मानस और महात्मा के बीच रामकथा का सेतुबंध
पिछली सदी के महानायक और समय बीतने के साथ अवतार के रूप में स्थापित होते जा रहे महात्मा गांधी भारतीय कथा परंपरा के विषय इतनी जल्दी बन जाएंगे, इसकी कल्पना करना थोड़ा मुश्किल है. लेकिन ऐसा हो गया. महात्मा गांधी अब भारत की कथा परंपरा में शामिल हो गये हैं. इस दिशा में पहली कोशिश की महात्मा गांधी के सचिव रहे महादेव भाई देसाई के बेटे नारायणभाई देसाई ने की.
नारायण भाई देसाई ने देश में बापू कथा की शुरूआत की. अपने देश में कथा की विषय वस्तु मिथकीय हैं. राम, कृष्ण हमारी संस्कृति के ऐसे मिथकीय चरित्र हैं जो भारत में कथा परंपरा के प्रसिद्ध नायक हैं. रामकथा, श्रीमद्भागवतकथा के बाद बापू कथा को इस देश की कथा परंपरा ने अभी पूरी तरह से स्वीकार भी नहीं किया था कि उसी कथा परंपरा को नया आयाम देनेवाले मोरारी बापू ने इसमें बड़ा हस्तक्षेप कर दिया. मोरारी बापू ने पहली बार 2005 में दांडी में मानस महात्मा नाम से नौ दिन की कथा की. अपनी पहली कथा के नौ दिनों में मोरारी बापू ने गांधी के सात सद्गुणों का उद्भव रामचरित मानस के सात काण्डों में निहित साबित कर दिया. निष्कलंक, सम्यक संयम, तपस्या, मैत्री, मुक्त मन, अजातशत्रु और निर्वाण को मानस के बालकाण्ड, अयोध्याकाण्ड, अयरण्यकाण्ड, किष्किन्धाकाण्ड, सुंदरकाण्ड, लंकाकाण्ड और उत्तरकाण्ड से जोड़कर बापू का लोकस्वरूप निर्धारित किया. महात्मा गांधी मानस के प्रेरित थे या नहीं, यह बाद में. लेकिन मानस के सद्गुण और महात्मा के सद््गुण में साम्यता अद्भुद है.
दुनिया में पश्चिमी संस्कृति के फैलाव ने संभवत: हर संस्कृति को उसके मूल से काटने का काम किया है. इसके कारण दुनिया में जहां जहां भी उपनिवेश रहे हैं या आक्रांता आते रहे हैं वहां संस्कृति विभाजित हो गयी है. भारत भी इससे अछूता नहीं है. सांस्कृतिक परिवर्तन उससे पहले नहीं होते थे ऐसा नहीं है, लेकिन पश्चिमी आक्रांताओं ने भारत में एक नये तरह के मानस को जन्म दे दिया जो पूरी तरह से अभारतीय है. उस अभारतीय मानस की अपनी सोच, अपनी व्यवस्था, अपनी कार्यशैली है. वर्तमान भारत में अगर आप ध्यान से देखें तो वही अभारतीय मानस सोच और व्यवस्था दोनों ही स्तर पर दिखाई देगा. ऐसे में कथा परंपरा और उसके चरित्र हमें हमेशा मिथक और धार्मिक कर्मकाण्ड के विषय बने रहे. लेकिन आश्चर्यजनक रूप से कथा परंपरा आज भी भारत में लोकशिक्षण की सबसे आधारभूत व्यवस्था बनी हुई है. लेकिन उससे भी आश्चर्यजनक तो यह है कि आधुनिकतम भोगवादी व्यवस्था जिस मानवीय विषाद के त्रासदी की पटकथा तैयार कर रही है उससे निजात पाने में भी कथा बहुत प्रभावी माध्यम बनकर उभर रही है. ऐसे वक्त में कथा परंपरा में गांधी का प्रवेश कथा को और समसामयिक बनाता है.
मानस, महात्मा और मोरारी बापू तीनों की अपनी विशिष्टताएं हैं. रामचरित मानस इस देश के लोकमानस का प्रतिनिधि ग्रंथ है तो महात्मा गांधी लोकजीवन के प्रतिनिधि चरित्र बनने की ओर अग्रसर हैं. ऐसे में रामकथा के जरिए मोरारी बापू ने दोनों के बीच सेतुबंध बनाने का सुंदर प्रयास किया है. अपने जीवनकाल में 682 रामकथा कर चुके मोरारी बापू के लिए ही संभव भी था कि लोकजीवन के प्रतिनिधि चरित्र को लोकमानस से जोड़ सकते थे.
दांडी से शुरू हुई मोरारी बापू की कथा यात्रा साबरमती होते हुए छठे साल में गांधी समाधि राजघाट पर आ गयी. मोरारी बापू कहते हैं" मानस महात्मा को तीन किश्तों में कथा करने की इच्छा थी. और इच्छा यह थी कि आखिरी किश्त बापू की समाधि के सामने गाऊं. थोड़ा वक्त लगा लेकिन आखिरकार मौका मिल गया." बापू की समाधि पर बापू की इस कथा की शुरूआत 30 जनवरी, महात्मा गांधी के निर्वाण दिवस के मौके पर हुई. अगले नौ दिनों तक मोरारी बापू ने मानस के इर्द-गिर्द महत्मा के स्वभाव का विश्लेषण किया. सवाल सिर्फ तर्क से महात्मा को मानस के करीब ला देने भर का नहीं है. खुद मोरारी बापू ने कथा के छठें दिन इस बात को खारिज कर दिया कि केवल तर्क से कुछ हासिल किया जा सकता है. उनका कहना था कि तर्क में पड़े रहने से सत्य तक नहीं पहुंचा जा सकता. सत्य तक पहुंचने के लिए तर्क से शुरूआत हो सकती है लेकिन सत्य तक पहुंचना नामुमकिन है. इसलिए मोरारी बापू ने कहा कि महात्मा गांधी न तो ज्ञान अवतार थे और न ही कर्म अवतार. वे भक्ति अवतार थे. मोरारी बापू मानते हैं कि महात्मा गांधी में अद्भुद श्रद्धा और भक्ति थी जिसके कारण वे पूरे देश को अंग्रेजी साम्राज्यवाद के खिलाफ एकजुट कर सके. जो मोरारी बापू ने नहीं कहा, लेकिन यथार्थ है, वह यह कि जननेता बनने की पहली कसौटी व्यक्ति का भावप्रधान होना जरूरी है. बुद्धि प्रधान व्यक्ति अच्छा रणनीतिकार हो सकता है, अच्छी योजनाएं बना सकता है लेकिन वह जननेता कभी नहीं हो सकता. बुद्धि का संसार तार्किक होता है और इसमें मनुष्य दूसरे मनुष्य से भावनात्मक संबंध नहीं बना सकता. जननेता की विशेषता यह होती है कि वह व्यक्तियों से भावना के स्तर पर संबंध स्थापित करता है. लेकिन गांधी का चरित्र तो इससे भी आगे निकल जाता है.
मोरारी बापू कहते हैं-"गांधी बापू ने अपना एक लोक स्थापित किया. उस लोक में उनकी चरखा रूपी विद्या, सत्य रूपी धर्म और अहिंसा रूपी जीवन दर्शन दिया." यह गांधी लोक संपूर्ण गांधी ब्रह्माण्ड का क्षितिज निर्मित कर देता है जो सिर्फ वाद के दायरे में नहीं समेटा जा सकता. गांधीवाद ने असल में गांधी चरित्र को सीमित करने का ही काम किया है. फिर भी मोरारी बापू का मानना है कि गांधी चरित्र निर्विवाद रूप से पूरी तरह मानस से मेल खाता है. इसलिए जिस तरह से लोक मानस में मानस की महिमा है उसी तरह लोकजीवन में गांधी का चरित्र स्थापित होगा. हो सकता है, आनेवाले कुछ दिनों में यह अवतार की पूर्ण अवधारणा को अंगीकार कर ले और पवित्र भाव से कथा परंपरा में गांधी के प्रवेश पर कर्मकाण्ड का आवरण चढ जाए, फिर भी रामचरित मानस के माध्यम से लोक मानस में महात्मा के इस प्रवेश से गांधी के व्यक्तित्व निर्धारण का एक नया युग शुरू होता है जो अकादमिक और सरकरी जैसी अभारतीय अवधारणाओं से तो बिल्कुल आबद्ध नहीं है.
लेकिन एक महत्वपूर्ण सवाल अभी भी अधूरा रह जाता है. क्या वास्तव में महात्मा गांधी रामचरित मानस से प्रेरित थे? मोरारी बापू कई ऐसे प्रसंग बताते हैं जो गांधी के राजा राम को मानस के राजा राम से मिला देता है. फिर भी गांधी जी के राजा राम और मानस के राजा राम के अलावा एक तीसरे राजा राम भी हैं जो भारत के कर्मकाण्डीय धर्म व्यवस्था का हिस्सा है. अयोध्या के राजा राम तुलसीदास और मोरारी बापू दोनों के केन्द्रीय चरित्र हैं. इसी चरित्र को मोरारी बापू महात्मा गांधी से जोड़ते भी हैं और मानस में तुलसीदास के कथनों को आधार बनाकर महात्मा गांधी की समीक्षा करते हैं. लेकिन उनके इस पूरे प्रयास में कहीं से महात्मा गांधी पर अयोध्या के राजा राम को थोपने की कोशिश नहीं है. संभवत: मोरारी बापू जानते हैं कि कालक्रम में रामचरित मानस में कोई विक्षेप आया हो या न आया हो, भारतीय मानस में विक्षेप जरूर आ गया है. गांधी के राम और राजा राम में भी भेद खोज लिए गये हैं. इसका कितना तात्विक अर्थ है यह तो नहीं मालूम लेकिन इसके कारण गांधी की सर्वग्राह्यता बनती है. अगर गांधी इसी रूप में लोकचरित्र का हिस्सा हो जाते हैं तो फिर भला ऐतराज किसे और क्यों होगा? गांधी विराट पुरुष (चेतन आत्मा) थे और जिसकी चेतना जितनी व्यापक होती है वह उतना ही विराट पुरुष बनता चला जाता है. चेतना के स्तर पर गांधी इतने व्यापक तो हैं ही कि मौत के महज तिरसठ साल बाद ही राम और कृष्ण जैसे चरित्र के बराबर आ खड़े हुए है.
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डर है की इसमें गांधी भगवन न बना दिए जाएँ जिसमे गांधी की ही हार होगी .
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