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हिंदी सिनेमा मुंबई की बपौती नहीं है

image फिल्म पत्रकार अजय ब्रह्मात्मज

मुंबई फिल्म इंडस्ट्री को रिपोर्ट करनेवाले फिल्म पत्रकार और समीक्षक अजय ब्रह्मात्मज का कहना है कि हिन्दी सिनेमा मुंबई की बपौती नहीं है. यह बात उन्होंने जयपुर में आयोजित एक संवाद में कही.

अजय ब्रह्मात्मज  कौन हैं? जाने-माने फ़िल्म पत्रकार, `ऐसे बनी लगान’, `समकालीन सिनेमा’ और `सिनेमा की सोच’ जैसी कई चर्चित किताबों के लेखक, महेश भट्ट की `जागी रातों के किस्से-हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री पर अंतरंग टिप्पणी’ सरीखी मशहूर किताब के संपादक या `चवन्नीचैप’ सरीखे महत्वपूर्ण ब्लॉग के मॉडरेटर!  ये परिचय पर्याप्त है?  नहीं, अजय की एक और भी पहचान है!

युवा फ़िल्मकार, लेखिका, हिंदी की महत्वपूर्ण ब्लॉगर और मूर्तिकार निधि सक्सेना ने बीती 24 अप्रैल को जवाहर कला केंद्र में उनका तआर्रुफ कुछ यूं कराया—मैंने अजय जी की किताबें पढ़ी हैं, लेकिन मैं उनको हिंदी टॉकीज़ के लिए याद रखती हूं। मुझे और मेरे कई मित्रों को अजय जी ने पहली बार वेब लेखन से मिलवाया, हम ही से हमारे सिनेमा संस्कारों की खोजबीन कराई...।

युवा प्रतिभा  के संधान की कोशिश में जुटे ब्रह्मात्मज ने चवन्नीचैप  पर हिंदी टॉकीज की शुरुआत करते समय शायद ही सोचा होगा कि उम्र और प्रदेश के स्तर पर समाज में सिनेमा की जड़ें  तलाश करने की उनकी कोशिशों  की चर्चा यूं होगी...पर हुई  और खूब हुई। मौक़ा था जयपुर  के जवाहर कला केंद्र के कृष्णायन सभागार में जवाहर कला केन्द्र और भारतेन्दु हरिश्चन्द्र संस्था की ओर से आयोजित संवाद ‘समय, समाज और सिनेमा’ का। तकरीबन सवा सौ दर्शक-श्रोता सभागार में पहुंचे, तो अंत तक जमे रहे।

अजय ब्रह्मात्मज  को उनकी गंभीरता, स्वाभाविकता और ईमानदारी के लिए जाना जाता है। वो फ़िल्मकारों और निर्देशकों-निर्माताओं पर मौकों या मूड के लिहाज से सुझावों और आलोचनाओं के पत्थर या गुलाब फेंककर अपने कर्तव्य और जुड़ाव की इति-श्री नहीं करते। घर के लोगों की माफ़िक उनका फ़िल्म संसार और इस दुनिया के लोगों से जुड़ाव है। अजय न अतिरंजित होते हैं, ना पलायन करते हैं...यही वज़ह है कि जयपुरियों को उनका स्वाभाविकता से लबरेज़ अंदाज़-ए-बयां खूब भाया। अजय ने ललकार लगाते हुए कहा—हिंदी सिनेमा मुंबई की बपौती नहीं है।

वो मानते हैं  कि हर प्रदेश का अपना सिनेमा होना चाहिए, ताकि फ़िल्में बनें-बढ़ें और फलें-फूलें। उन्होंने ये भी निष्कर्ष पेश किया कि भविष्य का सिनेमा सिर्फ बॉलीवुड का नहीं होगा। अजय के खुद के शब्दों में—मेरा नाम आधुनिक और सेक्युलर है..। अपने काम, यानी लेखन में वो ऐसे ही उपस्थित भी होते हैं। आधुनिकता भरी सोच और पहल से वो खुश होते हैं। जब सुनते हैं कि जयपुर, भोपाल या लखनऊ में संसाधन जुटाकर अपनी किस्म की फ़िल्म बनाई जा रही है, तो वो फूले नहीं समाते।

जयपुर आना भी ऐसी ही एक पहल से जुड़ा  था। पिंकसिटी के पत्रकार  रामकुमार सिंह एक फ़िल्म बना रहे हैं, जिसके बारे में बताया गया है कि ऐसी व्यवस्थित शूटिंग पहले किसी राजस्थानी फिल्म की नहीं हुई...सो अजय ये नज़ारा देखने के लिए हाज़िर हुए और संवाद का मौका भी बना।

अजय ने प्रादेशिक  सिनेमा के विकास के बारे में  अपनी राय कुछ यूं दी—फ़िल्मों का विकास तभी होगा, जब वो वो मुंबई से बाहर निकलेंगी। अजय मानते हैं कि सिनेमा अमर है और वो कभी नहीं मर सकता। यही वज़ह है कि मोबाइल तक पर फ़िल्में बनाई जा रही हैं। डिजिटल कैमरे पर बनी फ़िल्में पूरे देश में रिलीज की जा रही हैं। बावज़ूद इसके निर्माताओं के लिए सिनेमा प्रोडक्ट है और उनकी निगाहें अमीर दर्शकों पर टिकी हैं।

1990 से मुंबई में जमे अजय ब्रह्मात्मज ने संघर्ष के लंबे दिन देखे हैं। वो जानते हैं कि अभावों में प्रयोग होते हैं और उनका ये अनुभव इस संवाद में मुकम्मल राय बनकर सामने आया। अजय ने फ़िल्म इंडस्ट्री के अपवादों और विशिष्ट संयोगों की चर्चा करते हुए कहा—अभावों में प्रयोग होते हैं और आर्थिक रूप से कमज़ोर लोग अधिक प्रखरता का परिचय देते हुए प्रयोगवादी फ़िल्में बनाते हैं।

सवालों का सिलसिला  निधि सक्सेना ने आगे बढ़ाया।  उन्होंने गॉसिप, सिनेमा के कैनवॉस, समाज पर फ़िल्मों पर प्रभाव, सिनेमा और बाज़ार, प्रगतिशील और समानांतर सिनेमा से जुड़े कई ऐसे सवाल किए, जिनके जवाब से दर्शकों की सिनेमाई समझ मज़बूत हुई। निधि ने बेहद अनौपचारिक अंदाज़ में बातचीत को आगे बढ़ाया। जब उन्होंने अजय जी से पूछा—समानांतर सिनेमा जिसे ज़िम्मेदार सिनेमा कहा जाता है, क्या वाकई अपनी कोई उपयोगिता सिद्ध कर पाया है या पहले से ही समझे बूझे  दर्शको के मनोरंजन का पूरक है? और क्या अंकुर देख कर पत्थर उठाने वाले हाथ तैयार हुए होंगे?, तो सभागार में कौतूहल भरी फुसफुसाहट के बाद पल भर को सन्नाटा भी छा गया।

सवाल सत्र में  रामकुमार सिंह मौजूद थे और उन्होंने भी कई ज़रूरी प्रश्न अजय ब्रह्मात्मज से किए। अपनी दिलचस्प वक्तृत्व शैली, कविता-कर्म (और हां, आकर्षक कुर्तों के लिए भी!) के ज़रिए चर्चा में रहने वाले, डेली न्यूज़ के सप्लिमेंट हमलोग के प्रभारी डॉ. दुष्यंत ने कार्यक्रम का संचालन किया। आयोजन में वरिष्ठ पत्रकार और भारतेंदु हरिश्चंद्र संस्थान के अध्यक्ष ईश मधु तलवार, संस्थान के उपाध्यक्ष एवं लेखक फारुक आफरीदी, लेखक प्रेमचंद गांधी समेत जयपुर के बहुत-से लेखक-संस्कृतिकर्मी हाज़िर रहे।

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अजय जी के विचार जानना ऐसा लगा जैसे उनके लेखों से रूबरू हो रहे हैं और निधि जी के प्रश्‍नों ने तो समां ही बांध दिया। कुर्तों के लिए जाने जाने वाले दुष्‍यंत जी, प्रेमचंद गांधी जी की मौजूदगी हर्षित कर गई।
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anjule on 26 April, 2010 20:31;11
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अजय सर और चवन्नी छाप...अपने आप में सिनेमा के एक इंस्टीयुट हैं.हिंदी में क्या कुछ सिनेमा पे उपलब्ध है.आज से एक डेढ़ साल पहले सर्च करते हुए मैं चवन्नी छाप पे पंहुचा था.और सही जगह पहुच था..वहीँ से मैं हिंदी के ब्लॉग जगत में घुसपैठ की देखा अरे यहाँ तो हिंदी में बहुत कुछ है...ब्लॉग जगत और काफी हद हिंदी सिनेमा से इंट्रो मेरा यही से हूवा.हिंदी सिनेमा पे कोई बात उन्हें नज़रंदाज़ करके नहीं की जा सकती...
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sandeep sharma on 28 September, 2010 18:05;35
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