आम आदमी की राजनीति के शिखर पुरुष थे राजशेखर
राजशेखर रेड्डी की मौत की खबर ही न जाने कितनों के लिए मौत का कारण बन गयी. उधर अभी रेड्डी को दफनाया भी नहीं गया था कि उनके जाने के गम में 122 लोगों ने प्राण त्याग दिये. आंध्र प्रदेश की स्थानीय मीडिया के मुताबिक कुछ लोगों की मौत सदमें से हुई तो कुछ की मौत का कारण रेड्डी की मौत से आहत होकर आत्महत्या बताया जा रहा है। किसी ने गोदावरी में छलांग लगा दी तो किसी ने अपने प्रिय नेता की मौत के गम में खुद को आग के हवाले कर लिया। राज्य के 23 जिलों में से 19 जिलों से लोगों के मरने की ख़बरे मिली हैं। अंतत: राजशेखर रेड्डी के पुत्र वाई.एस. जगमोहन रेड्डी को लोगों से संयम बनाये रखने की अपील करनी पड़ी।
उनकी मृत्यु से आहत एक युवा ने अपने सुसाइड नोट में लिखा कि `रेड्डी ने अपना जीवन लोगों के लिए समर्पित कर दिया, मैं उनके लिए अपना जीवन समर्पित कर रहा हूं।´ भावनाओं का ऐसा सैलाब शायद ही पहले कभी देखने को मिला हो। आज के दौर में जब राजनीति को हेय दृष्टि से देखा जाता है, ऐसे में रेड्डी राजनीतिज्ञों की फेहरिस्त में आशा की एक किरण थे, जिनका जमीन से सीधा सरोकार था। राजशेखर रेड्डी क्या थे इसे सोपानस्टेप के संपादक और वरिष्ठ आर्थिक पत्रकार के.ए. बदरीनाथ (जो खुद भी मूलत: आंध्र के हैं) ने कहा कि- "आंध्र ने बहुत कुछ खो दिया है और यह कभी न भरने वाली क्षति है।" केवल आंध्र से जुड़े लोगों को ही राजशेखर के जाने का दुख है ऐसा नहीं है. उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद फिर बनारस में जिन मित्रों से फोन पर बात हुई तो वहां से भी संवेदनाओं की सीलन का अहसास हुआ। ऐसे में राजशेखर रेड्डी की लोकप्रियता का अंदाजा लगाया जा सकता है। रेड्डी ने आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री एन.टी. रामाराव की लोकप्रियता के सारे रिकार्ड तोड़ दिये हैं. एनटीआर आंध्र के निर्विवाद नेता थे जिन्होंने आंध्र प्रदेश की राजनीति को एक नयी पहचान दी और राज्य की राजनीति करते हुए भी उनकी छवि राष्ट्रीय नेता की थी. लेकिन एक प्रादेशिक नेता होते हुए भी राजशेखर रेड्डी की छवि वस्तुत: एक राष्ट्र नेता की थी, यह उनके जाने के बाद सबको अहसास हो रहा है।
आंध्र प्रदेश आम तौर पर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का गढ़ रहा है। लेकिन सन् 1982 में फिल्म अभिनेता रहे एन.टी. रामाराव ने तेलुगुदेश पार्टी जब नींव रखी तो राज्य में राजीनीति के सारे समीकरण बदल गए और कांग्रेस का जनाधार खिसका ही नहीं, बल्कि खत्म सा हो गया था। एन.टी. रामाराव के निधन के बाद उनके दामाद चंद्रबाबू नायडू ने तेलुगुदेशम की राजनीतिक विरासत को संभाला और प्रदेश के मुख्यमंत्री बन गए। लेकिन 2004 में तेलुगुदेशम का जनाधार खिसक कर वापस कांग्रेस के पाले में आया तो इसका श्रेय वाई.एस. राजशेखर रेड्डी को दिया जाता है। रेड्डी ने 1400 किलोमीटर की पदयात्रा की, जिससे राज्य की जनता और स्थानीय एवं ग्रामीण समस्याओं उनका सीधा साक्षात्कार हुआ। जब वे मुख्यमंत्री बने तो उन समस्याओं के निराकरण के लिए वे कमर कस चुके थे। करीब 22 सालों के बाद प्रदेश की सत्ता में वापस लौटी कांग्रेस सरकार के समक्ष राज्य में जारी किसान आत्महत्याओं को रोकने की चुनौती थी। बहरहाल रेड्डी मुख्यमंत्री बने और उन्होंने खेती, किसानी, ग्रामीण एवं सामाजिक विकास के क्षेत्र में सराहनीय काम किया। आज जब सहकारिता मृतप्राय हो चुकी है, ऐसे में आंध्र में कुछ समय पूर्व आरंभ किए गए कोऑपरेटिव फार्मिंग के मॉडल को हाशिये पर जा रही खेती के लिए वरदान के तौर पर देखा जाने लगा।
राजशेखर रेड्डी का जन्म 8 जुलाई 1949 को आंध्र प्रदेश के पुलिवेन्दुला (कड़प्पा) में हुआ था. राजारेड्डी और जयम्मा के बेटे राजशेखर की प्राथमिक शिक्षा दीक्षा बेल्लारी में हुई जहां उनके पिता राजा रेड्डी नहर िवभाग में इंजीनियर थे. गुलबर्गा विश्वविद्यालय से उन्होंने डाक्टर की पढ़ाई पूरी की और तिरूपति के एवी मेडिकल कालेज से हाउस सर्जन की उपाधि हासिल की. असल में हाउस सर्जन की उपाधि लेने के साथ ही उनका राजनीतिक और सामाजिक जीवन शुरू हो गया था. वे पहली बार हाउस सर्जनों के एसोसिएशन के अध्यक्ष यहीं बने.
पढ़ाई पूरी हुई तो पिता ने बेटे के लिए पुलिवेन्दुला में ही उनके लिए एक छोटा सा अस्पताल बनवा दिया जहां राजशेखर रेड्डी ने अपनी शुरूआती प्रैक्टिस की. उनके परिवार ने एक दो और अस्पताल और मेडिकल कालेज बनवाये जो कि बाद में दातव्य संस्थाओं को संचालन के लिए दे दिया गया. 1971 में राजलक्ष्मी से विवाह हुआ और राजेशकर को एक बेटा और एक बेटी है. 1980 में वे पहली बार राज्य की राजनीति के केन्द्र में आये जब उन्हें राज्य सरकार में ग्रामीण विकास, स्वास्थ्य मंत्री बनाया गया. वे तीन साल तक इस पद पर रहे. लेकिन उन्हें अपना मंत्री पद छोड़ना पड़ा क्योंकि 1983 में वे प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष निर्वाचित हो गये. वे दो बार प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष रहे. पहली बार 1983-85 और दूसरी बार 1998 से 2000 तक. 1999 से 2004 तक वे राज्य विधानसभा में बतौर नेता प्रतिपक्ष काम कर रहे थे. लेकिन राजनीति में उनकी पहली बार उनकी वृहद उपस्थिति तब दर्ज हुई जब 2003 में उन्होंने 1400 किलोमीटर की पदयात्रा की. यह पदयात्रा उन्हें प्रदेश के निर्धनतम इलाकों में की जिसका व्यापक असर हुआ और मई 2004 के विधानसभा चुनाव में 184 सीटें जीतकर प्रदेश से चंद्राबाबू नायडू की सरकार को विदा कर दिया. राज्य की राजनीति के अलावा वे तीन बार लोकसभा सांसद भी रहे थे.
यही करिश्मा उन्होंने 2009 में भी दोहराया और प्रदेश में एक बार फिर कांग्रेस की सरकार बनी. उन्होंने प्रदेश में 156 विधानसभा सीटों पर जीत दर्ज की. 20 मई 2009 को उसी लाल बहादुर शास्त्री स्टेडियम में उन्होंने 20 हजार से अधिक जनता के सामने दोबारा मुख्यमंत्री पद की शपथ ली और भरोसा दिलाया कि पिछली सरकार के दौरान सिंचाई और आम आदमी के आर्थिक उत्थान की जो परियोजनाएं अधूरी रह गयी थीं उन्हें पूरा करेंगे. लेकिन यह नियति का कैसा संयोग है कि तीन महीने बाद ही उसी लाल बहादुर शास्त्री स्टेडियम में येदुगिरी सांदिती राजशेखर रेड्डी का पार्थिव शरीर रखा हुआ था और जनता अपने नेता का अंतिम दर्शन कर रही थी.
यह बात सही है कि राजशेखर रेड्डी का राजनीतिक जीवन निर्विवाद नहीं था और उनके मुख्यमंत्रित्व काल में कई मौके ऐसे आये जब उनकी सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे. फिर भी उनका विरोधी राजनीतिज्ञ भी यह मानता है कि वाईएसआर आम आदमी की राजनीति करते थे और अपनी उस यात्रा में भी वे विपरीत मौसक के बीच भी आम आदमी के पास ही जा रहे थे ताकि उसके दुख दर्द को करीब से अनुभव किया जा सके. उनके ही कहने पर जिला प्रशासन को भी मुख्यमंत्री के दौरे की सूचना नहीं दी गयी थी ताकि वे सूखा राहत तथा अन्य विकास योजनाओं का औचक निरीक्षण कर सकें. लेकिन आंध्र प्रदेश के आम आदमी का दुर्भाग्य से उनकी यह यात्रा उनकी अंतिम यात्रा बन गयी.
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aapne unhe dafnaye jane ke bare main likha hai par aapne ye nahi bataya ki unhone dharam parivartan kab aur kyo kiya kripya batane ki kripa kare
हालांकि निजी तौर पर राजशेखर रेड्डी धर्म परिवर्तन के बाद भी तिरूपति तिरूमाला में अगाध श्रद्धा रखते थे और नियमित दर्शन के लिए जाते थे. राजशेखर रेड्डी की मां जयम्मा कहती थीं कि भगवान हैं तो सिर्फ जीसस.
hamare desh main marne ke bad log kisi ki burai nahi karte lekin aapke lekh ka title
vetican ki eesai rajneet ki daldal ke .........the reddy. hona chahiye tha
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