नंगे पांव देश नापने का नशा
लातूर के भीषण भूकंप ने उनसे उनका परिवार छीन लिया. गर्भवती स्त्री, बच्चे, माता-पिता, भाई कोई नहीं बचा. अगर कोई बचा तो वे खुद मोहनराव पाटिल. अब चालीस के हो चले पाटिल ने अपने परिवार के असमय काल के गाल में समा जाने के बाद पूरे देश को ही अपना परिवार बना लिया. कंधे पर राष्ट्रीय ध्वज और गले में लटकी संदेश की तख्ती के माध्यम से वे राष्ट्रप्रेम की अलख जगा रहे हैं. लोग भले ही उन्हें कुछ भी कहें, कुछ भी समझें, उनकी अनथक, अविरल देशप्रेम की पदयात्रा जारी है. संजय स्वदेश की रिपोर्ट-
गत दिनों नागपुर में विधानसभा का शीत सत्र चल रहा था, वे एक चौराहे पर खड़े होकर हर आने जाने वाले को देशभक्ति का संदेश दे रहे थे। लोग उन्हें पागल समझ कर उनकी अनदेखी करते चले जा रहे थे। बातचीत से पता चला कि जिन्हें लोग पागल समझ कर देखते हुए जाते वह कितना महान कार्य कर रहा है। लोग सच ही पागल समझ रहे थे, क्योंकि आज के जमाने में देशभक्ति के प्रचार-प्रसार का कार्य करने वाले को लोग पागल नहीं तो क्या कहेंगे?
पाटील बचपन से ही अपनी धुन के पक्के रहे हैं। गांव में 7 वीं कक्षा तक शिक्षा लेने के बाद आगे की पढ़ाई के लिए मजदूरी की। अपने गांव से दूर दूसरे गांव के हाईस्कूल में पढ़ाई की। पढ़ाई के लिए इस स्कूल में जाने के लिए उन्हें सास्तुर नदी तैर कर पार करना पड़ता रहा। 1987 में भारतीय थल सेना में भर्ती हुए। यहां तक तो मनोहर पाटील का जीवन सरल व सीधा रहा, परंतु उनकी नियति में कुछ और भी था। महाराष्ट्र के लातुर में 1993 में आए विनाशकारी भयानक भूकंप ने इनकी पूरी दुनिया ही उजाड़ दी। पूरा परिवार तबाह व तहस नहस हो गया। गर्भस्थ स्त्री और बच्चे काल के गाल में समा गए एवं इनका पूरा परिवार जिसमें बड़ा भाई, उनकी पत्नी, बच्चे माता-पिता, बहन उनका पूरा परिवार यानी कहने को जो अपने खून के रिश्ते होते है, वे सब इस भूकंप में समाप्त हो गए। बचे तो सिर्फ उनके अपनों के खत्म होने के निशान।
पाटील जब सेना की ड्यूटी से छुट्टी लेकर घर लैटे तो उन्हें देखा कि आपदा में पूरा गांव तबाह हो चुका है। गांव में बर्बादी के मंजर दिखें। अपनों को खोने के बाद भी पाटीन ने अपने मन को टूटने नहीं दिया। जीवन की हकीकत समझी और लग गए भूकंप में बर्बाद हुए लोगों की सेवा में। इस सेवा से उनके जीवन में बहुत बड़ा बदलावा आ गया। वापस जब सेना की ड्यूटी पर गए तो मन नहीं लगा। सन् 2000 में नौकरी से त्यागपत्र दे दिया और मिले हुए रुपये से गांव में ट्युबवेल, कुएं आदि लगवाकर किसानों की हालत एवं गांव को फिर से व्यवस्थित करने के कार्य में जुट गए। अपनी छह एकड़ की जमीन दूसरे किसानों को गुजर बसर के लिए दे दिया। पाटील जब भी गांव में रहते हैं. जरूरतमंद गरीब किसानों और गांववालों मदद के लिए सदैव तत्पर रहते हैं। गांव के पुनरुत्थान के लिए इन्होंने गाडगेबाबा ग्राम स्वच्छता अभियान के तहत शौचालय, बाथरूम सफाई के काम, पेड़ लगवाना आदि अनेक कार्यों में अपनी सक्रिय सहभागिता दिखाई। इनकी सक्रियता को देखते हुए लातूर के मंगसर गांव वालों ने इन्हें अपना सरपंच चुन लिया। सरपंच बनते ही पाटील ने गांव में स्कूल की नींव रखवाई। कंप्यूटर शिक्षा की शुरूआत करने का प्रयास किया। व्यायाम के सामान जुटाए। सर्व शिक्षा अभियान के तहत स्कूल खुलवाए और समाजकार्य व देशहित का कार्य इसी तरह आगे बढ़ता गया।
मनोहर आनंदराव पाटील का दिल इतना सब करने के बाद भी बचैन हो रहा था। उनकी चिंता गांव से अलग शहर और राष्ट्रहित के प्रति थी। जब चिंता का सैलाब मन पर भारी पड़ा तो नंगे पांव देशभक्ति, शांति, भाईचारा, परोपकार, प्रेम अहिंसा, पर्यावरण संरक्षण, भ्रष्टाचार उन्नमूलन, नशमुक्ति आदि अनेकानेक कुरितियों और कुप्रथाओं से लडऩे के लिए देशभर में निस्वार्थ भाव से परोपकार की भावना लिए शांति संदेश लेकर भारत भ्रमण पर निकल पड़े। उन्हें मानों नंगे पांव देश नापने का नशा है. रोजाना वे सूर्योदय होने पर निकलते है और सूर्यास्त होने तक गांव-गांव शहर भर में घूमकर लोगों को भाईचारे का पाठ पढ़ाते हुए आगे बढ़ते रहते है। इस दौरान वे दिन भर कुछ भी नहीं खाते और पांव में चप्पल भी नहीं पहनते। इसके लिए उनका तर्क यह है कि जब मेरे भारत देश में हजारों लाखों लोग को दो वक्त की रोटी भी नसीब नहीं है तो मैं कैसे भोजन करू ? रात को जहां शरण मिली वहीं सो लिया। मनोहर पाटील कहते हैं कि अभी तक करीब 27,000 किलोमीटर की पदयात्रा कर चुके हैं। भविष्य में भी उनकी पदयात्रा इसी उत्साह और लगन से जारी रहेगी। जब नागपुर में मिले थे, तब बताया था कि नागपुर से होते हुए उनका अगला पड़ाव मध्यप्रदेश राज्य होगा। जहां से वे समय और मौसम के अनुसार आगे की यात्रा तय करेंगे।
देशभक्त मनोहर पाटिल का कहना हैकि अंग्रेज भले ही भारत को 63 वर्ष पहले ही मुक्त कर चुके है परंतु देशवासी आज भी बुराइयों और कुप्रथा से के गुलाम बने हैं। इसलिए उनका अभियान देश को इन बुराईयों के विरोध जारी रहेगा। क्षेत्रवाद, नक्सलवाद, दहेजप्रथा, बालविवाह आदि से जब तक देश अजाद नहीं होता है, मेरा मानना है कि देश गुलाम है। क्या हिन्दी विरोध के बल पर मराठी राजनीति का दंभ भरनेवाले राज ठाकरे सुन रहे हैं?
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