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लोकतंत्र के गुणात्मक स्वरूप में गिरावट

image इंडिया पालिसी फाउण्डेशन द्वारा आयोजित गोष्ठी में उपस्थित वक्तागण

विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत के संसद के सामाजिक सरोकार को समझने के लिए इसके सामाजिक आधार एवं संरचना को बारीकी से समझना होगा। 15वीं लोकसभा का सामाजिक आधार भारतीय सामाजिक और राजनीतिक जीवन को कितना प्रतिबिम्बित करती है और लोकसभा का विरासत से कितना मेल खाता है? जैसे कुछ प्रश्न भारत नीति प्रतिष्ठान के द्वारा आयोजित गोष्ठी में उठाया गया। यह गोष्ठी प्रतिष्ठान के शोध कार्य ``15वीं लोकसभा के सामाजिक आधार का अलोचनात्मक अध्ययन´´ के पूर्ण होने पर आयोजित की गई थी।

यूं तो कुल सदस्यों के तीन चौथाई स्नातक या स्नातकोत्तरों हैं परंतु सदन में बहस का स्तर लगातार गिरा है। भारत सरकार के अर्जुन सेन गुप्ता समिति के अनुसार देश के 84 प्रतिशत आबादी प्रतिदिन 20 रुपये या इससे कम कमाई पर अपना जीवनयापन कर रही है। वहीं 15वीं लोकसभा में 306 सदस्य करोड़पति हैं। ज़ाहिर है उदारीकरण का सीधा प्रभाव चुनाव एवं लोकतांत्रिक संस्थाओं  पर हुआ है।  इसी प्रकार चुनाव के दौरान युवा भागीदारी एवं प्रतिनिधित्व को लेकर बहस चलायी गई। देश के 15वीं लोकसभा में 25-40 आयु वर्ग के केवल 79 सदस्य ही हैं जबकि पहली लोकसभा में संख्या 112 थी। और ये युवा सदस्य भी कोई 1974 जैसे राजनीतिक एवं लोकतांत्रिक आंदोलनों की उपज नहीं बल्कि राजनैतिक परिवारों प्रश्रय एवं वंशवादी राजनीति की देन है। 15वीं लोकसभा में 14वीं लोकसभा की तुलना से कई अधिक यानी 20 प्रतिशत अधिक सांसद हैं जिन पर हत्या, लूटपाट और बलात्कार जैसे संगीन अपराधों के लिए मुकदमा चल रहा है। अकेले भाजपा और कांग्रेस को मिलाकर ऐसे 85 दागी सांसद हैं। परिसीमन के बाद अनुसूचित जाति तथा जनजातियों के लिए आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों में बढ़ोत्तरी हुई है। लेकिन गौरतलब है कि इन क्षेत्रों में राष्ट्रीय राजनीतिक दलों मूलत: कांग्रेस एवं भाजपा का वर्चस्व बना रहा है।

जानकारों ने लोकतंत्र की इस बढ़ती कुलीनता और बिगड़ती तस्वीर पर चिंता व्यक्त की। शोधकर्ताओं ने आंकड़ों के आधार पर यह सावित करने की कोशिश की कि लोकतंत्र की सर्वोच्च सदन की स्थिति समय के साथ बदल रही है। लोकतंत्र का ढ़ाचागत आधार और क्रियात्मक पक्ष तो अपनी- अपनी जगह स्थिर है परंतु इसके गुणात्मक स्वरूप में गिरावट आ रही है।

लोकसभा में आपराधिक छवि वाले संसदों की संख्या में भी अप्रत्याशित वृद्धि हुई है और लोकतंत्र के लिए यह सबसे अधिक चिंता का विषय है। 15वीं लोकसभा में 211 सांसदों ने  अपने को किसान घोषित किया है। कई `किसान सांसद´ राजनैतिक परिवारों से आते हैं। पर विड़म्बना यह है कि किसानों की बदहाली इस कदर बढ़ती जा रही है कि वे बड़ी संख्या में आत्महत्या कर रहे हैं। लोकसभा में ट्रेड युनियन, पत्रकारिता, लेखन तथा सामाजिक कार्य  का प्रतिनिधित्व करने वालों की संख्या नगन्य  है। यह संसदीय लोकतंत्र के घटते सामाजिक सरोकार का ही परिचायक है।

संगोष्ठी में उपस्थित विशेषज्ञों ने लोकतंत्र के स्वास्थ्य पर चिंता व्यक्त की।  राजनीतिविद् श्री अनिल ठाकुर के अनुसार दक्षिण भारत के प्रति संसदीय सीट एक उम्मीदवार सौ करोड़ रुपये तक खर्चा कर सकता है। आश्चर्य नहीं की देश का लोकतंत्र करोड़पतियों के गिरफ्त में चला जाए। अब तक के सभी लोकसभाओं को कवर कर चुके वरिष्ठ पत्रकार श्री मनमोहन शर्मा का मानना था कि संसद में ऐसे लोग चुनकर आते हैं जो संसद की मर्यादाओं के  समझ नही है। राजनीतिकों में भ्रष्टाचार इस प्रकार घर कर चुका है कि हर आम व्यक्ति राजनीतिक के प्रति घृणा का भाव रखता है। इसीलिए वोटिंग का प्रतिशत गिर रहा है। यह स्थिति लोकसभा के भविष्य के लिए जानलेवा सावित होगी। 

प्रो0 सुषमा यादव के अनुसार संसदीय मर्यादा और निर्वाचन क्षेत्रों की वास्तविकता दो अलग चीजें है जिनके बीच तालमेल बैठाना मुश्किल है। जनसत्ता के वरिष्ठ पत्रकार श्री सतीश पेडणेकर जी के अनुसार यह एक समयोचित अध्ययन है जो लोकतंत्र की स्थिति पर एक बहस को जन्म देगी। प्रतिष्ठान के मानद निदेशक प्रो. राकेश सिन्हा ने कहा कि लोकतांत्रिक आंदोलनों से उपजी युवा नेतृत्व और व्यवस्था के द्वारा मनोनीत किया गया युवा नेतृत्व के बीच के अंतर को समझना चाहिए। उदाहरण के तौर पर 1974 के जय प्रकाश आंदोलन के बाद देश की राजनीति में युवा नेतृत्व को स्थान मिला था और यही  युवा भागीदारी का एक मापदंड होना चाहिए। संसद सुविधाभोगियों का अखाड़ा बनता जा रहा है और किसी भी राजनैतिक विचारधारा के व्यक्ति स्थिति से व्यथित होंगे।

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anurodh paswan on 16 November, 2009 22:34;17
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Congrats to Indiaa policy Foundation for taking serious issues. we need to discuss role and social base of indian parliament.
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anurodh paswan on 16 November, 2009 22:34;17
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