मिस्टर चिदम्बरम! गो बैक
जिस वक्त चिदम्बरम नक्सलवाद को समाप्त करने के अपने तरीकों के समर्थन में भाषण देने जेएनयू पहुंचे पूरा इलाका छावनी में तब्दील कर दिया गया था. संभवत: चिदम्बरम जानते थे कि वे उस बौद्धिक गढ़ में नक्सलवाद के सफाये का समर्थन करने जा रहे हैं जहां से बौद्धिक खुराक मिलने का आरोप लगता रहा है. यहां के छात्रों का आरोप है कि जेएनयू में पहुंच बनाने के लिए उन्होंने अपनी बौद्धिक तर्क क्षमता के साथ साथ अपनी प्रशासनिक क्षमता का भी इस्तेमाल किया.
अंदर गृहमंत्री पी चिदम्बरम ने बड़ी चालाकी से यह साबित करने की कोशिश की कि उन्होंने कभी भी माओवादियों को दुश्मन नहीं कहा है. चिदम्बरन ने कहा कि उन्होंने कभी माओवादियों के खिलाफ लड़ी जा रही लड़ाई को युद्ध नहीं कहा. चिदम्बरम ने कहा कि यह तो माओवादी ही हैं जो इसे युद्ध बता रहे हैं. अंदर भले ही चिदम्बरम अपनी स्वीकार्यता बनाने की कोशिश कर रहे हों लेकिन बाहर जिस तरह से उनका विरोध हो रहा था उससे साफ था कि जेएनयू के एक बड़े छात्रवर्ग ने उनका स्वागत नहीं किया है. चिदम्बरम यहां कांग्रेस समर्थित एनएसयूआई के बुलावे पर आये थे और अपरोक्ष रूप से संघ के विद्यार्थी संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने भी चिदम्बरम के पक्ष में अपना मोर्चा निकाला और वामपंथी छात्र संगठनों को जमकर गाली निकाली. इस शोरोगुल के बीच चिदम्बरम आये, बोले और चले गये. आने वाले कुछ दिनों तक देश के इस बौद्धिक गढ़ में चिदम्बरम के तर्कों कुतर्कों पर चर्चा होती रहेगी लेकिन चिदम्बरम आखिर जेएनयू आना ही क्यों चाहते थे?
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय संभवत: देश का एकमात्र ऐसा विश्वविद्यालय है जहां नक्सलवाद को लॉ एण्ड आर्डर की समस्या कहने पर आपका मजाक बना दिया जाता है. यहां का बौद्धिक वर्ग इस बात पर एकराय है कि नक्सलवाद कोई समस्या नहीं है बल्कि समस्या का लक्षण है. अपनी स्वतंत्र सोच के साथ जीने वाला जेएनयू मानता है कि पी चिदम्बरम आपरेशन ग्रीन हण्ट के संघ समर्थित सेनापति है. एक छात्र संगठन एसएफआई ने चिदम्बरम के विरोध में जो पर्चा निकाला है उसमें कहता है "केन्द्रीय गृहमंत्रालय का कारोबार देख रहा क्रिमिनल कारपोरेट वेदांता का निदेशक, पैरोकार, एडवोकेट इस पब्लिक मीटिंग में क्या बोल सकता है? दरअसल उन्हें अपने आपराधिक कारनामों की बौद्धिक स्वीकृति चाहिए." सच्चाई भी यही है. चिदम्बरम जिस आपरेशन ग्रीन हण्ट का संचालन कर रहे हैं उसे आपराधिक कारनामा कहना या न कहना मुश्किल है लेकिन वे जेएनयू गये थे सिर्फ बौद्धिक समर्थन हासिल करने. चिदम्बरम भी इस बात को जानते हैं कि तथाकथित नक्सलवाद को सबसे अधिक बौद्धिक खुराक जेएनयू से ही मिलती है. और चिदम्बरम चाहकर भी यहां किसी प्रकार का आपरेशन ग्रीन हण्ट नहीं चला सकते. हालांकि विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ताओं ने विरोध के दौरान नारा जरूर लगाया कि आपरेशन ग्रीन हण्ट का संचालन यहां भी किया जाए लेकिन यह महज नारेबाजी ही है. चिदम्बरम उस बौद्धिक जमात के सामने अपना तर्क रखने गये थे जहां से उन्हें सिवाय विरोध के कुछ नहीं मिला.
कांग्रेस समर्थित छात्र संगठन एनएसयूआई ने चिदम्बरम का पक्ष लेने में कोई कोताही नहीं बरती है. एनएसयूआई ने इस मौके पर जो पर्चा वितरित किया है उसमें न केवल चिदम्बरम के कदम का समर्थन किया है बल्कि यह भी कहा है कि कैम्पस से भी माओवादियों के समर्थकों को निकालकर बाहर कर दिया जाना चाहिए. यानी एनएसयूआई एक शैक्षणिक आपरेशन ग्रीन हण्ट की जरूरत बता रहा है. यह वही लाइन है जो संघ समर्थित विद्यार्थी परिषद की लाइन है. इसलिए जान लीजिए चिदम्बरम को केवल सदन या सदन के बाहर ही नक्सलवाद के मुद्दे पर संघ का समर्थन नहीं है. ऐसा लगता है कि नक्सलवाद के खिलाफ चलाये जा रहे आपरेशन ग्रीन हण्ट पर संघ विचारधारा चिदम्बरम के सामने बौद्धिक स्तर पर भी पूरी तरह से समर्पण कर चुका है. लेकिन कांग्रेसी जयहिन्द और संघी वन्देमातरम के बीच न तो चिदम्बरम के पास इस बात का कोई जवाब था और न ही उनके समर्थकों के पास कि क्या इस पूरे आपरेशन की मंशा आदिवासियों को बेदखल करके पूंजीपतियों को बसाने की नहीं है? अगर आप यह सवाल उठाते हैं तो जवाब में विकास समर्थक जय हिन्द का नारा लगा देते हैं और आपको विकास विरोधी बता देते हैं. जाहिर है, चिदम्बरम को इससे पार्टी के शैक्षणिक विंग का समर्थन तो मिल ही गया.
छात्र राजनीति जन राजनीति की प्रायोगिक पाठशाला होती है. जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में यह पाठशाला बहुत विकसित अवस्था में है. छात्र राजनीति का जैसा उन्नत स्वरूप यहां दिखता है, और किसी विश्वविद्यालय में देख पाना मुश्किल है. शायद यही कारण है कि जब भी वहां छात्र संगठन के चुनाव होते हैं तो पूरे देश में खबर फैलती है कि जेएनयू में किस विचारधारा ने कब्जा किया. बाहर की दुनिया के अल्पसंख्यक और उत्तेजक लोग यहां बहुसंख्यक हैं. धुर वामपंथी समर्थक छात्रों की बड़ी फौज है यहां. ये छात्र संगठन बाहरी राजनीति के उन्हीं समूहों के साथ हैं जिनपर माओवादी हत्यारे हो जाने का आरोप है. इन छात्र संगठनों के सामने चिदम्बरम गुजरे तो नजर मिलाने की भी जरूरत नहीं समझी. चिदम्बरम की बात करने वाली बात यहां एकदम से बेमानी हो गयी. साफ हो गया चिदम्बरम संवाद नहीं चाहते, दूसरों की बात सुनना नहीं चाहते. वे सिर्फ सुनाना चाहते हैं और जो नहीं सुनेगा उसे सुलाने के लिए उनकी फौजें तैयार है. अगर इसीलिए चिदम्बरम जेएनयू आये थे तो उनका आना कामयाब कहा जा सकता है. अगर कारण कुछ और था तो कहना मुश्किल होगा कि वे आंशिक रूप से भी सफल हो पाये या नहीं.
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- सुदर्शन का (कु) दर्शन
- सीआईए नहीं केजीबी एजंट कहिए जनाब
- सोनिया का सच जान बेकाबू क्यों होते हो?
- नये निजाम के दामन पर है ज्यादा बड़ा दाग
- अजमेर चार्जशीट और संघी उछल-कूद
- अपने होने पर ही हैरान
- भद्दा और बेदम रहा संघ का विरोध प्रदर्शन
- एनसीपी के 'दादा' का दांव
- पीएमओ वाले पृथ्वीराज
- गोली लगने के बाद क्या गांधी ने कहा था- हे राम ?



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तिवारी जी, आप वामपंथ से प्रभावित ज्यादा लगते हैं. अत जो रुदाली आप गा रहे है वो ठीक ही हा...... 'संघ और चिदम्बरम के बीच समझ' तो मात्र वामपंथी चश्मा लगा कर देखा जा सकता है.
zara theek se padhiye, sangh chidambaram ke saamne samrpan kar chuka hai, Chidambarm sangh ke agende par nahin chal rahe hain
जहाँ तक आपने नक्सलियों से चिदंबरम के संवाद की बात लिखी है। तो क्या आपको यह जानकारी नहीं है कि पिछले लगभग 2 माह से जो फैक्स नंबर गृह मंत्रालय ने नक्सलियों/माओवादियों को (मीडिया के माध्यम से) उपलब्ध करा रखा है। उस पर किसी ने आज तक वार्ता की पहल नहीं की है।
जब सरकार ने बातचीत के दरवाजे पूरी तरह से खोल रखे हैं फिर इन्हें तकलीफ किस बात की है। सरकार तो जिन हाथों में बंदूकें और घातक हथियारें हैं, उनसे बातचीत करने को राजी है तो फिर तो ये केवल पढ़ने वाले जेएनयू के छात्र हैं।
जो नक्सली 76 लोगों का योजनाबद्ध ढंग से कत्लेआम करना जानते हैं, लेकिन क्या शांतिपूर्ण ढंग से बैठकर वार्ता करना ही नहीं जानते?
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