Home | आदमीनामा | संघ विचारधारा के विनोबा भावे थे नाना जी

संघ विचारधारा के विनोबा भावे थे नाना जी

image

नाना जी नहीं रहे. उनका जाना राजनीति में एक युग का अवसान है. एक ऐसे युग का अवसान जिसे खुद नानाजी देशमुख ने बानाया था. वे राजनीति में उस नैतिक साहस के प्रतीक थे जो बिनोबा भावे के बाद किसी और राजनीतिज्ञ में दिखाई नहीं देता. आज भले ही नानाजी हमारे बीच नहीं है लेकिन उनका काम काज और कीर्ति सदा अमर रहेगी.

नानाजी देशमुख कई मायने में अद्भुद राजनीतिक प्राणी थे लेकिन राजनीति में रहते हुए भी उन्होंने नये पैमाने बनाये. अगर हम नानाजी के जीवन को समग्रता में देखें तो उनके पूरे जीवन में हमें त्याग और सेवा ही दिखाई देता है. हालांकि वे राजनीति में एक कुशल संगठनकर्ता और संबंधों के धनी थे लेकिन राजनीति में वे किसी भी पद या प्रतिष्ठा से कभी बंधे नहीं. जब लगा कि कि अब जाना चाहिए तो उठे और चल दिये. जीवन भर त्याग की प्रतिमूर्ति बने रहे नानाजी ने अपना देह भी दान कर दिया था जो अब आल इंडिया मेडिकल कालेज के विद्यार्थियों के शोध के काम आयेगा. इसी तरह जब वे साठ साल के हुए तो उन्होंने घोषणा की कि साठ साल से ऊपर के व्यक्ति को सक्रिय राजनीति में नहीं रहना चाहिए और सबसे पहले खुद सक्रिय राजनीति से अलग हो गये और उस गोंडा इलाके को सेवा कार्य के लिए चुना जहां से वे लोकसभा के लिए जनप्रतिनिधित्व कर चुके थे.

राजनीति के मैदान में उम्मीदवार के रूप में पहली बार नानाजी 1977 में आये जब जय प्रकाश नारायण ने उन्हें निमंत्रित किया. इससे पहले वे जनसंघ के संगठन महामंत्री के तौर पर लोगों को चुनाव लड़वाते थे. लेकिन वे चुनाव मैदान में उतरे तो जेल में रहते हुए भी उसी बलरामपुर सीट से जीत दर्ज की जहां राजनीति से सन्यास लेने के बाद सेवा कार्य के लिए गये थे. नानाजी देशमुख उन कुछ प्रमुख नौजवानों में से थे जिन्होंने संघ के संस्थापक डॉ हेडगेवार से प्रेरित होकर समाज कार्य के लिए अपने आपको समर्पित किया था. उनका जन्म महाराष्ट्र में जरूर हुआ था लेकिन उन्होंने अपना सार्वजनिक जीवन संघ के प्रचारक के रूप में उत्तर प्रदेश से शुरू किया. वे संघ के सक्रिय प्रचारक के रूप में कार्य जरूर कर रहे थे लेकिन नानाजी की एक खूबी थी. वे संपर्क सबसे रखते थे फिर विचारधारा के स्तर पर कोई उनका विरोधी ही क्यों न हो. संघ कार्य के साथ साथ ही उन्होंने कुछ बड़ी पहल की जो बाद में वटवृक्ष बन गया. नानाजी देशमुख ने गोरखपुर में अपने प्रवास के दौरान सरस्वती शिशु मंदिर की परिकल्पना की जो आगे चलकर विद्या भारती के वटवृक्ष के रूप में स्थापित हो गया.

जब वे राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में सक्रिय हुए तो उन्होंने सभी से संवाद की अपनी इस क्षमता का उपयोग गैर कांग्रेसवाद की स्थापना के लिए किया. यह नानाजी देशमुख ही थे जिनकी कोशिश से संविद सरकार की नींव पड़ी और संशोपा और जनसंघ के बीच गढजोड़ हुआ. नानाजी देशमुख का ही व्यक्तित्व था कि डॉ राम मनोहर लोहिया जनसंघ के साथ गैर कांग्रेसवाद के लिए आगे बढ़ने के लिए राजी हो गये. यह नानाजी की विशेषता थी कि वे संघ की विचारधारा से बिना किसी प्रकार का समझौता किये हुए दूसरे लोगों से बहुत घनिष्ठ और पारिवारिक संबंध रखते थे. दूसरे दलों और संगठनों के लोग उन पर अटूट विश्वास करते थे. यहां एक घटना का जिक्र करना जरूरी होगा कि जब केन्द्र में जनता पार्टी की सरकार बनी तो उन दिनों चंद्रशेखर जी जनता पार्टी के अध्यक्ष थे और नानाजी पार्टी के महामंत्री. कुछ लोगों ने चंद्रशेखर को कहा कि नानाजी पर इतना भरोसा करना अच्छा नहीं होगा. बाद के दिनों में चंद्रशेखर ने स्वीकार किया था कि लोगों ने उनसे शिकायत की थी लेकिन मैंने जब नानाजी के व्यक्तित्व को अपने में परखा तो पाया कि सिर्फ नानाजी ही हैं जिन पर पूरी तरह से भरोसा किया जा सकता है.

नानाजी ने केवल संबंध बनाते थे बल्कि उन संबंधों की पूरी चिंता भी करते थे. 1980 में जब इंडियन एक्सप्रेस समूह के मालिक रामनाथ गोयंका के इकलौते बेटे भगवान दास का निधन हुआ तो रामनाथ गोयंका पूरी तरह से टूट गये थे लेकिन नानाजी ने न केवल उन्हें संभाला बल्कि उन्हें काम काज में दोबारा लौटा लाये. इसी तरह जेपी से भी उनके संबंध बहुत प्रगाढ़ थे. 4 नवंबर 1974 जेपी के नेतृत्व में पटना में जो प्रदर्शन हुआ उसमें अगर नानाजी न रहे होते तो शायद पुलिस के लाठीचार्ज में जेपी बचते ही नहीं. यह नानाजी ही थे जिन्होने पुलिस की सारी लाठियां अपने ऊपर ले लीं.अपने आस पास के लोगों के लिए नानाजी हर प्रकार से कार्य करने के लिए तैयार रहते थे.

नानाजी ने जब राजनीति छोड़ी तब जनता पार्टी के हालात बहुत खराब थे. शीर्ष के तीन नेता मोरारजी देसाई, चौधरी चरण सिंह और जगवीवन राम नेतृत्व पाने के लिए आपस में लड़ रहे थे. नानाजी महामंत्री थे. वे जब सत्ता के शिखर की इस कलह को रोक पाने में नाकाम रहे तो उन्होंने एक आदर्श प्रस्तुत किया और कहा कि साठ साल से ऊपर के व्यक्ति को राजनीति से सेवाकार्य की ओर चले जाना चाहिए. उन्हें उम्मीद थी ऐसा करने से जनता पार्टी की कलह खत्म होगी और गैर कांग्रेसवाद की पहली सरकार पांच साल पूरा करेगी. लेकिन नानाजी के सेवा कार्य की ओर चले जाने के साथ ही जनता पार्टी का भी अवसान शुरू हो गया. अपनी इस घोषणा से नानाजी राजनीतिक वर्ग के सामने एक फार्मूला पेश कर रहे थे लेकिन दुर्भाग्य से यह नानाजी तक ही सिमटकर रह गया. खुद भारतीय जनता पार्टी में उनके बाद िकसी ने इस बारे में विचार नहीं किया. नानाजी राजनीति से अलग हटे तो अपने उन दीनदयाल उपाध्याय के नाम पर सेवा कार्य की शुरूआत की जो समाज के अंतिम आदमी का उत्थान चाहते थे. चित्रकूट में एक संन्यासी द्वारा दी गयी जमीन पर उन्होंने प्रयोग किये और बुन्देलखण्ड के उस इलाके की बदहाली में सिंचाई, चिकित्सा और स्वावलंबी जीवन का आदर्श प्रयोग किया.

नानाजी चित्रकूट नहीं जाना चाहते थे. वे गोंडा में रहकर ही सेवा कार्य करना चाहते थे लेकिन चित्रकूट के एक संन्यासी ने अपने पास उपलब्ध 200 एकड़ जमीन उन्हें देने की इच्छा व्यक्त की थी जिसे नानाजी यह कहते हुए लेने से मना कर दिया था कि वे कोई जमींदार नहीं है जो जमीन इकट्ठा करते रहेंगे. लेकिन उन सन्यासी ने उनके मना करने के बावजूद जमीन के सारे कागजात लाकर दिल्ली में सौंप दिया और चले गये. इसके बाद नानाजी वहां गये तो वहीं के होकर रह गये. अपने जीवन के आखिरी दिनों में वे किसी भी सूरत में एक दिन के लिए भी चित्रकूट से बाहर नहीं जाना चाहते थे. वे पिछले छह महीनों से वहीं थे. इस बीच वे एक दिन के लिए दिल्ली आये भी तो यह कहते हुए वापस चले गये कि वे अंतिम सांस चित्रकूट में ही लेना चाहते हैं. शनिवार को दोपहर दो बजे उन्होंने एक गिलास जूस पिया और थोड़ी देर बाद ही आस पास मौजूद लोगों को कहा कि अब मैं जा रहा हूं. और इसके साथ ही उन्होंने अपनी 95 साल की शरीर यात्रा समाप्त कर दी. वे शरीर में भले ही नहीं हैं लेकिन एक ऐसे राजनीतिज्ञ और समाजसेवी के रूप में हमेशा याद किये जाएंगे जो समाज के अंतिम आदमी के लिए संपूर्ण इच्छा के साथ अनवरत काम करता रहा. उनकी पुण्य आत्मा को शत्-शत् नमन.

Subscribe to comments feed Comments (5 posted):

shruti Awasthi on 28 February, 2010 02:01;14
avatar
और आज हालात यह है की 82 वर्ष की आयु के नेता , मबुत नेता निर्णायक सरकार का नारा बुलंद करते तंग नहीं आते
Thumbs Up Thumbs Down
-2
veeru on 28 February, 2010 10:34;40
avatar
पुण्य आत्मा को शत्-शत् नमन.
Thumbs Up Thumbs Down
5
Jitendra Dave on 01 March, 2010 01:24;23
avatar
गांधी के नाम पर उनके सपूतो ने तो सिर्फ वोट बटोरने और गान्धीगान करने का ही काम किया लेकिन गांधी की कल्पना को मूर्त रूप दिया नानाजी जैसे एक संघी ने. नानाजी को हार्दिक श्रन्दाजली. एक जानकारी-परक लेख के लिए लेखक और विस्फोट को साधुवाद.
Thumbs Up Thumbs Down
3
Janardan Pasi on 02 March, 2010 02:48;02
avatar
नानाजी देशमुख का जाना देश के लिए एक अपूरणीय क्षति है. वह एक प्रतिबद्ध संघी, प्रखर गांधीवादी और महान चिन्तक थे. आज के नेताओं को उनसे सबक सीखना चाहिए.
Thumbs Up Thumbs Down
3
surendra bansal on 27 April, 2010 14:35;55
avatar
ram ji, aapse aisi aasha nahi thi ke aap vinoba or nana ji ko ek hi tarazu m tolenge. aapka aalekh padh kar laga jaise aap jaisa patrakar na vinoba ko or na hi nana ji ko samjh paya hai. vinoba or nana vipreet dhruvon ka naam hai.vinoba tayag or nana ji ant tak saansad banne ka ocha moh nahi chod paye. chitrakoot ka jitna naash nana ji kiya, shayed hi kisi or ne kiya hoga. vinoba jeevan bhar zameen par bethte rahe or nana ji hamesha 10 mtr. ke table par baith sheeshe ki khidki se manegron ki tarha apne sehyogion ko ghoorte rahe. unhone kaunsi seva ki ye koi nahi samjha sakta.vinoba ka chitan poore desh ka chintan tha or nana ji apne aaspaas ko bhi theek se samajh nahi paye. jankaar unko sagh ka ek martra samaj sevak mante hen or samaj sevak bhi behad kamzor. maloom nahi aapne yeh lekh kisko khush karne ke liye likha hai. agar sagh ke beejuka logon ya jhandewalan ke vridh aashram ko khush karne liye likha hai to behad afsosnaaq hai. vinoba ki tulna nana ji se karni ornana ji ko samajsevak kehna- ye dono ka apmaan hai
Thumbs Up Thumbs Down
0
total: 5 | displaying: 1 - 5

Post your comment comment

Type in Hindi (हिन्दी में कमेन्ट करने के लिए यहां रोमन में लिखिए यह अपने आप हिन्दी में बदल देगा.)

Title :
Body
Powered by Vivvo CMS v4.1.2
Share |
  • email Email to a friend
  • print Print version

ईमेल से विस्फोटः अपना ईमेल यहां भरें और सब्सक्राइब करें:

Delivered by FeedBurner

Author info
image आर बी राय पत्रकार. छात्र आंदोलन से राजनीति और राजनीति से पत्रकारिता में आये रामबहादुर राय हिन्दी में खोजी पत्रकारिता के शीर्षपुरूष समझे जाते हैं. वर्तमान में प्रथम प्रवक्ता के संपादक और विस्फोट.कॉम के सम्मानित स्तंभलेखक. संपर्क- 09350972403
Rate this article
4.20
More from आदमीनामा
Previous
image
पीएमओ वाले पृथ्वीराज
महाराष्ट्र के नये मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण यूपीए सरकार पार्ट वन और पार्ट टू में बतौर पीएमओ मिनिस्टर जाने जाते हैं. प्रधानमंत्री कार्यालय में रहते हुए भी उन्होंने कभी ताकतवर होने का दंभ नहीं पाला और चुपचाप काम करते रहे. बिट्स पिलानी से बीई और बर्कले विश्वविद्यालय से एमएस की डिग्री हासिल करनेवाले पृथ्वीराज की राजनीतिक कमेस्ट्री ने उनके सार्वजनिक जीवन में पहली बार इतना गाढ़ा रंग उड़ेला है....
image
चंबल की वादियों से बिग बॉस के घर तक सीमा परिहार
चंबल की खूंखार वादियो मे अपने आंतक का डंका मचाने के बाद अपनी हकीकत की कहानी मे खुद को उतारने वाली सीमा परिहार अब टेलीविजन पर नजर आयेगी। यह पहला मौका होगा जब बिग बॉस जैसे कार्यक्रम के जरिये किसी खूखांर महिला अपराधी को छोटे पर्दे पर दर्शक देखेगे। वुंडेड नामक फिल्म के जरिये सीमा परिहार की कहानी देशवासी पहले ही देख चुके है जिसमे खुद सीमा परिहार ने किरदार अदा किया है।...
image
सहज उकेरी पीर घनेरी
क्षमा कुलश्रेष्ठ जब अठारह साल की थी तो उन्होंने एक कविता लिखी थी. ‘बन के तारा झिलमिलाऊं, चंाद मेरे पास हो, ऐसा कुछ मैं कर दिखाऊं, सबको मुझपर नाज हो, मानती हूं मेरा जीवन, गहरी काली रात है, दिन में तारों का नजारा, एक असंभव बात है।’ आज क्षमा की उम्र होगी यही कोई तीस साल के आसपास, लेकिन जब आप उनसे मिलेंगे, आपको कोई जब तक उनकी उम्र का हिसाब ना बताए, आप उनकी उम्र का अंदाजा नहीं लगा सकते।...
image
आधी आबादी के इन्साफ की लड़ाई और शबाना आजमी
आज़ादी के 63 साल बाद भी देश में आज़ादी पूरी तरह से नहीं आई है. शायद इसीलिये आज़ादी का जो सपना हमारे महानायकों ने देखा था वह पूरा नहीं हो रहा है. सबसे मुश्किल बात यह है कि राज-काज के फैसलों से देश की आधी आबादी को बाहर रखा जा रहा है. अपने देश में आज भी महिलायें मुख्य धारा से बाहर हैं. असंवेदनशीलता की हद तो यह है कि जनगणना में गृहिणी को अनुत्पादक काम में शामिल माना गया है और उन्हें भिखारियों की श्रेणी में रखने की कोशिश की गयी. लेकिन हल्ला गुल्ला होने के बाद शायद यह मसला तो दब गया लेकिन महिलाओं को सत्ता से बाहर रखने में अभी तक मर्दवादी राजनीति के पैरोकार सफल हैं और उन्हें संसद और विधानमंडलों में बराबर का हक नहीं दे रहे हैं....
image
राजनीति के बांका बहादुर को अंतिम सलाम
दिग्विजय सिंह का राजनीतिक जीवन न तो इतना लंबा है कि उसकी विधिवत समीक्षा की जाए और न ही उनकी राजनीतिक उपलब्धियां इतनी बड़ी थीं कि उनके निधन पर राष्ट्रीय राजनीतिक शोक का आयोजन किया जाए. मीडिया के लिए भी दिग्विजय सिंह के जाने से बड़ी खबर जसवंत सिंह के भाजपा में वापस आने की बनी. फिर भी दिग्विजय सिंह का भारतीय राजनीतिक परिदृश्य़ से जाना उतनी ही बड़ी क्षति है जितनी बड़ी क्षति माधवराव सिंधिया, राजेश पायलट या प्रमोद महाजन के जाने से हुई थी. ...
image
निश्छल राजनीतिज्ञ राजीव गांधी
राजीव गांधी नाम के जिस व्यक्तित्व पर कलम चलानी है, वह सहज संभव नहीं है । सौम्य छवि, अविचल मुस्कान से सदा परिपूर्ण रहने वाला चेहरा । यदि यह कहा जाये कि आज जिस संचार क्रांति के दम पर भारत विश्व के शीर्षस्थ देशों में से एक है, उस क्रांति को भारत भूमि पर व्याप्त करने वाला युगदृष्टा, तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। उनकी पुण्यतिथि 21 मई के मौके पर राजीव गांधी के बारे में और विस्तार से बता रहे हैं पंकज चतुर्वेदी....
image
शिक्षा में 'सिद्ध' प्रयोग की साधना
कलकत्ते में पैदा हुए, दिल्ली आई,आई टी से सिविल इंजिनियरिंग मे पढ़ाई की और कुछ दिन तक उत्तर बिहार में रसायन का उद्योग चलाया। लेकिन मन उखड़ा और कुछ अलग करने की धुन लगी तो चले आये मसूरी। पिछले बीस साल से सिद्ध संस्था के माध्यम से मसूरी के आस पास के इलाके में शिक्षा का प्रयोग कर रहे है। इनका नाम है पवन कुमार गुप्ता। आप पूछ सकते हैं कि ये पवन गुप्ता आखिर हैं कौन? ...
image
बेदाग व्यक्तित्व थे भैरो सिंह शेखावत
भारत के पूर्व उपराष्ट्रपति और देश के एक कद्दावर राजनेता भैरो सिंह शेखावत नहीं रहे. शनिवार की सुबह जयपुर के एक अस्पताल में उन्होंने अंतिम सांस ली. 87 साल के भैरोसिंह शेखावत ने लगभग छह दशक तक भारतीय राजनीति में अपना सशक्त हस्ताक्षर बनाये रखा. ...
image
चला गया 'नदिया के पार' का सूत्रधार
नदिया के पार के सूत्रधार गोविंद दा चले गये. गोविंद दा माने उस फिल्म के निर्देशक, पटकथा लेखक गोविंद मूनिस. पूरा नाम था गोविंद नारायण दुबे. गुरुवार की सुबह अचानक उनके सेलनंबर से कॉल आया. मैंने उनका फोन कट किया. एक मैसेज भेजा- ""दादा, मैं ठीक हूं. आप कैसे हैं. आज आपको एक मेल करूंगा. एक पत्र भी भेजा हूं. जवाब दीजिएगा.''...
image
उदयन शर्मा: जन पत्रकारिता का जोरदार पहरुआ
उदयन शर्मा की पुण्य तिथि 23 अप्रैल पर उनको याद करना 1977 में शुरु हुई उस हिन्दी पत्रकारिता को भी याद करना है, जब उदयन शर्मा, एमजे अकबर और एसपी सिंह ने 'रविवार' के माध्यम से हिन्दी पत्रकारिता को नए तेवर प्रदान किए थे। 11 जुलाई 1949 को जन्मे उदयन शर्मा प्रख्यात पत्रकार ही नहीं बल्कि विचारों से पक्के समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष शख्स थे।...
image
जानिए जनाब ललित मोदी को
पूरे देश को आईपीएल की खूंटी पर टांग देनेवाले ललित मोदी आखिर हैं कौन? हब्सियों की तरह अनवरत अंग्रेजी बोलने में सिद्धहस्त ललित मोदी के जीवन की कहानी कम दिलचस्प नहीं है. क्रिकेट को पूंजी का खेल बना देनेवाले ललित मोदी बड़े शिकार करने में विश्वास करते हैं भले ही इसके लिए कोई कीमत चुकानी पड़ जाए. अपने मां की सहेली से शादी रचाने वाले ललित मोदी ने शशि थरूर से एक छोटी सी खुन्नस पर ऐसा खेल किया कि शशि थरूर को अपने मंत्रीपद से इस्तीफा देना पड़ गया. ...
image
नक्सल विरोधी अभियान के नकली नेपोलियन
चिदंबरम के इस्तीफे की धमकी के नाट्य के समानांतर ही रवि शंकर प्रसाद का बयान आया है कि सरकार को उन सबके खिलाफ भी कार्रवाई करनी चाहिए जो नक्सलियों के प्रति सहानुभूति रखते हैं. यदि चिदंबरम नेपोलियन बनने के ख्वाब संजोते हैं तो रविशंकर प्रसाद उन्हें हिटलर, मुसोलिनी या स्टालिन जो कुछ भी उन्हें पसंद हो बनने के लिए ललकार रहे हैं. सवाल पैदा होता है कि क्या चिदंबरम और रविशंकर प्रसाद जैसे कारपोरेट कंपनियों के वकील जो तर्क पेश कर रहे हैं उससे नक्सलवाद का सफाया हो जाएगा?...
image
नंगे पांव देश नापने का नशा
लातूर के भीषण भूकंप ने उनसे उनका परिवार छीन लिया. गर्भवती स्त्री, बच्चे, माता-पिता, भाई कोई नहीं बचा. अगर कोई बचा तो वे खुद मोहनराव पाटिल. अब चालीस के हो चले पाटिल ने अपने परिवार के असमय काल के गाल में समा जाने के बाद पूरे देश को ही अपना परिवार बना लिया. कंधे पर राष्ट्रीय ध्वज और गले में लटकी संदेश की तख्ती के माध्यम से वे राष्ट्रप्रेम की अलख जगा रहे हैं. लोग भले ही उन्हें कुछ भी कहें, कुछ भी समझें, उनकी अनथक, अविरल देशप्रेम की पदयात्रा जारी है. संजय स्वदेश की रिपोर्ट-...
image
संघ विचारधारा के विनोबा भावे थे नाना जी
नाना जी नहीं रहे. उनका जाना राजनीति में एक युग का अवसान है. एक ऐसे युग का अवसान जिसे खुद नानाजी देशमुख ने बानाया था. वे राजनीति में उस नैतिक साहस के प्रतीक थे जो बिनोबा भावे के बाद किसी और राजनीतिज्ञ में दिखाई नहीं देता. आज भले ही नानाजी हमारे बीच नहीं है लेकिन उनका काम काज और कीर्ति सदा अमर रहेगी....
image
पंडवानी की पुरखिन दाई: श्रीमती लक्ष्मी बाई
महज चौथी कक्षा तक स्कूली पढ़ाई करने के बाद श्रीमती लक्ष्मी बाई ने महाभारत का पारायण शुरू कर दिया. उनके पिता दयाराम बंजारे मशाल नाच के प्रख्यात कलाकार थे लेकिन बंजारे ने बेटी को पंडवानी सिखाई. पिता की सिखाई पंडवानी को वे पिछले 45 वर्षों से गा रही हैं और पूरी पंडवानी सुनाने के लिए उन्हें 18 दिन का अनवरत समय चाहिए. डॉ परदेशी राम वर्मा की रिपोर्ट-...
image
माई नेम इज बाल ठाकरे
साल भर पहले की बात है. 26 फरवरी की देर शाम मुंबई के लीलावती अस्पताल में एक बीमार व्यक्ति को रुटीन चेक-अप के नाम पर अस्पताल लाया गया. डाक्टरों ने परीक्षण किया तो उस बीमार व्यक्ति को अस्पताल में दाखिल कर लिया क्योंकि उन्हें फेफड़े में संक्रमण था. संक्रमण सामान्य नहीं था. डाक्टरों ने लंबे समय तक आराम करने की सलाह दे दी. ...
image
कामगार मुले पाहिजे
नागपुर के विभिन्न चौक-चौराहों पर गुजरते वक्त दीवारों पर कामगार मुले पाहिजे और उसके नीचे दो मोबइल नंबर लिखा नजर आता है। इस विज्ञापन को गौर से पढऩे वाले शायद सोचते हो कि बच्चे सस्ते मजदूर होते हैं, इसलिए उनके ही रोजगार के लिए यह विज्ञापन होगा। पर इस विज्ञापन को को पढ़कर इसके पीछे के सामाजिक उद्देश्य के बारे में कोई नहीं जानता है।...
Next
Tags
No tags for this article
सर्वाधिकार (अ)सुरक्षित

विस्फोट.कॉम में प्रकाशित सामग्री पर हमारी ओर से कोई कापीराइट नहीं है.

Powered by Vivvo CMS v4.1.2