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सिकरिया की 'शांति' यात्रा

image सिकरिया की सरपंच शांति देवी

आज सिकरिया में कोई अपने अतीत को याद नहीं करना चाहता। नक्सल हिंसा वहां के लिए बीते समय की बात हो चुकी है। `लाल मिट्टी´ जो कभी जहानाबाद वालों के लिए आतंक का पर्याय था, जिसकी गिनती लोग-बाग बाथे, सेनारी, मियांपुर, बढ़ैता, कंसारा, दोहिया, पारसबीघा, पेरियारी, चौरम, झुनाठी (करपी थाना), बारा, शंकरबीघा जैसे नरसंहार पीड़ित इलाकों में ही करते थे। पर आज `लाल मिट्टी´ का अर्थ पूरी तरह बदल गया है, अब यह नाम लोगों को आतंकित नहीं करता, बल्कि प्रगति के लिए प्रेरित करता है।

लाल मिट्टी, लाल सलाम इस नाम से सिकरिया की जमीन को आज से महज 7-8 साल पहले तक पुकारा जाता था। इस इलाके में पुलिस भी जाने से घबराती थी। चूंकि जहानाबाद में सिकरिया जाने का साफ सा मतलब था, आप आत्महत्या करना चाहते हैं। यह इलाका पीपुल्स वार ग्रूप और एमसीसी (माओइस्ट कम्यूनिस्ट सेन्टर) का गढ़ रहा है। डाण् वीनियन के नेतृत्व में यहां एमसीसी के कैडर सक्रिय थे। इस जमीन पर कितने लोगों की मौत हुई, इसका सही-सही आंकड़ा किसी सरकारी/गैरसरकारी संस्था के पास उपलब्ध नहीं है। यह इलाका संगीनों के साए में जिया है।

यदि हम सिकरिया के विकास की बात करें और इस पंचायत की 40 वर्षिय दलित मुखिया शांति देवी की बात नहीं करें तो बात अधूरी रह जाएगी। शांति देवी कहती हैं- `एमसीसी, हत्या और हथियार जैसे शब्द सिकरिया के लिए बीते जमाने की बाते हैं। अब यहां के लोगों का सरोकार शिक्षा, विकास और अहिंसा से है।´ शांति देवी अनपढ़ हैं। उनके पति राज वल्लभ प्रसाद की भी पढ़ाई प्राथमिक स्कूल तक ही हो पाई है। वह दिहाड़ी मजदूर हैं और एक दुर्घटना में अपना एक हाथ गंवा चुके हैं। घर की माली हालत बहूत अच्छी नहीं है। इन तमाम विपरित परिस्थितियों के बावजूद गंाव का विकास शांति देवी की प्राथमिकता में रहा है। मामला गांव के हित से जुड़ा हो तो शांति देवी जिलाधिकारी से लेकर राज्य के मुख्यमंत्री तक किसी के सामने बेखौफ खड़ी हो सकती हैं। जिस समाज की एक पूरी पीढ़ी हथियारों के साए में पली-बढ़ी है, शांति देवी उस समाज का प्रतिनिधित्व करती हैं। आज उनके प्रयासों की वजह से वहां के बच्चे हाथों में कलम थाम रहे हैं। स्कूल जा रहे हैं। कम्प्यूटर से परिचित हो रहे हैं। इंटरनेट को जान रहे हैं। आज भी जहानाबाद के बहूत से गांवों में बिजली के तार भी नहीं पहुंचे हैं। सिकरिया भी उनमें से एक है। वहां कम्प्यूटर और इंटरनेट के पहुंचने को कम बड़ी उपलब्धि नहीं कहा जा सकता। गांव में बच्चों को कम्प्यूटर सिखाने के लिए जनरेटर की व्यवस्था की गई है। बच्चों को कम्प्यूटर शिक्षा दे रहे आशु कुमार कहते हैं- `जब मुझे पटना से जहानाबाद बच्चों को कम्प्यूटर पढ़ाने आना था, उस वक्त मैं बहूत डरा हुआ था। लेकिन आकर पता चला, यहां डरने जैसा कुछ भी नहीं है।´

शांति देवी खुद नहीं पढ़ पाई, इस बात की कसक आज भी है उनके मन में है। वह नहीं चाहती कि उनके पूरे पंचायत में कोई उनकी तरह अनपढ़ रहे। वह अपने पंचायत में शिक्षा, स्वास्थ और स्वच्छता पर विशेष ध्यान दे रहीं हैं। उन्हीं की कोशिशों का नतीजा है कि सिकरिया पंचायत में आज हर घर में अपना शौचालय है। उन्होंने गांव में इसके लिए स्वच्छता अभियान चलाया। घर-घर गईं। जिन घरों में शौचालय था, उन्हें साफ-सफाई की बात बताई। जिन घरों में शौचालय नहीं था, उन्हें शौचालय बनाने के लिए प्रेरित किया। इसके लाभ से परिचित कराया। जो लोग इसके लिए खर्च नहीं कर सकते थे, उनकी पंचायत की तरफ से आर्थिक मदद की। उसने पंचायत की महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए स्वयं सहायता समूह का निर्माण कराया। जहां छोटे-मोटे काम करके धीरे-धीरे महिलाएं अपने पांव खड़ी हो रहीं हैं। वह अपने पंचायत में अंधविश्वास और टोने टोटके के खिलाफ भी लोगों को जागरूक करने के लिए अभियान चला रहीं हैं। उनका मानना है,`यदि कोई रोगी है तो उसे डॉक्टर के पास जाना चाहिए। तांत्रि़क के पास नहीं।´

शांति देवी जैसी एक दलित, अनपढ़, घरेलू महिला, जिसने घर के बाहर की दुनिया कभी देखी नहीं थी उसका घर से बाहर निकलना, और सिर्फ घर से बाहर ही नहीं निकलना, अपने गांव को पूरे बिहार के लिए विकास के एक रोल मॉडल के तौर पर खड़ा करना, इतना आसान काम नहीं था। यह काम कोई दृढ़ इच्छाशक्ति वाली महिला ही कर सकती थी, जिसकी कमी शांति देवी में नजर नहीं आती। वह इन उपलब्धियों का श्रेय अपने पति को देती है। इसमें उनका बड़प्पन ही प्रकट होता है। जो सिर्फ काम करने में यकिन रखता है, जिसकी श्रेय लूटने की कोई मंशा नहीं है।बकौल शांति देवी- `यदि पति राज वल्लभ प्रसाद साथ नहीं होते तो मैं अपने गांव को विकास के रास्ते पर इतनी दूर तक कभी नहीं  ला पाती।´ पुराने दिन बड़े कठिन थे सिकरिया के। जिसने उन दिनों को अपनी आंखों से देखा है। आज भी उसे याद करके उनके आंखों में खौफ उतर आता है। करौना (सिकरिया) के लल्लन दास अनुमान से बताते हैं- `लगभग तीन हजार लोगों की मौतें हुईं होंगी यहां।´ वह आगे कहते हैं- सारा जहानाबाद राजाओं से भरा हुआ था। टेकारी राज, अमैन राज, पंडुरी राज, खनकपुरा राज। इन राजाओं के बीच हम गरीबों की हालत बंधुआ मजदूर से भी गई बीती थी। वंचितों के बीच इसी बात से उपजे आक्रोश ने टकराव का रूप ले लिया और जो जहानाबाद में हुए नरसंहारों की वजह बनी।´

सिकरिया को इन नरसंहारों की वजह से `लाल मिट्टी´ और लाल सलाम के नाम से लोग बाग पुकारने लगे थे। लाल मिट्टी इसलिए क्योंकि बताया जाता है, लगातार हुए नरसंहारों की वजह से यहां की मिट्टी का रंग लाल हो गया था। लाल सलाम इसलिए क्योंकि एमसीसी पूरे जहानाबाद में अपनी गतिविधियों को यहीं से नियंत्रित करता था। स्थानीय पत्रकार मृत्युंजय के अनुसार- `वर्ष 1980 से 2002 के बीच लगभग 48 बड़े नसंहार यहां हुए। जिनमें आधिकारिक रूप से 600 लोगों की मृत्यु हुई। जबकि वास्तव में मरने वालों की संख्या हजारों में होगी। यहां छीटपुट मरने वालों को किसी गिनती में ही नहीं रखा गया।´

जब जहानाबाद में नरसंहारों का दौर चल रहा था, उस वक्त महिलाओं और बच्चों की स्थिति क्या रही होगी। वह कितने आतंकित होंगे इन सभी गतिविधियों से? शांति देवी उन दिनों को याद करती हुई कहती हैं - हमेशा यहां आस-पास से गोलियों की आवाज आती थी। लोग बेवजह मारे जा रहे  थे। हमारी जान कभी भी जा सकती थी। उन दिनों सिकरिया में होने का मतलब ही था, बारूद के ढेर पर बैठे होना। वह आगे बताती हैं- `घर के पुरूष तो यहां वहां जाकर छिप भी जाते थे। असली मुिश्कल औरतों के सामने थी। क्योंकि औरतों के मन में अपनी जान बचाने से अधिक डर अपनी इज्जत-आबरू जाने का था।´

अब सिकरिया में पुरानी बात नहीं रही है, उसके पास शांति देवी जैसा नेतृत्वकर्ता है, जिसने जागरूकता कार्यक्रम को अपने पंचायत में अभियान की तरह चलाया है। लोग-बाग को उनके अधिकारों से परिचित कराया। शांति देवी की पहल की वजह से ही `मिशन नवबिहार, आपकी सरकार-आपके द्वार´ योजना के अन्तर्गत राज्य सरकार ने सिकरिया में एक परिसर के अंदर गांव वालों को प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र, पोस्ट ऑफिस, बैंक, स्कूल, कम्प्यूटर प्रिशक्षण केन्द्र, कृषि बाजार, कम्प्यूटराइज्ड सूचना केन्द्र, पंचायत भवन, जनवितरण प्रणाली की दूकान, आदि सुविधाएं उपलब्ध कराई है। समझ लीजिए अब सीकरिया के पास अपना एक ग्रामीण मॉल है। जहां के एक परिसर के अंदर उनकी सारी जरूरतें पूरी हो जाएंगी। नमक से लेकर पोस्ट कार्ड तक सब यहीं मिल जाएगा।

अनपढ़ और दलित महिला शांति देवी का जीवन उन सभी महिलाओं के लिए एक रोड मॉडल हो सकता है, जो सोचती हैं कि वे घरेलू महिला हैं और वे समाज के लिए कुछ नहीं कर सकती। शांति देवी को जो लोग पहले से जानते हैं, वे बताते हैं, मुखिया की जिम्मेदारी मिलने से पहले वह विशुद्ध रूप से एक घरेलू महिला थी। खैर, शांति देवी ने साबित किया है, यदि काम करने का जज्बा हो तो आर्थिक और सामाजिक विषमताएं जैसे रोड़े भी रास्ते से हट जाते हैं।

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ummed Singh Baid Saadhak on 12 November, 2008 15:05;28
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काम-काज के वास्तेे,शिक्षा कहाँ जरुरी.
मन में हो सद्भावना,सच्चाई है जरुरी.
सच्चाई है जरुरी, समझें सारे नेता.
बाँटाढार कर रहे हैं भारत का नेता.
कह साधक जीना भी सीखो देश के वास्ते.
शिक्षा कहाँ जरुरी, काम-काज के वास्ते.
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umesh on 12 November, 2008 15:30;30
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देखिए दुनिया मे कही भी कोई भी आतंकवाद किसी दुश्मन देश (राज्य) की सरकार के सहयोग के बिना नही चल सकता है। यह जानना महत्वपुर्ण ही नही बल्कि निहायत जरुरी है की वामपंथी आतंकवादीयो को कौन सा मुलुक धन एवम योजना उपलब्ध करा रहा है?
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image आशीष कुमार बेतिया से पढ़ना शुरू किया और दिल्ली आकर पत्रकारिता की पढ़ाई पढ़ ली. दसवीं कक्षा पहुंचने तक आधा दर्जन स्कूलों को नाप चुके आशीष कुमार 'अंशु' आजकल एक घुमंतू पत्रकार के तौर पर देश को नाप रहे हैं. लिखते-पढ़ते स्कूली छात्रों के साथ मिलकर मीडिया स्कैन भी निकालते हैं और सोपानस्टेप के लिए घूमते-फिरते कार्यरत भी हैं.
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