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समाजवाद के जयचंद मीरजाफर

image लोहिया के चालीस साल के गैरकांग्रेसवाद को अमर सिंह ने कांग्रेस में ही समाहित करवा दिया.

भारतीय राजनीति के कुछ सबसे छोटे सौदेबाज और दलाल मनमोहन सिंह की सरकार बचाने में लग गये थे. सरकार बच भी गयी क्योंकि जैसा और जितना देशी-विदेशी धन इस सरकार को बचाये रखने के लिए दिल्ली और प्रदेश की राजधानियों में खुलेआम घूमा है उससे दस बीस वोटों का इंतजाम हो जाना कोई बड़ी बात नहीं थी.

कांग्रेस में यों भी बहूमत की खरीद बिक्री करनेवाले उस्तादों की कभी कमी नहीं रही है. फिर उनकी मदद के लिए अमर सिंह जैसा आदमी लग गया था. अमर सिंह का राजनैतिक कैरियर जनता में काम और जनता के विश्वास और समर्थन से नहीं बल्कि उद्योग व्यापार में राजनेताओं की और राजनीति में उद्योग व्यापार की दलाली करके बनाया है. दिल्ली में ऐसा कोई राजनीतिक और सत्ता का गलियारा नहीं है जहां अमर सिंह की पहुंच और जरिया न हो. जो घोषित रूप से उनके राजनीतिक विरोधी माने जाते हैं वहां भी अमर सिंह बेधड़क जाकर अपना काम करवा लेते हैं.

पैसे से चलनेवाला लोकतंत्र जैसा अमर सिंह ने साधा है उनके पहले प्रमोद महाजन ने साधा था. सब जानते हैं कि सन 98 में चंद्राबाबू को वामपंथियों और जनता दल के चंगुल से निकालकर अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार बनाने में प्रमोद महाजन ही तैयार करके ले आये थे. सन 1998 से 2004 तक चंद्राबाबू ने सरकार से बाहर रहकर उसका जो दोहन किया वह केन्द्र सरकार के पचास-साठ साल के इतिहास में अनोखा और अद्भुद माना जाएगा. वे जिसे चाहते उसे किसी भी पद पर नियुक्त करवाते थे और राज्य में किसी भी योजना के लिए पैसे ले जाते थे. वे विश्वबैंक के पोस्टर ब्वाय थे और वर्षों तक मुख्यमंत्री नंबर एक बने रहे. उनके जैसा पौव्वा तो यूपीए सरकार में वामपंथियों का भी नहीं रहा. वामपंथी सिद्धांत के नाम पर हल्ला मचाते रहे और बदनाम होते रहे जबकि चंद्राबाबू चुपचाप अपना काम कर जाते थे. उनके पास कोई सैद्धांतिक आग्रह नहीं था. प्रमोद महाजन और अटल बिहारी वाजपेयी ने उन्हें ऐसा साध रखा था कि छह साल में चंद्राबाबू को कोई शिकायत नहीं हुई. आखिर में जनता ने ही दोनों सरकार को जमीन दिखाई.

सबसे घातक तथ्य यह है कि लोकतंत्र की राजनीति के सूत्र अमरीका के हाथ में होंगे और भारत के राजनेता उसके हितों के कठपुतले. यह काम जयचंद और मीरजाफर समाजवादियों के नाम पर करेंगे.

प्रमोद महाजन की दलाली में फिर भी नफासत थी. फिर वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा में रहे थे इसलिए सैद्धांतिक न सही वैचारिक आग्रह तो थे ही. भले ही यह आग्रह दिखने का रहा हो लेकिन अंबानी घराने से लेकर अटल आडवाणी के रसोईं तक उनके तार बिछे हुए थे. वे सेवा से बड़े लोगों की मेहरबानी कमाते थे और इस सेवा में अपना तन-मन-धन सब लगा देते थे. राजनीतिक उपकार करने में भी वे हमेशा यह ध्यान रखते थे कि असामी भी खुश हो जाए और नाहक किसी कि बदनामी भी न हो. इसलिए आखिर तक उनकी राजनीति भी सम्मान से चलती रही और दलाली भी. फिर भी आप देखिए कि उनके छोटे भाई ने ही उनके प्राण हर लिये. उनकी इस निर्मम हत्या में जो कारक बना उसी औरत और पैसे को राजनीति में चढ़ाकर राजनीति में प्रमोद महाजन अपना काम करवाते रहे थे. अपने यहां सदियों के अनुभव से यह कहावत निकली है कि जो जैसा करता है वैसा भरता है. फिर भी इतना तो कहना ही होगा कि प्रमोद महाजन न होते तो अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार न बनती और बन भी जाती तो इतने मजे से चलती नहीं. प्रमोद महाजन ने सौदा ठीक किया था.

क्या अगले महीने अगस्त के क्रांतिकारी महीने में हम गर्व से कह सकेंगे कि जो सरकार हमारे साथ है उसे बचाने में अमर सिंह का रोल है उनकी महिमा से सरकार ने अमरीका से आणविक समझौता भी कर लिया. सिद्धांत और राजनीति धरे रह गये और एक दलाल ने सौदा करके सरकार और समझौते दोनों को बचा लिया. शायद अब अमर सिंह का करिश्मा प्रमोद महाजन के उस करिश्मे से भी बड़ा होगा जिसमें उन्होंने चंद्राबाबू को साध रखा था. अमर सिंह ने केवल मुलायम सिंह को ही तैयार नहीं किया. एक महीने तक तो वे राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक के सबसे बड़े कार्यकर्ता बन ही गये थे. न सिर्फ भारत के उद्योग व्यापार जगत के लोग उनके एहसानमंद हुए अमेरिका में बुश की सेवा में लगे व्यापारी भी उनसे खुश हो गये हैं. आखिर इन दो देशों के व्यापारियों के बीच सौदा मनमोहन सिंह ने पटाया था और वामपंथी उसकी राह में रोड़ा बन रहे थे.

वह तो अमर सिंह हैं जिन्होंने वामपंथियों को हाशिये पर सरकाकर उन्हें सरकार के मामले में अप्रासंगिक और निरर्थक बनाने का करिश्मा कर दिखाया. इतने वर्षों से वामपंथियों के आशिर्वाद से समाजवादी बने रहकर टिके रहनेवाले मुलायम सिंह को अमर सिंह ने कांग्रेस में लाकर बैठा दिया. राममनोहर लोहिया का गैर-कांग्रेसवाद चालीस साल चलकर उसी कांग्रेस में विलीन हो गया. क्या यही गैर-कांग्रेसवाद की तार्किक परिणिति है? (प्रप्र)  

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Suresh Chiplunkar on 24 July, 2008 10:55;41
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अमर सिंह तो इस बड़े खेल के छोटे से दलाल मात्र हैं, असली खेल तो अम्बानियों का है
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tulsi singh bisht on 24 July, 2008 12:24;06
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प्रभाष जी द्वारा अमर सिंह को घुमा-फिरा कर समाजवाद के मीरजाफर जयचंद कहना बिल्कुल ठीक बैठता है। साथ ही दलाली करना वाला तब तक दलाली करता है जब तक उसका फायदा नहीं होता और साथ ही किसी का वफादार भी नहीं होता उसे बस अपना पैसा कमाना और दूसरे को भी लाभ देना होता है जब तक ज्यादा लाभ तब तक उसके साथ फिर पाला चेंज जैसे मुलायम को कांग्रेस से मिला दिया। पहले कांग्रेस की बुराई अब उसके साथ। इसी बात से साफ पता चल जाता है कैसे दलाली करनी है। बाकी प्रभाष जी द्वारा लेख की जितनी तरीफ की जाए कम है।
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marwah t. on 24 July, 2008 21:46;12
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Aeham baat ye he ki jo kuch tamasha hua vo agar congress ki jagah bjp hoti to bhi yahi pariniti hoti tab amar singh congress ke bajai bjp ki god main baitha hota,AAJ SATTA KI BHOOK ITNI JABARDAST HE KI GERAT BHI NAHI BACHEE HE,LEKIN ASLI JIMMEDAR HUM KHUD HAIN,HAMARI KHUDGARJI VA APNI KHUDMARJI KI KHATIR SAMUCHI SIYASAT KO VAISHYA KA KOTHA BANA KAR RAKH DIYA HE jahan koi bhi aira gera bhari ho jata he,jis desh ki adhikansh janta chand rupyon aur daru ki ek bottel ki khatir bik jati he to neta kaise honge ? aaj ye log neta nahi vaipari hain aur vaiapar main to yahi hota he agar janta ka jamir va daman saaf hota to amar singh ki bisaat he kya thi
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amar on 25 July, 2008 11:34;17
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पहचान कौन

मेरी सबसे बड़ी खूबी ही यह है कि मौका आने पर मैं चूकता नहीं। मेरे एक पूर्व संपादक का जन्मदिन आया तो मैंने बहुत सोचा कि उन्हें क्या भेंट करूं। अंत में मैंने उन्हें एक कार देना तय किया। आखिर जो कुछ उन्होंने मेरे लिए किया था उसे मैं कैसे भुला दूं। वह भी उऩ दिनों जब मैं उनके अखबार के अनेक लोगों के क्रोध का निशाना बना हुआ था। सबकी नाराजगी जानते-समझते हुए भी उन्होंने मेरा साथ दिया। बाबरी मसजिद प्रकरण में जब गोली चली तो मैंने मरने वालों की संख्या खूब बढ़ा-चढ़ा कर लिखी। उन्होंने मेरा साथ दिया। फिर जब वह मसजिद गिरा दी गई तब तो वे स्वयं ही कारसेवकों के विरुद्ध लिख रहे थे। इसके बावजूद उन्होंने मुझे कारसेवकों का पक्ष लेने से कभी नहीं रोका। मैं उनका आभारी हूं।

उनके हर जन्मदिन पर मैं कुछ न कुछ करना चाहता हूं। इस बार मैंने तीन किलो का पिस्ते का केक बनारस से हवाई जहाज से इस खास मौके के लिए मंगवाया। कुछ और मिठाइयां भी। लेकिन इतने भर से क्या होता है। तब मैंने एक स्विफ्ट डिज़ायर खरीद कर उन्हें भेंट करने का मन बनाया। आखिरकार उन लोगों के बारे में आपको सोचना ही चाहिए जो अब पहले जैसी हालत में नहीं रह गए। मेरे पास तो पहले भी खूब था और अब तो और ज्यादा है। एक-आध कार का खर्च उठाना कोई बड़ी बात नहीं रह गई। वह भी उऩके लिए जिनकी दी छूट की वजह से मैं आज यहां तक पहुंचा। उन्हें मुझसे कार लेनी चाहिए थी या नहीं, यह वही जानें। मेरी समस्या तो यह है कि मेरे मौजूदा मालिक या संपादक जो इन दिनों मेरी खूब मदद कर रहे हैं, जब उन्हें कुछ देना पड़ेगा तो मैं क्या दूंगा।

yeh patrkarita ke amar singh hai
www.gossipadda.com
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vijai upadhya on 25 July, 2008 14:02;30
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kahi aap banaras ke hemant sharma ki taraf ishara to nahi ker rahe .inki bhabhi der der ki thokre kha rahi hai mahila aayog ke dakhal per case chala aur bhai transfer posting ki caroro ki kali kamai car deker
prabhash josi ko bhi dhanai ker rahe hai.
jai amar sing jai joshi ji
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anam on 25 July, 2008 14:06;23
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दाता हमेशा बड़ा होता है। लेकिन ये दाता बहुत बड़ा है। यूपी में ये झोलाछाप पत्रकार अरसे पहले से नहीं रहे। वहां की सरकारों ने इन्हें सर-आंखों पर बिठाए रखा। यही नहीं, यूपी में घूमने-फिरने के लिए इन्हें हमेशा लालबत्ती वाली गाड़ी पर बिठाया। अब ये सज्जन टीवी नंबर वन में नंबर तीन पर विराजमान हैं। पहले तो नंबर दो थे... लेकिन अब तीन नंबर के बना दिए गए हैं। सरकार हिलाने वाले अखबार में काम कर इन्होंने अपनी तरक्की का कोई मौका नहीं गंवाया। और ये सब उस संपादक की वजह से ही संभव हुआ जिन्होंने अपने अखबार में जरूरत से ज्यादा लोगों को आजादी दी। यही वजह है कि जो हाल लोकतंत्र का है वही अब इस अखबार का। मौजूदा जीवित पत्रकारों में कार पाने वाले ये संपादक सबसे ऊंचे आंके जाते हैं। क्या और पहचान बताने की जरूरत है।
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harishchandr on 25 July, 2008 14:47;24
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natikta ka labada pahanker kai ghum rahe hai.
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suresh singh on 25 July, 2008 22:28;22
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car apne paise se nahi bjp ke ek sansad aur ek ias afsar ke paise ki hai.
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धुरंधर on 29 July, 2008 11:08;20
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अगर वही बनारसी पत्रकार हैं तो उनके पिता को अपने बचवा का आत्मकथा लिखनी चाहिए, आखिर उन्होंने तमाम महापुरूषों की आत्मकथाएं लिखी हैं जो चर्चित भी खूब हुई। उनका बचवा कमाल का है। उसकी आत्मकथा से प्रेरणा लेकर तमाम पौध तैयार होगी। कलयुग में ऐसी पौध खूब फल-फूल रही है। जय हो शर्मा जी।
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धुरंधर on 30 July, 2008 11:33;30
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प्रभाष जी की पत्रकारिता का कोई जवाब नहीं। इसमें कोई शक नहीं। लेकिन उनकी बात आज तक समझ में नहीं आई कि चंद्रशेखर के प्रधानमंत्री बनने पर वह उनको चिरकुट प्रधानमंत्री कहते थे, लेकिन बाद में पता नहीं क्यों वह चंद्रशेखर से फेवीकोल की तरह चिपक गए। लेकिन चंद्रशेखर की चला-चली की बेला के ठीक पहले प्रभाष जी ने फिर चंद्रशेखर से मुंह मोड़ लिया। प्रभाष जी इसका खुलासा करें तो वह बेशक रोचक होगा।
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image प्रभाष जोशी वरिष्ठ पत्रकार प्रभाष जोशी अंग्रेजी पत्रकारिता से हिन्दी में आये. जनसत्ता को शिखर पर ले जाने वाले संपादक के रूप में प्रभाष जी का काम हिन्दी पत्रकारिता में मीलपत्थर है. पत्रकारिता के जाने-माने हस्ताक्षर जो अब हमारे बीच नहीं है.
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