Home | आदमीनामा | बेदाग व्यक्तित्व थे भैरो सिंह शेखावत

बेदाग व्यक्तित्व थे भैरो सिंह शेखावत

image

भारत के पूर्व उपराष्ट्रपति और देश के एक कद्दावर राजनेता भैरो सिंह शेखावत नहीं रहे. शनिवार की सुबह जयपुर के एक अस्पताल में उन्होंने अंतिम सांस ली. 87 साल के भैरोसिंह शेखावत ने लगभग छह दशक तक भारतीय राजनीति में अपना सशक्त हस्ताक्षर बनाये रखा.

आज उनके जाने के बाद उन्हें याद करें तो हम उन्हें ऐसे राजनेता के रूप में पाते हैं जिन्होंने सार्वजनिक जीवन में आदर्श और व्यवहार का बहुत ही बेहतर समन्वय किया और लोक राजनीति का मार्ग प्रशस्त किया.

भैरो सिंह शेखावत उन चंद नेताओं में से एक रहे हैं जो अपनी विचारधारा से बिना समझौता किये हुए निजी संबंधों को बनाये रखने में माहिर थे. उनके संबंध हर दल के नेताओं में थे और वे संबंध केवल औपचारिक नहीं बल्कि गहरे रिश्ते थे. इसकी कई बार परीक्षा भी हुई. 1993 में राजस्थान विधानसभा में दोबारा चुनाव हुआ तो मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश इन जगहों पर भाजपा की सरकार वापस नहीं आयी. लेकिन राजस्थान में भैरो सिंह शेखावत के नेतृत्व में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी होकर उभरी. हालांकि उन्हें स्पष्ट बहुमत नहीं मिला था लेकिन भैरोसिंह के कारण ही वहां भाजपा उनके नेतृत्व में सरकार बना सकी. कांग्रेस ने उस सरकार को उखाड़ने, गिराने और तोड़ने की हर चाल चली. उसी तरह से प्रयोग करने की कोशिश की जैसा कि गुजरात में किया गया था. राजेश पायलट उस कोशिश के सूत्रधार थे. लेकिन भैरोसिंह शेखावत की सरकार पांच साल चली. और अपने निजी संबंधों के कारण ही वे समय समय पर नरसिंहराव का समर्थन प्राप्त कर लेते थे.

भैरो सिंह शेखावत के पिता कम उम्र में ही चले गये थे और पूरे परिवार की जिम्मेदारी उनके ऊपर आ गयी थी. पहले कोई छोटी मोटी नौकरी की और बतौर पुलिस के सब इस्पेक्टर काम भी किया. लेकिन जब जनसंघ का गठन हुआ तो शुरुआती तौर पर ही वे जनसंघ से ही जुड़ गये. अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि और राजनीतिक विकास की प्रक्रिया के कारण उनके मन में गरीबों के लिए गहरी पीड़ा थी. 1977 में जब वे मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने सबसे पहले गरीबी रेखा के नीचे जीनेवाले लोगों के लिए जो कार्यक्रम शुरू किया उसको नाम दिया अन्त्योदय योजना. अन्त्योदय योजना के बारे में जैसे ही जयप्रकाश नारायण ने सुना तो उन्हें पटना बुलाया और उनकी सार्वजनिक सराहना की. 

भैरों सिंह शेखावत राजनीति के व्यावहारिक और आदर्शवाद में समन्वय करना बखूबी जानते थे. उनके जीवन में कई मौके ऐसे आये जब उनके सामने निजी संबंधों और राजनीति के आदर्श का टकराव उपस्थित हुआ लेकिन हर मौके पर उन्होंने न तो निजी संबंधों को बिगड़ने दिया और न ही अपने राजनीतिक आदर्श से कोई समझौता किया. बीते दिनों में उन्होंने एक ऐसा ही उदाहरण उस वक्त पेश किया जब जयप्रकाश नारायण के नाम पर बने ट्रस्ट में कई तरह की गड़बड़ियां की जा रही थीं. पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर से उनके संबंध बहुत प्रगाढ़ थे और चंद्रशेखर जी चाहते थे कि वे जयप्रकाश की जन्मस्थली जाएं. लेकिन भैरो सिंह शेखावत ने मना कर दिया. उनका तर्क था कि अगर जय प्रकाश जी के नाम पर कुछ लोग धांधली कर रहे हैं तो वे उन सबके बीच सिताब दियारा नहीं जाएंगे. लेकिन ऐसा भी नहीं है कि आदर्शों के लिए वे निजी संबंधों का ख्याल नहीं रखते थे. जीवन में बहुत सारे मौके ऐसे आये जब उन्होंने निजी संबंधों को महत्व दिया और कौन क्या कह रहा है इसके बारे में कभी विचार नहीं किया.

1951 में जब वे जनसंघ के जरिए राजनीति में आये उससे पहले वे राजस्थान पुलिस में बतौर सब-इंस्पेक्टर कार्यरत थे. उनकी राजनीतिक अभिरुचि और सक्रियता का ही परिणाम था कि राजनीति में आते ही 1952 में वे पहली बार विधायक बने. उस साल राजस्थान विधानसभा में जनसंघ के सात विधायक चुनकर आये थे. पहली बार विधायक बनते ही उन्होंने जमीनी राजनीति को जनसंघ का व्यावहारिक राजनीतिक कर्म बना दिया. जब केन्द्र सरकार ने जमींदारी प्रथा उन्मूलन का ऐलान किया तो भैरो  सिंह शेखावत ने उसका समर्थन कर दिया. भैरो सिंह शेखावत का यह समर्थन कई लोगों को नागवार गुजरा क्योंकि उन दिनों जनसंघी सामंती विचारवाले लोगों की पार्टी हुआ करती थी. लेकिन भैरो सिंह शेखावत ने साफ कर दिया कि अगर कोई पार्टी छोड़कर जाना चाहता है तो जा सकता है लेकिन पार्टी अपना स्टैण्ड नहीं बदलेगी. विवाद इतना बढ़ा कि पंडित दीनदयाल उपाध्याय को वहां जाना पड़ा लेकिन भैरो सिंह ने फिर भी अपना स्टैण्ड नहीं बदला और बाद में सबको भैरों सिंह का समर्थन करना पड़ा.

भैरो सिंह शेखावत बहुत ही सामान्य परिवार से आते थे. पूरे जीवन उन्होंने राजनीतिक ऊंचाई कुछ भी हासिल कर ली हो लेकिन वे एक आम इंसान ही बने रहे. आम आदमी के हक और हित की चिंता उनकी राजनीति के केन्द्र में हमेशा बना रहा. ऐतिहासिक रूप से भैरों सिंह शेखावत ने दो काम ऐसे किये हैं जिसके बारे में कम ही लोग जानते हैं लेकिन सच्चाई यह है कि भैरों सिंह न होते तो शायद ये दोनों पहल कभी नहीं होती. इसमें पहला काम था बतौर मुख्यंत्री राजस्थान में अन्त्योदय योजना की शुरूआत. 1977 में जब वे पहली बार राजस्थान के मुख्यमंत्री बने तो पहली दफा उन्होंने गरीबों के लिए जिन योजनाओं की शुरूआत की उसे अन्त्योदय योजना का नाम दिया. इन योजनाओं से खुद जयप्रकाश नारायण इतने प्रभावित हुए कि उन्हें पटना बुलाकर उनका सार्वजनिक सम्मान किया. इसी तरह भैरो सिंह शेखावत ही ऐसे पहले मुख्यंत्री थे जिन्होंने सूचना का अधिकार आंदोलन को आधार प्रदान किया. 1993 में जब वे एक बार फिर राजस्थान के मु्ख्यमंत्री बने तो उन्होंने अनिवार्य कर दिया कि ग्राम पंचायतों में जो भी विकास का काम किया जा रहा है उसका शिलापट लगाया जाए और किसी भी नागरिक द्वारा जानकारी मांगे जाने पर अधिकारी उसे जानकारी मुहैया कराएं. हालांकि शुरूआत में अधिकारियों ने आनाकानी की लेकिन मुख्यमंत्री की सख्ती के कारण उनको ऐसा करना पड़ा. इसी का परिणाम है कि राजस्थान में हुई इस शुरूआत को अरुणा राय ने सूचना अधिकार का आंदोलन बनाया और उसे केन्द्र सरकार द्वारा लागू किया गया.

भैरों सिंह शेखावत आम आदमी की राजनीति करते थे लेकिन पार्टी के स्तर पर भी वे हमेशा एक योद्धा की भांति ही राजनीति करते रहे. जब वे बतौर उपराष्ट्रपति दिल्ली आ गये और राजस्थान में विधानसभा के चुनाव होनेवाले थे तो उन्होंने ही कोशिश करके वसुंधरा राजे को राजस्थान की राजनीति में अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी बनाया. लेकिन पांच साल के शासनकाल में जब उन्हें लगा कि वसुंधरा राजे ने आम आदमी के हकों कि रक्षा नहीं की तो उन्हीं भैरों सिंह शेखावत ने वसुंधरा राजे का विरोध करना शुरू कर दिया. यह बात अलग है कि उस वक्त वसुंधरा राजे को भाजपा के ऐसे नेता का संरक्षण मिल गया जिसके सामने भैरो सिंह एक तरह से कमजोर पड़ गये. फिर भी उन्होंने अपनी मांग बनाये रखी. पार्टी फोरम पर भी वे आम आदमी के लिए राजनीति का मुद्दा उठाते रहते थे और समय समय पर पार्टी को सचेत करते रहते थे कि आम आदमी की राजनीति ही असली राजनीति है.

भैरो सिंह शेखावत राजनीति मे बेदाग व्यक्तित्व थे. अपने निजी संबंधों के लिए कभी विचारधारा से समझौता नहीं किया लेकिन निजी संबंधों में राजनीतिक विचारधारा को भी कभी आड़े नहीं आने दिया. उनके निधन से सिर्फ भारतीय जनता पार्टी का ही नुकसान नहीं हुआ है बल्कि भारतीय राजनीति का एक बेदाग व्यक्तित्व हमारे बीच से चला गया है.

Subscribe to comments feed Comments (5 posted):

shruti awasthi on 16 May, 2010 02:26;15
avatar
bhairo singh ji ko shat shat naman
Thumbs Up Thumbs Down
-1
Ratan Singh Shekhawat on 16 May, 2010 07:59;29
avatar
लाडेसर रजथान रा , शेखावत सरदार !
नैण सजळ श्रद्धांजळी निंवण हज़ारूं बार !!


<a href="http://way4host.com">Way4host:Affordable WEb Hosting </a>
Thumbs Up Thumbs Down
-1
sandeep on 23 May, 2010 02:44;06
avatar
प्रणाम इस महान राजनीतिज्ञ को [कोई शक नही की वो बेदाग़ नेता थे [जय भैरो सिंह शेखावत
Thumbs Up Thumbs Down
1
Jitendra Dave on 25 May, 2010 02:11;24
avatar
Shekhaavat Was The Only 'Sher' of Rajsthaan.
Thumbs Up Thumbs Down
0
avatar
अटल-बिहारी बाजपेयी और भैरोसिंह शेखावत के रूप में भारतीय जनतापार्टी को दो महानतम राजनीतिज्ञ मिले थे .शेखावत चले गए और बाजपेयी जी बढ़ी हुई आयु तथा गिरते स्वास्थ की वजह से राजनीतिक रंगमंच से गायब है .भाजपा को इन महान नेताओ का विकल्प मिलना लगभग असम्भव लगता है.इन दोनों की लोकप्रियता हर वर्ग तथा हर जाति बल्कि आम भारतीय के मन में थी . शेखावत जी ने भारतीय राजनीति को गरिमामय योगदान दिया .उनका पूरा जीवन निर्विवाद निष्कलंक और सरल रहा वे आदर्श रहनुमा थे .उनकी स्मृतियों को अनन्त प्रणाम .
Thumbs Up Thumbs Down
1
total: 5 | displaying: 1 - 5

Post your comment comment

Type in Hindi (हिन्दी में कमेन्ट करने के लिए यहां रोमन में लिखिए यह अपने आप हिन्दी में बदल देगा.)

Title :
Body
Powered by Vivvo CMS v4.1.2
Share |
  • email Email to a friend
  • print Print version

ईमेल से विस्फोटः अपना ईमेल यहां भरें और सब्सक्राइब करें:

Delivered by FeedBurner

Author info
image आर बी राय पत्रकार. छात्र आंदोलन से राजनीति और राजनीति से पत्रकारिता में आये रामबहादुर राय हिन्दी में खोजी पत्रकारिता के शीर्षपुरूष समझे जाते हैं. वर्तमान में प्रथम प्रवक्ता के संपादक और विस्फोट.कॉम के सम्मानित स्तंभलेखक. संपर्क- 09350972403
Rate this article
3.67
More from आदमीनामा
Previous
image
पीएमओ वाले पृथ्वीराज
महाराष्ट्र के नये मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण यूपीए सरकार पार्ट वन और पार्ट टू में बतौर पीएमओ मिनिस्टर जाने जाते हैं. प्रधानमंत्री कार्यालय में रहते हुए भी उन्होंने कभी ताकतवर होने का दंभ नहीं पाला और चुपचाप काम करते रहे. बिट्स पिलानी से बीई और बर्कले विश्वविद्यालय से एमएस की डिग्री हासिल करनेवाले पृथ्वीराज की राजनीतिक कमेस्ट्री ने उनके सार्वजनिक जीवन में पहली बार इतना गाढ़ा रंग उड़ेला है....
image
चंबल की वादियों से बिग बॉस के घर तक सीमा परिहार
चंबल की खूंखार वादियो मे अपने आंतक का डंका मचाने के बाद अपनी हकीकत की कहानी मे खुद को उतारने वाली सीमा परिहार अब टेलीविजन पर नजर आयेगी। यह पहला मौका होगा जब बिग बॉस जैसे कार्यक्रम के जरिये किसी खूखांर महिला अपराधी को छोटे पर्दे पर दर्शक देखेगे। वुंडेड नामक फिल्म के जरिये सीमा परिहार की कहानी देशवासी पहले ही देख चुके है जिसमे खुद सीमा परिहार ने किरदार अदा किया है।...
image
सहज उकेरी पीर घनेरी
क्षमा कुलश्रेष्ठ जब अठारह साल की थी तो उन्होंने एक कविता लिखी थी. ‘बन के तारा झिलमिलाऊं, चंाद मेरे पास हो, ऐसा कुछ मैं कर दिखाऊं, सबको मुझपर नाज हो, मानती हूं मेरा जीवन, गहरी काली रात है, दिन में तारों का नजारा, एक असंभव बात है।’ आज क्षमा की उम्र होगी यही कोई तीस साल के आसपास, लेकिन जब आप उनसे मिलेंगे, आपको कोई जब तक उनकी उम्र का हिसाब ना बताए, आप उनकी उम्र का अंदाजा नहीं लगा सकते।...
image
आधी आबादी के इन्साफ की लड़ाई और शबाना आजमी
आज़ादी के 63 साल बाद भी देश में आज़ादी पूरी तरह से नहीं आई है. शायद इसीलिये आज़ादी का जो सपना हमारे महानायकों ने देखा था वह पूरा नहीं हो रहा है. सबसे मुश्किल बात यह है कि राज-काज के फैसलों से देश की आधी आबादी को बाहर रखा जा रहा है. अपने देश में आज भी महिलायें मुख्य धारा से बाहर हैं. असंवेदनशीलता की हद तो यह है कि जनगणना में गृहिणी को अनुत्पादक काम में शामिल माना गया है और उन्हें भिखारियों की श्रेणी में रखने की कोशिश की गयी. लेकिन हल्ला गुल्ला होने के बाद शायद यह मसला तो दब गया लेकिन महिलाओं को सत्ता से बाहर रखने में अभी तक मर्दवादी राजनीति के पैरोकार सफल हैं और उन्हें संसद और विधानमंडलों में बराबर का हक नहीं दे रहे हैं....
image
राजनीति के बांका बहादुर को अंतिम सलाम
दिग्विजय सिंह का राजनीतिक जीवन न तो इतना लंबा है कि उसकी विधिवत समीक्षा की जाए और न ही उनकी राजनीतिक उपलब्धियां इतनी बड़ी थीं कि उनके निधन पर राष्ट्रीय राजनीतिक शोक का आयोजन किया जाए. मीडिया के लिए भी दिग्विजय सिंह के जाने से बड़ी खबर जसवंत सिंह के भाजपा में वापस आने की बनी. फिर भी दिग्विजय सिंह का भारतीय राजनीतिक परिदृश्य़ से जाना उतनी ही बड़ी क्षति है जितनी बड़ी क्षति माधवराव सिंधिया, राजेश पायलट या प्रमोद महाजन के जाने से हुई थी. ...
image
निश्छल राजनीतिज्ञ राजीव गांधी
राजीव गांधी नाम के जिस व्यक्तित्व पर कलम चलानी है, वह सहज संभव नहीं है । सौम्य छवि, अविचल मुस्कान से सदा परिपूर्ण रहने वाला चेहरा । यदि यह कहा जाये कि आज जिस संचार क्रांति के दम पर भारत विश्व के शीर्षस्थ देशों में से एक है, उस क्रांति को भारत भूमि पर व्याप्त करने वाला युगदृष्टा, तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। उनकी पुण्यतिथि 21 मई के मौके पर राजीव गांधी के बारे में और विस्तार से बता रहे हैं पंकज चतुर्वेदी....
image
शिक्षा में 'सिद्ध' प्रयोग की साधना
कलकत्ते में पैदा हुए, दिल्ली आई,आई टी से सिविल इंजिनियरिंग मे पढ़ाई की और कुछ दिन तक उत्तर बिहार में रसायन का उद्योग चलाया। लेकिन मन उखड़ा और कुछ अलग करने की धुन लगी तो चले आये मसूरी। पिछले बीस साल से सिद्ध संस्था के माध्यम से मसूरी के आस पास के इलाके में शिक्षा का प्रयोग कर रहे है। इनका नाम है पवन कुमार गुप्ता। आप पूछ सकते हैं कि ये पवन गुप्ता आखिर हैं कौन? ...
image
बेदाग व्यक्तित्व थे भैरो सिंह शेखावत
भारत के पूर्व उपराष्ट्रपति और देश के एक कद्दावर राजनेता भैरो सिंह शेखावत नहीं रहे. शनिवार की सुबह जयपुर के एक अस्पताल में उन्होंने अंतिम सांस ली. 87 साल के भैरोसिंह शेखावत ने लगभग छह दशक तक भारतीय राजनीति में अपना सशक्त हस्ताक्षर बनाये रखा. ...
image
चला गया 'नदिया के पार' का सूत्रधार
नदिया के पार के सूत्रधार गोविंद दा चले गये. गोविंद दा माने उस फिल्म के निर्देशक, पटकथा लेखक गोविंद मूनिस. पूरा नाम था गोविंद नारायण दुबे. गुरुवार की सुबह अचानक उनके सेलनंबर से कॉल आया. मैंने उनका फोन कट किया. एक मैसेज भेजा- ""दादा, मैं ठीक हूं. आप कैसे हैं. आज आपको एक मेल करूंगा. एक पत्र भी भेजा हूं. जवाब दीजिएगा.''...
image
उदयन शर्मा: जन पत्रकारिता का जोरदार पहरुआ
उदयन शर्मा की पुण्य तिथि 23 अप्रैल पर उनको याद करना 1977 में शुरु हुई उस हिन्दी पत्रकारिता को भी याद करना है, जब उदयन शर्मा, एमजे अकबर और एसपी सिंह ने 'रविवार' के माध्यम से हिन्दी पत्रकारिता को नए तेवर प्रदान किए थे। 11 जुलाई 1949 को जन्मे उदयन शर्मा प्रख्यात पत्रकार ही नहीं बल्कि विचारों से पक्के समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष शख्स थे।...
image
जानिए जनाब ललित मोदी को
पूरे देश को आईपीएल की खूंटी पर टांग देनेवाले ललित मोदी आखिर हैं कौन? हब्सियों की तरह अनवरत अंग्रेजी बोलने में सिद्धहस्त ललित मोदी के जीवन की कहानी कम दिलचस्प नहीं है. क्रिकेट को पूंजी का खेल बना देनेवाले ललित मोदी बड़े शिकार करने में विश्वास करते हैं भले ही इसके लिए कोई कीमत चुकानी पड़ जाए. अपने मां की सहेली से शादी रचाने वाले ललित मोदी ने शशि थरूर से एक छोटी सी खुन्नस पर ऐसा खेल किया कि शशि थरूर को अपने मंत्रीपद से इस्तीफा देना पड़ गया. ...
image
नक्सल विरोधी अभियान के नकली नेपोलियन
चिदंबरम के इस्तीफे की धमकी के नाट्य के समानांतर ही रवि शंकर प्रसाद का बयान आया है कि सरकार को उन सबके खिलाफ भी कार्रवाई करनी चाहिए जो नक्सलियों के प्रति सहानुभूति रखते हैं. यदि चिदंबरम नेपोलियन बनने के ख्वाब संजोते हैं तो रविशंकर प्रसाद उन्हें हिटलर, मुसोलिनी या स्टालिन जो कुछ भी उन्हें पसंद हो बनने के लिए ललकार रहे हैं. सवाल पैदा होता है कि क्या चिदंबरम और रविशंकर प्रसाद जैसे कारपोरेट कंपनियों के वकील जो तर्क पेश कर रहे हैं उससे नक्सलवाद का सफाया हो जाएगा?...
image
नंगे पांव देश नापने का नशा
लातूर के भीषण भूकंप ने उनसे उनका परिवार छीन लिया. गर्भवती स्त्री, बच्चे, माता-पिता, भाई कोई नहीं बचा. अगर कोई बचा तो वे खुद मोहनराव पाटिल. अब चालीस के हो चले पाटिल ने अपने परिवार के असमय काल के गाल में समा जाने के बाद पूरे देश को ही अपना परिवार बना लिया. कंधे पर राष्ट्रीय ध्वज और गले में लटकी संदेश की तख्ती के माध्यम से वे राष्ट्रप्रेम की अलख जगा रहे हैं. लोग भले ही उन्हें कुछ भी कहें, कुछ भी समझें, उनकी अनथक, अविरल देशप्रेम की पदयात्रा जारी है. संजय स्वदेश की रिपोर्ट-...
image
संघ विचारधारा के विनोबा भावे थे नाना जी
नाना जी नहीं रहे. उनका जाना राजनीति में एक युग का अवसान है. एक ऐसे युग का अवसान जिसे खुद नानाजी देशमुख ने बानाया था. वे राजनीति में उस नैतिक साहस के प्रतीक थे जो बिनोबा भावे के बाद किसी और राजनीतिज्ञ में दिखाई नहीं देता. आज भले ही नानाजी हमारे बीच नहीं है लेकिन उनका काम काज और कीर्ति सदा अमर रहेगी....
image
पंडवानी की पुरखिन दाई: श्रीमती लक्ष्मी बाई
महज चौथी कक्षा तक स्कूली पढ़ाई करने के बाद श्रीमती लक्ष्मी बाई ने महाभारत का पारायण शुरू कर दिया. उनके पिता दयाराम बंजारे मशाल नाच के प्रख्यात कलाकार थे लेकिन बंजारे ने बेटी को पंडवानी सिखाई. पिता की सिखाई पंडवानी को वे पिछले 45 वर्षों से गा रही हैं और पूरी पंडवानी सुनाने के लिए उन्हें 18 दिन का अनवरत समय चाहिए. डॉ परदेशी राम वर्मा की रिपोर्ट-...
image
माई नेम इज बाल ठाकरे
साल भर पहले की बात है. 26 फरवरी की देर शाम मुंबई के लीलावती अस्पताल में एक बीमार व्यक्ति को रुटीन चेक-अप के नाम पर अस्पताल लाया गया. डाक्टरों ने परीक्षण किया तो उस बीमार व्यक्ति को अस्पताल में दाखिल कर लिया क्योंकि उन्हें फेफड़े में संक्रमण था. संक्रमण सामान्य नहीं था. डाक्टरों ने लंबे समय तक आराम करने की सलाह दे दी. ...
image
कामगार मुले पाहिजे
नागपुर के विभिन्न चौक-चौराहों पर गुजरते वक्त दीवारों पर कामगार मुले पाहिजे और उसके नीचे दो मोबइल नंबर लिखा नजर आता है। इस विज्ञापन को गौर से पढऩे वाले शायद सोचते हो कि बच्चे सस्ते मजदूर होते हैं, इसलिए उनके ही रोजगार के लिए यह विज्ञापन होगा। पर इस विज्ञापन को को पढ़कर इसके पीछे के सामाजिक उद्देश्य के बारे में कोई नहीं जानता है।...
Next
Tags
No tags for this article
सर्वाधिकार (अ)सुरक्षित

विस्फोट.कॉम में प्रकाशित सामग्री पर हमारी ओर से कोई कापीराइट नहीं है.

Powered by Vivvo CMS v4.1.2