भारतीय पत्रकारिता के महात्मा गांधी
किसी को महात्मा गांधी कब कहना चाहिए यह जानने से पहले हमें यह जानना चाहिए कि महात्मा गांधी होने का अर्थ क्या है? मेरी समझ में समकालीन भारतीय संदर्भ में महात्मा गांधी का अर्थ वह सागर है जिसमें सभी धाराएं आकर समाहित हो जाती हैं. इसी अर्थ में प्रभाष जोशी हिन्दी पत्रकारिता के महात्मा गांधी हैं.
गुरुवार को नई दिल्ली के उसी गांधी शांति प्रतिष्ठान में उनकी बड़ी सी फोटो टांगकर उन्हीं के उपर लिखी गयी किताब का विमोचन किया गया जहां अभी थोड़े दिनों पहले ही प्रभाष जोशी जन्मदिन मनाकर आये थे. 15 जुलाई को हाथ में केक काटने का चाकू लिए केक काटकर सबको अपने हाथ से खिलाते रहे. पिछले कुछ जन्मदिन पर मैं उन्हें देखता रहा हूं लेकिन इस बार उनके मन में जैसा उत्साह था वैसा पहले कभी नहीं दिखा. मैंने उस वक्त अनुभव किया था कि वे शिशुवत हो चले हैं. कहते हैं जब अंत नजदीक होता है तो व्यक्ति का व्यवहार शिशुवत हो जाता है. उस वक्त ऐसा आभास नहीं हुआ. गुरुवार को प्रभाष जोशी के नाम पर लेखों के संकलन "हद से अनहद गये" के लोकार्पण के मौके पर भी एकदम आभाष नहीं हुआ कि प्रभाष पाठ बंद हो चुका है. अब सिर्फ संपुट बचे हैं जिन्हें बार बार दोहराया जाता रहेगा.
प्रभाष जी पर लिखी गयी पुस्तक के लोकार्पण के मौके पर भी संपुट ही दोहराये गये. लेकिन संपुट वाचन करनेवाले ये लोग भी प्रभाष जोशी को महात्मा गांधी बता रहे थे. प्रभाष जोशी के मित्र कुलदीप नैयर के हाथों पुस्तक का लोकार्पण हुआ. यह भी आश्चर्यजनक ही है कि आखिरी बार प्रभाष जी के जन्मदिन पर कुलदीप नैयर और प्रभाष जोशी एक साथ ही थे लेकिन कुलदीप नैयर जन्मदिन वाले कार्यक्रम में नहीं आये थे. आये भी तो ऐसे वक्त में जब प्रभाष जोशी की स्मृति में पुस्तक का लोकार्पण हो रहा था. उनके वक्तव्य में वह अफसोस भी दिख रहा था और यह भी कि वे भी अपनी जिंदगी की सांझ पर खड़े है. कुलदीप नैय्यर और प्रभाष जोशी ने मिलकर खबरों की खरीद बिक्री पर अभियान चलाने का निश्चय किया था जिसका जिक्र भी कुलदीप नैयर ने किया लेकिन उन सबसे अधिक महत्वपूर्ण उनकी वह बात है जिसका जिक्र यहां करना जरूरी है. कुलदीप नैय्यर ने कहा कि प्रभाष जोशी फासीवादी ताकतों से लड़ रहे थे. वे फासीवादी ताकतें कोई और नहीं बल्कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ है.
आगे आनेवाले जितने भी वक्ता आये उसमें अगर प्रोफेसर नित्यानंद तिवारी को छोड़ दें तो एक बात कहने से कोई नहीं चूका कि वे संघ के फासीवाद से लड़ रहे थे. मंगलेश डबराल ने बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद प्रभाष जोशी और जनसत्ता दोनों की भूमिका की सराहना की तो प्रभाष जोशी द्वारा तैयार किये गये संपादक ओम थानवी ने थोड़ा और खुलकर संघ संबंध पर प्रकाश डाला. बकौल ओम थानवी, प्रभाष जी इसलिए बड़े आदमी थे क्योंकि "वे संघ के लोगों के बीच जाने का साहस कर लेते थे. मैं जरूर संघ विचारधारा को अपने अखबार में छापता हूं लेकिन मैं आज भी इतना साहस नहीं कर पाता हूं कि उनके बीच जा सकूं. मुझे यह बिल्कुल ही मंजूर नहीं है. लेकिन प्रभाष जोशी ऐसा करके भी सहज रहते थे." ओम थानवी के अध्यक्षीय भाषण से सभा का समापन हो गया लेकिन अनुपम मिश्र को छोड़ दें तो कुलदीप नैय्यर, मंगलेश डबराल, पुष्पराज, पुण्य प्रसून वाजपेयी सभी आरएसएस के विपरीत वामपंथी विचारधारा से आते हैं. प्रभाष जी की याद में शोकसभाओं के आयोजन में भले ही सब धाराएं आकर बैठी हों लेकिन इस पुस्तक लोकार्पण ने प्रभाष जी को धारा विशेष में बांटना शुरू कर दिया है.
इस सभा से पहले एक दो घटनाएं ऐसी हुई हैं जो साबित करती हैं कि प्रभाष जी के वामपंथी समर्थक उनकी एक अलग धारा विकसित करने में लग गये हैं जिसकी पहचान सिर्फ वामपंथी प्रभाष जोशी की होगी. लेकिन उधर दूसरी धारा भी बह रही है. आखिरी वक्त में जो गोविन्दाचार्य उनके साथ थे वे भी चाहते हैं कि प्रभाष जी के चार अधूरे कामों को पूरा किया जाए. इसके लिए उनकी अलग कोशिश है. एक तीसरी धारा फूटी है जो प्रभाष जी के नितांत निजी और पारिवारिक संबंधों से विकसित होती है. इस धारा का वाम-दक्षिण से कुछ लेना देना नहीं है. इस धारा ने एक ट्रस्ट का गठऩ कर दिया है और उनकी कोशिश है कि प्रभाष जी के नाम पर उन अधूरे कामों को हर संभव तरीके से पूरा किया जाए जो वे करना चाहते थे. जाने के तीन महीने के भीतर ही प्रभाष जोशी के नाम पर तीन धाराओं का उद्गम स्पष्ट हो जाना कहीं से आश्चर्यजनक नहीं है. प्रभाष जोशी ऐसे ही विलक्षण प्रतिभा के धनी थे. गांधी भी तो ऐसे ही थे. जिसको जो सुहाया उसने उसी को अपनी थाती बनाकर गांधी से अपने आप को जोड़ लिया. पत्रकारिता में प्रभाष जोशी के साथ भी ऐसा ही होगा. दक्षिण वाम के बौद्धिक बंटवारे में प्रभाष जोशी का जो हिस्सा जिसको अच्छा लगेगा उसे लेकर आगे दौड़ पड़ेगा. यहां यह भी महत्वपूर्ण है कि प्रभाष जोशी विस्मृत नहीं होंगे और समय के साथ उनकी प्रासंगिकता बढ़ती चली जाएगी. जितना मैंने उन्हें देखा था उसमें समझ लिया था कि यह व्यक्ति पत्रकारिता का महात्मा गांधी है. इनकी किसी बात से आप असहमत हो सकते हैं, लेकिन संपूर्णता में प्रभाष जोशी को खारिज नहीं कर सकते. बिल्कुल ऐसा ही तो महात्मा गांधी के साथ भी है. क्या ऐसा नहीं है?
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- दलित उत्पीड़न को मिल रहा है दलित सत्ता का संरक्षण
- पटना निगल जाता है आधा बिहार
- दस्यु सरगनाओं की शरणस्थली में दलित पुजारी का मंदिर
- भ्रष्टाचार को शिष्टाचार बनाना चाहती है भाजपा
- बंगाल में सियासी सुनामी से आतंकित हैं वामपंथी
- जीएम फसलों पर जोरजबर्दस्ती
- संघ से डरने डराने वाले लोग
- नर्मदा के सौंदर्य पर जादू-टोने का अमावस
- उधर दौलत की बेटी के घर जश्न, इधर दलित की बेटी पर सितम
- जंतर मंतर पर लोकतंत्र जब्त



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आदरणीय प्रभाष जी के चले जाने के बाद आज जो चंद लोग उनका नाम लेकर कुछ ज्यादा ही सक्रियता दिखा रहे हैं और जगह-जगह विभिन्न कार्यक्रमों के आयोजक बने फिर रहे हैं वो वही लोग हैं जिन्होंने प्रभाष जी को जीते जी काफी दुख पहुंचाया है. आज वे लोग अगुआ बनकर खुद को प्रभाष जी का शुभचिंतक और करीबी साबित करने पर तुले हैं. जिन्हें प्रभाष जी कीचड़ से उठाकर लाए और ससम्मान सिंहासन पर बिठा दिया उन्होंने ही आगे चलकर उन्हें खूब दुख पहुंचाया. आखिरी दिनों तक प्रभाष जी उनका दिया मानसिक दुख झेलते रहे. इन दुष्टों ने प्रभाष जी के साथ-साथ उनके लोगों को भी दुख दिया. मैं यहां किसी का नाम नहीं खोलना चाहता. पर मैं इसका जीता-जागता गवाह हूं.
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