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पंडवानी की पुरखिन दाई: श्रीमती लक्ष्मी बाई

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महज चौथी कक्षा तक स्कूली पढ़ाई करने के बाद श्रीमती लक्ष्मी बाई ने महाभारत का पारायण शुरू कर दिया. उनके पिता दयाराम बंजारे मशाल नाच के प्रख्यात कलाकार थे लेकिन बंजारे ने बेटी को पंडवानी सिखाई. पिता की सिखाई पंडवानी को वे पिछले 45 वर्षों से गा रही हैं और पूरी पंडवानी सुनाने के लिए उन्हें 18 दिन का अनवरत समय चाहिए. डॉ परदेशी राम वर्मा की रिपोर्ट-

छत्तीसगढ़ की मंचीय कला के विविध रूपों से आज हम सब खूब परिचित है। भरथरी की विख्यात गायिका सुरूजबाई खांडे, पंथी के अंतर्राष्ट्रीय ख्याति के कलाकार देवदास बंजारे तथा पंडवानी के चमकते सितारों में पद्मभूषण तीजनबाई, श्रीमती ऋतु वर्मा ने खूब यश प्राप्त किया है। इनसे छत्तीसगढ़ की कीर्ति बढ़ी है। पंडवानी विधा के कलाकार दुर्ग जिले में विशेष रूप से पनपे। पंथी के शीर्ष कलाकार देवदास बंजारे भी इसी जिले के धनोरा ग्राम के निवासी है। लेकिन पंडवानी के प्रथम यशस्वी पुरूष कलाकार स्व. झाडूराम देवांगन और प्रथम चर्चित पंडवानी गायिका श्रीमती लक्ष्मीबाई ने इस जिले का गौरव पहले पहल बढ़ाया।

झाडूराम देवांगन की प्रस्तुति देखकर पूनाराम निषाद आगे बढ़े। ठीक उसी तरह 60 वर्षीय लक्ष्मीबाई का प्रभाव महिला कलाकारों पर रहा। जब लक्ष्मीबाई कीर्ति के शिखर पर थीं तब तीजनबाई मात्र आठ नौ वर्ष की रही होगी। अपने कई साक्षात्कार में पद्मभूषण तीजनबाई ने इस तथ्य को स्वीकारा है कि लक्ष्मीबाई से उन्हे भी प्रेरणा मिली। लेकिन लक्ष्मीबाई मंच की पहली पंडवानी गायिका नहीं है। उनसे पहले सुखियाबाई पंडवानी गाती थी। रायपुर के पास स्थित 'मुनगी’ गांव की सुखियाबाई मर्दों के वेश में मंच पर आती थी। तब पंडवानी के विख्यात कलाकार रावनझीपन वाले मामा-भांजे ही चर्चा में आये थे। सुखियाबाई को लगा होगा कि यह महाभारत की लड़ाई का किस्सा है इसलिए यह मर्दाना विधा है। इसीलिए वे मर्दों के वेश में मंच पर आती थीं। श्रीमती लक्ष्मीबाई पहली ऐसी साधिका हैं जिहोंने स्त्री के रूप में ही महासंग्राम की कथा का गायन मंच पर किया।

श्रीमती लक्ष्मी का बंजारे के गुरू उनके कलावंत पिता दयाराम बंजारे ही थे। एक अप्रैल 1944 को ग्राम कातुलबोड़ में जन्मी लक्ष्मीबाई का जन्म लक्ष्मी पूजा के दिन हुआ इसलिए उनका नाम लक्ष्मी रखा गया। जीवन भर लक्ष्मी के अभाव में साधनों के लिए संघर्ष करती हुई लक्ष्मीबाई आज अब 60 पार कर चुकी हैं। उन्हे दस वर्ष पहले गले का कैंसर भी हो गया था। लेकिन जीवट की गायिका लक्ष्मीबाई अब कैंसर को पछाड़कर पुन: पूर्ण स्वस्थ हो मंचों पर आ गई है। दयाराम बंजारे के 11 बेटे और दो बेटियों में मात्र लक्ष्मीबाई ही बच पाई। शेष सब सत्यलोकगामी हो गये। मां फुलकुंवर ने इकलौती बेटी को खूब दुलार दिया। लक्ष्मीबाई ही इस दंपत्ति के लिए बेटी थी और वही बेटा भी। इसीलिए लक्ष्मीबाई के पति 'राजीव नयन’ घरजियां अर्थात घरज भाई हैं। 'राजीव नयन’ दाढ़ीधारी पत्नीभक्त, कलावंत पति है। लक्ष्मीबाई के दल में वे शामिल रहते हैं। उन्हे अपनी प्रतिभा संपन्न पत्नी की सेवा करने में गर्व का अनुभव होता है। मैंने उनकी भक्ति पर टिप्पणी करते हुए जब कहा...

'मंगनी के बइला, घरजियां दमान्द,
मरे ते बांचय, जोते से काम।’

तो वे दाढ़ी लहराकर खूब हंसे। बच्चो की तरह नि:श्छल राजीवनयन जी झुमका, मजीरा बजाते हैं। कलाकारों के दलों में दाढ़ीधारी सदस्य प्राय: होते हैं। ऋतु वर्मा के पिता की दाढ़ी है तो लक्ष्मीबाई के पति की। पद्मभूषण तीजनबाई के पूर्व हरमुनिया मास्टर तुलसीराम की भी युवकोचित दाढ़ी थी। राजीवनयन 'दढिय़ारा’ भी जब मंच पर लक्ष्मीबाई के साथ बैठते हैं तो शोभा देखते ही बनती है।

लक्ष्मीबाई ने लगभग पंद्रह वर्ष की उम्र में गायन प्रारंभ किया। मशाल नाच के प्रख्यात कलाकार अपने पिता दयाराम बंजारे से उन्होने गायन सीखा। विगत 45 वर्षों से वे गायन कर रही है। खड़े साज में चिकारा बजाने वाले पिता दयाराम से उन्होने भरथरी गायन, गोपीचंदा कथा गायन तथा पंडवानी गायन की कला को प्राप्त किया। खड़े होकर पंडवानी गायन करने की कला कापालिक शैली कहलाती है। भिन्न- भिन्न मुद्रा में कलाकार मंच पर नाच गाकर गायन करते हैं। लेकिन बैठकर गायन की शैली की साधिका है। लक्ष्मीबाई के बाद श्रीमती रितु वर्मा ने ही वेदमती शैली का अनुगमन किया है। शैली कोई भी हो, कला की सिद्धि किसी कलाकार को यश देती है, यह इन भिन्न-भिन्न शैलियों की साधिकाओं की कीर्ति से सिद्ध हुआ है। टोने-टोटके, लटके-झटके और पहुंच पहचान की अपनी सीमायें हैं। प्रतिभा की शक्ति सारी सीमाओं का लंखन कर कलाकार अपने दम पर ही आगे बढ़ता है। लक्ष्मीबाई को भी अपनी साधना के दम पर मंजिल मिली। वे आकाशवाणी की प्रथम पंडवानी गायिका है। 1972 से वे आकाशवाणी पर पंडवानी प्रस्तुत कर रही है। श्रीमती लक्ष्मीबाई ने मोतीबाग, महाराष्ट्र मंडल, आदिवासी लोक कला परिषद के द्वारा प्रदत्त मंच तथा उदयाचल के आयोजनों में शामिल होकर पंडवानी गायन से श्रोताओं को मंत्रमुद्ध किया है।

चौथी कक्षा उत्तीर्ण लक्ष्मीबाई महाभारत ग्रंथ का पारायण किया और कथा के मूल सूत्रो को पकड़ा। वे 18 दिन तक पंडवानी गाती है। तभी पर्वों का उन्हे भरपूर ज्ञान है। वे महिला कलाकारों में वरिष्ठतम ही नहीं है, प्रथम साक्षर महिला कलाकार भी है। रामायण गायन की कला में भी वे सिद्ध है। प्रसिद्ध गायक झाडूराम का गांव बासिंग श्रीमती लक्ष्मीबाई का ननिहाल है। झाडूराम जी को वे मामा मानती थी। इसलिए जब तक बासिंग जाकर मामा झाडूराम से भी पंडवानी पर खूब चर्चा करने की सुविधा उन्हे मिली। गिरौदपुरी धाम में इस प्रख्यात कलाकार को स्वर्ण-पदक से सम्मानित किया गया। श्रीमती लक्ष्मीबाई अपनी इन दिनों हो रही उपेक्षा पर हंस कर टिप्पणी करती है। 'रंगरूप म राजा मोहे, चटक-मटक दारी, भाव भजन म साधू मोहे, पंडित करौ बिचारी।’ उन्हे अपनी उपेक्षा स्वाभाविक लगती है। वे कहती है कि सबका अपना युग होता है। काम रह जाता है। काम की कीमत सदा होती है। प्रचार से कुछ हलचल तो मचाई जा सकती है लेकिन सच्चा सम्मान नहीं प्राप्त किया जा सकता...

'सोना तो बाजय नहीं, कांच पीतल झन्नाय,
साधू  तो बोलय नहीं, मूरख रहे चिल्लाय।’
'धरे हंव ध्यान तुम्हारा मैं रघुबर’

यह गीत तन्मय होकर गाती है लक्ष्मीबाई तो न केवल वे रो पड़ती है बल्कि श्रोता भी विलाप कर उठते हैं। हबीब तनवीर के दल के साथ लक्ष्मीबाई को भी विदेश जाना था। लेकिन उन्ही दिनों इन्हे कैंसर ने घेर लिया। जबलपुर रायपुर आदि में लगातार इलाज करवा कर अपनी अदम्य इच्छा शक्ति के बल पर वे पुन: स्वस्थ हो सकी है। चार वर्ष पहले छत्तीसगढ़ लोक कला महोत्सव के विराट मंच पर गुरू परंपरा के लोक कलाकारों का सम्मान हुआ। पंडवानी विधा में गुरू के रूप में पूजित श्रीमती लक्ष्मीबाई का सम्मान हुआ। वे अपने अवदान और बदले में मिले सम्मान से पूर्ण संतुष्ट है। उन्हे कलाकार पंडवानी कला की पुरखिन दाई कहकर जब प्रणाम करते हैं तो लक्ष्मीबाई को लगता है जैसे भारत रत्न मिल गया हो।

(लेखक डॉ परदेशी राम वर्मा का संपर्क: 09827993494)

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Vicky G on 25 February, 2010 14:59;39
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बढिया आलेख. विस्फ़ोट पर विषयों का विस्तार होना ही चाहिए.
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