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परिवार के लिए सत्ता का संकल्प

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पिछले दो तीन दिनों से मुंबई से प्रकाशित होनेवाले अखबारों के लिए एक अनिवार्य खबर छप रही है कि शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे इस साल दशहरा रैली को संबोधित करेंगे. मुंबई के अखबारों की यह उत्सुकता इसलिए भी है क्योंकि पिछले साल खराब स्वास्थ्य के कारण बाल ठाकरे उस शिवाजी मैदान में दशहरे के दिन नहीं आ पाये थे जहां उनके पिता प्रबोधनकार ठाकरे ने उन्हें महाराष्ट्र की राजनीति को सौंपा था.

लेकिन इस बार "साहेब" आयेंगे इसे लेकर शिवसैनिक भी काफी उत्साहित थे. कम से कम मुंबई में जितने बैनर/होर्डिंग लगाये गये थे उनमें साफ साफ लिखा था कि साहेब आ रहे हैं इसलिए पूरे उत्साह में शिवसैनिक 'शिवतीर्थ" पर पहुंचे. (शिवसैनिक शिवाजी मैदान को शिवतीर्थ के नाम से संबोधित करते हैं.) जाहिर सी बात है पिछला चुनाव में मात खायी शिवसेना के लिए यह दशहरा काफी महत्वपूर्ण था. इस महत्व को बाल ठाकरे भी समझ रहे थे और बाल ठाकरे में विश्वास रखनेवाले शिवसैनिक भी. बाल ठाकरे पिछले चुनाव में शिवसेना के चेहरे जरूर थे लेकिन उनकी उपस्थिति नगण्य थी. ऐसा उनके खराब स्वास्थ्य के कारण हुआ. पूरा चुनाव उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में लड़ा गया और उद्धव ही पार्टी के रणनीतिकार भी थे और प्रचार का जिम्मा भी उन्हीं के कांधे पर था. परिणाम आशा के अनुकूल नहीं रहा. विधानसभा चुनावों में हार के बाद अचानक ही बाल ठाकरे के स्वास्थ्य में सुधार होने लगा और वे अपनी पुरानी रंगत में वापस लौटने लगे. अगर विधानसभा चुनाव के बाद मुंबई के मीडिया की पड़ताल करेंगे तो पायेंगे कि राज ठाकरे को बाल ठाकरे का विकल्प बतानेवाले मीडिया ने भी बाल ठाकरे को उनकी पुरानी गद्दी वापस दे दी थी. आईपीएल में आष्ट्रेलियन खिलाड़ियों को न खेलने देने से लेकर एफ एम पर मराठी गीत बजाने तक बाल ठाकरे ने एक बार फिर महाराष्ट्र की राजनीति में मराठी तान छेड़ दी थी, मानों वे उद्धव ठाकरे से कह रहे हों राजनीति का पाठ सीखना अभी तुम्हें बाकी है.

शिवसेना की दशहरा रैली में डाक्टर के साथ पहुंचे बाल ठाकरे ने शिवसैनिकों के लिए आगे की राजनीति का एजेण्डा दे दिया. वह एजेण्डा है- महाराष्ट्र की सत्ता में वापसी. जिन्हें भी शिवसेना के सांगठनिक ढांचे का थोड़ा भी अनुमान होगा वे जानते होंगे कि संभवत: शिवसेना संगठन के स्तर पर इस देश की सबसे ताकतवर पार्टी है. बाल ठाकरे निश्चित रूप से शिवसेना की एकमात्र आवाज थे लेकिन कार्यकर्ताओं के लिए शिवसेना एक उद्दण्ड संस्था नहीं बल्कि एक व्यवस्थित राजनीतिक दल है. इसका राजनीतिक संगठन बहुत ही व्यवस्थित है. इतना व्यवस्थित कि महाराष्ट्र में अन्य सभी राजनीतिक दलों को शिवसेना के अनुसार अपनी रचना करनी पड़ी है. स्थानीय कार्यकर्ताओं के माध्यम से पार्टी संगठन के जरिए लोगों को कैसे साधा जाए शिवसेना इसका बहुत सशक्त प्रयोग है. लेकिन देश की मीडिया ने हमेशा बाल ठाकरे के विवादास्पद बयानों में ही रुचि रखी और शिवसेना के उस स्वरूप को कभी सामने ही नहीं आने दिया जो कि उसकी असली ताकत है. शिवसेना की दशहरा रैली उसी सांगठनिक व्यवस्था का सम्मेलन है जो पिछले 46 सालों से लगातार हो रहा है. देश में आज कोई भी राजनीतिक दल ऐसा नहीं है जिसके पास कार्यकर्ताओं से संवाद की कोई सीधी व्यवस्था हो. बाल ठाकरे ने वह व्यवस्था बनायी. साल में कम से कम एक बार पार्टी से जुड़े सभी कार्यकर्ता और नेता एक जगह इकट्ठा होते हैं. वहीं पर आगे साल भर के लिए बाल ठाकरे कोई कार्ययोजना बताते हैं जिसे कार्यकर्ता पूरे साल लागू करते हैं. कुछ कुछ कुंभ जैसी व्यवस्था जहां देशभर के साधु संत इकट्ठा होते हैं और धर्मसंसद में पारित प्रस्वाव को फिर अगले 12 सालों तक लोगों में पहुंचाते हैं.

बाल ठाकरे के पिता प्रबोधनकार ठाकरे ने इसी मैदान में आज से 46 साल पहले एक अकेले बाल ठाकरे को महाराष्ट्र की राजनीति के लिए समर्पित किया था. आज 46 साल बाद उन अकेले बाल ठाकरे ने अपने पूरे वंश को महाराष्ट्र की राजनीति में आगे कर दिया है. हालांकि उनका स्वास्थ्य अच्छा है और आनेवाले कुछ दशहरा रैलियों में वे आयेंगे लेकिन आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारियां उन्होंने अभी से शुरू कर दी हैं. इस दशहरा रैली का महाराष्ट्र की राजनीति में सीधा और सपाट संदेश यही जायेगा, बाल ठाकरे बूढा हुआ है, विदा नहीं हुआ. और जैसे कोई बूढ़ा शेर अपने कुनबे को जंगल में राज करने के लिए प्रशिक्षित करता है वैसे ही बाल ठाकरे अपने परिवार का प्रशिक्षण कर रहे हैं.

इस बार भी अपनी दशहरा रैली में बाल ठाकरे ने वही काम किया जो अपनी पिछली सभी दशहरा रैलियों में करते आये हैं. उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं को एक संदेश दिया है. वह संदेश है कि अब तुम्हे सत्ता के लिए काम करना है. खराब स्वास्थ्य और लोगों की उम्मीदों के खिलाफ उन्होंने चालीस मिनट भाषण किया. वहां उपस्थित जन समुदाय भी मान रहा था कि वे ज्यादा नहीं बोलेंगे लेकिन वे जमकर बोले. लेकिन उनकी इस दशहरा रैली का संदेश संभवत: थोड़ा जटिल है और शायद शिवसैनिकों को सीधे स्वीकार्य भी न हो. ठाकरे परिवार में भी उसी तरह से सत्ता संघर्ष चलता रहा है जैसे करुणानिधि के परिवार में या फिर मुलायम सिंह यादव के परिवार में है. जयदेव, स्मिता और राज ठाकरे की छीना झपटी के बाद ठाकरे परिवार में हुए सत्ता संघर्ष की खबरें केवल चारदीवारी के भीतर चलनेवाली अफवाहें भर नहीं रह गयी थी. राज ठाकरे की सीधी बगावत और प्रिय बहू स्मिता ठाकरे द्वारा कांग्रेस में जाने की घोषणा ने निश्चित रूप से बाल ठाकरे को तोड़ा होगा. 2010 की इस दशहरा रैली में राज ठाकरे के प्रति उनकी तड़प दिखाई दी. उद्धव ठाकरे को कार्याध्यक्ष बनाने का बचाव करते हुए उन्होंने कहा कि यह फैसला तो कृष्ण कुंज (राज ठाकरे का दादर स्थित आवास) का था जिसका मैने ही विरोध किया था. बाल ठाकरे ने दशहरा रैली में उद्धव के कार्याध्यक्ष बनने का जो बचाव कृष्णकुंज के बहाने किया है उसके दो संदेश है. एक, पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच परिवारवाद के आरोप से अपने आपको बचाना और दो, राज ठाकरे तक यह संदेश पहुंचाना कि महत्व आज भी तुम्हारा ज्यादा होगा अगर तुम वापस आ जाते हो तो. क्योंकि उस वक्त भी तुम्हारी हैसियत कार्याध्यक्ष बनाने की थी. अगर राज ठाकरे ऐसा नहीं करते हैं तो बाल ठाकरे के पास संदेश देने के लिए इनबॉक्स में एक और मैसेज है. कोई स्टाइल कॉपी कर सकता है, विचार नहीं. इशारा राज ठाकरे की ओर है.

बाल ठाकरे जानते हैं कि वे पार्टी में परिवारवाद को ही स्थापित कर रहे हैं. कोई इस बारे में क्या कहेगा इसकी बाल ठाकरे को कभी कोई चिंता नहीं होगी लेकिन ऐसा करते हुए उन्हें कई तरह की विसंगितियों का सामना करना होगा. वे राहुल गांधी का सबसे मुखर विरोध इसलिए करते हैं क्योंकि उनके पास मम्मी है. अगर राहुल गांधी के पास मम्मी है तो उद्धव ठाकरे के पास कौन है? उद्धव न अच्छे वक्ता हैं और न ही जननेता. उन्हें करीब से जाननेवाले लोग मानते हैं कि वे अच्छे रणनीतिकार और संगठनकर्ता हैं. लेकिन राजनीतिक दल को रणनीति और संगठन के साथ साथ राजनीतिक चेहरा भी चाहिए होता है जो पार्टी की नीतियों और जनता के बीच सेतु बनने का काम कर सके. इस दशहरा रैली में 20 वर्षीय पोते आदित्य ठाकरे का प्रवेश कराकर बाल ठाकरे ने उस कमी को पूरा करने की कोशिश की है. अगले कुछ सालों में आदित्य ठाकरे को एक पब्लिक फिगर के बतौर पेश करने की कोशिश की जाएगी. शिवाजी पार्क की दशहरा रैली में तलवार को जिस अंदाज में आदित्य ठाकरे उठाया उससे भविष्य के राजनीतिक संकेत तो झलकते ही हैं. लेकिन बाल ठाकरे यहीं नहीं रुके. उन्होंने उद्धव ठाकरे के दूसरे बेटे तेजस का भी जिक्र किया जो अपनी मारधाड़ सेना बनाकर अभी से भविष्य की राजनीति के लिए अपने आप को तैयार कर रहा है. साफ है, बाल ठाकरे की इस दशहरा रैली का एक ही संदेश है, शिवसेना के शीर्ष पर सिर्फ ठाकरे परिवार रहेगा. और जब ठाकरे परिवार की बात होती है तो उसका मतलब सिर्फ बाल ठाकरे का परिवार ही होना चाहिए. अब इसी परिवार को सत्तानशीन करने के लिए शिवसैनिकों को काम करना होगा.

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tyagi on 18 October, 2010 12:51;03
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jo hindu hito ki baat karega hindu uska sath dega chaye vo parivar ho, vyakti ho ya party ho.
bala sahab tackery ne kabhi bhi kabhi bi satta ki raajniti nahi ki hai. vo aaj bhi hindu hirdya samrath hai aur kal bhi aur vo jisko chahenge vo hi hindu ke hirdya par raaj karega.
Koi shak ?:
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sanjay modi on 27 October, 2010 10:59;34
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बाल ठाकरे सिर्फ और सिर्फ महाराष्ट्र में ओच्छी राजनीती करने वाला और दबंगई में राजनीती का तड़का लगा के भारत में प्रांतवाद की आग लगाने वाला , हिन्दू विचारधाराओं के विपरीत कार्य करने वाला छुट भैया नेता है. अगर वाकई हिन्दू ह्रदय सम्राट है तो UP , बिहार, झारखण्ड जाने की एक बार जरुरत तो करें , ओकात पता लग जाएगी की वहां के हिन्दू उनकी कैसे उनकी जुत्तम पैर करतें है?
ठाकरे परिवार के बारे में तो यही कहना ठीक होगा-
मुंबई बदनाम हुई ठाकरे तेरे लिए,
शर्मशार हुई ठाकरे तेरे लिए,
प्रांतवाद का जहर फैला ठाकरे तेरे लिए
और हिंदी बदनाम हुई ठाकरे तेरे लिए.
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Yashovardhan Nayak on 27 October, 2010 23:14;00
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बाल ठाकरे की संगठन क्षमता का कोई सानी नही ,पर उन्होंने उत्तर-भारतीयों के प्रति जो ओछापन दिखाया वह निंदनीय है .वे रचनात्मक तरीके से भी मराठी मानुस का भला कर सकते थे/कर सकते है .ठाकरे की तरह यू.पी.और बिहार वाले भी तमाशा करते तो हमारे देश का क्या होता ?वैसे बाल ठाकरे का ओरिजनल वारिस उनका भतीजा राज ठाकरे ही लगता है.
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rajeev on 01 November, 2010 00:54;37
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ऐसे हिन्दू हृदय सम्राट होने लगे तो हो गया इस देश का कल्याण ............... कमबख्त टाइप के लोग हैं ये और कुछ नही ---------------------
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