरेन का इतना मान-सम्मान उनको चमत्कारिक व्यक्तित्व प्रदान करती हैं। उस वक्त उत्तर बिहार समेत देश के कई हिस्सों के छात्र और युवाओं के मन में जयप्रकाश नारायण की संपूर्ण क्रांति हिलोरे मार रही थी। इसी दौर में 1972 में बोकारो में बडे जनाधार वाले नेता बिनोद बिहारी महतो के साथ मिलकर शिबू सोरेन ने झारखंड मुक्ति मोर्चा का गठन कर लिया और निकल गए निपट अंधेरे में जी रहे संताल परगना के संतालों के बीच रोशनी फैलाने।
ये दीगर है कि वक्त के साथ साथ शिबू सोरेन की छवि को करारा झटका भी लगता रहा। इनमें झारखंड बनाने का विरोध करते रहे बिहार की लालू यादव की सरकार में शामिल होना प्रमुख है। जिस दौर में लालू की अल्पमत सरकार को बहुमत में तब्दील करने के लिए झाझुमो ने बिहार सरकार में शामिल होने का फैसला लिया था और भरोसेमंद सूरज मंडल को बिहार का उपमुख्यमंत्री बनवाया तो लोग एकबारगी समझ बैठे कि झारखंड आंदोलन फिर से बिक गया। इससे पहले 1963 में राजा जयपाल सिंह की झारखंड पार्टी सरकार में शामिल होने की लालच में कांग्रेस पार्टी में विलय कर चुकी थी। लेकिन झारखंड मुक्ति मोर्चा का वजूद बचा रहा। फिर दौर आया नरसिंह राव की सरकार को घूस लेकर बचाने का। तब सरकार बचाने के एवज में तीन झाझुमो सांसदो के बैंक खातों में रकम के भुगतान और दक्षिण दिल्ली के पाँश इलाके में फ्लैट्स की बात सामने आई और दिसाम गुरु पर खुद अपनी दिशा से भटक जाने का इल्जाम लगा। हालांकि तब शिबू सोरेन इस संवाददाता से साजिश में फंसने की बात कही थी और मसले को गैर आदिवासियों द्वारा आदिवासियों को बेवकूफ बनाने की शाश्वत प्रक्रिया का हवाला देते हुए कहा था, नरसिंह राव की सरकार बचाने के लिए तो कई को घूस दिया गया लेकिन सिर्फ झाझुमो सांसदों के खाता और सौदे का ब्यौरा सामने आया। लेकिन शिबू सोरेन की ये दलील उस वक्त बेमानी साबित हुई जब सीबीआई की जांच में वो अपने सचिव शशिनाथ झा की हत्या में शामिल बताए गए। सांसद घूस कांड से छवि पर लगे दाग का ही नतीजा रहा कि शिबू सोरेन अपने अभेद्य दुर्ग दुमका लोकसभा से चुनाव हार गए।
हार से डगमगाए आत्मविश्वास का नतीजा रहा कि शिबू सोरेन ने झारखंड की राजनीति में बीजेपी को वाकओवर देते हुए बीजेपी के समर्थन से राज्यसभा में पहुंच गए। हालांकि वाजपेयी सरकार के समय चला बीजेपी का दांव शिबू सोरेन को जल्द ही समझ में आ गया और राज्यसभा सदस्य रहते हुए,दुमका के खोये जमीन को हासिल करने के लिए लोकसभा चुनाव लड़ा और जीत गए। फिर यूपीए में शामिल होकर मनमोहन सरकार में कोयला मंत्री बने। मंत्री की कुर्सी थामते और सफलता की मुकाम तय करते वक्त परिवार के खातिर पुराने साथियों को मझधार में छोडना जैसे आरोप भी शिबू सोरेन पर लगा। झामुमो के कई भरोसेमंद छिटक गए। शिबू सोरेन पर कार्यकर्त्ताओं से ज्यादा पत्नी रूपी सोरेन और तीन बेटे दुर्गा,हेमंत और बसंत सोरेन को तवज्जो देने का इल्जाम लगा। यही वजह रही कि मौजूदा ही विधानसभा के शुरुआत में जब झारखंड में पहली गैर बीजेपी सरकार बनी शिबू सोरेन को मुख्यमंत्री बनाया गया तो स्टीफन मरांडी जैसे पुराने दोस्तों ने साथ नही दिया। वो विश्वास मत हासिल नही कर पाए। आठ दिनों में ही उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी छो़डनी पडी। अब मुश्किल से ये कुर्सी हाथ लगी है। कई संगीन आरोपों के बीच कई बार लगा कि आदिवासियों के दिसाम गुरु खुद में खो गए। लेकिन वक्त ने शिबू सोरेन को झारखंड के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बिठाकर खंडित व्यक्तित्व को बहाल करने का एक और मौका दिया है। देखना होगा कि अस्सी के दशक में आदिवासियों के सिर माथे चढकर दिसाम गुरु बने झारखंड की मुख्यमंत्री उम्मीदों पर खरे उतरते हैं अथवा नहीं। या फिर झारखंड की भोली जनता को कोई नए दिसाम गुरु की जरुरत है।
(आलोक कुमार वरिष्ठ टीवी पत्रकार हैं.)
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