Home | आदमीनामा | वामपंथी राजनीति का वजनदार पहरुआ

वामपंथी राजनीति का वजनदार पहरुआ

image

ज्योति बसु को कुछ लोग बहुत ही भाग्यशाली मानते थे क्योंकि ज़िंदगी में हमेशा उन्हें महत्व मिला. भारतीय राजनीति के निराले व्यक्तित्व ज्योति बसु ने अपने पहला चुनाव १९४६ में लड़ा था. चुनाव में जीते भी, लेकिन यह मह्त्वपूर्ण नहीं है. इस चुनाव में उन्होंने प्रोफेसर हुमायूं कबीर को हराया था. जो मौलाना आज़ाद के बहुत करीबी थे. बाद में वे नेहरू की मंत्रिपरिषद् में मंत्री भी बने. उसी वक़्त से वे बंगाल के नौजवानों के हीरो बन गये.

ज्योति  बसु नहीं रहे. ९५ साल की उम्र में उन्होंने अलविदा कहा. अपने राजनीतिक जीवन में उन्होंने बहुत सारी बुलंदियां तय कीं जो किसी भी राजनेता के लिए सपना हो सकता था. १९७७ में कांग्रेस की पराजय के बाद उन्हें पश्चिम बंगाल का मुख्य मंत्री बनाया गया था  और जब शरीर कमज़ोर पड़ने लगा तो उन्होंने अपनी मर्जी से गद्दी छोड़ दी और बुद्धदेव भट्टाचार्य को मुख्यमंत्री बना दिया गया. १९७७ के बाद का उनका जीवन एक खुली किताब है. मुख्यमंत्री के रूप में उनका सार्वजनिक जीवन हमेशा कसौटी पर रहा लेकिन उनको कभी किसी ने कोई गलती करते नहीं  देखा, न सुना. १९९६ की वह घटना दुनिया  जानती है जब वे देश के प्रधान मंत्रीपद के लिए सर्वसम्मत उम्मीदवार बन गए थे लेकिन दफ्तर में बैठ कर राजनीति करने वाले कुछ सांचाबद्ध  कम्युनिस्टों ने उन्हें रोक दिया. अगर ऐसा न हुआ होता तो देश देवगौड़ा को प्रधान मंत्री के रूप में न देखता . बहरहाल बाद के वक़्त  में यह भी कहा कि १९९६७ में प्रधान मंत्री पद न लेना मार्क्सवादियों की ऐतिहासिक भूल थी. उस हादसे को ऐतिहासिक भूल मानने वालों में भी बहुत मतभेद है.

१९७७ में मुख्यमंत्री बनने के बाद वे एक राज्य के मुखिया थे लेकिन राष्ट्रीय राजनीति पर उनकी पकड़ हमेशा बनी रही. १९८९ में  जब राजीव  गाँधी की  कांग्रेस चुनाव हार गयी तो आम  तौर पर माना जा रहा था कि कोई भी सरकार  बनना  बहुत ही  मुश्किल है. वी पी सिंह को ज्यादातर विपक्षी पार्टियां प्रधानमंत्री बनाने के चक्कर में थीं लेकिन यह समझ में नहीं आ रहा था कि लेफ्ट फ्रंट और बी जे पी एक ही सरकार को कैसे समर्थन करेंगें. ज्योति बसु ने बार बार कहा था कि बी जे पी पूरी तरह से साम्प्रदायिक पार्टी है तो कैसे जायेंगें उनके साथ. लेकिन ज्योति बसु और हरकिशन सिंह सुरजीत ने मिल कर ऐसा फार्मूला बनाया कि बीजेपी को वी पी सिंह को बाहर से समर्थन करने में कोई दिक्क़त नहीं रह गयी. प्रणय रॉय के साथ एक टेलिविज़न कार्यक्रम में सुरजीत ने ऐलान कर दिया कि वे वी पी सिंह को प्रधान मंत्री बनाने को तैयार हैं बशर्ते कि उस में बीजेपी का कोई मंत्री न हो. बस बन गयी सरकार. बहुत सारी यादें है ज्योति बाबू की जिन्होंने पिछले कई दशकों की भारतीय राजनीति को प्रभावित किया है.

ज्योति बाबू को उस वक़्त के बंगाल के सम्पान परिवारों के लड़कों को जो कुछ भी मिलता है, सब मिला.कोलकता के नामी सेंट जेवियर कॉलेज में पढ़ाई पूरी करने के बाद वे इंग्लैंड गए जहां उन्होंने कानून की पढ़ाई की. लन्दन में उनके समकालीनों में इंदिरा गाँधी, फीरोज़ गाँधी, वी के कृष्ण मेनन और भूपेश गुप्ता जैसे लोग थे. लन्दन के विश्व विख्यात लिंकल इन ने कानून की पढ़ाई  पूरी करने के बाद जब वे कोलकता आये तो कुछ दिन छोटी मोटी वकालत करने के बाद  ट्रेड यूनियन के काम में जुट गए. उन्होंने कम्युनिस्ट विचारधारा को चुना था लेकिन दिल्ली दरबार की कभी परवाह नहीं की. एक बार केंद्र सरकार से पश्चिम बंगाल के लिए केंद्रीय सहायता की बात करने दिल्ली पंहुचे ज्योति बसु से किसी केंद्रीय मंत्री ने शिकायत भरे लहजे में कहा कि आप समस्याएं ही गिनाते हैं, कभी कोई हल नहीं बताते, ज्योति बाबू का जवाब तुरंत मिल गया. जब हम आपकी सीट पार बैठेंगें तब हल भी बतायेंगें. लेकिन इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि वे कभी भी इस सीट पर नहीं बैठ पाये.

वामपंथी राजनीति के शिखर पर पंहुचने के पहले उन्होंने बंगाल के समाज के हर वर्ग में क्रांतिकारी परिवर्तन की पहल की थी. राजनीति के ऊंच-नीच से होते हुए वे १९६७ और १९६९की  गैर कांग्रेसी सरकारों में  मंत्री रहे. चुनाव हारे भी लेकिन कभी हार नहीं मानी.पार्टी के अन्दर भी उन्हें  बहुत संभल कर चलना पड़ता था.उनकी राज्य पार्टी के बॉस प्रमोद दासगुप्ता थे. एक बार उन्होंने घोषणा कर दी कि अगर केंद्रीय गृह मंत्री एस बी चह्वाण, कोलकाता  आये तो उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाएगा. मुख्यमंत्री ज्योति बसु के लिए दासगुप्त की यह टिप्पणी बहुत ही मुश्किल थी लेकिन उन्होंने बात को संभाला. एक बार प्रधान मंत्री इंदिरा गाँधी ने कहा कि आपके ऊपर मुझे पूरा भरोसा है लेकिन आपके कुछ सहयोगियों के बारे में यह नहीं कहा जा सकता.

उन्होंने बार-बार कहा कि हमारी पार्टी क्रान्ति में विश्वास करती है लेकिन हमने फिल-हाल संसदीय लोकतंत्र का रास्ता चुना है. मार्क्सवाद की मूल विचार धारा में संसदीय पद्धति को घुसाने का आरोप सभी वामपंथी पार्टियों पर लगता रहा है लेकिन अपने कार्यकर्ताओं  को उन्होंने हमेशा इस दुविधा से बाहर का राष्ट्र ढूँढने, आलोचना  से बच निकलने में मदद की. ज्योति बसु निजी तौर पर भी बहुत बहादुर इंसान थे.  १९६९ में एक बार कोलकाता में पुलिस वालों ने विद्रोह कर दिया था. उन्होंने विधानसभा को ही घेर लिया. मंत्री लोग भागने लगे लेकिन ज्योति बसु ने पुलिस वालों का हड़का कर भगा दिया था. विपक्षी को हड़का देने की उनकी खासियत अंत तह बनी रही. हमेशा अपनी बात को सोच समझ कर और सही तरीके से कहने वाले ज्योति बाबू ने मार्क्सवादी पार्टी के आतंरिक लोकतंत्र को बहुत संभाला था. आने वाले दिनों  में इस मोर्चे पर भी राजनीतिक बिरादरी उनकी कमी को महसूस करेगी.

Subscribe to comments feed Comments (0 posted):

total: | displaying:

Post your comment comment

Type in Hindi (हिन्दी में कमेन्ट करने के लिए यहां रोमन में लिखिए यह अपने आप हिन्दी में बदल देगा.)

Title :
Body
Powered by Vivvo CMS v4.1.2
Share |
  • email Email to a friend
  • print Print version

ईमेल से विस्फोटः अपना ईमेल यहां भरें और सब्सक्राइब करें:

Delivered by FeedBurner

Author info
image शेष जी शेष नारायण सिंह मूलतः इतिहास के विद्यार्थी हैं. शुरू में इतिहास के शिक्षक रहे. .बाद में पत्रकारिता की दुनिया में आये...प्रिंट, रेडियो और टेलिविज़न में काम किया. इन्होने १९२० से १९४७ तक की महात्मा गाँधी की जीवनी के उस पहलू पर काम किया है जिसमें वे एक महान कम्युनिकेटर के रूप में देखे जाते हैं..1992 से अब तक तेज़ी से बदल रहे राजनीतिक व्यवहार पर अध्ययन करने के साथ साथ विभिन्न मीडिया संस्थानों में नौकरी की. अब मुख्य रूप से लिखने पढने के काम में लगे हैं. एक अखबार में काम और विस्फोट.कॉम के सम्मानित स्तंभलेखक.
Rate this article
5.00
More from आदमीनामा
Previous
image
पीएमओ वाले पृथ्वीराज
महाराष्ट्र के नये मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण यूपीए सरकार पार्ट वन और पार्ट टू में बतौर पीएमओ मिनिस्टर जाने जाते हैं. प्रधानमंत्री कार्यालय में रहते हुए भी उन्होंने कभी ताकतवर होने का दंभ नहीं पाला और चुपचाप काम करते रहे. बिट्स पिलानी से बीई और बर्कले विश्वविद्यालय से एमएस की डिग्री हासिल करनेवाले पृथ्वीराज की राजनीतिक कमेस्ट्री ने उनके सार्वजनिक जीवन में पहली बार इतना गाढ़ा रंग उड़ेला है....
image
चंबल की वादियों से बिग बॉस के घर तक सीमा परिहार
चंबल की खूंखार वादियो मे अपने आंतक का डंका मचाने के बाद अपनी हकीकत की कहानी मे खुद को उतारने वाली सीमा परिहार अब टेलीविजन पर नजर आयेगी। यह पहला मौका होगा जब बिग बॉस जैसे कार्यक्रम के जरिये किसी खूखांर महिला अपराधी को छोटे पर्दे पर दर्शक देखेगे। वुंडेड नामक फिल्म के जरिये सीमा परिहार की कहानी देशवासी पहले ही देख चुके है जिसमे खुद सीमा परिहार ने किरदार अदा किया है।...
image
सहज उकेरी पीर घनेरी
क्षमा कुलश्रेष्ठ जब अठारह साल की थी तो उन्होंने एक कविता लिखी थी. ‘बन के तारा झिलमिलाऊं, चंाद मेरे पास हो, ऐसा कुछ मैं कर दिखाऊं, सबको मुझपर नाज हो, मानती हूं मेरा जीवन, गहरी काली रात है, दिन में तारों का नजारा, एक असंभव बात है।’ आज क्षमा की उम्र होगी यही कोई तीस साल के आसपास, लेकिन जब आप उनसे मिलेंगे, आपको कोई जब तक उनकी उम्र का हिसाब ना बताए, आप उनकी उम्र का अंदाजा नहीं लगा सकते।...
image
आधी आबादी के इन्साफ की लड़ाई और शबाना आजमी
आज़ादी के 63 साल बाद भी देश में आज़ादी पूरी तरह से नहीं आई है. शायद इसीलिये आज़ादी का जो सपना हमारे महानायकों ने देखा था वह पूरा नहीं हो रहा है. सबसे मुश्किल बात यह है कि राज-काज के फैसलों से देश की आधी आबादी को बाहर रखा जा रहा है. अपने देश में आज भी महिलायें मुख्य धारा से बाहर हैं. असंवेदनशीलता की हद तो यह है कि जनगणना में गृहिणी को अनुत्पादक काम में शामिल माना गया है और उन्हें भिखारियों की श्रेणी में रखने की कोशिश की गयी. लेकिन हल्ला गुल्ला होने के बाद शायद यह मसला तो दब गया लेकिन महिलाओं को सत्ता से बाहर रखने में अभी तक मर्दवादी राजनीति के पैरोकार सफल हैं और उन्हें संसद और विधानमंडलों में बराबर का हक नहीं दे रहे हैं....
image
राजनीति के बांका बहादुर को अंतिम सलाम
दिग्विजय सिंह का राजनीतिक जीवन न तो इतना लंबा है कि उसकी विधिवत समीक्षा की जाए और न ही उनकी राजनीतिक उपलब्धियां इतनी बड़ी थीं कि उनके निधन पर राष्ट्रीय राजनीतिक शोक का आयोजन किया जाए. मीडिया के लिए भी दिग्विजय सिंह के जाने से बड़ी खबर जसवंत सिंह के भाजपा में वापस आने की बनी. फिर भी दिग्विजय सिंह का भारतीय राजनीतिक परिदृश्य़ से जाना उतनी ही बड़ी क्षति है जितनी बड़ी क्षति माधवराव सिंधिया, राजेश पायलट या प्रमोद महाजन के जाने से हुई थी. ...
image
निश्छल राजनीतिज्ञ राजीव गांधी
राजीव गांधी नाम के जिस व्यक्तित्व पर कलम चलानी है, वह सहज संभव नहीं है । सौम्य छवि, अविचल मुस्कान से सदा परिपूर्ण रहने वाला चेहरा । यदि यह कहा जाये कि आज जिस संचार क्रांति के दम पर भारत विश्व के शीर्षस्थ देशों में से एक है, उस क्रांति को भारत भूमि पर व्याप्त करने वाला युगदृष्टा, तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। उनकी पुण्यतिथि 21 मई के मौके पर राजीव गांधी के बारे में और विस्तार से बता रहे हैं पंकज चतुर्वेदी....
image
शिक्षा में 'सिद्ध' प्रयोग की साधना
कलकत्ते में पैदा हुए, दिल्ली आई,आई टी से सिविल इंजिनियरिंग मे पढ़ाई की और कुछ दिन तक उत्तर बिहार में रसायन का उद्योग चलाया। लेकिन मन उखड़ा और कुछ अलग करने की धुन लगी तो चले आये मसूरी। पिछले बीस साल से सिद्ध संस्था के माध्यम से मसूरी के आस पास के इलाके में शिक्षा का प्रयोग कर रहे है। इनका नाम है पवन कुमार गुप्ता। आप पूछ सकते हैं कि ये पवन गुप्ता आखिर हैं कौन? ...
image
बेदाग व्यक्तित्व थे भैरो सिंह शेखावत
भारत के पूर्व उपराष्ट्रपति और देश के एक कद्दावर राजनेता भैरो सिंह शेखावत नहीं रहे. शनिवार की सुबह जयपुर के एक अस्पताल में उन्होंने अंतिम सांस ली. 87 साल के भैरोसिंह शेखावत ने लगभग छह दशक तक भारतीय राजनीति में अपना सशक्त हस्ताक्षर बनाये रखा. ...
image
चला गया 'नदिया के पार' का सूत्रधार
नदिया के पार के सूत्रधार गोविंद दा चले गये. गोविंद दा माने उस फिल्म के निर्देशक, पटकथा लेखक गोविंद मूनिस. पूरा नाम था गोविंद नारायण दुबे. गुरुवार की सुबह अचानक उनके सेलनंबर से कॉल आया. मैंने उनका फोन कट किया. एक मैसेज भेजा- ""दादा, मैं ठीक हूं. आप कैसे हैं. आज आपको एक मेल करूंगा. एक पत्र भी भेजा हूं. जवाब दीजिएगा.''...
image
उदयन शर्मा: जन पत्रकारिता का जोरदार पहरुआ
उदयन शर्मा की पुण्य तिथि 23 अप्रैल पर उनको याद करना 1977 में शुरु हुई उस हिन्दी पत्रकारिता को भी याद करना है, जब उदयन शर्मा, एमजे अकबर और एसपी सिंह ने 'रविवार' के माध्यम से हिन्दी पत्रकारिता को नए तेवर प्रदान किए थे। 11 जुलाई 1949 को जन्मे उदयन शर्मा प्रख्यात पत्रकार ही नहीं बल्कि विचारों से पक्के समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष शख्स थे।...
image
जानिए जनाब ललित मोदी को
पूरे देश को आईपीएल की खूंटी पर टांग देनेवाले ललित मोदी आखिर हैं कौन? हब्सियों की तरह अनवरत अंग्रेजी बोलने में सिद्धहस्त ललित मोदी के जीवन की कहानी कम दिलचस्प नहीं है. क्रिकेट को पूंजी का खेल बना देनेवाले ललित मोदी बड़े शिकार करने में विश्वास करते हैं भले ही इसके लिए कोई कीमत चुकानी पड़ जाए. अपने मां की सहेली से शादी रचाने वाले ललित मोदी ने शशि थरूर से एक छोटी सी खुन्नस पर ऐसा खेल किया कि शशि थरूर को अपने मंत्रीपद से इस्तीफा देना पड़ गया. ...
image
नक्सल विरोधी अभियान के नकली नेपोलियन
चिदंबरम के इस्तीफे की धमकी के नाट्य के समानांतर ही रवि शंकर प्रसाद का बयान आया है कि सरकार को उन सबके खिलाफ भी कार्रवाई करनी चाहिए जो नक्सलियों के प्रति सहानुभूति रखते हैं. यदि चिदंबरम नेपोलियन बनने के ख्वाब संजोते हैं तो रविशंकर प्रसाद उन्हें हिटलर, मुसोलिनी या स्टालिन जो कुछ भी उन्हें पसंद हो बनने के लिए ललकार रहे हैं. सवाल पैदा होता है कि क्या चिदंबरम और रविशंकर प्रसाद जैसे कारपोरेट कंपनियों के वकील जो तर्क पेश कर रहे हैं उससे नक्सलवाद का सफाया हो जाएगा?...
image
नंगे पांव देश नापने का नशा
लातूर के भीषण भूकंप ने उनसे उनका परिवार छीन लिया. गर्भवती स्त्री, बच्चे, माता-पिता, भाई कोई नहीं बचा. अगर कोई बचा तो वे खुद मोहनराव पाटिल. अब चालीस के हो चले पाटिल ने अपने परिवार के असमय काल के गाल में समा जाने के बाद पूरे देश को ही अपना परिवार बना लिया. कंधे पर राष्ट्रीय ध्वज और गले में लटकी संदेश की तख्ती के माध्यम से वे राष्ट्रप्रेम की अलख जगा रहे हैं. लोग भले ही उन्हें कुछ भी कहें, कुछ भी समझें, उनकी अनथक, अविरल देशप्रेम की पदयात्रा जारी है. संजय स्वदेश की रिपोर्ट-...
image
संघ विचारधारा के विनोबा भावे थे नाना जी
नाना जी नहीं रहे. उनका जाना राजनीति में एक युग का अवसान है. एक ऐसे युग का अवसान जिसे खुद नानाजी देशमुख ने बानाया था. वे राजनीति में उस नैतिक साहस के प्रतीक थे जो बिनोबा भावे के बाद किसी और राजनीतिज्ञ में दिखाई नहीं देता. आज भले ही नानाजी हमारे बीच नहीं है लेकिन उनका काम काज और कीर्ति सदा अमर रहेगी....
image
पंडवानी की पुरखिन दाई: श्रीमती लक्ष्मी बाई
महज चौथी कक्षा तक स्कूली पढ़ाई करने के बाद श्रीमती लक्ष्मी बाई ने महाभारत का पारायण शुरू कर दिया. उनके पिता दयाराम बंजारे मशाल नाच के प्रख्यात कलाकार थे लेकिन बंजारे ने बेटी को पंडवानी सिखाई. पिता की सिखाई पंडवानी को वे पिछले 45 वर्षों से गा रही हैं और पूरी पंडवानी सुनाने के लिए उन्हें 18 दिन का अनवरत समय चाहिए. डॉ परदेशी राम वर्मा की रिपोर्ट-...
image
माई नेम इज बाल ठाकरे
साल भर पहले की बात है. 26 फरवरी की देर शाम मुंबई के लीलावती अस्पताल में एक बीमार व्यक्ति को रुटीन चेक-अप के नाम पर अस्पताल लाया गया. डाक्टरों ने परीक्षण किया तो उस बीमार व्यक्ति को अस्पताल में दाखिल कर लिया क्योंकि उन्हें फेफड़े में संक्रमण था. संक्रमण सामान्य नहीं था. डाक्टरों ने लंबे समय तक आराम करने की सलाह दे दी. ...
image
कामगार मुले पाहिजे
नागपुर के विभिन्न चौक-चौराहों पर गुजरते वक्त दीवारों पर कामगार मुले पाहिजे और उसके नीचे दो मोबइल नंबर लिखा नजर आता है। इस विज्ञापन को गौर से पढऩे वाले शायद सोचते हो कि बच्चे सस्ते मजदूर होते हैं, इसलिए उनके ही रोजगार के लिए यह विज्ञापन होगा। पर इस विज्ञापन को को पढ़कर इसके पीछे के सामाजिक उद्देश्य के बारे में कोई नहीं जानता है।...
Next
Tags
No tags for this article
सर्वाधिकार (अ)सुरक्षित

विस्फोट.कॉम में प्रकाशित सामग्री पर हमारी ओर से कोई कापीराइट नहीं है.

Powered by Vivvo CMS v4.1.2