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कोयले की खान में हीरा

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अगर मौका मिले तो तिल में ताड़ की ऊंचाई छूने की भरपूर संभावना होती है. ओमप्रकाश, किंसु, कालू, बंटी, अमरलाल ने इसे साबित कर दिखाया है.

ओमप्रकाश भी एक दुबला पतला सा सरकारी स्कूल में पढ़ने वाला लड़का है. जैसे गांव के अमूनन बच्चे शर्मीले होते हैं, वैसा ही ओम प्रकाश भी दिखता है. लेकिन जैसे ही आप उससे बातचीत शुरु करते हैं, आपकी यह धारणा टूट जाएगी. देश-दुनिया को बदलने का उसका जज्बा आप को हैरानी में डाल देगा. उसके साहसिक कारनामों को सुनकर आप भी हमारी तरह ही दांतो-तले उंगली दबा लेंगे. कई देशों की यात्रा कर चुका ओमप्रकाश जैसा दिखता है, दरअसल वैसा है नहीं. हाल ही में वह इटली से दलाई लामा, मिखाइल गोर्वाचोब, बेटी बिलयम और जार्ज क्लूनी जैसी कई और बड़ी हस्तियों को संबोधित करके भारत लौटा है. इतना ही नहीं, बाल अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाले ओम प्रकाश को दुनिया के प्रतिष्ठत पुरस्कार इंटरनेशनल चिल्ड्रेन पीस अवार्ड से नवाजा जा चुका है, जिसे बच्चों का नोबल पुरस्कार भी कहा जाता है.

ओमप्रकाश न तो किसी अमीर बाप का बेटा है और न ही किसी पब्लिक स्कूल का छात्र, जहां "पर्सनालिटी डेवलपमेंट" की ट्रेनिंग दी जाती है. अपने बारे में ओम प्रकाश बताता है, "मेरे दादा ने एक जमीनदार से कर्ज लिया था, जिसके एवज में मेरा पूरा परिवार उनके यहां काम करता था. मैं जब पांच साल का था तभी से उनके यहां काम करने लगा था. मैं खेतों में काम करने के साथ साथ उनके पशुओं की भी देखभाल करता था." ओम प्रकाश एक बाल बंधुआ मजदूर था, जो कभी खेतों में काम करता था. जब बाल मजदूरी से बाहर निकल कर उसे पढ़ने और कुछ करने का मौका मिला तो उसने वह कर दिखाया, जिससे लोग हैरत में है. ओम प्रकाश के सामाजिक सरोकार को देखते हुए राजस्थान के राज्यपाल और मुख्यमंत्री भी उसे सम्मानित कर चुके हैं. उसे राजस्थान गौरव के सम्मान से भी सम्मानित किया जा चुका है. अपनी जाति के गूर्जर में तो वह "लायक बेटे" का दर्जा हासिल कर चुका है. ऐसा सम्मान पाने वाला ओमप्रकाश अकेला नहीं है, उसके जैसे और भी बच्चे हैं, जो कभी बाल मजदूर थे या फिर भीख मांगते थे और सड़कों पर कूड़ा बीनते थे. लेकिन उन्हें भी जब पढ़ाई का मौका मिला तो नन्हीं उम्र में उन्होंने भी साबित कर दिया है कि वे दुनिया बदलने का माद्दा रखते हैं. बंटी, अमरलाल, कालू, राकेश सदा, किंसू कुमार और शम्सुर... ऐसे कुछ नाम हैं जो कभी गुमनाम थे, लेकिन आज दुनिया की जबान पर हैं.

राजस्थान के अलवर जिले के सराधना गांव के रहने वाले 16 वर्षीय ओम प्रकाश के खाते में कई उपलब्धियां दर्ज हैं. स्कूल से लौटने के बाद ओम प्रकाश गांवों में निकल जाता है. जहां कहीं भी उसे कोई बच्चा खेतों या ढ़ाबों में काम करता दिख जाता है, वह उसे मुक्त कराने की कोशिश करता है. ओम प्रकाश गांव के लोगों को समझा कर बच्चों और खासकर लड़कियों को स्कूल भेजने के लिए प्रेरित करता है. ओम प्रकाश से हमारी मुलाकात राजस्थान की राजधानी जयपुर के पास स्थित विराट नगर के मुक्ति आश्रम में होती है. बाल मजदूरी के खिलाफ काम करने वाली गैर सरकारी संस्था बचपन बचाओं आंदोलन (बीबीए) द्वारा संचालित मुक्ति आश्रम में बाल और बंधुआ मजदूरी करने वाले बच्चों को मुक्त कराकर उन्हें अनौपचारिक शिक्षा व व्यावसायिक प्रशिक्षण तो दिया ही जाता है, साथ ही उनमें समाज और देश के लिए कुछ करने का जज्बा भी पैदा किया जाता है. बंटी, अमरलाल, कालू, राकेश सदा, किंसू कुमार और शम्सुर आदि ने आज जिन बुलंदियों को छूआ है, उसकी बुनियाद यहीं से पड़ी थी. ये बच्चे सामाजिक बुराइयों के खिलाफ अलख जगाए हुए हैं. ओम प्रकाश ने जब अपने ही घर में सामाजिक बुराइयों को पैदा होते देखा तो उसने अपने पिता के खिलाफ ही विद्रोह कर दिया. ओम प्रकाश उस घटना को याद करते हुए बताता है, "करीब दो साल पहले जब मेरे पिता ने मेरी नाबालिक बहन की शादी तय की तो मैंने इसकी खिलाफत की. मेरे पुलिस में इस बारे में रिपोर्ट करने की धमकी पर ही उन्होंने आखिरकार विवाह रद्द किया."

अलवर जिले थानागाजी ब्लाक के 500 बच्चों का जन्म पंजीकरण करा कर ओम प्रकाश ने एक इतिहास भी रचा है. अनपढ़ ग्रामीणों को ओम प्रकाश ने न केवल इसका महत्व बताया, बल्कि साथ ले जाकर पंजीकरण भी कराया. जन्म पंजीकरण प्रमाणपत्र बच्चे की पहचान का ऐसा दस्तावेज है जिसके आधार पर ही उसे सरकारी योजनाओं का लाभ मिलता है. ओम प्रकाश हमेशा सामाजिक बुराइयों के खिलाफ लड़ता रहता है. ओम प्रकाश ने एक बार जब देखा कि सरकारी स्कूल में दाखिले के दौरान बच्चों से विकास शुल्क के नाम पर जबरन पैसा वसूला जा रहा है तो उसने इसकी शिकायत पहले तो प्रधानाचार्य से की, जब प्रधानाचार्य ने इस पर ध्यान नहीं दिया तो ओमप्रकाश ने अभिभावकों से विकास शुल्क की रसीदें इकठ्ठी कर एक रिपोर्ट तैयार की और इसकी शिकायत राजस्थान के मानवाधिकार आयोग से की. आयोग ने जांच में इसे सही पाया और राज्य सरकार को इस पर कार्रवाई करने का आदेश दिया. ओमप्रकाश के मुताबिक, "मानवाधिकार आयोग में शिकायत के चलते स्कूल को अभिभावकों को विकास शुल्क वापस करने के लिए मजबूर होना पड़ा." ओम प्रकाश की इन उपलब्धियों के चलते उसे हेग स्थित नीदरलैंड की संसद में दक्षिण अफ्रीका के पूर्व प्रधानमंत्री और नोबल पुरस्कार विजेता फैडरिक विलयम डी क्लार्क ने 19 नबंबर, 2006 को इंटरनेशनल चिल्ड्रेन पीस अवार्ड देकर सम्मानित किया. पुरस्कार प्रदान करने वाली हालैंड की सामाजिक संस्था किड्स राइट्स पुरस्कृत बच्चे के सम्मान में करीब 45 लाख रूपये बच्चों के लिए काम करने वाली किसी संस्था देती है. ओम प्रकाश अपने स्कूल में बनाई गई बाल पंचायत का निर्वाचित सरपंच भी है.

बिहार के मधेपुरा के मुरोह गांव के आठवीं में पढ़ने वाले बंटी कुमार को हाल ही में पोगो अमेजिंग किड्स अवार्ड (लीडरशिप कैटेगरी) से नवाजा गया है. कभी ईट-भट्टे में काम करने वाले 15 साल के बंटी कुमार को यह पुरस्कार इसलिए दिया गया कि उसने ईट-भट्टे में काम करने वाले अपने गांव के करीब 60 बच्चों को नर्क की जिंदगी से निकाल कर स्कूल का रास्ता दिखाया. बंटी के मुताबिक, "भट्टे से बाल मजदूर के रूप में मुक्त होने के बाद मुझे मुक्ति आश्रम में शिक्षा का महत्व पता चला. यहां से अनौपचारिक शिक्षा लेने के बाद जब मैं गांव गया तो वहां मेरे माता-पिता मेरे स्कूल जाने का विरोध करते थे. लेकिन मैं खुद तो स्कूल जाता ही, साथ में भट्टे पर काम करने वाले गांव के अन्य बच्चों को स्कूल जाने के लिए प्रेरित भी करता. मुक्ति आश्रम में मैने शिक्षा पर कुछ नुक्कट नाटक किए थे. गांव में कुछ बच्चों की टोली तैयार कर मैं लोगों के बीच नुक्कड नाटक करने लगा. इससे लोगों में चेतना आई और वे अपने बच्चों को स्कूल भेजने के लिए तैयार हो गए." बंटी का चयन इस प्रतियोगिता में भले ही हो गया था, लेकिन बंटी को आखिर तक उम्मीद नहीं थी कि उसको यह पुरस्कार मिलेगा. बंटी बताता है, "वहां तो सब बड़े-बड़े पब्लिक स्कूल के अंग्रेजी बोलने वाले बच्चे आए हुए थे." बंटी को जब यह पुरस्कार मिला तो उसे घरों और भट्टों पर काम करने वाले बच्चे बहुत याद आए. पोगो किड्स अवार्ड मिलने के बाद जब बंटी को सम्मानित करने आमिर खान पहुंचे तो बंटी एक गुजारिश सुन कर दंग रह गए. बंटी के मुताबिक, "मैने आमिर खान से बाल मजदूरी करने वाले बच्चों पर एक फिल्म बनाने की बात कही की और आमिर खान ने मुझसे ऐसी फिल्म बनाने का बादा भी किया." बंटी को पोगो अवार्ड में जो पांच लाख रूपये मिले हैं उन्हें भी वह अपने ऊपर नहीं, गरीब बच्चों के उत्थान के लिए खर्च करना चाहता है. बंटी की आखों में एक ऐसे समाज का सपना है जहां कोई गरीब और भूखा न रहे. यही वजह है कि बंटी बडा होकर समाजसेवी बनना चाहता है.

तेरह साल का किंसू कुमार... हंसी और ठहाकों से तो उसका चोली-दामन का साथ है. उसकी जिंदादिली को देखकर नहीं लगता कि कभी वह उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले में जीप पर खलासी का काम करता रहा होगा. पढ़ने में होनहार किंसू ने सातवीं में स्कूल में प्रथम स्थान प्राप्त किया है. किंसू की प्रतिभा को देखकर लोग हैरान हो जाते हैं. वह जापानी दल भी किंसू की प्रतिभा का कायल हो गया था, जो भारत में बाल मजदूरी पर शोध करने आया था. किंसू को बाल मजदूरी से संबंधित सारे नियम-कानून रटे पड़े हैं. वह जितनी अच्छी तरह से क्रांतिकारी गीत गाता है उतनी अच्छी तरह से नुक्कड नाटकों में अभिनय भी करता है. उसकी इसी प्रतिभा को देखते हुए उसे अमेरिका के वाशिंटन में संपन्न हुए ग्लोबल कंपेन फार एजुकेशन के सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए खासतौर से आमंत्रित किया गया था. जहां उसने अमेरिकी सीनेटर, दुनिया कई देशों के शिक्षा मंत्रियों व सासंदों और शिक्षाविदों को संबोधित भी किया. सम्मेलन में आए ब्रिटेन के प्रधानमंत्री गार्डेन ब्राउन भी किंसू के मुरीद हो गए. अपने स्वभाव के मुताबिक मुस्कराते हुए किंसू कहता है, "मैं वहां सभी देशों के शिक्षा मंत्रियों से अपील की की वे लोग अपना शिक्षा का बजट बढ़ाएं.ताकी सभी बच्चों को मुफ्त शिक्षा मिल सके." कभी कूड़ा बीनने और मध्य प्रदेश के शिवपुरी की पत्थर खदानों में काम करने वाला अमर लाल यूनेस्कों की "सभी के लिए शिक्षा" (एजूकेशन फार आल) के मकसद से बनाई गई उच्च स्तरीय समिति (हाई लेबल कमेटी) का सदस्य है. वह इस मिटिंग में हिस्सा लेने सेनगल गया था. वह वकील बन कर लोगों को न्याय दिलाना चाहता है.

सोलह साल का कालू कारपेट बुनता था, लेकिन वह अब भविष्य के सपने बुन रहा है. बचपन के दिनों में जब उसके खेलने खाने के दिन थे, तब उसकी नन्हीं उंगलियां कारपेट के धांगों से खेलने के लिए मजबूर थी. अंधेरी कोठरी में लंबे समय तक काम करने से उसका रंग काला पड़ गया और नाम पड़ गया कालू. कालू आज बाल दासता का प्रतीक बन गया है. खैर, इस समय वह पढ़ लिख कर अपनी किस्मत संवारने में लगा है. वह नौवीं कक्षा का होनहार छात्र है. अपनी अदम्य जिजिविषा के लिए चर्चित कालू को 1999 में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने भोज पर आमंत्रित किया था. बाल मजदूरी के खिलाफ बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेने की वजह से कालू को जर्मनी की प्रसिद्ध गैर सरकारी संस्था ब्रेड फार द वर्ल्ड ने कालू को उन पचास लोगों की सूची में शामिल किया है जो दुनिया को बदलने में जुटे हुए हैं.

ओम प्रकाश, बंटी, अमर लाल, किंसू और कालू....एक उम्मीद हैं. जो लोग समाज बदलने और दुनिया से गरीबी मिटाने में जुटे हुए हैं उनके लिए ये एक मिसाल भी हैं. इन बच्चों ने साबित किया है कि अगर समाज के हाशिए पर खड़े उन बच्चों को, जिन्हें पेट भरने के लिए मजदूरी करनी पड़ रही है, उन्हें भी शिक्षा और ज्ञान का अवसर मिले तो दूसरों के मुकाबले वे कहीं बेहतर कर सकते हैं. उनका जो सामाजिक सरोकार हमें दिखा है, वह शिक्षा के तथाकथिक आधुनिक संस्थानों और मंहगें पब्लिक स्कूलों के बच्चों में दिखाई नहीं देता. इस मामले में ये "स्ट्रीट चिल्ड्रेन" सभ्य समाज के हाइटेक "स्मार्ट चिल्ड्रेन" पर कहीं भारी पड़ते हैं.

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sanjay swadesh on 28 December, 2008 20:31;49
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aisi kahbar akhbar me kam hi aati han shandar report k liyebadhe!!
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sunita on 15 January, 2009 16:29;21
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lekkh padh kar maan gad gad ho gaya is tarh ka itna maan ko chu lene wala lekha likhen ke liye meri dher sari hardik badhai.
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image अनिल पाण्डेय पत्रकारिता में मास्टर डिग्री. नई दिल्ली से प्रकाशित दैनिक समाचारपत्र जनसत्ता में पांच साल तक संवाददाता. इसके बाद माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग में पांच साल तक व्याख्याता के तौर पर कार्य किया. वर्तमान में 13 भाषाओं में प्रकाशित साप्ताहिक पत्रिका द संडे इंडियन में प्रमुख संवाददाता के रुप में कार्यरत.
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