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मिश्रित संस्कृति या मायाजाल?

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image बायें से देवेन्द्र स्वरूप, प्रकाश सिंह, अजीत डोभाल और जगमोहन

क्या भारत सचमुच एक मिश्रित संस्कृतिवाला देश है? या फिर ऐसा किसी खास उद्येश्य के तहत स्थापित किया जा रहा है. दिल्ली में आयोजित एक सभा में जो विद्वतजन मिले उनकी बहुत सी बातें सोचने पर मजबूर करती हैं. किसी को शक नहीं कि भारत एक खास प्रकार की जीवनशैली जीनेवाले लोगों का देश है जो रूढ़ होकर आज अधिकांश हिन्दू के रूप में पहचाना जाता है. जिस प्रकार के प्रतिक्रियावादी हिन्दुत्व को भारतीय जीवनदर्शन के रूप में प्रचारित किया जा रहा है उसे जस के तस स्वीकार करने में बहुत पेंच है.

फिर भी बात भारत और भारतीयता की हो इस सवाल से सबको दो-चार होना ही होगा कि भारत मिश्रित संस्कृति का देश है या नहीं? या दुनिया में कभी कोई मिश्रित संस्कृति का देश बन पाया है? कोई समाज, समुदाय मिश्रत संस्कृति के रूप में स्थाई रूप से निवास कर सका है? अगर सभ्यता में सम्मिश्रण की बात होती है तो फिर वह सम्मिश्रण किसका होना चाहिए? धर्म का? मान्यताओं का? जीवन दर्शन का? किस बात के सम्मिश्रण को हम मिश्रित संस्कृति मानें?

दुनिया में आज मिश्रित संस्कृति वाला कोई देश नहीं है. इससे आप भले ही सहमत न हों लेकिन मिश्रित संस्कृति जैसी कोई बात होती भी नहीं है. अलग-अलग नदियां जब किसी एक नदी में मिलती हैं तो अपना अस्तित्व पीछे छोड़ देती हैं. संस्कृति के साथ भी ऐसा ही कुछ होता है. भारत में आज जिस संगम संस्कृति के हवाले से गंगो-जमुन की धारा बहायी जा रही है क्या वह सही है? आचार्यकुल के सचिव कहते हैं- यह ठीक नहीं है. भारत हिन्दू संस्कृति है. भारत पर जो हमले हो रहे हैं वह उसकी इस हिन्दू संस्कृति को नष्ट करने के लिए हो रहे हैं. एक बार हिन्दू संस्कृति नष्ट होती है तो आज जिस कम्पोजिट कल्चर की दुहाई दी जा रही है वह नहीं दी जा सकेगी. दुनिया में जहां भी इस्लाम या ईसाईयत का बाहुल्य है वहां इस्लामिक या ईसाई संस्कृति है. वहां आप कम्पोजिट कल्चर जैसी बातें नहीं कर सकते. उनके राज-काज और समाज में उनकी धार्मिक मान्यता को सम्मान और स्थान दोनों मिला हुआ है." यहां एक बड़ा सवाल यह खड़ा होता है कि क्या संस्कृति का आधार धर्म ही होता है और दूसरे कारक इसके लिए जिम्मेदार नहीं होते?

असल में संस्कृति के लिए धार्मिक मान्यता की जरूरत तो होती ही नहीं. संस्कृति के प्रवाह में धर्म बहुत बाद में आता है जब संस्कृति एक निश्चित प्रवाह का रूप ले लेती है. आज के समाज में धर्म ही प्रमुख हो गया है. जिन तत्वों को जोड़कर धार्मिक मान्यताओं का विकास होता है वे कर्मकाण्ड बनकर रह गयी हैं. जीवन जीने के दूसरे सभी जरूरी उपाय पीछे छूट गये हैं और हम धार्मिक मान्यता और पूजा पद्धति को ही धर्म के रूप में परिभाषित करने लगे हैं. अति तो तब हो जाती है जब इसे ही हम संस्कृति मान बैठते हैं. कुछ हद तक ऐसा सांप्रदायिक प्रभुत्व बढ़ने के कारण भी हुआ है. किसी खास प्रकार के धर्मावलंबी जब किसी खास प्रकार मान्यतावाले लोगों को ही अपना सहोदर मानने लगते हैं तो उन्हें एक निश्चित भू-भाग चाहिए जहां वे निश्चिंत होकर रह सकें. इस्लाम और ईसाईयत में यह मानसिकता सबसे प्रबल है. पूरी दुनिया में पिछले कुछ सौ सालों से यह मानसिकता दनदनाते हुए घूम रही है. यह आनेवाले कितनी सदियों तक रहेगी, कहा नहीं जा सकता लेकिन जब तक रहेगी मनुष्य अपने पूर्णरूप में विकास नहीं कर पायेगा. आज जिस हिन्दुत्व वे आफ लाईफ की वकालत की जाती है वह भी अपने मूल रूप में नहीं बल्कि ईसाईयत और इस्लाम के प्रतिक्रियास्वरूप आकार लेती है. ऐसे में ही यह सवाल उठता है कि किसी निश्चित भूभाग में भी अगर हिन्दू अल्पसंख्यक हो गये तो क्या होगा?

सभा इसी मानसिकता का प्रतिनिधित्व करती थी. तात्कालिक रूप से बहावी आतंकवाद और धर्मांतरण को समर्पित ईसाई भारत में अपने-अपने तरीके से अपनी मान्यता को स्थापित कर रहे हैं. इस मानसिकता के प्रभाव में तात्कालिक रूप से बहुत सारी समस्याएं खड़ी हुई हैं. पिछले १६-१७ सालों से संगठित अपराध ने आतंकवाद का सशक्त रूप धारण कर लिया है जिसे इस्लाम के कट्टरपंथी हवा दे रहे हैं. हिन्दू ही नही इस्लाम का उदारवादी धड़ा भी हक्का-बक्का हैं. यह इस्लामिक आतंकवाद फौरी तौर पर बड़ी समस्या बन गया है जिसे तात्कालिक राजनीतिक स्वार्थ ने और भी जटिल बना दिया है. आईबी के पूर्व प्रमुख अजीत डोभाल ने कहा "अगर इस्लामी जेहाद के साथ इसी तरह तुष्टीकरण होता रहा तो कोई पचास साल और लगेंगे जब आपको मजबूरन शरीयत को अपने संविधान के रूप में स्वीकार कर लेना होगा." इसका दूसरा सिरा एक दूसरे वक्ता (उन्होंने अपना नाम नहीं बताया) बताते हैं कि इस्लाम के माननेवाले जिस तेजी से लोकतांत्रिक प्रक्रिया में हिस्सा ले रहे हैं, वह बताता है कि वे ज्यादा से ज्यादा अपने प्रतिनिधियों को भारत की संसद और विधानसभा में भेजना चाहते हैं." इसके दो कारण हो सकते हैं. एक, या तो मुसलमान किसी बड़े एजंडा के तहत काम कर रहे हैं या फिर वे आम हिन्दू मतदाता से ज्यादा जागरूक हैं. दुर्भाग्य से यहां के वक्ताओं को दूसरे कारण पर विचार करने का वक्त नहीं था.   

सेन्टर फार पालिसी रिसर्च के निदेशक जीतेन्द्र बजाज कहते हैं भारत इस समय चौरस्ते पर है. मुश्किल वक्त है. उनकी इस बात को संविधानविद सुभाष कश्यप यह कहते हुए खारिज करते हैं कि भारत केवल चौरस्ते पर नहीं है. भारत ऐसे चौरस्ते पर है, जहां से कोई रास्ता किसी ओर नहीं जाता. तो क्या देश में बढ़ती इस्लामिक आबादी इस देश के लिए खतरा है? बढ़ती ईसाईयत आबादी इस देश के गुण-धर्म स्वभाव को खत्म कर देगी? जैसा कि कुछ दिन पहले एक वामपंथी अध्ययन ने भी माना था कि भारत अगले दो सौ सालों में इस्लामिक बहुलता वाला राष्ट्र हो जाएगा. जिस रफ्तार से इस्लामिक आबादी का विस्तार हो रहा है उससे इस धारणा को बल मिलता है. इतिहास में अभी तक इस बात के प्रमाण ही मिले हैं कि जहां कहीं भी इस्लामिक आबादी बढ़ी वहां से कम्पोजिट कल्चर और सेकुलर मानस दोनों ही खत्म हो गये. पाकिस्तान, अफगानिस्तान, बांग्लादेश और अब कश्मीर इस बात के प्रत्यक्ष उदाहरण हैं. हिन्दू चिंतकों की इस चिंता का निश्चित रूप से ही सम्मान किया जाना चाहिए. उनको भी अपनी धर्मरक्षा का उतना ही हक है जितना इस्लाम या ईसाई धर्मावलंबी को. आज का भारत सनातन भारत है इसलिए यहां सबके लिए जगह है. कल का भारत अगर किसी एक खास प्रकार के पंथ या मत का भारत होगा तो यहां उसके अलावा बाकी लोगों के लिए वैसी ही जगह होगी जैसे पाकिस्तान, बांग्लादेश या फिर अफगानिस्तान में है. फिर शायद वह भारत भारत भी नहीं होगा.

लेकिन इस बहुसांस्कृतिक पहचान से उस तरह से उबरा भी नहीं जा सकता जैसे हिन्दू रणनीतिकार सोच रहे हैं. सबसे पहली बात, कोई सिर्फ मुसलमान होने के नाते राष्ट्रद्रोही नहीं हो जाता और दूसरी बात ईसाईयत आज के बाजार का धर्म है. जो लोग इस बाजार के समर्थक हैं वे न तो इसाईयत के धर्मांतरण का विरोध करने का हक रखते हैं और न ही जेहाद का. क्योंकि ये दोनों ही बाजार की क्रिया और प्रतिक्रिया हैं. रणनीतिकार जो नहीं देख पा रहे हैं वह यह कि बाजार इसी तरह से हावी रहा जिसकी जड़ें पश्चिम की औद्योगिक क्रांति में जाकर ठहरती हैं तो धर्मांतरण और आतंकी जेहाद दोनों ही तेजी से बढ़ेगें. भारत का अपना सनातन जीवन दर्शन तो कहीं भी ठौर खोज लेगा क्योंकि वह सत्य है. सनातन है. अजर-अमर और अविनाशी है. वह मूर्तियों में नहीं है, वह मान्यताओं में नहीं है, वह सत्य अनुभूतियों में हैं जो मनुष्य को मनुष्य होने का बोध कराती है. वह धार्मिक मान्यताओं से बहुत आगे जाती है. वह धर्म नहीं है, वह धर्मों को पैदा करता है. जो तात्कालिक चुनौती है, उससे हम कैसे निपटते हैं उसी में दीर्घकालिक उत्तर भी छिपे होंगे.  

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फ़िरदौस ख़ान on 29 October, 2008 13:39;00
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भारतीय संविधान के मुताबिक़ भारत एक धर्म निरपेक्ष देश है...यहां पर अलग-अलग मज़हबों और संस्कृतियों के लोग रहते हैं...इसके बावजूद आज 'कुछ' लोग भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाने पर तुले हुए हैं...यही मानसिकता अलगाव पैदा कर रही है...जब मुसलमान, ईसाई या दूसरे मज़हबों के लोग भारत की 'गंगा-जमुनी' तहज़ीब में यक़ीन रखते हुए अपने इस देश में सुख-शांति से रहना चाहते हैं तो फिर हिन्दू संस्कृति की दुहाई देकर माहौल को बिगाड़ने की कोशिश क्यों की जा रही है...मैं समझती हूं कि हर मज़हब या संस्कृति इंसान को इंसानियत का सबक़ देते हुए उसमें इंसानी फ़ितरत को पुख्ता करने के लिए ही होते हैं...ऐसा धर्म या संस्कृति जो इंसान को एक-दूसरे के खून का प्यासा जानवर बनाए...कहां तक सही क़रार दी जा सकती है...

एक अहम सवाल और... हर कोई जानता है इस देश की आज़ादी के लिए यहां रहने वाले मुसलमानों ने भी कुर्बानियां दी हैं...भारतीय संस्कृति के विकास के लिए मुसलमान बादशाहों ने उल्लेखनीय कार्य किए हैं...इस सबके बावजूद मुसलमानों की कुर्बानियों और उनके योगदान को भुलाकर क्यों हमेशा उनकी वतन परस्ती पर शक किया जाता है...क्या ऐसा मुसलमानों में हीन भावना पैदा करने के लिए किया जाता है...ग़द्दार जयचंद क्या मुसलमान था...? इस देश के राष्ट्रपिता गांधी को मौत की नींद सुलाने वाला गोडसे क्या मुसलमान था...?


धर्म जैसे मुद्दों पर लड़ने के बजाय...इस देश और समाज की खुशहाली पर ध्यान क्यों नहीं दिया जा रहा है...परमाणु शक्ति बनने जा रहे भारत में आज भी बच्चे और बड़े भूख से दम तोड़ रहे हैं...नौजवान रोज़गार न मिलने पर अपराध की तरफ़ अग्रसर हो रहे हैं...नारी को दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती के रूप में पूजने वाले देश के लोग ही सरेआम महिलाओं से सामूहिक बलात्कार कर उन्हें ज़िन्दा जला रहे हैं...क़र्ज़ से बेहाल किसान खुदकुशी करने पर मजबूर हैं...दहेज के दानव के कारण लड़कियों को कोख में ही मौत की नींद सुलाया जा रहा है...कितनी ही लड़किया दहेज न होने की वजह से कुंवारी बैठी हैं...विवाहिताओं को दहेज के लिए ज़िन्दा जलाया जा रहा है...

आज जितना वक़्त और ताक़त धर्म के नाम आतंक फैलाने में लगाई जा रही है...अगर उससे आधी मेहनत देश और समाज की भलाई के कामों में लगाई जाए तो...वो दिन दूर नहीं जब भारत फिर से सोने की चिड़िया बन सकता है...बस ज़रूरत है ईमानदारी से और मिलजुल कर काम करने की...
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Brijesh on 29 October, 2008 15:24;28
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फ़िरदौस जी आपको ये तो याद है कि जयचंद और गोडसे हिन्दू थे पर दाऊद और सलेम के बारे में कुछ नही कहेंगी आप। और अफजल के बारे में क्या कहना है आपका? रही बात मुसलमान बादशाहों की तो बाबर से लेकर औरंगजेब तक सबका एक ही मकसद था इस्लाम का विस्तार करना व हिन्दूओं का शोषण करना। लाखों हिन्दूओं को जबरन मुसलमान बनाया गया और हिन्दूओं पर जजिया और अन्य कर लगाये गये।
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sudhakar mishra on 29 October, 2008 20:41;33
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behut hi sunder lekh hai jo stya hai
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PRASHANT mehrishi on 30 October, 2008 23:21;22
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bhai sab tiwari ji jindgi main pahli bar aapne koi kam ki bat likhi hai aapko badhai . keep it up. dhanyawad aur shubhkamnaye. pratyek shikshit vyakti ki ye bat samajh aani chahiye ki hindu kam hote hi secularism samapt ho jata hai.
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shridhar on 31 October, 2008 13:16;44
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Jo log bachav ke liye milijuli sanskriti aur arop lagane ke liye sampradaikta shabdo ka prayog karte hai, ve milijuli sankriti jaise faltu shabdo ka prayog karte hai. Sahi ko sahi aur galat ko galat kahane ki himmat honi chahiye. Kori laffaji se kya hoga.
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ummed Singh Baid Saadhak on 15 November, 2008 12:53;00
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"लेकिन इस बहुसांस्कृतिक पहचान से उस तरह से उबरा भी नहीं जा सकता जैसे हिन्दू रणनीतिकार सोच रहे हैं. सबसे पहली बात, कोई सिर्फ मुसलमान होने के नाते राष्ट्रद्रोही नहीं हो जाता और दूसरी बात ईसाईयत आज के बाजार का धर्म है. जो लोग इस बाजार के समर्थक हैं वे न तो इसाईयत के धर्मांतरण का विरोध करने का हक रखते हैं और न ही जेहाद का. क्योंकि ये दोनों ही बाजार की क्रिया और प्रतिक्रिया हैं. रणनीतिकार जो नहीं देख पा रहे हैं वह यह कि बाजार इसी तरह से हावी रहा जिसकी जड़ें पश्चिम की औद्योगिक क्रांति में जाकर ठहरती हैं तो धर्मांतरण और आतंकी जेहाद दोनों ही तेजी से बढ़ेगें. भारत का अपना सनातन जीवन दर्शन तो कहीं भी ठौर खोज लेगा क्योंकि वह सत्य है. सनातन है. अजर-अमर और अविनाशी है. वह मूर्तियों में नहीं है, वह मान्यताओं में नहीं है, वह सत्य अनुभूतियों में हैं जो मनुष्य को मनुष्य होने का बोध कराती है. वह धार्मिक मान्यताओं से बहुत आगे जाती है. वह धर्म नहीं है, वह धर्मों को पैदा करता है. जो तात्कालिक चुनौती है, उससे हम कैसे निपटते हैं उसी में दीर्घकालिक उत्तर भी छिपे होंगे."- यही शुद्ध सांस्कृतिक धारा इस्लाम और ईसाइयत को भी अपने भीतर समाहित करे, यही है विश्व-बन्धुत्व और वसुधैव कुटुम्बकम की भाव-भूमि.

समझाओ फ़िरदौस को,हिन्दु-ह्रदय का मर्म.
बाकी सारे पन्थ हैं, एक यही है धर्म.
यही है सच्चा धर्म,विश्व का मंगल इसमें.
स्वागत है अल्लाह-गोड का हरदम इसमें.
कह साधक मिटाना पुण्य-भूमि से दोष को.
हिन्दु-ह्रयदय का मर्म, समझाओ फ़िरदौष को.
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mehta on 18 October, 2009 15:37;49
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wow firdos par yr ye sab bate tum ulemao ko samjhao molviyo se kho abb tum iss lekh ko galat bta rhi ho par tumne ye nhi kha ki jabran dharm parivartan sirf ulema molvi hi kra rhe hai mujhe ye btao kya koi hindu tumhe ye kahne aya tum hindu bno or ek bat tumhare dada ya pardada to hindu hi honge kabhi pardada ya unke dada ka nam pucho or rhi bat desh ke vikas ki tum kya samjhti ho atankwadi iss desh ki tarakki hone denge ye bat sahi hai muslims ne ajadi me sath diya lekin ye bhi to dekho orangjeb ne kya kiya punjab sindh kyo bharat se alag hue yr jha bhi muslims ki sankhya achhi khasi hoti hai alag desh ki mang ho jati hai agar or jankari chahiye to batao kha milogi khuli bhas karte hai kya tayar ho tum
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image संजय तिवारी आप जहां तक सोच सकते हैं इंटरनेट आपको वह करने का मौका देता है. अभी तक मानव सभ्यता ने जितने भी मीडिया माध्यमों का उपयोग किया है यह उन सबमें अनूठा, प्रभावी और सर्वगुण संपन्न है. सूचना लेने देने के तीन माध्यमों दृश्य, श्रवण और पाठ को एक ही धागे में लपेटे नया मीडिया उत्पादन और पहुंच दोनों के लिहाज से सर्वश्रेष्ठ है. ऐसे नये मीडिया का जनहित के लिए भरपूर उपयोग हो, विस्फोट.कॉम उसी दिशा में उठा एक कदम है. sanjaytiwari07@gmail.com
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