समाजवाद के जयचंद मीरजाफर
भारतीय राजनीति के कुछ सबसे छोटे सौदेबाज और दलाल मनमोहन सिंह की सरकार बचाने में लग गये थे. सरकार बच भी गयी क्योंकि जैसा और जितना देशी-विदेशी धन इस सरकार को बचाये रखने के लिए दिल्ली और प्रदेश की राजधानियों में खुलेआम घूमा है उससे दस बीस वोटों का इंतजाम हो जाना कोई बड़ी बात नहीं थी.
कांग्रेस में यों भी बहूमत की खरीद बिक्री करनेवाले उस्तादों की कभी कमी नहीं रही है. फिर उनकी मदद के लिए अमर सिंह जैसा आदमी लग गया था. अमर सिंह का राजनैतिक कैरियर जनता में काम और जनता के विश्वास और समर्थन से नहीं बल्कि उद्योग व्यापार में राजनेताओं की और राजनीति में उद्योग व्यापार की दलाली करके बनाया है. दिल्ली में ऐसा कोई राजनीतिक और सत्ता का गलियारा नहीं है जहां अमर सिंह की पहुंच और जरिया न हो. जो घोषित रूप से उनके राजनीतिक विरोधी माने जाते हैं वहां भी अमर सिंह बेधड़क जाकर अपना काम करवा लेते हैं.
पैसे से चलनेवाला लोकतंत्र जैसा अमर सिंह ने साधा है उनके पहले प्रमोद महाजन ने साधा था. सब जानते हैं कि सन 98 में चंद्राबाबू को वामपंथियों और जनता दल के चंगुल से निकालकर अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार बनाने में प्रमोद महाजन ही तैयार करके ले आये थे. सन 1998 से 2004 तक चंद्राबाबू ने सरकार से बाहर रहकर उसका जो दोहन किया वह केन्द्र सरकार के पचास-साठ साल के इतिहास में अनोखा और अद्भुद माना जाएगा. वे जिसे चाहते उसे किसी भी पद पर नियुक्त करवाते थे और राज्य में किसी भी योजना के लिए पैसे ले जाते थे. वे विश्वबैंक के पोस्टर ब्वाय थे और वर्षों तक मुख्यमंत्री नंबर एक बने रहे. उनके जैसा पौव्वा तो यूपीए सरकार में वामपंथियों का भी नहीं रहा. वामपंथी सिद्धांत के नाम पर हल्ला मचाते रहे और बदनाम होते रहे जबकि चंद्राबाबू चुपचाप अपना काम कर जाते थे. उनके पास कोई सैद्धांतिक आग्रह नहीं था. प्रमोद महाजन और अटल बिहारी वाजपेयी ने उन्हें ऐसा साध रखा था कि छह साल में चंद्राबाबू को कोई शिकायत नहीं हुई. आखिर में जनता ने ही दोनों सरकार को जमीन दिखाई.
सबसे घातक तथ्य यह है कि लोकतंत्र की राजनीति के सूत्र अमरीका के हाथ में होंगे और भारत के राजनेता उसके हितों के कठपुतले. यह काम जयचंद और मीरजाफर समाजवादियों के नाम पर करेंगे.
प्रमोद महाजन की दलाली में फिर भी नफासत थी. फिर वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा में रहे थे इसलिए सैद्धांतिक न सही वैचारिक आग्रह तो थे ही. भले ही यह आग्रह दिखने का रहा हो लेकिन अंबानी घराने से लेकर अटल आडवाणी के रसोईं तक उनके तार बिछे हुए थे. वे सेवा से बड़े लोगों की मेहरबानी कमाते थे और इस सेवा में अपना तन-मन-धन सब लगा देते थे. राजनीतिक उपकार करने में भी वे हमेशा यह ध्यान रखते थे कि असामी भी खुश हो जाए और नाहक किसी कि बदनामी भी न हो. इसलिए आखिर तक उनकी राजनीति भी सम्मान से चलती रही और दलाली भी. फिर भी आप देखिए कि उनके छोटे भाई ने ही उनके प्राण हर लिये. उनकी इस निर्मम हत्या में जो कारक बना उसी औरत और पैसे को राजनीति में चढ़ाकर राजनीति में प्रमोद महाजन अपना काम करवाते रहे थे. अपने यहां सदियों के अनुभव से यह कहावत निकली है कि जो जैसा करता है वैसा भरता है. फिर भी इतना तो कहना ही होगा कि प्रमोद महाजन न होते तो अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार न बनती और बन भी जाती तो इतने मजे से चलती नहीं. प्रमोद महाजन ने सौदा ठीक किया था.
क्या अगले महीने अगस्त के क्रांतिकारी महीने में हम गर्व से कह सकेंगे कि जो सरकार हमारे साथ है उसे बचाने में अमर सिंह का रोल है उनकी महिमा से सरकार ने अमरीका से आणविक समझौता भी कर लिया. सिद्धांत और राजनीति धरे रह गये और एक दलाल ने सौदा करके सरकार और समझौते दोनों को बचा लिया. शायद अब अमर सिंह का करिश्मा प्रमोद महाजन के उस करिश्मे से भी बड़ा होगा जिसमें उन्होंने चंद्राबाबू को साध रखा था. अमर सिंह ने केवल मुलायम सिंह को ही तैयार नहीं किया. एक महीने तक तो वे राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक के सबसे बड़े कार्यकर्ता बन ही गये थे. न सिर्फ भारत के उद्योग व्यापार जगत के लोग उनके एहसानमंद हुए अमेरिका में बुश की सेवा में लगे व्यापारी भी उनसे खुश हो गये हैं. आखिर इन दो देशों के व्यापारियों के बीच सौदा मनमोहन सिंह ने पटाया था और वामपंथी उसकी राह में रोड़ा बन रहे थे.
वह तो अमर सिंह हैं जिन्होंने वामपंथियों को हाशिये पर सरकाकर उन्हें सरकार के मामले में अप्रासंगिक और निरर्थक बनाने का करिश्मा कर दिखाया. इतने वर्षों से वामपंथियों के आशिर्वाद से समाजवादी बने रहकर टिके रहनेवाले मुलायम सिंह को अमर सिंह ने कांग्रेस में लाकर बैठा दिया. राममनोहर लोहिया का गैर-कांग्रेसवाद चालीस साल चलकर उसी कांग्रेस में विलीन हो गया. क्या यही गैर-कांग्रेसवाद की तार्किक परिणिति है? (प्रप्र)
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मेरी सबसे बड़ी खूबी ही यह है कि मौका आने पर मैं चूकता नहीं। मेरे एक पूर्व संपादक का जन्मदिन आया तो मैंने बहुत सोचा कि उन्हें क्या भेंट करूं। अंत में मैंने उन्हें एक कार देना तय किया। आखिर जो कुछ उन्होंने मेरे लिए किया था उसे मैं कैसे भुला दूं। वह भी उऩ दिनों जब मैं उनके अखबार के अनेक लोगों के क्रोध का निशाना बना हुआ था। सबकी नाराजगी जानते-समझते हुए भी उन्होंने मेरा साथ दिया। बाबरी मसजिद प्रकरण में जब गोली चली तो मैंने मरने वालों की संख्या खूब बढ़ा-चढ़ा कर लिखी। उन्होंने मेरा साथ दिया। फिर जब वह मसजिद गिरा दी गई तब तो वे स्वयं ही कारसेवकों के विरुद्ध लिख रहे थे। इसके बावजूद उन्होंने मुझे कारसेवकों का पक्ष लेने से कभी नहीं रोका। मैं उनका आभारी हूं।
उनके हर जन्मदिन पर मैं कुछ न कुछ करना चाहता हूं। इस बार मैंने तीन किलो का पिस्ते का केक बनारस से हवाई जहाज से इस खास मौके के लिए मंगवाया। कुछ और मिठाइयां भी। लेकिन इतने भर से क्या होता है। तब मैंने एक स्विफ्ट डिज़ायर खरीद कर उन्हें भेंट करने का मन बनाया। आखिरकार उन लोगों के बारे में आपको सोचना ही चाहिए जो अब पहले जैसी हालत में नहीं रह गए। मेरे पास तो पहले भी खूब था और अब तो और ज्यादा है। एक-आध कार का खर्च उठाना कोई बड़ी बात नहीं रह गई। वह भी उऩके लिए जिनकी दी छूट की वजह से मैं आज यहां तक पहुंचा। उन्हें मुझसे कार लेनी चाहिए थी या नहीं, यह वही जानें। मेरी समस्या तो यह है कि मेरे मौजूदा मालिक या संपादक जो इन दिनों मेरी खूब मदद कर रहे हैं, जब उन्हें कुछ देना पड़ेगा तो मैं क्या दूंगा।
yeh patrkarita ke amar singh hai
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prabhash josi ko bhi dhanai ker rahe hai.
jai amar sing jai joshi ji
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