बीस बरस बाद भी हजार कोस दूर
पूरी कश्मीर घाटी में पिछले दो हफ्ते से जमात-ए-इस्लामी द्वारा गठित हिजबुल मुजाहीदीन जमकर कत्लेआम कर रहा है. राज्य सरकार और राज्य के मुख्यमंत्री फारुख अब्दुल्ला पूरी तरह से नकारा साबित हो चुके हैं. ऐसे ही वक्त में 19 जनवरी 1990 को कश्मीर में बतौर राज्यपाल जगमोहन का प्रवेश होता है.
जिस दिन जगमोहन श्रीनगर हवाई अड्डे पर उतरते हैं उसी रात कश्मीर घाटी में तीन नारे गूंजते हैं. पहला नारा- काश्मीर में रहना है तो अल्लाहो अकबर कहना है. दूसरा नारा- यहां क्या चलेगा?- निजामे मुस्तफा. और तीसरा नारा- हिन्दू औरतों सहित हम पाकिस्तान के साथ हैं.) ये तीनों नारे जमात-ए-इस्लामी द्वारा तैयार किये गये संगठन हिजबुल मुजाहीदीन के लोग लगा रहे थे. 19 जनवरी की रात को कश्मीर घाटी में जो कत्लेआम हुआ उसने कश्मीर को ही नहीं इंसानियत को लहुलुहान कर दिया. श्रीनगर से लेकर दूर दराज के गांवों तक उस दिन दर्जनों कश्मीरी पण्डितों का काटकर फेंक दिया गया. वहां से जो सिलसिला शुरू हुआ वह तब तक जारी रहा जब तक कि कश्मीर पण्डित विहीन नहीं हो गया. आज कश्मीर के सात लाख से अधिक कश्मीरी पण्डित देश और दुनिया के दूसरे हिस्सों में रह रहे हैं.अब श्रीनगर में भी शायद ही कोई कश्मीरी पण्डित बचा हो.
नब्बे के दशक में कश्मीर में पण्डितों के साथ जो कुछ हुआ उससे भले ही कश्मीर से उनकी कहानी खत्म हो गयी हो लेकिन कश्मीर की कहानी यहां खत्म नहीं होती. उल्टे कश्मीर की कहानी यहां से शुरू होती है. जिस इस्लामिक राष्ट्रवाद की अफीम खिलाकर घाटी में आतंकवाद को पैठ दी गयी थी कश्मीरी पंडितों के वहां से जाने के बाद उसने कश्मीरी मुसलमानों को अपनी जद में ले लिया. सीधे तौर पर भले ही कश्मीरी मुसलमानों को निशाना न बनाया जाता हो लेकिन आतंकवाद सिर्फ बंदूक के जरिए ही नहीं आता. गोली किसी पर भी चले शोर सबको सुनाई देता है. और गोली चलने का शोर जो भी सुनेगा वह शांत शायद ही रह सके. पिछले बीस वर्षों में कश्मीर आक्रमण और प्रतिरक्षा की भूमि बन चुका है. जगमोहन अब स्वीकार करते हैं कि आतंकवाद को समाप्त करने के लिए उन्होंने बहुत कुछ ऐसा भी किया जो वे नहीं करना चाहते थे. उनका कहना है कि ऐसा उन्होंने कश्मीर में शांति लाने के लिए किया. आज भी वे अपने कार्यकाल को स्वर्णयुग कहकर परिभाषित करते हैं.
जगमोहन ने जो किया वह अतीत बन गया है. लेकिन वर्तमान यह है कि कश्मीरी पण्डितों की पहचान एक हिन्दू शरणार्थी के तौर पर ही रह गयी है जो अधिकांश जम्मू और दिल्ली में रहते हैं. 19 जनवरी को नई दिल्ली में भारतीय जनता पार्टी द्वारा स्थापित एक प्रतिष्ठान श्यामा प्रसाद मुखर्जी फाउण्डेशन की ओर से नई दिल्ली में एक कार्यक्रम आयोजित किया गया. कार्यक्रम में कश्मीरी लोगों के साथ अपनी "हिन्दू" एकता प्रदर्शित करने के लिए भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी से लेकर ढेर सारे केन्द्रीय पदाधिकारी और कार्यकर्ता मौजूद थे. कश्मीरी पण्डित भी थे लेकिन सिर्फ होने के लिए ही थे. पांचजन्य के संपादक रहे तरुण विजय अपने तेजस्वी भाषण में बार बार कश्मीरी पण्डितों के पलायन को महान राष्ट्र की महान विडंबना बताते हुए हिन्दू एकता में सेंध लग जाने की दुहाई दे रहे थे. अब कश्मीरी पण्डितों की यह हिन्दू एकता वाली छवि उनके हित में है या अहित में? तरुण विजय कह रहे थे कि जो कश्मीरी पण्डित निर्वासन झेल रहे हैं वह भारत माता के माथे पर लगा रक्तरंजित तिलक है. फिर आगे वे कहते हैं कि "हम गुरु तेगबहादुर के वंशज हैं और हम घाटी में हिन्दुओं को लेकर वापस जाएंगे."
कश्मीरी पण्डित सांस्कृतिक इकाई हैं लेकिन संघ उन्हें राजनीतिक मोहरे के तौर पर इस्तेमाल कर रहा है इसलिए उनकी हिन्दू पहचान को उभार रहा है. यह कुछ कुछ वैसे ही है जैसे जमात-ए-इस्लामी ने कश्मीरी मुसलमानों के अंदर से हिजबुल मुजाहीदीन पैदा कर दिया. कश्मीरी पंडितों का इससे कोई भला नहीं होगा. कश्मीर से जो भी निकलकर बाहर आये हैं अव्वल तो वे वापस जाना नहीं चाहते और जाना भी चाहते हैं तो केन्द्र और राज्य सरकारें इस कदर उदासीन हैं कि कोई संभावना ही पैदा नहीं होने दे रही हैं. संघ और किसी अन्य संगठन से अधिक भारत सरकार की यह चिंता होनी चाहिए कि घाटी की "स्थाई" सोच में बदलाव कैसे आये. इसके लिए उसे लंबी रणनीति बनाकर काम करना होगा तभी शायद कश्मीरी पण्डितों और कश्मीर समस्या दोनों का कोई स्थाई समाधान निकल सके.
सुनने में तो ऐसी तेजस्वी बातें अच्छी लगती हैं लेकिन अगर आप संघ समर्थित ऐसे तेजस्वी हिन्दूवादी विचारों का विश्लेषण करेंगे तो पायेंगे इससे कश्मीरी पण्डितों की समस्या सुलझने की बजाय और उलझ जाएगी. कश्मीरी पण्डित पहले कश्मीरी पण्डित है. वे धर्म के रूप में हिन्दू धर्म के अनुयायी हैं लेकिन उससे पहले वे कश्मीरी संस्कृति के वाहक हैं. संकट यह है कि संघ से जुड़े संगठन कश्मीरी पण्डितों को वैसा ही हिन्दू मानकर चलते हैं जिससे उनके राष्ट्रवाद को ताकत मिलती हो. संघ वैसे भी समस्त विश्व के हिन्दुओं को एकसूत्र में पिरोने का महान कार्य कर रहा है. लेकिन कश्मीरी पण्डित सांस्कृतिक रूप से शेष भारत से इतने भिन्न हैं कि केवल धर्म के नाम पर वे शेष भारत के साथ नहीं जुड़ सकते. लेकिन जैसे इस्लाम में व्यक्ति को व्यक्ति से जोड़ने का सिर्फ धर्म ही एकमात्र आधार होता है वैसे ही संघ मानता है कि सिर्फ हिन्दू होने के नाते वे शेष देश से जुड़ जाते हैं. मेरा मानना है कि ऐसा संभव नहीं होगा. कोई भी कश्मीरी पण्डित किसी बिहारी पण्डित के एकदम करीब कभी नहीं होगा भले ही दोनों हिन्दू हों और भले ही दोनों के नाम के साथ पण्डित पदनाम जुड़ा हुआ हो. कश्मीरी पण्डित सांस्कृतिक रूप से घाटी के उन मुसलमानों के ज्यादा नजदीक है जो उन्हीं में से अलग छिटकर मुसलमान बने और आज घाटी में बहुसंख्यक हैं.
जाहिर है, समाधान संघ के रास्ते और सोच से संभव नहीं है. फिर रास्ता क्या हो सकता है? मोटे तौर पर तीन रास्ते दिखाई देते हैं. एक, सरकारी प्रयास. दो,कश्मीरी पण्डितों की अपनी पहल और तीन स्थानीय लोगों की इच्छा. घाटी में कश्मीरी पण्डितों के वापस लौटने का जहां तक सरकारी प्रयास का सवाल है वह शायद कभी ईमानदारी से न की जाए. दुर्भाग्य से आज भी घाटी में राजनीतिक पहल के नाम पर सिर्फ खुफिया एजंसियों और पैरा मिलिट्री फोर्स की मौजूदगी ही है. केन्द्र सरकार ने पिछले साठ साल में शायद ही कभी कोई गंभीर प्रयास किया हो कि घाटी की सोच में "स्थाई बदलाव" आये. आगे भी सरकार कुछ ठोस करेगी इसकी उम्मीद नहीं की जा सकती. दूसरी कोशिश खुद कश्मीरी पण्डितों की हो सकती है कि उनके सैकड़ों संगठन एकसाथ फैसला करें कि घाटी में वापस जाना है. और कूच कर जाएं. आगे जो होगा देखा जाएगा. यह रास्ता बहुत सटीक है लेकिन कश्मीरी पण्डित ऐसा करेंगे नहीं क्योंकि वे जहां हैं, जैसे हैं वहां खुश हैं. जो दुखी हैं वे भी वहीं खुश होना चाहते हैं जहां वे रह रहे हैं. कश्मीर से उनकी यादें सिर्फ सांस्कृतिक हैं जो आगे कई पीढ़ियों तक रहेगी कहना मुश्किल है. तीसरा और अंतिम रास्ता है स्थानीय लोगों की पहल. यही वह एकमात्र कारगर रास्ता है जिसके लिए सरकार और संगठन दोनों ही जी-तोड़ कोशिश कर सकते हैं और जिससे कुछ रास्ता निकलने की उम्मीद भी पाली जा सकती है.
दुर्भाग्य से इसी एक रास्ते के बारे में न तो कश्मीरी पण्डित सोच रहे हैं और न ही कश्मीरी पण्डितों के रहनुमा. हिन्दूवादी संगठन जो रास्ता सुझा रहे हैं वह उस दिन साकार होगा जब कश्मीर से मुसलमानों का सफाया हो जाएगा. वह दिन शायद दोजख के दिन ही आए. तब तक दर दर भटकते कश्मीरी पण्डित भी सांस्कृतिक इकाई की बजाय धार्मिक कठपुतली बन जाएंगे और तिब्बती शरणार्थियों की तरह अपने होने का कोई और ही अर्थ विकसित कर लेंगे. बीस साल बाद ही नहीं दो सौ साल बाद भी कश्मीरी पण्डित ऐसी ही किसी गोष्ठी में बैठे होंगे और कुछ निहित स्वार्थी तत्व उनके नाम पर राजनीतिक बयानबाजी कर रही होंगी. कार्यक्रम की शुरूआत में कश्मीरी लोकगीत गानेवाले धनंजय ने एक मार्मिक कश्मीरी गीत गाया जिसका अर्थ था- "हम कच्चे धागे से अपनी नांव को खींच रहे हैं. लेकिन नहीं पता कि ईश्वर हमें अपने घर कब पहुंचाएगा." आज यही गीत की एक पंक्ति कश्मीरी पण्डितों की वास्तविक हकीकत है.
Title :
Body
- ममता के दरबार में कांग्रेस की सरकार
- आतंकवाद की राजनीति और मीडिया
- राजनीतिक हिन्दुत्व पर दिग्गी का दांव
- कृष्णं वन्दे जगतगुरुम्
- हरिप्रसाद का लोकतंत्र 'हठ'
- 'हिंदुस्तान' ने पूर्णिया को शर्मसार कर दिया
- सुखाड़ का शिकार हो गया बिहार
- टाटा-बिड़ला-अंबानी, पीयेंगे मध्य प्रदेश का पानी
- प्रेस क्लब ने खाना नहीं खिलाया, नोटिस थमा दिया
- पाँचना से फोन पर पानी पहुँचा घना



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रोना ठीक रहेगा .
अगर इस्लाम के नाम पर दुनिया के मुसलमान एक हो सकते हैं तो फिर हिन्दू होने के नाम पर कश्मीरी और गैर कश्मीरी हिन्दुओं के बीच एकता क्यों नहीं हो सकती?
विभा जी, अव्वल तो हिन्दू भी एक संप्रदाय है जैसे मुसलमान या फिर इस्लाम और इसाइयत. इसलिए जरूर ऐसा हो सकता है. लेकिन इधर हमेशा एक भूल हम सब करते हैं और वह भूल है हिन्दुत्व और सनातन धर्म में फर्क. भारत सनातन सभ्यता का देश है जबकि हिन्दू धर्म प्रतिक्रिया स्वरूप हमारे ऊपर थोपी गयी एक पहचान है. इसलिए धर्म के नाम पर एक होने की तमन्ना होती है क्योंकि हमारे ऊपर धर्म के नाम पर ही हमला होता है. कोई ऐसा करना चाहे तो जरूर करे लेकिन समाधान इसमें नहीं है.
समाधान सनातन जीवन दर्शन में है जो कि सबको सबके हिसाब से जीने के लिए स्वतंत्र करता है. इस्लाम के नाम पर जो आतंकवाद और उग्रवाद है उसका जवाब हिन्दुत्व के नाम पर नहीं दिया जा सकता. विष को विष से उतारा तो जा सकता है लेकिन फिर व्यक्ति पर नये तरह का विष हावी हो जाता है. यह सोचने का पश्चिमी तरीका है जो मानवता के किसी काम का नहीं है.
बिला शक कश्मीर से बाहर गये लोगों को वहां वापस जाने का मौका मिलना चाहिए औऱ उन्हें भी जो कश्मीर जाना चाहते हैं भले ही वे नान कश्मीरी हों. इसकी व्यवस्था प्रशासन को प्रशासनिक स्तर पर करनी चाहिए. यह हिन्दू मुस्लिम का सवाल नहीं होना चाहिए.
कश्मीर में पण्डितों का संकट सभ्यता मूलक है. तो समाधान कभी भी संप्रदाय के दायरे में नहीं निकल सकता. आप समस्या के मूल में जाइये. और संकट को वहां से पकड़ना शुरू करिए जहां से कश्मीर में नये संप्रदाय का उदय हुआ था. अपनी कमजोरी का ठीकरा किसी और के सिर नहीं फोड़ना चाहिए।
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