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पत्रकारिता में साहित्य का होना न होना

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वामपंथी और दक्षिणपंथी विचारधारा के माननेवाले लोगों में काम करने की शैली में वैसे तो कोई खास अंतर नहीं होता लेकिन दोनों के व्यवहार में एक साफ अंतर दिखाई देगा. दोनों ही पहले से निर्धारित निष्कर्ष पर पहुंचते हैं लेकिन तरीका थोड़ा अलग होता है. दक्षिणपंथी विचारधारा का समर्थक संवाद इत्यादि में बहुत कम विश्वास करता है. वह सीधे दिशानिर्देश जारी करता है जबकि वामपंथी विचारधारा से जुड़े लोग दिखावे के लिए ही सही बहस करते हैं. भले ही बहस में परिवर्तन की किसी भी गुंजाइश को स्वीकार न करें लेकिन कम से कम बहस की गुंजाइश तो रखते ही है. ऐसी ही एक बहस का आयोजन मंगलवार की शाम इंडिया हैबिटेट सेन्टर में ढेर सारे वामपंथी विचारधारा से जुड़े बुद्धिजीवियों की उपस्थिति में हुई.

बहस का विषय था- मीडिया में साहित्य की खत्म होती जगह. इस बहस का कोई खास मतलब तब नहीं होता जबकि इसके आयोजन की पृष्ठभूमि वह नहीं होती जो कि है. बहस का आयोजन वेब मीडिया से जुड़े जो नवोदित वेबसाइटों के नौजवान मालिकों ने एक नये नये खुले प्रकाशन हाउस के साथ मिलकर किया था. ये दो नौजवान हैं- अविनाश और समरेन्द्र. इन दोनों की नवोदित वेबसाइटें हैं मोहल्लालाइव और जनतंत्र. तथा उस नये नये खुले प्रकाशन हाउस का नाम है यात्रा बुक्स जो कि पेंगुइन का हिन्दी विभाग है. इन तीनों ने मिलकर तय किया है कि वे समाज, साहित्य और पत्रकारिता से जुड़े मुद्दों पर एक बहसमाला का आयोजन करेंगे और संभव हुआ तो हर महीने किसी न किसी विषय पर बात करेंगे. इसी कड़ी में इस आयोजन त्रयी ने दिल्ली के इंडिया हैबिटेट सेन्टर में पहली बहस आयोजित की थी.

इस आयोजन का नयापन यह है कि वेब मीडिया से जुड़े दो उभरते नामों ने दिल्ली में इस तरह का आयोजन किया और आश्चर्यजनक रूप से पूरा गुलमोहर हाल ठसाठस भरा हुआ था. एकदम से यकीन करना मुश्किल था. क्योंकि इंडिया हैबिटेट सेन्टर के इसी गुलमोहर हाल में कई ऐसे आयोजनों में शिरकत किया है जब बड़े नाम बोलने के लिए होते हैं लेकिन सुनने के लिए 10-20 लोगों को जुटाना भी मुश्किल हो जाता है. लेकिन न केवल गुलमोहर श्रोताओं से गुलजार था बल्कि एक जीवंत और समयबद्ध बहस हुई. नयी पीढ़ी ने पुरानी पीढ़ी के साथ कैसा कदमताल किया कि जाते जाते सुधीश पचौरी ने कहा भी कि यहां जो दिख रहा है वह साहित्य और पत्रकारिता दोनों के सुनहरे भविष्य का संकेत है. यह सुनहरा भविष्य क्या है? यह सुनहरा भविष्य है वेब मीडिया और उससे जुड़े लोगों का व्यापक होता दायरा. यह आयोजन इसीलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि इसका आयोजन वेब मीडिया से जुड़े दो लोगों ने किया था. और सिर्फ सूचनाओं के बल पर समझदार श्रोताओं से पूरे हाल को भर दिया था. आयोजन से लेकर संचालन तक सबकुछ नयी मीडिया से जुड़े लोगों के हाथ में था. सिर्फ बोलनेवाले लोगों में परंपरागत माध्यम के पुरोधा आ विराजे थे.

राजेन्द्र यादव (हंस के संपादक), ओम थानवी (जनसत्ता के संपादक), सुधीश पचौरी (आलोचक), रवीश कुमार (टीवी पत्रकार) और शीबा (लेखिका) बोलनेवाले में थे तो संचालन कर रहे थे विनीत कुमार जो कि बतौर मीडिया आलोचक वेब माध्यम के द्वारा लिख पढ़ रहे हैं. इन सभी की चिंता साझी नहीं थी. रवीश कुमार कह रहे थे पत्रकारिता में साहित्य के लिए जगह इसलिए नहीं बच रही है क्योंकि मीडिया माध्यम फुर्तीला हो गया है. साहित्यकार अभी भी बैलगाड़ी अवस्था में रहते हैं जबकि मीडिया माध्यम जेट विमान की तरह सेकेण्डों का समयसाक्षी हो गया है. रवीश कुमार को लगता है कि साहित्यकार नये मीडिया माध्यम को बहुत कुछ "उपदेश" दे सकते हैं लेकिन उनका उपदेश ठहरकर निकलता है कि जब तक वे उपदेश देने के लिए तैयार होते हैं तब तक मुद्दा ही छूटकर पीछे जा चुका होता है. उनके हिसाब से साहित्यकारों को भी कुछ फोनो-वोनों देने के लिए "गाड़ी रोककर" रास्ते से ही काम निपटा देना चाहिए. अब रवीश कुमार का यह दर्द स्वाभाविक है. वे टीवी के पत्रकार हैं और वे जानते हैं कि पत्रकारिता का फास्टफूड कैसे तैयार किया जाता है. उन्होंने उदाहरण भी दिया कि कैसे उन्होंने एक किताब (आज भी खरे हैं तालाब) के दम पर ही पानी तालाब पर स्टोरी बना दी और उस जगह गये ही नहीं जहां की स्टोरी की थी.

रवीश अभी यह सब बोलकर चुप ही हुए थे कि ओम थानवी बैलगाड़ी वाली बात साबित कर दी. नयी तकनीकि से उन्हें कितना "प्रेम" है इसका स्पष्टीकरण उन्होंने कुछ यूं किया कि फेशबुक पर एक एकाउण्ट बना लिया और अब तमाशा यह कि जिसे वे जानते तक नहीं वह भी उनका मित्र बनने चला आता है. बकौल ओम थानवी शब्दों की ऐसी भरमार हो गयी है कि पढ़ना मुश्किल हो गया. उनका तर्क था कि शब्दों को बहुत संभालकर खर्च करना चाहिए. मसलन लोग इतना लिख रहे हैं कि पढ़ना मुश्किल. जो ओम थानवी को जानते होंगे वे जानते हैं कि ओम थानवी ऐसे अखबारी संपादक हैं जो शब्दों को संभालनकर खर्च करने की बात ही नहीं करते बल्कि करते भी बिल्कुल वैसा ही हैं. सुना है, लिखने से ज्यादा वे बोलने में विश्वास करते हैं. उन्हीं के अखबार जनसत्ता में मजाक में अक्सर लोग कहा करते थे कि थानवी जी जितना कम बोलते हैं, उससे कम पढ़ते हैं और उससे बहुत कम लिखते हैं. फिर भी वे एक अखबार के संपादक हैं और भरे पूरे संपादक हैं. ऐसे संपादक जी अगर यह कहें कि शब्दों की पूंजी जरा संभालकर खर्च करिए तो उन्हें यह बताने की जरूरत है कि इंटरनेट पर शब्द की पूंजी संभालने और खंगालने का काम गूगल नामक एक भीमकाय सर्च इंजन करता है. कहते हैं गूगल का एल्गोरिदम ऐसा है कि एक शब्द जितनी अधिक से अधिक मात्रा में प्रयोग किया जाएगा उसके सुपर कम्प्यूटर में उस शब्द की महत्ता उतनी ही अधिक बढ़ जाती है और वह मानता है कि इस शब्द (या फिर भाषा) का भविष्य बहुत अच्छा है. मुक्त ज्ञानकोष विकीपीडिया के साथ भी ऐसी ही कहानी है. अब सवाल यह है कि किसकी बात मानें? गूगल और विकीपीडिया की या फिर ओम थानवी की?

अच्छी अच्छी बात की सुधीश पचौरी ने. लिखने में नयी तकनीकि का विरोध करनेवाले सुधीश पचौरी कितने बड़े उस्ताद हैं इसका अंदाजा उनके इसी बयान से लगाया जा सकता है कि जो भी बोले साहित्य की निंदा और नयी मीडिया में आ रहे साहित्य के समर्थन में बोले. उन्होंने भांप लिया कि सामने कौन लोग बैठे हैं और ये लोग क्या बोलने पर उनकी तारीफ कर सकते हैं. उन्होंने वही बोला. जो लोग स्रोता देखकर अपनी बात तक बदल लेते हों उनके बोलने पर कुछ कहने की जरूरत है क्या? इसलिए उनको उनके हाल पर छोड़ देना ही बेहतर होगा.

काम की बात की राजेन्द्र यादव ने. बहुत संक्षेप लेकिन बहुत सारगर्भित. बूढ़ा हो चुका आदमी जो अपने आपको कभी बूढ़ा नहीं मानता, लेकिन आज उस बूढ़े आदमी ने जो कहा वह साहित्य और पत्रकारिता के अंतरसंबंधों सबसे सटीक टिप्पणी थी. राजनेद्र यादव ने कहा कि साहित्य और मीडिया दो ऐसे पड़ोसी देश की तरह हैं जो हमेशा एक दूसरे से लड़ते रहते हैं. इनकी दुश्मनी पुरानी है. फिर भी साहित्य को मीडिया की जरूरत है. मीडिया को साहित्य की जरूरत है. और हमें एक खास तरह के साहित्य को ही साहित्य मानने की मानसिकता से उबरने की जरूरत है. जिस वक्त ऐसा होने लगेगा इस बहस को एक निष्कर्ष मिलता दिखाई देने लगेगा. राजेन्द्र यादव की बेबसी कि "पीछे बंधे हैं हाथ, पर शर्त है सफर, किससे कहें कि पांव के कांटे निकाल दो." तभी समाधान तक पहुंचेगी जब पत्रकारिता में साहित्य को अलग से पन्ने पर जगह मिलनी बंद हो जाएगी और साहित्य में पत्रकारिता के रास्ते खोल दिये जाएंगे. तभी साहित्य के गढ़ टूटेंगे, गिरोह फूटेंगे और आम आदमी साहित्य से दोबारा से जुड़ पायेगा. साहित्य से आम आदमी दोबारा जुड़े इसके लिए जरूरी है कि साहित्य पर जमकर पत्रकारिता हो. उसके श्रेष्ठताबोध को अहंकार की पहाड़ी से उतारकर समानता के समतल मैदान में लाकर खड़ा कर दिया जाए. कहानी, कविता और उपन्यास से अलग ट्विटर की पोस्ट और फेशबुक की कमेन्ट्री को भी साहित्य सा सम्मान दिया जाए. इन नये मीडिया माध्यमों ने शशि थरूर और ललित मोदी प्रकरण से इतना तो साबित कर दिया है कि यह माध्यम पत्रकारिता करने में सिद्धहस्त है. जल्द ही साहित्य के क्षेत्र में भी इसका दखल दिखाई देने लगेगा. तब बहस बदल जाएगी. वह बहस कहां तक जाएगी कहना मुश्किल है लेकिन इंडिया हैबिटेट सेन्टर के गुलमोहर में आयोजित इस आयोजन ने उसका रास्ता खोल दिया है. यही रास्ता पत्रकारिता और साहित्य के बीच सेतुबंध का काम करेगा. जिसकी जरूरत कल भी थी, आज भी है और आगे भी रहेगी लेकिन गिरोहबाज साहित्यकारनुमा पत्रकारों ने उसे शब्दों की वर्तनी और प्रूफ पढ़ने तक लाकर समेट दिया था.

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बेबाक प्रस्‍तुति। मैं भी इस आयोजन में उपस्थित था। सबने माना कि इसे और कम से कम दो घंटे और चलना चाहिए था। ओम थानवी जी ने स्‍वीकार किया कि बहस सार्थक रही। ऐसे आयोजन होते रहने चाहिए।
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Sadashiv Tripathi on 19 May, 2010 19:23;58
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बहुत बढ़िया, ऐसे आयोजन होते रहने चाहिए।
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ऐसे बढ़िया और बेबाक आयोजन होते रहने चाहिए।
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ऐसे बढ़िया और बेबाक आयोजन होते रहने चाहिए।
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हिमांशु on 20 May, 2010 06:25;28
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यह सही कहा आपने - "वह बहस कहां तक जाएगी कहना मुश्किल है लेकिन इंडिया हैबिटेट सेन्टर के गुलमोहर में आयोजित इस आयोजन ने उसका रास्ता खोल दिया है.."

अभी इस पर बहुत बात होनी है !
प्रविष्टि का आभार |
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वीरेन्द्र जैन on 20 May, 2010 11:55;46
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यह तय है कि बहसों को बामपंथी ही ज़िन्दा रखे हुये हैं अन्यथा दक्षिणपंथी तो भजनिये होते हैं जिन्हें कीर्तन करने के अलावा कुछ नहीं आता। वादे वादे जायते त्तत्वबोधः । बात जब निकलेगी तभी तो दूर तलक जायेगी। अभी तक ऐसी सार्थक बहसें भोपाल में हुआ करती थीं किंतु अब भोपाल उजड़ गया है और भारत भवन में सांस्कृतिक आयोजन ऐसे होते हैं जैसे शाखा का बौद्धिक हो रहा हो, जो किसी भी ठीक जगह नहीं पहु
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नीलाम्बुज on 20 May, 2010 16:39;10
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ये आयोजन हर तिमाही पर होना चाहिए. वैसे इसके अगले आयोजन की तिथि कब की रखी गयी है?
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सोनू on 20 May, 2010 21:05;14
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ईशावास्योपनिषद् के इन श्लोकों पर ग़ौर कीजिए--

अंध तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते। ततो भयं इव ते तमो य उ विद्यायां रताः॥९॥
विद्यां चाविद्या च यस्तद् वेदोभयं सह। अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययामृतमश्नुते॥११॥


(जो अविद्या की उपासना करते हैं वे अंधकार में जाते हैं। जो विद्या में रत हैं वे भी अंधकार में जाते हैं।९। जो विद्या अविद्या की साथ साथ उपासना करते हैं वे अविद्या से मृत्यु पर विजय प्राप्त करते हैं और विद्या से अमरत्व प्राप्त करते हैं।११।)
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सोनू on 20 May, 2010 21:05;14
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ईशावास्योपनिषद् के इन श्लोकों पर ग़ौर कीजिए--

अंध तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते। ततो भयं इव ते तमो य उ विद्यायां रताः॥९॥
विद्यां चाविद्या च यस्तद् वेदोभयं सह। अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययामृतमश्नुते॥११॥


(जो अविद्या की उपासना करते हैं वे अंधकार में जाते हैं। जो विद्या में रत हैं वे भी अंधकार में जाते हैं।९। जो विद्या अविद्या की साथ साथ उपासना करते हैं वे अविद्या से मृत्यु पर विजय प्राप्त करते हैं और विद्या से अमरत्व प्राप्त करते हैं।११।)
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on 21 May, 2010 00:34;06
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विरेंद जैन कुछ खिसके से दिखाई देते है बात क्या हो रही है और ये अपना वामपंथ और दक्षिणपंथी बात को लेकर बैठ गए
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image संजय तिवारी आप जहां तक सोच सकते हैं इंटरनेट आपको वह करने का मौका देता है. अभी तक मानव सभ्यता ने जितने भी मीडिया माध्यमों का उपयोग किया है यह उन सबमें अनूठा, प्रभावी और सर्वगुण संपन्न है. सूचना लेने देने के तीन माध्यमों दृश्य, श्रवण और पाठ को एक ही धागे में लपेटे नया मीडिया उत्पादन और पहुंच दोनों के लिहाज से सर्वश्रेष्ठ है. ऐसे नये मीडिया का जनहित के लिए भरपूर उपयोग हो, विस्फोट.कॉम उसी दिशा में उठा एक कदम है. sanjaytiwari07@gmail.com
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