संघ विचारधारा के विनोबा भावे थे नाना जी
नाना जी नहीं रहे. उनका जाना राजनीति में एक युग का अवसान है. एक ऐसे युग का अवसान जिसे खुद नानाजी देशमुख ने बानाया था. वे राजनीति में उस नैतिक साहस के प्रतीक थे जो बिनोबा भावे के बाद किसी और राजनीतिज्ञ में दिखाई नहीं देता. आज भले ही नानाजी हमारे बीच नहीं है लेकिन उनका काम काज और कीर्ति सदा अमर रहेगी.
नानाजी देशमुख कई मायने में अद्भुद राजनीतिक प्राणी थे लेकिन राजनीति में रहते हुए भी उन्होंने नये पैमाने बनाये. अगर हम नानाजी के जीवन को समग्रता में देखें तो उनके पूरे जीवन में हमें त्याग और सेवा ही दिखाई देता है. हालांकि वे राजनीति में एक कुशल संगठनकर्ता और संबंधों के धनी थे लेकिन राजनीति में वे किसी भी पद या प्रतिष्ठा से कभी बंधे नहीं. जब लगा कि कि अब जाना चाहिए तो उठे और चल दिये. जीवन भर त्याग की प्रतिमूर्ति बने रहे नानाजी ने अपना देह भी दान कर दिया था जो अब आल इंडिया मेडिकल कालेज के विद्यार्थियों के शोध के काम आयेगा. इसी तरह जब वे साठ साल के हुए तो उन्होंने घोषणा की कि साठ साल से ऊपर के व्यक्ति को सक्रिय राजनीति में नहीं रहना चाहिए और सबसे पहले खुद सक्रिय राजनीति से अलग हो गये और उस गोंडा इलाके को सेवा कार्य के लिए चुना जहां से वे लोकसभा के लिए जनप्रतिनिधित्व कर चुके थे.
राजनीति के मैदान में उम्मीदवार के रूप में पहली बार नानाजी 1977 में आये जब जय प्रकाश नारायण ने उन्हें निमंत्रित किया. इससे पहले वे जनसंघ के संगठन महामंत्री के तौर पर लोगों को चुनाव लड़वाते थे. लेकिन वे चुनाव मैदान में उतरे तो जेल में रहते हुए भी उसी बलरामपुर सीट से जीत दर्ज की जहां राजनीति से सन्यास लेने के बाद सेवा कार्य के लिए गये थे. नानाजी देशमुख उन कुछ प्रमुख नौजवानों में से थे जिन्होंने संघ के संस्थापक डॉ हेडगेवार से प्रेरित होकर समाज कार्य के लिए अपने आपको समर्पित किया था. उनका जन्म महाराष्ट्र में जरूर हुआ था लेकिन उन्होंने अपना सार्वजनिक जीवन संघ के प्रचारक के रूप में उत्तर प्रदेश से शुरू किया. वे संघ के सक्रिय प्रचारक के रूप में कार्य जरूर कर रहे थे लेकिन नानाजी की एक खूबी थी. वे संपर्क सबसे रखते थे फिर विचारधारा के स्तर पर कोई उनका विरोधी ही क्यों न हो. संघ कार्य के साथ साथ ही उन्होंने कुछ बड़ी पहल की जो बाद में वटवृक्ष बन गया. नानाजी देशमुख ने गोरखपुर में अपने प्रवास के दौरान सरस्वती शिशु मंदिर की परिकल्पना की जो आगे चलकर विद्या भारती के वटवृक्ष के रूप में स्थापित हो गया.
जब वे राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में सक्रिय हुए तो उन्होंने सभी से संवाद की अपनी इस क्षमता का उपयोग गैर कांग्रेसवाद की स्थापना के लिए किया. यह नानाजी देशमुख ही थे जिनकी कोशिश से संविद सरकार की नींव पड़ी और संशोपा और जनसंघ के बीच गढजोड़ हुआ. नानाजी देशमुख का ही व्यक्तित्व था कि डॉ राम मनोहर लोहिया जनसंघ के साथ गैर कांग्रेसवाद के लिए आगे बढ़ने के लिए राजी हो गये. यह नानाजी की विशेषता थी कि वे संघ की विचारधारा से बिना किसी प्रकार का समझौता किये हुए दूसरे लोगों से बहुत घनिष्ठ और पारिवारिक संबंध रखते थे. दूसरे दलों और संगठनों के लोग उन पर अटूट विश्वास करते थे. यहां एक घटना का जिक्र करना जरूरी होगा कि जब केन्द्र में जनता पार्टी की सरकार बनी तो उन दिनों चंद्रशेखर जी जनता पार्टी के अध्यक्ष थे और नानाजी पार्टी के महामंत्री. कुछ लोगों ने चंद्रशेखर को कहा कि नानाजी पर इतना भरोसा करना अच्छा नहीं होगा. बाद के दिनों में चंद्रशेखर ने स्वीकार किया था कि लोगों ने उनसे शिकायत की थी लेकिन मैंने जब नानाजी के व्यक्तित्व को अपने में परखा तो पाया कि सिर्फ नानाजी ही हैं जिन पर पूरी तरह से भरोसा किया जा सकता है.
नानाजी ने केवल संबंध बनाते थे बल्कि उन संबंधों की पूरी चिंता भी करते थे. 1980 में जब इंडियन एक्सप्रेस समूह के मालिक रामनाथ गोयंका के इकलौते बेटे भगवान दास का निधन हुआ तो रामनाथ गोयंका पूरी तरह से टूट गये थे लेकिन नानाजी ने न केवल उन्हें संभाला बल्कि उन्हें काम काज में दोबारा लौटा लाये. इसी तरह जेपी से भी उनके संबंध बहुत प्रगाढ़ थे. 4 नवंबर 1974 जेपी के नेतृत्व में पटना में जो प्रदर्शन हुआ उसमें अगर नानाजी न रहे होते तो शायद पुलिस के लाठीचार्ज में जेपी बचते ही नहीं. यह नानाजी ही थे जिन्होने पुलिस की सारी लाठियां अपने ऊपर ले लीं.अपने आस पास के लोगों के लिए नानाजी हर प्रकार से कार्य करने के लिए तैयार रहते थे.
नानाजी ने जब राजनीति छोड़ी तब जनता पार्टी के हालात बहुत खराब थे. शीर्ष के तीन नेता मोरारजी देसाई, चौधरी चरण सिंह और जगवीवन राम नेतृत्व पाने के लिए आपस में लड़ रहे थे. नानाजी महामंत्री थे. वे जब सत्ता के शिखर की इस कलह को रोक पाने में नाकाम रहे तो उन्होंने एक आदर्श प्रस्तुत किया और कहा कि साठ साल से ऊपर के व्यक्ति को राजनीति से सेवाकार्य की ओर चले जाना चाहिए. उन्हें उम्मीद थी ऐसा करने से जनता पार्टी की कलह खत्म होगी और गैर कांग्रेसवाद की पहली सरकार पांच साल पूरा करेगी. लेकिन नानाजी के सेवा कार्य की ओर चले जाने के साथ ही जनता पार्टी का भी अवसान शुरू हो गया. अपनी इस घोषणा से नानाजी राजनीतिक वर्ग के सामने एक फार्मूला पेश कर रहे थे लेकिन दुर्भाग्य से यह नानाजी तक ही सिमटकर रह गया. खुद भारतीय जनता पार्टी में उनके बाद िकसी ने इस बारे में विचार नहीं किया. नानाजी राजनीति से अलग हटे तो अपने उन दीनदयाल उपाध्याय के नाम पर सेवा कार्य की शुरूआत की जो समाज के अंतिम आदमी का उत्थान चाहते थे. चित्रकूट में एक संन्यासी द्वारा दी गयी जमीन पर उन्होंने प्रयोग किये और बुन्देलखण्ड के उस इलाके की बदहाली में सिंचाई, चिकित्सा और स्वावलंबी जीवन का आदर्श प्रयोग किया.
नानाजी चित्रकूट नहीं जाना चाहते थे. वे गोंडा में रहकर ही सेवा कार्य करना चाहते थे लेकिन चित्रकूट के एक संन्यासी ने अपने पास उपलब्ध 200 एकड़ जमीन उन्हें देने की इच्छा व्यक्त की थी जिसे नानाजी यह कहते हुए लेने से मना कर दिया था कि वे कोई जमींदार नहीं है जो जमीन इकट्ठा करते रहेंगे. लेकिन उन सन्यासी ने उनके मना करने के बावजूद जमीन के सारे कागजात लाकर दिल्ली में सौंप दिया और चले गये. इसके बाद नानाजी वहां गये तो वहीं के होकर रह गये. अपने जीवन के आखिरी दिनों में वे किसी भी सूरत में एक दिन के लिए भी चित्रकूट से बाहर नहीं जाना चाहते थे. वे पिछले छह महीनों से वहीं थे. इस बीच वे एक दिन के लिए दिल्ली आये भी तो यह कहते हुए वापस चले गये कि वे अंतिम सांस चित्रकूट में ही लेना चाहते हैं. शनिवार को दोपहर दो बजे उन्होंने एक गिलास जूस पिया और थोड़ी देर बाद ही आस पास मौजूद लोगों को कहा कि अब मैं जा रहा हूं. और इसके साथ ही उन्होंने अपनी 95 साल की शरीर यात्रा समाप्त कर दी. वे शरीर में भले ही नहीं हैं लेकिन एक ऐसे राजनीतिज्ञ और समाजसेवी के रूप में हमेशा याद किये जाएंगे जो समाज के अंतिम आदमी के लिए संपूर्ण इच्छा के साथ अनवरत काम करता रहा. उनकी पुण्य आत्मा को शत्-शत् नमन.
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