बिल्डरों, ठेकेदारों और सरकारी अफसरों का 'हिन्दू' समागम
भाजपा नेता, सरकारी अमला, बिल्डर-ठेकेदार और रसूखदारों के समर्थन-सहयोग से भोपाल में हिन्दू संगम सम्पन्न तो हो गया, लेकिन संघ जैसा चाहता था, वैसा हिन्दू समागम तो तब भी नहीं हुआ। इन सब की भीड़ में संघ और उसके कार्यकर्ता दोनों ही कहीं गुम गये। लेकिन शायद यही नया संघ है, जहां वह दिल से नहीं दिमाग से चलता है। यह संघ अपने स्वयंसेवक और कार्यकर्ताओं से नहीं समर्थकों से चलता है। इस संघ में कार्यकर्ता कम हो गए, नेता बढ़ गए। यह संघ क्लालिटी नहीं, क्वांटिटी चाहता है। भीड़ के लिए वह कुछ भी करेगा।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक का अखिल भारतीय प्रवास चल रहा है। इस अखिल भारतीय दौरे के तहत डॉ. भागवत संघ और समाज के विभिन्न तबकों को संबोधित कर रहे हैं। उनके दौरे में संघ के स्वयंसेवकों का जमावड़ा होता है, वे अपने कौशल का प्रदर्शन करते हैं ताकि संघ प्रमुख के साथ ही समाज भी संघ की हैसियत, ताकत और जूनून को समझ सके। 24-25 को डॉ. भागवत केरल प्रांत के दौरे पद थे। केरल कम्युनिस्ट शासित प्रदेश है। लेकिन वहां दक्षिण के अन्य प्रांन्तों की तरह ही संघ का कैडर अपेक्षाकृत अधिक मजबूत और सुसंगठित है। उल्लेखनीय है कि संघ कार्य पर दक्षिण प्रांतों पर सामाजिक और उत्तरी प्रांतों में राजनीतिक प्रभाव अधिक है। गौर करने लायक बात यह है कि अभी-अभी केरल में आयोजित कार्यक्रम में 92 हजार स्वयंसेवकों ने संघ यूनीफॉर्म में उपस्थित होकर संघ के विराट स्वरूप का प्रदर्शन किया। केरल के तिरूअनंतपुरम और कोल्लम के आयोजन के ठीक दो-तीन दिन बाद भोपाल में भागवत का कार्यक्रम हुआ। चूंकि यह कार्यक्रम मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में आयोजित हुआ और मध्यप्रदेश में न सिर्फ भाजपा केरल की तुलना मजबूत है बल्कि यहां भाजपा की सरकार भी है। इसलिए भोपाल में आयोजित संघ के ‘‘सामाजिक सद्भाव बैठक’’ और ‘‘हिन्दू समागम’’ में भाजपा और सरकार का खासा असर दिखा। सद्भावना बैठक में भी भाजपा के नेता या उनके चहेते ही अधिकांश संख्या में उपस्थित थे।
भोपाल में आयोजित संघ के वार्षिक कार्यक्रम, सामाजिक सद्भाव बैठक और हिन्दू समागम कार्यक्रम की शुरुआती तैयारियों में ही भाजपा, सरकार और राजनीति का प्रभाव दिखने लगा था। भोपाल में आमंत्रितों के पंजीयन से लेकर आयोजन समिति के गठन तक में भाजपा का वर्चस्व और राजनीतिक दखल स्पष्ट दिख रहा था। गौरतलब है कि हिन्दू समागम के आयोजन के लिए गठित आयोजन समिति में जिन्हे अध्यक्ष के रूप में रखा गया बाद में उन्हें हटाना पड़ा। जरूरी तैयारी न होने और अपने खास लोगों को आयोजन समिति में फिट करने की जल्दीबाजी के चक्कर में मध्यप्रदेश के सेवानिवृत्त पुलिस अधिकारी और पूर्व डीजीपी श्री एच.एम. जोशी को आयोजन समिति का अध्यक्ष बना दिया गया। आयकर विभाग के छापे में उनके और उनके आइएएस पुत्र-पृत्रवधु के यहां करोड़ों की समपत्ति मिलने के कारण जोशी बन्धु सुर्खियों में आने लगे। आयोजन समिति के अध्यक्ष का नाम विवादों में आने के कारण आनन-फानन में संघ को दूसरा अध्यक्ष ढूंढना पड़ा। न्यायमूति आरडी शुक्ला को अध्यक्ष के रूप में नियुक्त किया गया। संघ के अनेक पुराने कार्यकर्ताओं को छोड़ समाजवादी पृष्ठभूमि के श्री शुक्ला को अध्यक्ष बनाने पर भी दबी जुबान चर्चा हुई।
जिस दिन से हिन्दू समागम के लिए पंजीयन की शुरुआत हुइ उसी दिन से संघ के पदाधिकारी लाखों परिवारों से संपर्क, पंजीयन और उपस्थिति का दावा कर रहे थे। लेकिन संपर्क से अधिक मीडिया और प्रचार पर अधिक ध्यान दिया गया। आयोजन समिति में भाजपा से सीधे तौर पर जुड़े अनेक कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों को शामिल किया गया। आयोजन समिति के सचिव के रूप में व्यवसायी दीपक शर्मा को रखा गया। गौरतलब है कि दीपक शर्मा मध्यप्रदेश शासन में मंत्री, सांसद और भाजपा के वरिष्ठ नेता लक्ष्मीनारायण शर्मा के पुत्र हैं। हालांकि श्री शर्मा अब जीवित नहीं हैं, लेकिन उनके जिन्दा रहते पूरा परिवार उमा भारती का कट्टर समर्थक रहा। शर्मा परिवार ने उमा के सहारे ही अपनी राजनैति हैसियत और रूतबे का विस्तार किया। उमा भारती के पुराने समर्थक और उनके संरक्षण में राजनैतिक हैसियत बढ़ाने वाले लक्ष्मीनारायण शर्मा के दोनों पुत्रों दीपक शर्मा और शैलेन्द्र शर्मा ने उनका साथ छोड़ दिया। राजनैतिक रूतबा भले ही कम हो गया हो, लेकिन अर्थ का रूतबा अभी भी बरकरार है। अपनी इसी योग्यता के बल पर वे आज भी भाजपा और संघ के करीबी है और उपयोगी भी। संघ और भाजपा से यह निकटता उनके लिए राजनीतिक और आर्थिक संजीवनी का काम करती है। संघ के इस आयोजन समिति में दीपक शर्मा ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। अपने व्यक्तित्व और चरित्र के कारण भाजपा के वरिष्ठ नेता और मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री तथा वर्तमान मंत्री बाबूलाल गौर को संघ भले ही पसंद न करता हो, लेकिन उन्हे भी आयोजन समिति में जगह दी गई। उनकी बहू और भोपाल की महापौर कृष्णा गौर ने महिलाओं का मोर्चा संभाला। महापौर होने के कारण उन्होंने कई सरकारी सहूलियतें भी हिन्दू समागम के लिए उपलब्ध करायी।
अपने होने और करने की कीमत सब वसूलते हैं। कोई आज तो कोई कल। जो न वसूल सके वो तो सबसे बड़ा मूर्ख ही होगा। इसीलिए हिन्दू समागम का प्रचार करते हुए कृष्णा गौर ने अपना भी खूब प्रचार किया। कई ठेकेदार-बिल्डर भी इस समागम की तैयारियों से जुड़े। वे संघ की ताकत और हैसियत से आकर्षित हैं। ऐसे ही एक बिल्डर ने स्थान-स्थान पर सौजन्य से हिन्दू समागम के लिए प्रचार होर्डिग्स लगाए। यह बात जरूर हुई कि उन होर्डिंग्स में हिन्दू समागम के साथ-साथ उस बिल्डर का भी प्रचार हो रहा था। यह जानते हुए भी कि समाचार पढ़कर, बैनर और होर्डिग्स देखकर संघ में आने वालों की तादाद बहुत कम होती है आयोजकों ने भोपाल शहर में सैंकड़ों होर्डिंग्स लगाए। नेता और नारों से देश नहीं चल सकता तो संघ कैसे चलेगा। हिन्दू समागम सम्पन्न हो गया, सफल नहीं। चूंकि तैयारियों में भाजपा के लोग अधिक संख्या में लगे थे, इसलिए दर्शकों में भी अधिकांश राजनैतिक पृष्ठभूमि के ही लोग उपस्थित हुए। कार्यक्रम में संघ की इज्जत बचाने लायक स्वयंसेवक भी उपस्थित हो ही गए।
सरसंघचालक डॉ. मोहनराव भागवत देशभर में घूम रहे हैं। वे अपने संघ को भी देख ही रहे होंगे। संभव है अलग-अलग क्षेत्रों में एक ही संघ का वैविध्य उन्हे दिखता ही होगा। भोपाल का संघ भी उन्होंने देखा-समझा होगा। भागवत को थोड़ा जानने वाले भी इसी बात में यकीन करते हैं कि भागवत भाजपा का संघीकरण तो चाहते हैं, लेकिन संघ का भाजपाकरण कतई नहीं। उत्तर भारतीय प्रांतों में संघ पर भाजपा का प्रभाव है। खासकर मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश और बिहार जैसे प्रांतों में। इसमें कोई गुरेज भी नहीं। लेकिन संघ का राजनीतिकरण अथवा भाजपाइकरण तो नुकसानदेह ही होगा। भोपाल का हिन्दू संगम संघ पर भाजपा के अधिक प्रभाव का दर्शन कराने वाला था। सब मानते हैं भाजपा पर संघ का प्रभाव उसके लिए हितकर है, लेकिन संघ पर भाजपा का प्रभाव अहितकर। देशभर में डॉ. भागवत को लोग तारणहार के रूप में देख रहे हैं। संघ ही समस्याग्रस्त रहा तो देश-समाज की समस्याओं को कैसे दूर कर पायेगा। केरल में 92 हजार और भोपाल में पांच हजार भी नहीं। तो डॉ. भागवत ऐसा नही ंतो कैसा संघ चाहेंगे?
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- सुदर्शन का (कु) दर्शन
- सीआईए नहीं केजीबी एजंट कहिए जनाब
- सोनिया का सच जान बेकाबू क्यों होते हो?
- नये निजाम के दामन पर है ज्यादा बड़ा दाग
- अजमेर चार्जशीट और संघी उछल-कूद
- अपने होने पर ही हैरान
- भद्दा और बेदम रहा संघ का विरोध प्रदर्शन
- एनसीपी के 'दादा' का दांव
- पीएमओ वाले पृथ्वीराज
- गोली लगने के बाद क्या गांधी ने कहा था- हे राम ?



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Digg
samaj main 80% log chor adhikari, chor thekedar, chor vayvsai hai lekin kabhi ye socha ki kya ye imandari se kam kar sakte hai? pura desh brashtachar main aakanth duba hai use theek karne main sangh ke swayamsevak jo aabadi ka 1% hai lage hai. HINDU samagam tha sabhi hindu aamantrit hote hain usme aap chhatni nahi kar sakte . jaise visfot par bhi anya akhbaro ki tarah kuchh bikau patrakar bhi likh rahe hai .aap unhe kaise pahchanoge? aur meri tareh pehchan bhi lo to kya ker sakte ho.RSS ka kam charitrawan,Rashtrahbhakt naojavano ka nirman karna hai. jaha samaj khada hai vahi to kam kar sakte hai aap. sangh ke jo swayamsevak rajneeti main gaye hai to us maidan ke niyam alag hai. eksath rakhana uchit nahi hai.
ya ise sanjai tiwari ka lekh hi mana karen jinme naam na ho
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