Home | सभा-संगत | समाज में ही आन्दोलन नहीं हैं तो मीडिया क्या करे?

समाज में ही आन्दोलन नहीं हैं तो मीडिया क्या करे?

image

दिल्ली में यूँ तो रोज़ाना अनेक गोष्ठियां अनेक विषयों पर होती रहती हैं, लेकिन ऐसी गोष्ठियां कभी-कभार ही होती हैं जिनमें विभिन्न क्षेत्रों के अनुभवी, विशेषज्ञ, पेशेवर, कार्यकर्ता आदि एक साथ किसी एक मुद्दे पर अपना नज़रिया पेश करते हों. शुक्रवार की शाम दक्षिण दिल्ली के हैबिटैट सेंटर में ऐसी ही एक गोष्ठी आयोजित की गई जिसमें 'अभिव्‍यक्ति माध्‍यमों में आम आदमी' विषय पर चर्चा हुई.

वक्ताओं में स्वनामधन्य नामवर सिंह (साहित्य), त्रिपुरारी शर्मा (राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय/रंगमंच), अरविन्द मोहन (पत्रकारिता), अजय ब्रह्मात्‍मज (फ़िल्म समीक्षक) और अनुराग कश्यप (फिल्मकार) शामिल थे. डेढ़ घंटे चली इस चर्चा को समाचार-साहित्य की हिंदी वेब साईटों - मोहल्ला लाईव एवं जनतंत्र, और पेंग्विन की सहयोगी संस्था- यात्रा बुक्स ने बहसतलब श्रृंखला के तहत आयोजित किया था. यह गोष्ठी इस श्रृंखला की द्वितीय कड़ी थी. पहली गोष्ठी के बारे में आप विस्फोट पर पढ़ चुके हैं.

आयोजकों की तरफ से आमंत्रण में कहा गया था कि अभिव्यक्ति के तमाम माध्यम आज बाज़ार की चाकरी कर रहे हैं और उन्हें आम आदमी से कोई सरोकार नहीं है जिसकी बुनियाद पर लोकतंत्र की इमारत खड़ी है. उन्होंने सवाल किया था कि क्या इन माध्यमों की सरहद से बाहर जा चुके इस आम आदमी की वापसी हो पायेगी. यह एक अतिवादी धारणा है लेकिन आम आदमी और उसकी चिंताओं को चिंतन और सृजन के केंद्र में लाने तथा माध्यमों की व्यापक जिम्मेदारी को यह धारणा रेखांकित भी करती है. इस लिहाज़ से यह गोष्ठी एक महत्वपूर्ण पहल मानी जानी चाहिए और इसी वज़ह से बड़ी संख्या में लोगों ने इसमें शिरकत की. लेकिन निराशाजनक पहलू यह है कि वक्ता बिना किसी तैयारी के आए थे और सतही बातों के अलावा कोई समझदारी बनाने वाली बातचीत नहीं हो पाई.

फ़िल्म लेखन और निर्देशन के नए तेवर की बदौलत अपना स्थान बना चुके अनुराग कश्यप फ़िल्म निर्माण, वितरण और प्रदर्शन के अर्थतंत्र की भयावहता को गिना रहे थे और बता रहे थे कि बाज़ार के चंगुल से मुक्ति लगभग असंभव है. उनके अनुसार फ़िल्मकारों पर यह दबाव रहता है कि वह तीन दिनों के भीतर अपनी लागत और मुनाफ़ा बटोर ले क्योंकि चौथे ही दिन लोगों के पास इन्टरनेट या पाईरेटेड सीडी की कृपा से फ़िल्म पहुँच जायेगी. अनुराग कह रहे थे कि हम पाईरेटेड या डाउनलोड कर फ़िल्में देख वैसे फ़िल्मकारों का नुकसान कर रहे हैं जो कुछ अच्छा कर सकते हैं. वैसे जाते जाते उन्होंने यह भी कह दिया कि दर्शकों की रूचि को अभी परिष्कृत होना है- 'यदि एक थियेटर में सामाजिक मुद्दे पर बनी फ़िल्म लगी हो और बगल वाले सिनेमा घर में कैटरीना कैफ़ की फ़िल्म लगी हो तो आम आदमी दूसरे सिनेमा घर जाएगा'. नामवर सिंह यूँ तो बोलने के लिये पिछले कई वर्षों से जाने जाते हैं (माने भी जाते हैं), लेकिन इस गोष्ठी में वे बमुश्किल दो मिनट बोले और बताया कि रचना में आम चरित्र ख़ास हो जाता है और हो जाना चाहिए. अगर ऐसा नहीं होता तो वह कमज़ोर रचना मानी जायेगी. नामवर जी जैसे धाकड़ विद्वान से लगभग बेमतलब की बात सुन कर खीझ सी हुई. इस कैफीयत को परवान दिया वरिष्ठ पत्रकार अरविन्द मोहन ने. कहने लगे अखबार की लागत बहुत ज्यादा होती है इसीलिए हमारे पास विज्ञापनों पर निर्भरता और उनसे निर्देशित होने के लिये विवश हैं. अनुराग की तरह अपनी कमजोरी का ठीकरा समाज पर फोड़ते गए कि जब समाज में ही आन्दोलन नहीं हैं तो मीडिया क्या करे. हालांकि उन्होंने इतना भलापन (भोलापन!!) ज़रूर दिखाया कि आम आदमी मीडिया के धोखे में नहीं आता.

त्रिपुरारी शर्मा जी ने कहा रंग-कर्म सबसे पुराना माध्यम है और वह बुनियादी रूप से हाशिये के लोगों का माध्यम है. चूँकि थियेटर में बाज़ार-वाणिज्य का वह दखल अभी तक नहीं हो पाया है जैसा कि अन्य माध्यमों में है इसलिए उसके बारे में अन्य माध्यमों की तरह बात नहीं कर सकते. गोष्ठी के अंतिम वक्ता थे फ़िल्म पत्रकार अजय ब्रह्मात्‍मज और वही कुछ तैयारी से बोले रहे थे. फ़िल्म-व्यवसाय के बदलते स्वरुप का बयान करते हुए वह बम्बईया सिनेमा के सरोकारों के बदलने का विवरण दे रहे थे. बड़े शहरों और विदेश में रह रहे भारतीयों को केंद्र में रख कर फ़िल्में बनाई जा रही हैं क्योंकि धन की तुरंत वसूली वहीँ से हो रही है. उनके हिसाब से यह एक बड़ा कारण है जिसकी वज़ह से गाँव, क़स्बा और पीछे छूट गया आदमी सिनेमा से दरकिनार है.

वक्ताओं के बोलने के बाद श्रोताओं की बारी थी और उन्होंने कई सवाल पूछे. सबसे ज्यादा सवाल अनुराग के खाते में गए और उनसे कुछ कम अजय जी से पूछे गए. नामवर जी और अरविन्द मोहन से नहीं के बराबर सवाल हुए जिस पर उन्हें सोचना चाहिए. त्रिपुरारी जी से सवाल नहीं पूछे गए क्योंकि ज़्यादातर श्रोता थियेटर की गतिविधियों से परिचित नहीं थे और इसे हम सब को एक चिंता के रूप लेना चाहिए. सिनेमा पर सवालों की बौछार इस बात को एक बार फिर रेखांकित कर गयी कि सिनेमा की लोकप्रियता और उसको लेकर हिंदी लोकवृत्त में रूचि/चिंता काफी गहरी है.

मेरे विचार से आयोजकों को 'आम आदमी' जैसी अवधारणायें स्पष्टता से रखनी चाहिए और वक्ताओं को विषय और बहस के सरोकारों से आगाह कर देना चाहिए. एक सलाह और कि बड़े और भीड़जुटाऊ नामों की जगह ज़रूरी नामों को आमंत्रित किया जाये. बहस का विषय व्यापक रखने से बहस का स्तर निर्धारित नहीं होता. इसके लिये ज़रूरी हैं-  गंभीरता, ताज़गी और सरोकार. बहसतलब के दोनों कार्यक्रमों में सक्रिय भागीदारी ने हिंदी लोकवृत के न सिर्फ़ जीवंत होने का प्रमाण है, बल्कि उसकी बहस के केंद्र में राजनीति और साहित्य के साथ अन्य क्षेत्रों के आने और जमने की सूचना भी है. बहसतलब के अगले आयोजन का इंतज़ार है.

Subscribe to comments feed Comments (5 posted):

sushil Gangwar on 19 June, 2010 20:36;28
avatar
बरेली के पत्रकार कर रहे ब्लैकमेलिंग का धंधा -------
दैनिक जागरण का स्टिंग कांड थमा नहीं बरेली दैनिक जागरण रिपोर्टर ने नया ठीकरा फोड़ मारा । उस पर जबरन बसूली के आरोप लगाते हुये एक कालेज के मालिक शंकर लाल ने कहा दैनिक जागरण का रिपोर्टर २५००० रूपये की फ़ोन पर डिमांड कर रहा था और उन्हें धमकी दी गयी उसे पैसे नहीं मिले तो कालेज के खिलाफ खबर निकाल देगा । एक बड़े न्यूज चैनल के दूसरे रिपोर्टर का फोन आया। वह कालेज पर गंभीर आरोप लगाने की बात कह रहा था। जब उस न्यूज चैनल वाले युवक को बुलाया गया तो वह अपने पैर सर पर रख कर भाग खड़ा हुआ ।दैनिक जागरण में 14 जून को पेज तीन पर 'कालेज में बनी अश्लील क्लीपिंग' शीर्षक से खबर प्रकाशित हुई। खबर के अनुसार एक लड़के और लड़की ने कालेज में आपत्तिजनक अवस्था में वीडियो क्लीपिंग तैयार की है। आजकल कालेज बंद है फिर यह अश्लील क्लीपिंग' कैसे बना । सूत्रों के अनुसार कालेज के मालिक बकील और बसपा नेता है ।
www.sakshatkar.com
www.sakshatkar-tv.blogspot.com
Thumbs Up Thumbs Down
0
Sanjeev Kumar Shrivastav on 19 June, 2010 23:40;28
avatar
किसी भी आन्दोलन के लिए मुद्दे पर केन्द्रित हो कर कार्य करने की आवश्यकता होती है. साथ ही यह भी सच है की समाज के किसी दौर में मुद्दों की कमी नहीं होती. बस उसे देखने की दृष्टी चाहिए. मेरे विचार से मूल समस्या जागरूक और समर्पित नेतृत्व के आभाव की है. लेकिन एसा नेतृत्व किसी अन्य ग्रह से नहीं आयेगा. हम और आप भी एसा कार्य कर सकते हैं.
Thumbs Up Thumbs Down
2
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा, राष्ट्रीय अध्यक्ष भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास) on 20 June, 2010 11:53;38
avatar
जिन्दा लोगों की तलाश! मर्जी आपकी, आग्रह हमारा!!

काले अंग्रेजों के विरुद्ध जारी संघर्ष को आगे बढाने के लिये, यह टिप्पणी प्रदर्शित होती रहे, आपका इतना सहयोग मिल सके तो भी कम नहीं होगा।
============

उक्त शीर्षक पढकर अटपटा जरूर लग रहा होगा, लेकिन सच में इस देश को कुछ जिन्दा लोगों की तलाश है। सागर की तलाश में हम सिर्फ सिर्फ बूंद मात्र हैं, लेकिन सागर बूंद को नकार नहीं सकता। बूंद के बिना सागर को कोई फर्क नहीं पडता हो, लेकिन बूंद का सागर के बिना कोई अस्तित्व नहीं है।

आग्रह है कि बूंद से सागर में मिलन की दुरूह राह में आप सहित प्रत्येक संवेदनशील व्यक्ति का सहयोग जरूरी है। यदि यह टिप्पणी प्रदर्शित होगी तो निश्चय ही विचार की यात्रा में आप भी सारथी बन जायेंगे।

हम ऐसे कुछ जिन्दा लोगों की तलाश में हैं, जिनके दिल में भगत सिंह जैसा जज्बा तो हो, लेकिन इस जज्बे की आग से अपने आपको जलने से बचाने की समझ भी हो, क्योंकि जोश में भगत सिंह ने यही नासमझी की थी। जिसका दुःख आने वाली पीढियों को सदैव सताता रहेगा। गौरे अंग्रेजों के खिलाफ भगत सिंह, सुभाष चन्द्र बोस, असफाकउल्लाह खाँ, चन्द्र शेखर आजाद जैसे असंख्य आजादी के दीवानों की भांति अलख जगाने वाले समर्पित और जिन्दादिल लोगों की आज के काले अंग्रेजों के आतंक के खिलाफ बुद्धिमतापूर्ण तरीके से लडने हेतु तलाश है।

इस देश में कानून का संरक्षण प्राप्त गुण्डों का राज कायम हो चुका है। सरकार द्वारा देश का विकास एवं उत्थान करने व जवाबदेह प्रशासनिक ढांचा खडा करने के लिये, हमसे हजारों तरीकों से टेक्स वूसला जाता है, लेकिन राजनेताओं के साथ-साथ अफसरशाही ने इस देश को खोखला और लोकतन्त्र को पंगु बना दिया गया है।

अफसर, जिन्हें संविधान में लोक सेवक (जनता के नौकर) कहा गया है, हकीकत में जनता के स्वामी बन बैठे हैं। सरकारी धन को डकारना और जनता पर अत्याचार करना इन्होंने कानूनी अधिकार समझ लिया है। कुछ स्वार्थी लोग इनका साथ देकर देश की अस्सी प्रतिशत जनता का कदम-कदम पर शोषण एवं तिरस्कार कर रहे हैं।

अतः हमें समझना होगा कि आज देश में भूख, चोरी, डकैती, मिलावट, जासूसी, नक्सलवाद, कालाबाजारी, मंहगाई आदि जो कुछ भी गैर-कानूनी ताण्डव हो रहा है, उसका सबसे बडा कारण है, भ्रष्ट एवं बेलगाम अफसरशाही द्वारा सत्ता का मनमाना दुरुपयोग करके भी कानून के शिकंजे बच निकलना।

शहीद-ए-आजम भगत सिंह के आदर्शों को सामने रखकर 1993 में स्थापित-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास)-के 17 राज्यों में सेवारत 4300 से अधिक रजिस्टर्ड आजीवन सदस्यों की ओर से दूसरा सवाल-

सरकारी कुर्सी पर बैठकर, भेदभाव, मनमानी, भ्रष्टाचार, अत्याचार, शोषण और गैर-कानूनी काम करने वाले लोक सेवकों को भारतीय दण्ड विधानों के तहत कठोर सजा नहीं मिलने के कारण आम व्यक्ति की प्रगति में रुकावट एवं देश की एकता, शान्ति, सम्प्रभुता और धर्म-निरपेक्षता को लगातार खतरा पैदा हो रहा है! हम हमारे इन नौकरों (लोक सेवकों) को यों हीं कब तक सहते रहेंगे?

जो भी व्यक्ति स्वेच्छा से इस जनान्दोलन से जुडना चाहें, उसका स्वागत है और निःशुल्क सदस्यता फार्म प्राप्ति हेतु लिखें :-
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा, राष्ट्रीय अध्यक्ष
भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास)
राष्ट्रीय अध्यक्ष का कार्यालय
7, तँवर कॉलोनी, खातीपुरा रोड, जयपुर-302006 (राजस्थान)
फोन : 0141-2222225 (सायं : 7 से 8) मो. 098285-02666
E-mail : dr.purushottammeena@yahoo.in
Thumbs Up Thumbs Down
0
sanjay bhati Editor Supreme news on 29 June, 2010 19:29;22
avatar
aam admi ki bat karte hai too media mafya aapke piche pad jate hai .dadri me lpg ke blak karne walo se jajran ke reporter ke mili bhagat ka virodh karne ke liye janta ne jagran ki copy jala di mene ye khabar SUPREME NEWS ke front page par chhapi or jagran ke blakmeler buro chef ka sting bhi febuary me hi parkashit kar diya badle me jagran walo ne mujh par loot or rangdari ka mukadma kasna kotwali me darj karvaya or ab ye log supreme news ka title nirast karane ki paryas kar rahe hai jila parshasan inka sath de raha hai jabki sach ko sab jante hai bhagat Sing is bar na lena kaya bharatvasi ki,!deshbhagti ke liye aaj bhi saja fasi ki!! yadi janta ki bat karoge to gadadar kahaoge! bhasan diye ki pakde jaoge !!(selender)
Thumbs Up Thumbs Down
1
bimal singhania on 08 September, 2010 15:04;37
avatar
aisi gosthion ki aaj jarurat hai.magar dekhana yah bhi hai ki aaj hum media par jis bajaarvad ko haavi hone ki baat karte hain,use rokane ki disha men kiya kya jaa raha hai.Lekhak bhi ek bhukt bhogi hai.haal hi men apun jis kakatiya dainik ki seva men the bataur ek reporter,vahaan hamen resign karna pad gaya.meri bebaak kalam ne jab ilaake men sakriyatar coal-mafia[illegal coal mining in w.bengal]aur drug,arms,explosives,ke aviadh dhandhon ki bakhiya udhedani shuru ki to mare ilaake ke hi ek bade vaampanthi NETAJI ko takalif hone lagi?unake paas karib 4,500karod rupayon ki avaidh sanpatti maujud bataai jaati hai.Kai log unhen safedposh MAFIA bhi kahate hain.so,unake ek kathit paalatu dumdaar ne Netaji ki shifaarish par mere hi dainik men ghushpaith karake,mujhase unchi kursi haasil kar mujhe hi aakhen dikhana shuru kardiya.yahaantak ki phone par gandi gaaliyan aur dhamakiyan tak mujhe di jaat rahin.Sanpaadakji se yah sab bataaya, to unhone maamala MAALIK saheb ka hai kah kar,taal diya.Aisi sthiti men hamane resign karana hi behatar samajha.Kya koi aisa shaksh hai jo ki is vyabhichaar par kuchh kah-kar sake?shaayad nahin?To fir aisi goshthiyaan logon ko "apane man ki bhadaash nikaalane ka ek platform" ke sivaay aur kya kaha jaaye?
Thumbs Up Thumbs Down
0
total: 5 | displaying: 1 - 5

Post your comment comment

Type in Hindi (हिन्दी में कमेन्ट करने के लिए यहां रोमन में लिखिए यह अपने आप हिन्दी में बदल देगा.)

Title :
Body
Powered by Vivvo CMS v4.1.2
Share |
  • email Email to a friend
  • print Print version

ईमेल से विस्फोटः अपना ईमेल यहां भरें और सब्सक्राइब करें:

Delivered by FeedBurner

Author info
image प्रकाश कुमार रे सामाजिक-राजनीतिक सक्रियता के साथ ही पत्रकारिता और फिल्म निर्माण में सक्रिय. दूरदर्शन, यूएनआई और इंडिया टीवी में काम किया. वर्तमान समय में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से फिल्म पर शोधरत. मानीखेज फिल्मों को लोगों से जोड़ने की दिशा में कार्यरत.
Rate this article
5.00
More from सभा-संगत
Previous
image
परिवार के लिए सत्ता का संकल्प
पिछले दो तीन दिनों से मुंबई से प्रकाशित होनेवाले अखबारों के लिए एक अनिवार्य खबर छप रही है कि शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे इस साल दशहरा रैली को संबोधित करेंगे. मुंबई के अखबारों की यह उत्सुकता इसलिए भी है क्योंकि पिछले साल खराब स्वास्थ्य के कारण बाल ठाकरे उस शिवाजी मैदान में दशहरे के दिन नहीं आ पाये थे जहां उनके पिता प्रबोधनकार ठाकरे ने उन्हें महाराष्ट्र की राजनीति को सौंपा था. ...
image
ब्लागरी का बवाल और आचार संहिता का सवाल
वर्धा में महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय के दो दिवसीय ब्लाग कार्यशाला व सेमीनार से यह बात तो उभर कर सामने आई कि हिंदी ब्लॉगिंग के लिए किसी आचार संहिता या रेगुलेटरी बोर्ड या फिर पंचायत जैसी किसी संस्था के लिए कोई गुंजाईश ही नहीं है। दरअसल यह संभव ही नहीं है। दूसरी बात यह कि अगर कानून है तो हमें यह बात नहीं भूलनी चाहिए कि भले ही अपराधी हमेशा पुलिस से दो कदम आगे ही होता है लेकिन कानून के हाथ लंबे होते हैं। इसलिए स्व-नैतिकता ही ब्लॉगिंग में सबसे अनिवार्य तत्व है, यही एक ब्लॉगर की ब्लॉगिंग के लिए आचार संहिता है।...
image
मानवीय मूल्यों की अमानवीय कार्यशाला पर मीडिया की मुहर
इस खबर को लिखने की कोई इच्छा नहीं थी.कारण भी साफ था. उदघाटन और समापन की औपचारिकताओं के अलावा इसमें कुछ दिखा नहीं.. कुछ समूह चर्चा भी हुई थी जिसे समापन की जल्दबाजी में शीघ्रता से समाप्त कर दिया गया। दूसरे दिन के अखबारों में खबर भी छपी. लेकिन तीसरे दिन जब बाकायदा समापन का सचित्र समाचार पढा तो मन हुआ कि अब तो खबर लिखनी ही पडेगी। दो दिन की ‘राष्ट्रीय गोष्ठी’ जो एक दिन में ही समाप्त हो गई, को दो दिन की बताकर मानवीय मूल्यों की चर्चा में मीडिया ने वास्तव में अमानवीय कार्य किया है....
image
माया के आगे बेबस मायानगरी
राजनीति में जाइये तो भी वहीं चिता दिखेगी. नौकरशाही में देखिए वे भी परेशान हैं उसी समस्या से. संत महंत समाज में भी वही एक चिंता है. सामाजिक कार्यकर्ता भी उसी समस्या का रोना रो रहा है. ये तो वास्तविक जीवन को रोजमर्रा की जिंदगी में जीनेवाले लोग हैं. अगर वे रोएं तो तो रोएं पर वे भला क्यों रोएं जो उस समस्या से कल्पना के तौर पर ही सही समाधान खोजकर लाते हैं? फिल्मी समाज के सामने भला वही समस्या कैसे हो सकती है जो समाज के बाकी सक्रिय हिस्से में समाहित है?...
image
मीडिया खड़ा बाजार में, नहीं किसी की खैर
भौतिकता से दग्ध मानवता को शांति और दिशा देने का काम भारतीय मूल्य और दर्शन ही करेंगे। भारतीय मूल्यों और राष्ट्रीय भावना को संरक्षित करने और प्रसारित करने की जिम्मेदारी मीडिया को निभानी होगी। आज भारतीय मूल्यों और परंंपराओं को तोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। मीडिया भी इसमें शामिल है। मीडिया को मर्यादित होना होगा। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान ने इंडियन मीडिया सेंटर की बैठक में समापन उद्बोधन देते हुए ये बातें कही।...
image
आतंकवाद की राजनीति और मीडिया
क्या आतंकवाद बौद्धिक स्तर पर इतना विकसित हो चुका है कि उसका राजनीतिक धरातल तैयार हो सके? इस जटिल प्रश्न का उत्तर सरल नहीं है. जो लोग अल-कायदा को आतंकी संगठन बताकर उसके खिलाफ कार्रवाई कर रहे हैं वे भी शायद इसे इस्लामिक चरमपंथ कहना ज्यादा मुनासिब समझेंगे बनिस्बत कि आतंकवाद के दर्शन में निहित राजनीति को मान्यता प्रदान करें. लेकिन मुस्लिम देशों में आतंकी गतिविधियों के द्वारा दुनियाभर में थरथराहट पैदा करनेवाले इस्लामिक विद्वान इसे उस राजनीति की प्रतिक्रिया मानते हैं जिसके वैचारिक आक्रमण के कारण इस्लाम को खतरा पैदा हो गया है. शायद इसीलिए "जिहाद" जरूरी हो गया था. ...
image
कारपोरेट पत्रकारों की समाजवादी चिंता
11 जुलाई को सुप्रसिद्ध पत्रकार स्वर्गीय उदयन शर्मा का जन्म दिन था। हर साल की तरह इस साल भी 'संवाद 2010' के तहत एक परिचर्चा 'लॉबींयग, पैसे के बदल खबर और समकालीन पत्रकारिता' का आयोजन किया गया था। इस परिचर्चा में देश के कई दिग्गज पत्रकार दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब के स्पीकर हॉल में जुटें और अपने विचार रखे।...
image
घर में बढ़ती विदेशी घुसपैठ
घुसपैठ और सामान्य आवाजाही में फर्क है। दुनियाभर में अपनी आवश्यकताओं के लिए एक स्थान से दूसरे स्थान पर आबादी की आवाजाही सामान्य बात है। लेकिन घुसपैठ सुनियोजित और रणनीतिक है। अर्थात भारत में घुसपैठ आवश्यकता या परिस्थितियों के कारण नहीं बल्कि किसी खास मकसद का हिस्सा है। इनका आगमन, बसाहट और निवास सब रणनीतिक होता है।...
image
समाज में ही आन्दोलन नहीं हैं तो मीडिया क्या करे?
दिल्ली में यूँ तो रोज़ाना अनेक गोष्ठियां अनेक विषयों पर होती रहती हैं, लेकिन ऐसी गोष्ठियां कभी-कभार ही होती हैं जिनमें विभिन्न क्षेत्रों के अनुभवी, विशेषज्ञ, पेशेवर, कार्यकर्ता आदि एक साथ किसी एक मुद्दे पर अपना नज़रिया पेश करते हों. शुक्रवार की शाम दक्षिण दिल्ली के हैबिटैट सेंटर में ऐसी ही एक गोष्ठी आयोजित की गई जिसमें 'अभिव्‍यक्ति माध्‍यमों में आम आदमी' विषय पर चर्चा हुई....
image
पत्रकारिता में साहित्य का होना न होना
वामपंथी और दक्षिणपंथी विचारधारा के माननेवाले लोगों में काम करने की शैली में वैसे तो कोई खास अंतर नहीं होता लेकिन दोनों के व्यवहार में एक साफ अंतर दिखाई देगा. दोनों ही पहले से निर्धारित निष्कर्ष पर पहुंचते हैं लेकिन तरीका थोड़ा अलग होता है. दक्षिणपंथी विचारधारा का समर्थक संवाद इत्यादि में बहुत कम विश्वास करता है. वह सीधे दिशानिर्देश जारी करता है जबकि वामपंथी विचारधारा से जुड़े लोग दिखावे के लिए ही सही बहस करते हैं. भले ही बहस में परिवर्तन की किसी भी गुंजाइश को स्वीकार न करें लेकिन कम से कम बहस की गुंजाइश तो रखते ही है. ऐसी ही एक बहस का आयोजन मंगलवार की शाम इंडिया हैबिटेट सेन्टर में ढेर सारे वामपंथी विचारधारा से जुड़े बुद्धिजीवियों की उपस्थिति में हुई. ...
image
मिस्टर चिदम्बरम! गो बैक
जिस वक्त चिदम्बरम नक्सलवाद को समाप्त करने के अपने तरीकों के समर्थन में भाषण देने जेएनयू पहुंचे पूरा इलाका छावनी में तब्दील कर दिया गया था. संभवत: चिदम्बरम जानते थे कि वे उस बौद्धिक गढ़ में नक्सलवाद के सफाये का समर्थन करने जा रहे हैं जहां से बौद्धिक खुराक मिलने का आरोप लगता रहा है. यहां के छात्रों का आरोप है कि जेएनयू में पहुंच बनाने के लिए उन्होंने अपनी बौद्धिक तर्क क्षमता के साथ साथ अपनी प्रशासनिक क्षमता का भी इस्तेमाल किया. ...
image
हिंदी सिनेमा मुंबई की बपौती नहीं है
मुंबई फिल्म इंडस्ट्री को रिपोर्ट करनेवाले फिल्म पत्रकार और समीक्षक अजय ब्रह्मात्मज का कहना है कि हिन्दी सिनेमा मुंबई की बपौती नहीं है. यह बात उन्होंने जयपुर में आयोजित एक संवाद में कही. ...
image
बनी रहेगी वैकल्पिक मीडिया की जरूरत
आवारा पूंजी की मीडिया पर पकड़ मजबूत हुई है और इस पकड़ ने खबर को मनोरंजन में बदल दिया है। राहुल महाजन, मल्लिका शेरावत या राखी सावंत जैसे चरित्रों का मीडिया सुर्खियों में होने के कारण भी यही है। मनोरंजन की प्रवृत्ति स्थिर नहीं है। अतः ये चरित्र भी तेजी से बदलते और आते जाते है।...
image
गांधी कथा के महात्मा गांधी
नारायण भाई देसाई के बारे में अनुपम मिश्र द्वारा दिया जाने वाला परिचय सबसे सटीक है. अनुपम मिश्र कहते हैं - "नारायण भाई ऐसे शख्स हैं जिन्हें पहले गांधी जी ने जाना. उन्होंने तो गांधी जी को बाद में जाना." अनुपम मिश्र बिल्कुल सही कह रहे हैं. गांधी के छायारूप सचिव महादेवभाई देसाई के बेटे नारायण भाई देसाई गांधी की गोद में पलकर बड़े हुए हैं....
image
भाषा भी होती है सर्वहारा, दलित और सवर्ण
बड़ोदरा में भाषा अनुसंधान एवं प्रकाशन संस्था ने एक बेहतरिन आयोजन किया। जिसमें भाषा और बोली के सवाल पर देश भर के विद्वान और सामाजिक कार्यकर्ता इकट्ठे हुए। भाषा के सवाल पर इतने बड़े पैमाने पर विद्वानों के जुटान का शायद यह एक अभूतपूर्व कार्यक्रम था। प्रोफेसर गणेशी देवी के संयोजन में हुए इस कार्यक्रम को बड़ोदरा की स्थानीय मीडिया में तो अच्छी कवरेज मिली लेकिन नहीं कह सकता उसके बाहर वह खबर बनी या नहीं। ...
image
बिल्डरों, ठेकेदारों और सरकारी अफसरों का 'हिन्दू' समागम
भाजपा नेता, सरकारी अमला, बिल्डर-ठेकेदार और रसूखदारों के समर्थन-सहयोग से भोपाल में हिन्दू संगम सम्पन्न तो हो गया, लेकिन संघ जैसा चाहता था, वैसा हिन्दू समागम तो तब भी नहीं हुआ। इन सब की भीड़ में संघ और उसके कार्यकर्ता दोनों ही कहीं गुम गये। लेकिन शायद यही नया संघ है, जहां वह दिल से नहीं दिमाग से चलता है। यह संघ अपने स्वयंसेवक और कार्यकर्ताओं से नहीं समर्थकों से चलता है। इस संघ में कार्यकर्ता कम हो गए, नेता बढ़ गए। यह संघ क्लालिटी नहीं, क्वांटिटी चाहता है। भीड़ के लिए वह कुछ भी करेगा। ...
image
अंबेडकर और गांधी : संवाद जारी है
बाबासाहब अम्बेडकर और महात्मा गांधी सिर्फ दो व्यक्ति नहीं, दो 'स्कूल' हैं, दो वैचारिक केन्द्र हैं, दो संस्थाएं हैं। दोनों आधुनिक भारत के सर्वाधिक विवादास्पद चरित्रों में हैं। चूंकि दोनों लीक से हटकर चले, इसलिए उन पर उनके समय से लेकर आज तक सवाल उठाए जाते रहे हैं। दोनों की मंजिल एक-दूसरे से जितनी मिलती थी, रास्ते उतने ही जुदा थे।...
Next
Tags
No tags for this article
सर्वाधिकार (अ)सुरक्षित

विस्फोट.कॉम में प्रकाशित सामग्री पर हमारी ओर से कोई कापीराइट नहीं है.

Powered by Vivvo CMS v4.1.2