मानवता के हित में है तिब्बत की स्वायत्तता
तिब्बत की आजादी का संघर्ष गत पांच दशकों से जारी है। चीन द्वारा अपना प्रभुत्व स्थापित करने के लिए तिब्बती नागरिकों का दमन किए जाने के कारण वे निर्वासित होकर भारत में रहने के लिए मजबूर है। किसी भी स्वतंत्र राष्ट्र पर जबरन आधिपत्य एक गंभीर मानवीय मसला है और पड़ासी देश के नाते भारत के लिए भी यह स्थिति घातक है।
भारत-तिब्बत की सांस्कृतिक विरासत समान है। चीन की चाल को नाकाम करने और तिब्बत को बचाने के लिए हिमालय बचाना आवश्यक है। इसी में राष्टहित भी निहित है। 1960 के दशक में डा. राममनोहर लोहिया की प्रेरण से आयोजित हिमालय बचाओं सम्मेलन इसकी महत्वपूर्ण कड़ी थी। इसी प्ररिप्रेक्ष्य में हिमालय की रक्षा आज भी प्रांसगिक है। इसका संज्ञान लेते हुए डा. राममनोहर लोहिया जन्म शताब्दी महोत्सव के दौरान नागपुर स्थित डा. लोहिया अध्ययन केंद्र में हिमालय बचाओ, तिब्बत बचाओ विषय पर व्याख्यान कार्यक्रम का आयोजन हुआ।
इसमें बोलते हुए भारत तिब्बत मैत्री पत्रिका के संपादक डॉ मनोज कुमार ने कहा कि तिब्बत की स्वायता देश की राष्ट्रीयता और मानवीय हित का मुद्दा है। केंद्र सरकार को हिमाालय पर अपनी स्पष्ट नीति बनानी चाहिए। वे लोहिया अध्ययन केंद्र में आयोजित हिमालय बचाओं, तिब्बत बचाओं कार्यक्रम में बतौर प्रमुख वक्ता बोल रहे रहे थे। डा. कुमार ने कहा कि डा. राममनोहर लोहिया ने संसद में तिब्बत और हिमालय को लेकर एक स्पष्ट राष्ट्रीय नीति बनाने के लिए कई बार अवाज उठाई थी। उनके उठाये हुए सवाल आज भी प्रासंगिक है। भाजपा और कांग्रेस आज इस मुद्दे पर खामोश है। समाजवादी पार्टी में यह मुद्दा पूरी तरह से हाशिये पर चला गया है। जो लोग हिमाालय बचाओ ंआंदोलन से जुड़े हैं, वे इसके लिए समय-समय पर प्रयास कर रहे हैं।
उन्होंने कहा कि चीन ने तिब्बत को पूरी तरह से कब्जे में कर लिया है। अपने यहां के लोगों को तिब्बत में बसा दिया है। स्थिति यह हो गई है कि तिब्बत के मूल निवासी हाशिये पर हैं। उनके साथ अमानवीय व्यवहार होता है। तिब्बत को कई क्षेत्रों को विभाजित कर चीन ब्रृहद तिब्बत के नाम पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भ्रम फैला रहा है। उन्होंने कहा कि इस तरह से चीने तिब्बत के कई क्षेत्रों का अस्तित्व ही मिटा दिया है। 1962 में हुए युद्ध के दौरान कब्जा किए भारत के जमीन के एक-एक इंच को वापस लेने का प्रस्ताव संसद में पारित हुआ था। पर आज एक इंच जमीन वापस लेने की बात तो दूर, उल्टे चीन भारत का एक-एक इंच जमीन हड़पते जा रहा है। इस मुद्दे पर पर हिमालय बचाओ के प्रतिनिधि मंडल भारत सरकार से मिलते हैं तो सरकार यह कहती है कि यह समान्य प्रक्रिया का एक अंग है। एक दूसरे देश के सेना आती-जाती है तो अपने निशान छोड़ जाती है। उन्होंने कहा सरकार पूरी तरह से चीन के दवाब में है। कभी-कभी काफी हो-हल्ला होने पर संसद के शुन्यकाल में कोई सदस्य इस मुद्दे को उठाता है, फिर बात आई गई हो जाती है।
डा. कुमार ने कहा कि भारत और तिब्बत का सांस्कृतिक संबंध का स्वरूप काफी विशाल है। इसमें किसी भी तरह का हस्तक्षेप एक शांत जल में पत्थर फेंकने जैसा है। भारत तिब्बत को अपने से अलग करके नहीं देख सकता है। जब से दलाई लामा भारत के शरण में हैं। चीन पूरी तरह से तिब्बत की संस्कृति को नष्ट करने में जुट गया है। लोहिया अध्यक्ष केंद्र के हरीश अड्यालकर ने कहा कि चीन भारत में आर्थिक साम्राज्यवाद फैला रहा है। देश की कोई ऐसी वस्तु नहीं है जो चीन उपलब्ध नहीं करा रहा हो। चीन भारतीय बाजारों में दीपावली के दिये से लेकर मूर्तियां तक बेच रहा है। इससे देश के कुटीर उद्योगों को गहरा धक्का लगा है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे ओम प्रकाश मिश्र ने कहा कि सबसे दु:खद स्थिति तो यह है कि हिमाालय की गोद में स्थित लाखों लोगों के श्रद्धा का प्रतीक कैलाश मानसरोवर चीन के कब्जे में है। तिब्बत को भारतीय और अंतरराष्ट्रीय महत्व को समझते हुए उस कालखंड में डा. राममनोहर लोहिया ने जो बात कही थी, वह आज प्रासांगिक है। यह एशिया का मध्य स्थल है। एक तरह से यह दुनिया की छत है। इसी छत पर कब्जा करने की नियत से चीन ने तिब्बत में हांग जाति के लोगों का बसाया। चीन के कुटिल दुश्चक्र से तिब्बत में मूल तिब्बतवासी अल्पसंख्यक हो गए हैं। यहां तिब्बत ने कई सामरिक व्यवस्था कर रखी है, जिसके निशान पर देश के कई प्रमुख केंद्र हैं। उन्होंने कहा कि संतलुज, सिंधु और ब्रह्मपुत्र नदियां हिमालय की गोद से निकलती हैं। चीन इन नदियों का उपयोग आणविक परियोजनाएं तैयार करने में लगा है, जिससे पर्यावरण को भारी नुकसान होगा। उसका सीधा असर भारत पर पड़ेगा। उन्होंने कहा कि चीन से तिब्बत की मुक्ति भारतीय अस्मिता और राष्ट्रीयता और मानवीय दृष्टि से बेहद जरूरी है। इसलिए भारत सरकार को हिमालय बचाओ-तिब्बत बचाओं पर अपनी एक स्पष्ट नीति तैयार कर देश की राष्ट्रीयता और मानवीयता की रक्षा करनी चाहिए। कार्यक्रम में नगर के कई प्रबुद्ध लोग उपस्थित थे। हिंदी तिब्बत मैत्री संघ के महाराष्ट्र प्रदेश अध्यक्ष अमृत बंसोड के आभार प्रदर्शन के बाद कार्यक्रम का समापन हुआ।
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