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राजनीति के बांका बहादुर को अंतिम सलाम

image दिग्विजय सिंह: 14 नवंबर 1955 से 24 जून 2010

दिग्विजय सिंह का राजनीतिक जीवन न तो इतना लंबा है कि उसकी विधिवत समीक्षा की जाए और न ही उनकी राजनीतिक उपलब्धियां इतनी बड़ी थीं कि उनके निधन पर राष्ट्रीय राजनीतिक शोक का आयोजन किया जाए. मीडिया के लिए भी दिग्विजय सिंह के जाने से बड़ी खबर जसवंत सिंह के भाजपा में वापस आने की बनी. फिर भी दिग्विजय सिंह का भारतीय राजनीतिक परिदृश्य़ से जाना उतनी ही बड़ी क्षति है जितनी बड़ी क्षति माधवराव सिंधिया, राजेश पायलट या प्रमोद महाजन के जाने से हुई थी.

दिग्विजय सिंह को लोग जब भी संबोधन करते थे तो साथ में यह स्पष्टीकरण भी देना होता था कि किस वाले दिग्विजय सिंह की बात कर रहे हैं. जो दिग्विजय सिंह भारतीय राजनीतिक परिदृश्य से हमेशा के लिए ओझल हो गये हैं वे बिहार से आते थे. जमुई के पास गिद्धौर राजघराने के दिग्विजय सिंह पिता कुमार सुरेन्द्र सिंह की इकलौती संतान थे. स्नातक तक की पढ़ाई बिहार में ही हुई उसके बाद वे दिल्ली आ गये और जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय से एमए, एमफिल किया. इसके बाद टोक्यो पढ़ने गये और वहां कुछ वक्त पढ़ाया भी.

भारत लौटे तो राजनीति में सक्रिय हुए. हालांकि 1983 में चंद्रशेखर की भारत यात्रा में उन्होंने सक्रिय हिस्सेदारी की थी और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति में भी सक्रिय रहे थे लेकिन टोक्यो से वापिस आने के बाद मुख्यधारा की राजनीति में पदार्पण किया. 1990 में वे राज्यसभा पहुंचे और चंद्रशेखर सरकार में 1991 में मंत्री बन गये. राजनीति में इस शीर्ष से शुरूआत करनेवाले दिग्विजय सिंह अपने निजी व्यक्तित्व में भी संबंधों को बहुत शीर्ष पर रखते थे. जो लोग दिग्विजय सिंह को नजदीक से जानते थे वे बतायेंगे कि संबंधों को वे हमेशा एक स्तर पर रखते थे. लोधी एस्टेट के अपने घर में वे परिचित और अपरिचित दोनों से एक ही समान मिलते थे. उनके घर के दरवाजे हमेशा मिलने जुलनेवाले लोगों के लिए खुले रहते थे. राजपरिवार से संबंध होने के बावजूद संबंवत: जेएनयू की शिक्षा का असर था कि वे स्तरीय बौद्धिक बहसों में बढ़चढ़कर रुचि लिया करते थे और उनकी चिंता हमेशा दिखती थी कि कैसे लोकतंत्र आम आदमी के हक और हित से दूर होती जा रही है.

अपने 20 साल के छोटे से राजनीतिक कैरियर में वे तीन बार केन्द्र सरकार में मंत्री रहे. पहली बार चंद्रशेखर की सरकार में और दो बार एनडीए सरकार में. लेकिन उनके निजी व्यक्तित्व में मंत्रीपना कभी नहीं आया. हां, यह बात दीगर है कि अपने व्यक्तिगत जीवन में वे थोड़े से रिजर्व भी रहते थे लेकिन अपने सार्वजनिक जीवन में वे खुलकर लोगों से मिलते थे और लोगों के राय मशविरे को पूरा आदर देते हुए स्वीकार भी करते थे. दिग्विजय सिंह सीधी बात करने में विश्वास करते थे. लालू प्रसाद यादव द्वारा रेल बजट पेश किये जाने पर 2008 में जब हमने उनसे प्रतिक्रिया लेने के लिए संपर्क किया था उस वक्त खुलकर उन्होंने कहा था कि लालू जी देश को धोखा दे रहे हैं. वे सीएजी के नियमों का उल्लंघन करते हुए प्रतिबंधित आय को भी रेलवे के मुनाफे में गिना रहे हैं. वर्तमान वित्तवर्ष में जब ममता बनर्जी ने रेलवे पर ह्वाइट पेपर जारी किया तो उनकी बात सही साबित हुई. वे जिसके बारे में जैसा सोचते थे सार्वजनिक जीवन में और निजी बातचीत में बिल्कुल वैसा ही बोलते भी थे.

1994 में जब जार्ज फर्नांडीज ने जनता दल को तोड़कर समता पार्टी का गठन किया तो दिग्विजय सिंह उसके संस्थापक सदस्यों में थे. वे समता पार्टी के प्रवक्ता भी बनाये गये. 1998 में पहली बार उन्होंने बांका से लोकसभा चुनाव लड़ा और विजयी हुए. अगले ही साल फिर लोकसभा के चुनाव हुए और 1999 में भी वे लोकसभा के लिए निर्वाचित किये गये. 2004 में एनडीए के खराब प्रदर्शन के कारण वे बांका से चुनाव हार गये थे लेकिन 2009 में एक बार फिर वे बांका से बतौर निर्दलीय चुनकर लोकसभा में दाखिल हुए. नीतीश कुमार के साथ मतभेद के चलते उन्होंने जनता दल युनाइटेड छोड़ दिया था जिसके कि वे संस्थापक सदस्य रहे थे. दिग्विजय सिंह को हमेशा शिकायत थी कि नीतीश कुमार ने जार्ज साहब (जार्ज फर्नांडीज) के साथ उचित व्यवहार नहीं किया जिसके कारण उनका नीतीश से मतभेद लगातार बढ़ता गया और अंतत: उन्होंने जदयू छोड़ दिया. 2009 के आमचुनाव में जब नीतीश ने जार्ज फर्नांडीज को लोकसभा का टिकट नहीं दिया तो जार्ज फर्नांडीज ने निर्दलीय लोकसभा चुनाव लड़ने का ऐलान किया तो दिग्विजय सिंह ने भी बांका से निर्दलीय मैदान में उतरने का फैसला किया और भारी मतों से विजयी हुए. उनकी सभाओं में जिस तरह से लोगों की भीड़ उमड़ी थी उसे देखकर पर्यवेक्षकों ने मतदान से पहले ही उन्हें भारी मतों से जीतने की भविष्यवाणी कर दी थी. 2009 में वे तीसरी बार बांका से लोकसभा में पहुंचे जो कि बांका लोकसभा सीट के इतिहास में एक रिकार्ड है.

भले ही वे बांका से निर्दलीय जीतकर लोकसभा में पहुंचे हो लेकिन उन्होंने केन्द्र की राजनीति में कभी अपने आपको अप्रासंगिक नहीं होने दिया. अकेले सांसद के रूप में वे यूपीए का सपोर्ट कर रहे थे और पिछले साल मुंबई में एक बैठक का आयोजन करके राष्ट्रीय मोर्चा बनाने की भी कोशिश की थी. एक दफा यह भी खबर आयी थी कि वे जसवंत सिंह के साथ मिलकर कोई राजनीतिक दल बना सकते हैं. लेकिन यह समय का कैसा फेर है कि आज एक साथ दो खबरें आयी जिसमें एक खबर जसवंत सिंह के भाजपा में शामिल हो जाने की है तो दूसरी खबर दिग्विजय सिंह के भारतीय राजनीतिक परिदृष्य से सदा सर्वदा के लिए विदा हो जाने की है.

दिग्विजय सिंह का का महज 55 साल की उम्र में निधन किसी दल विशेष का नहीं बल्कि भारतीय राजनीति का नुकसान है. वे भारतीय राजनीति के ऐसे आक्रामक लेकिन संयत चेहरा थे जो भारतीय राजनीति में उम्मीद की नयी रोशनी लेकर आगे बढ़ रहे थे. उनके गुरुतुल्य प्रभाष जोशी का जब पिछले साल नवंबर में निधन हो गया था तो वे इंदौर पहुंचे थे. उस वक्त वे जिस प्रकार प्रभाष जोशी के पार्थिव शरीर को बेचारगी से निहार रहे थे उससे साफ झलक रहा था, मानो वे कह रहे हों कि आप इतनी जल्दी क्यों चले गये, आपकी कमी अब कौन पूरा करेगा. प्रभाष जी को गये साल भर भी नहीं बीता होगा कि दिग्विजय सिंह भी उसी प्रकार हार्ट अटैक का शिकार हुए और हार्ट अटैक की ही स्थिति में उनको ब्रेन हैम्रेज हुआ और वे कोमा में चले गये. लंदन के अस्पताल में दस दिन जीवन मौत से जूझने के बाद गुरुवार को उन्होंने अंतिम सांस ली. यह महज संयोग ही कहा जाएगा कि जिस दिन प्रभाष जोशी का निधन हुआ वह दिन भी गुरूवार ही था. दिग्विजय सिंह का जाना भी बिल्कुल वैसा ही है जैसे उनको जाननेवाले नजदीक से निहारकर उनके पार्थिव शरीर से ही पूछ रहे हों कि आप इतनी जल्दी क्यों चले गये? आपकी कमी कौन पूरा करेगा?

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sushil Gangwar on 24 June, 2010 23:56;34
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--सुशील गंगवार ---
नास्पीतो काले कोट वालो अग्रेजी में दीपक को शटअप - गेट आउट बोलो ---
सवेरे सवेरे अम्मा खटिया पर बैठी गारी बक रही थी । मेरी आख अचानक खुली तो देखा अम्मा का चेहरा तमतमा रहा था। मैंने पूछा अरे किसको गरिया रही है । अम्मा बोली - नास्पीतो काले कोट वालो अग्रेजी में अपने बालक दीपक को शटअप - गेट आउट बोलो । टीवी पर कितनो सुन्दर लगत है अरे मीडिया का बच्चा है तो मेरे भी बेटा है ।
अम्मा तू किस काले कोट वाले की बात कर रही है । अरे वो कफ़न चोर है जो देश बड़े बड़े लोग के केस लड़त है। नाम मै भूल जाती हू हां लालवानी । अरे अम्मा लालवानी नहीं जेठमलानी है । हां वही जेठमलानी । अम्मा तू ये बता खबर कहा से मिली है । तू छोड़ खबर की ,आज मै जिला प्रचारक से पूछ लेती हू। संघ वाले ऐसे लोगो को राज्य सभा क्यों ले आते है ।
अरे राम लाल जी को पहचानते होगे । जब राम लाल जी , अडवाणी जी , अटल जी , के साथ टीवी में दिखत है तो जा वकील को जानत होगे । पहले राम लाल जी प्रान्त प्रचारक थे अब वे नेता बना गए है । इस लिए तो घर कम आत जात है । अबकी बार आन दे ,मै राम लाळजी से पूछ लेती हू क्या बड़े नेता बना गए जो हम सबको भूल गए । अम्मा तू भी तो ----- जब देश के नेता देश को भूल जाते है फिर तुम हम क्या चीज है ।
तो अम्मा तू फिर गलत रास्ते पर जा रही है । संघ वाले जेठमलानी को राज्यसभा में नहीं लाये है । तू चुपकर , आये न जाये गाना गए । अम्मा चिल्ला कर बोली । संघ वालो के बिना वी जे पी वालो का काम न चले । अरे वी जे पी की जड़े तो संघ में है। मै सब जानू। जेठमलानी बड़े बकील है । बड़े बड़े केस लडे , पर दीपक से ऐसे न बोलना चाहिए ।
दीपक ने पूछ लिया कि आप राज्यसभा में जाने के लिए कुछ भी कर सकते हैं, कभी यह तो कभी वह पार्टी, आप आतंकवादी अफजल की भी पैरवी कर सकते हैं, ऐसे ही कुछ सवाल। जेठमलानी पिनक gaya or बकने लगे-तुम बेवकूफ हो, बिकाऊ हो, कांग्रेस पार्टी ने पूरी मीडिया को खरीद लिया है, तुम लोग अंग्रेजी नहीं जानते, निकल जाओ नहीं तो गार्ड धक्के मार कर निकाल देगा।
अम्मा तू उ बता अब क्या चाहती है । मै मै -------- जेठमलानी मेरे दीपक से माफ़ी मागे ? चलो देखते है । चल अब जा ,मुझे दीपक को सुनन दे । अम्मा ने स्टार न्यूज़ चला दिया ।
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on 25 June, 2010 00:25;28
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संजय जी इस ""सुशील गंगवार"" की टिपण्णी को हमेशा के लिए बैन करिए ये लेख पर टिपण्णी नहीं करता है बस अपना विज्ञापन ही करता रहता है
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krishna on 25 June, 2010 00:50;18
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दिग्विजय सिंह से संभवतः मेरी दो बार की मुलाकात है. दूसरी मुलाकात लोकसभा टीवी पर कोसी की समस्या पर चर्चा के दौरान हुई. उनसे मेरा मतभेद था. वो प्रस्तावित सरकारी समाधान के पक्ष में थे. मगर चर्चा के तुरंत बाद उन्होंने मुझसे उन किताबो और रिपोर्टो की मांग की जिसके आधार पर मैं मौजूदा सरकारी समाधान से समस्या के और बदतर हो जाने की बात कर रहा था. उन्होंने कहा की वो कोसी समस्या के हर पहलू को समझना चाहते है और वैकल्पिक समाधान को लेकर उत्सुक है. चर्चा के दौरान और चर्चा के बाद भी उन्होंने मेरे तर्क को काफी गंभीरता से सुना और उसे और समझने में दिलचस्पी दिखाई जो सराहनीय थी.
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Ram bhuwan Singh Kushwah on 25 June, 2010 08:12;20
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दिग्विजय सिंह का निधन वास्तव में भारतीय राजनीति की अपूर्णीय क्षति है । आलेख बहुत सुंदर और जानकारीयुक्त है । मैं भी स्व. सिंह से एक वार मिला था जैसा अपने बताया वे वैसे ही व्यक्ति थे । मिलने पर लगा की इनसे वर्षों की पहचान हो । जसवंत सिंह को भाजपा में लेना और दिग्विजय सिंह का निधन शायद यूँ तो संयोग ही हो सकता है पर स्वच्छ राजनीति करनेवालों को सम्झना होगा कि नियति भी हमें कुछ संदेश दे रही है। अब दिग्विजय सिंह वहाँ जसवंत सिंह का पक्ष रखेंगे ।
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anuradha on 26 June, 2010 18:26;00
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स्वर्गीय दिग्विजय सिंह का जिस दिन निधन हुआ उसी दिन उनकी छोटी बिटिया का कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए चयन हुआ निशानेबाजी में.
दोनों बेटियों का शालीन स्वभाव प्रतिबिम्ब है उनकी माँ और दिवंगत पिता का.
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