चला गया 'नदिया के पार' का सूत्रधार
नदिया के पार के सूत्रधार गोविंद दा चले गये. गोविंद दा माने उस फिल्म के निर्देशक, पटकथा लेखक गोविंद मूनिस. पूरा नाम था गोविंद नारायण दुबे. गुरुवार की सुबह अचानक उनके सेलनंबर से कॉल आया. मैंने उनका फोन कट किया. एक मैसेज भेजा- ""दादा, मैं ठीक हूं. आप कैसे हैं. आज आपको एक मेल करूंगा. एक पत्र भी भेजा हूं. जवाब दीजिएगा.''
मुंह का कैंसर की परेशानी के कारण उनसे बातचीत कम होती थी, वे ज्यादा बोल नहीं पाते थे. इसलिए जब भी उनका फोन आता मैं कट कर मैसेज भेजा करता. पत्र, ईमेल और एसएमएस से ही ज्यादातर संवाद हुआ करता. इस मैसेज के बाद भी रिप्लाई मैसेज नहीं आया बल्कि बार-बार उनके नंबर से कॉल आता रहा. मुझे आश्चर्य हुआ. इधर से फोन मिलाया. दूसरी ओर फोन लाइन पर उनके बेटे अतुल थे. उन्होंने इतना भर कहा- बाबूजी नहीं रहे. इस सदमे भरी खबर के बाद ज्यादा बात नहीं कर सका.
गोविंद दा से पहली बार बातचीत तीन साल पहले "प्रभात खबर' के लिए नदिया के पार फिल्म के 25 वर्ष पूरे होने पर एक विशेषांक निकालने के क्रम में हुई थी. तब मिलना नहीं हो सका था लेकिन उन्होंने फोन और इंटरनेट के जरिये हर संभव मदद कर विशेषांक को निकलवाया. बाद में दो साल पहले जब वे ईटीवी के भोजपुरी फिल्म सम्मान समारोह में बनारस आये उनसे मिलने वहां गया. वहां भोजपुरी फिल्मी कलाकारों के लटके-झटके में गोविंद दा कहां गुम हो गये थे, पता ही नहीं चला. वे बैठे रहे, एक कतार में. मूक दर्शक बन कर. सिनेमा में गांव, गांव के सोन्हापन, बोली, आंचलिकता और भोजपुरी परिवेश को एक अलग मुकाम पर ले जाने वाले गोविंद दा को उस फिल्म फेस्टिवल में उपेक्षित देख मन विचलित हुआ था लेकिन कुछ कहने या करने की स्थिति नहीं थी. अगले दिन बनारस के होटल में मिले तो उन्होंने हंसते हुए कहा कि अरे! पागल हो क्या? यही रवायत है फिल्मी दुनिया का. इसे समझ लोगे तो मन को कोई परेशानी नहीं होगी. मैं ठीक हूं, मुझे कुछ भी बुरा नहीं लगता अब. खैर! गोविंद दा से मिलना फिर नहीं हो सका लेकिन इस बीच कभी नहीं लगा कि हम एक-दूसरे से अनजान हैं. हर माह एक पत्र, हर सप्ताह ईमेल और फोन पर एसएमएस के माध्यम से संवाद का सिलसिला जारी रहा. उनका अभिभावक और गुरु तुल्य स्नेह बराबर मिलता रहा.
और फिर पिछले माह यानी अप्रैल के पहले सप्ताह की ही तो बात है. एक दिन अचानक से गोविंद दा का एक एसएमएस आया था- "मैं सात दिनों के बाद इलाज वास्ते अस्पताल जा रहा हूं." मैंने फोन मिलाया तो उन्होंने लड़खड़ाती हुई आवाज में ही गंभीर हंसी के साथ कहा था- तीसरी बार जा रहा हूं अस्पताल में और शायद आखिरी बार भी. मिलना हो तो आ जाओ एक बार मुंबई...उनकी गंभीर हंसी से परेशान हो गया. अगले दिन आनन-फानन में रिजर्वेशन लेकर मुंबई के लिए निकल गया. उनसे मिलने.
अंधेरी स्थित उनके आवास पर यह हमारी दूसरी मुलाकात हो रही थी लेकिन यह नहीं पता था कि यह आखिरी मुलाकात थी. अंधेरी के हिलव्यू जैसे पॉश इलाके के वातानुकूलित कमरे में गंवई चेतना से लैस मानुष से मिलना हो रहा था. लुंगी-गंजी पहनकर गहन विचारों में खोये रहने वाले गोविंद दा ने अपनी पत्नी सत्यभामा से मुलाकात करवाई. काफी देर तक बातचीत हुई. अगले दिन फिर उनके घर गया. यह तय हुआ कि मैं कुछ माह में फिर मुंबई आ जाउं तो गोविंद दा नदिया के पार बनने-बनाने के पूरे अनुभव को लिखकर रखेंगे. गोविंद दा वह अनुभव नहीं लिख सके. अपनी जीवनी और फिल्मी दुनिया के संस्मरण भी लिख रहे थे. शायद वह भी पुरा नहीं हो सका. जिस दिन गोविंद दा के पुत्र अतुल का फोन आया, उसके एक दिन पहले ही मैं जौनपुर से लौटा था. उन्हीं के निर्देश पर जौनपुर गया था. नदिया के पार के यादों को संजोने. वहां से लौटते ही मैंने उन्हें एक लंबा पत्र लिखा. अब वह पत्र उनके हाथों में नहीं पहुंचेगा. अब पत्र मिलते ही एक मैसेज नहीं आयेगा कि निरालाजी आपका पत्र मिल गया है, जवाब लिख रहा हूं. गोविंद दा इन दिनों फिल्मी दुनिया के हालात पर बहुत बेचैन रहा करते थे. शायद उस बेचैनी को लिये ही दुनिया से विदा हो गये. बार-बार कहा करते थे- यह चकाचौंध भरी मायावी दुनिया बहुत बकवास है भाई. यहां जब तक चलने लायक हो, चल सकते हो, अपंग हो गये तो कहां फेेंक दिये जाओगे, पता भी नहीं चलेगा. कुछ वर्षों से गुमनामी में ही रह रहे थे गोविंद दा. फिल्मी दुनिया से संपर्क लगभग टूट चुका था लेकिन रचनाकर्म को जारी रखे हुए थे. गोविंद दा रचनात्मक रूप से कितने संवेदनशील थे, उसे उनकी एक हालिया कविता को पढ़ कर समझा जा सकता है-
मैं अपना दुख नहीं बेचता
फिर भी लोग भुना लेते हैं.
लेखों में, कविताओं में
मंचों और सभाओं में
साहित्यिक गलियारों में
मेरा दर्द भुना लेते हैं.
अपना नाम कमा लेते हैं.
दर्द मिला है जिनसे मुझको
ऐसी भला पड़ी या उनको
ये दुख हरना ही होता तो
पहले ही देते यों मुझको
बेशक अश्रु बहा लेते हैं
मेरा दर्द भुना लेते हैं.
गोविंद दा ने मशहूर फिल्म दोस्ती के संवाद भी लिखे थे.चलती का नाम गाड़ी, आंसू बन गये फूल, बंदिश, मासूम, जागृति, आसरा आदि के संवाद भी लिखे. लेकिन उनकी पहचान बनी नदिया के पार से. एक साधारण सी गंवई कहानी को असाधारण तरीके से परदे पर पेश कर गोविंद दा ने इतिहास ही रचा था. वह कहा करते थे कि भारत गांवों का ही देश है न. यहां के मूल में तो गंवई परिवेश ही है न, तो बनावटी दुनिया में कब तक रहा जा सकता है. वह इन दिनों फिल्मों में गायब होते इनोसेंसी, गांव-गिरांव के नजारे और गंवई परिवेश से काफी चिंतित रहते. और साथ ही इस बात की चर्चा बार -बार निजी पत्र में करते कि बेटा यह राजस्थान या पंजाब के गांव ही फिल्मों में यों दिखते हैं! क्या और जगह गांव नहीं है!
गोविंद दा का स्वास्थ्य साथ नहीं दे रहा था लेकिन अदम्य इच्छाशति उन्हें बार-बार एक और फिल्म बनाने को प्रेरित कर रही थी. उन्होंने आखिरी मुलाकात में भी कहा- यदि ठीक रहा तो गांव को लेकर एक और फिल्म बनाना चाहता हूं. विषय तैयार है, बस एक फिनांसर चाहिए लेकिन वैसा फिनांसर, जो नदिया के पार की तरह कलात्मक आजादी दे सके. गोविंद दा की अंत्येष्टि में कोई फिल्मी हस्ती नहीं गया लेकिन उससे क्या फर्क पड़ता है. वे अमर रहेंगे. अपने व्यतित्व व कृतित्व के लिए. नदिया के पार के लिए वे हमेशा याद किये जायेंगे.
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गोविंद मूनिस - एक परिचय
2 जनवरी 1929 को उन्नाव (उत्तरप्रदेश) में जन्में गोविंद नारायण आरंभ में साहित्यिक कहानियों के लेखक थे. 1952 में वे कोलकाता आये और ऋत्विक घटक के साथ बतौर सहायक निर्देशक काम करना शुरू किया. इप्टा से जुड़ाव हुआ.1953 में मुंबई आ गये. यहां उन्होंने सत्येन बोस की लगभग सभी फिल्मों में बतौर सहायक निर्देशक काम किया. इन फिल्मों में जागृति (1955), बंदिश (1955), मासूम (1960), चलती का नाम गाड़ी (1957), और दोस्ती (1964) जैसी हिट फिल्में शामिल हैं. दोस्ती के लिए सर्वश्रेठ संवाद लेखक का फिल्मफेयर एवार्ड मिला. सत्येन बोस के साथ काम करते हुए उन्होंने राजश्री प्रोडक्शन की फिल्मों के लिए संवाद भी लिखे. बाद में " नदिया के पार' फिल्म का निर्देशन कर उन्होंने एक इतिहास कायम किया.
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