पुण्यतिथि के बहाने आरक्षण के फसाने
26 नवंबर को जब सारा देश मुंबई में हुए हमलों को याद कर रहा था ऐसे वक्त में लोग यह भूल गये कि ऐतिहासिक रूप से यह दिन देश के पहले दलित राष्ट्रपति के आर नायारणन की पुण्यतिथि भी थी. उनके जन्मदिन के अवसर पर दिल्ली में राष्ट्रवादी अम्बेडकरवादी महासंघ ने एक सेिमनार का आयोजन किया. इस सेमिनार का विषय था- दलित हिन्दुओं के सामने चुनौतियां. सेमीनार में दलितों के सवाल पर विस्तार से चर्चा की गयी.
भारत में आरक्षण की शुरुआत लाभ उठाने की नीति थी, आज यह वोट उठाने की रणनीति बन गई है. यह राजनीति की एक ऐसी कड़ी बन गयी है जिसे थामकर हर कोई सफेदपोश राजनीतिक उंचाइयों को छूना चाहता है, वास्तव में देखा जाय तो आजादी के बाद दबे कुचले दलितों के खेवनहार बाबा साहब के प्रयासों से मात्र दस वर्षों तक आरक्षण का प्रावधान बनाया गया लेकिन वोट के कारिदों की बदौलत यह इक्कीसवीं सदी तक पहुंच चुका है. उसमें भी अब यह तुर्रा कि गैर दलितों अर्थात ऐसे लोगों को जो दलित से मुस्लिम और इसाई बन गये उन्हें भी इस आरक्षण का लाभ दिया जाय।
जाहिर है इसका विरोध होगा, कोई क्यों अपनी थाली का भोजन दूर चले गये भाइयों के साथ बॉंटे ,वो भी इस इक्कीसवीं सदी में, इसी मुददे पर छब्बीस नवंबर के दिन राष्ट्रवादी अंम्बेडकरवादी महासंघ द्वारा पूर्व राष्ट्रपति के आर नारायणन की पुण्यतिथि एवं संविधान दिवस के अवसर पर एक सेमिनार का आयोजन किया गया जिसका विषय था ``हिन्दू दलित के समक्ष चुनौतियॉ´´ं सेमिनार को संबोधित करते हुए पूर्व मंत्री एवं राष्ट्रवादी अम्बेडकर संघ के प्रमुख डॉं संजय पासवान ने कहा कि वर्तमान समय में सबसे अधिक संख्या में दलित ही गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रहे हैं। अच्छा होता कि यह पूर्व मंत्री दलितों के लिए किये गये अपने कार्यों को बतलाते, वास्तव में यदि देखा जाय तो दलितों की दीन हीन दशा का कारण स्वयं दलित भी हें आगे बढ गये दलितों ने कभी पिछडों को आगे बढ़ाने के प्रयास नहीें किये वो लोग अपने ही साथियों के सिर पर पैर रख कर आगे बड़ गये यह बात मंचासीन कई व्यक्तियों ने स्वीकारी भी, ये जरूर सोचने की बात है कि देश का एक बड़ा तबका आजादी के बाद से ही आरक्षण का लाभ उठा रहा है, स्कूल से लेकर नौकरी और प्रमोशन तक फिर भी देश की सर्वाधिक भुखमर जनता में वो शामिल हैं ऐसा क्यों, क्या वर्तमान समय मैं भी उनहें किसी खास जाति के नागरिक होने का खामियाजा भुगतना पढ़ रहा है? यदि ऐसा है तो फिर क्यों इतनी भीड़ इस वर्ग का नागरिक बनने की होड़ में है ,क्या यह विचारणीय प्रश्न नहीं है?
आरक्षित क्षेणी में आने के लिए आन्दोलनरत लोगों में बड़ी संख्या में वे दलित लोग हें जिन्हें दलित रहना गंवारा नहीं था सो उन्होंने अपना धर्म बदल लिया, धर्म क्या बदला ईसाइ मिशनरियों के लालच में ये लोग आये और अब ईसाइयों में ही इनकी औकात दो कौड़ी की नहीें है। सेमिनार में पधारे दलित इसाईयों के प्रतिनिधि आर एल फ्रांसिस ने बताया कि गुजरात में ईसाइयों की चर्चों में दलित इसाई प्रवेश नहीें करने दिया जाता वहां ऐसे लोगों के लिए अलग चर्च बनाइ गइ है, साथ ही उन्होंने इसाई मिशनरियों से मांग की कि भारत में धर्म प्रचार के लिए खर्च किया जाने वाला पैंसा सोलह करोड़ हिन्दू दलितों के उद्धार के लिए खर्च किया जाय,दलितों में आरक्षण की जो मांग उठ रही है उसमें इसाई दलितों के अलावा बड़ी संख्या में दलित मुस्लिम भी हैं, इस बहुउद्देशीय सेमिनार में बाबा साहब एवं नारायणन जी के विषय में चर्चा हुई। पूर्व राष्ट्रपति नारायणन के ओ एस डी भी यहां मौजूद थे।
समापन करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरसंघचालक दत्तात्रय होसबोले ने कहा कि मतान्तरण करने वालों में निन्यानबे प्रतिशत अनुसूचित जाति के लोग हैं। बकौल दत्तात्रय उन्होंने एक सर्वे भी दलितों के भारत भर में फैले हॉस्टिलों में किया और देखा कि दलित कितनी दयनीय हालातों में गुजर बसर करते हैं, पर दत्तात्रय साहब ने इसका जिक्र ही नहीें किया कि जब उनके पास सत्ता की ताकत थी तब उन्होंने दलितों के लिए क्या काम किये? दलितों का विकास दलितों का उद्धार दलितों की उन्नति की चर्चा सेमिनार में छायी रही, एक बात जो बार-बार आई और चली गई वह थी दलितों के पिछडेपन के लिए दलित ही जिम्मेदार हैं। आगे बढ़ गये दलितों ने पिछड़ों को आगे नहीं बढ़ने दिया। वर्तमान स्थितियों में भी मुस्लिमों एवं इसाई दलितों के लिए स्थापित आरक्षित वर्ग यही इतिहास तो नहीं दोहरा रहा?
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