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जय हो, मंगल हो, कल्याण हो !

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आप सबका शुभ हो. आपके बीच आकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हो रही है. वेदों का सार उपनिषद है और उपनिषदों का परिणाम वेदांत में कहा गया है. वेदांत में ही एक शब्द कहा गया है- ब्रह्म सत्य है, जगत मिथ्या है. यह बात मेरी समझ में नहीं आयी. सत्य से मिथ्या की उत्पत्ति कैसे हो सकती है? इस एक बात ने मुझे प्रेरित किया कि मुझे सत्य की खोज करनी चाहिए. फिर मैंने परंपरा में ऋषियों-मुनियों द्वारा कहे गये इस बात की ओर ध्यान दिया कि समाधि में ही सब समाधान है. इसके बाद मैं अमरकंटक आ गया. वहां २५ साल साधना की. साधना के परिणामस्वरूप जो कुछ प्राप्त हुआ वह मैं आपके सामने लेकर प्रस्तुत हूं.

मुझे जो उत्तर मिले उसमें वह वाक्य की मूलतः गलत हो गया कि ब्रह्म सत्य है और जगत मिथ्या है. सत्य से मिथ्या की उत्पत्ति कैसे हो सकती है? फिर सत्य क्या है? मुझे जो उत्तर मिला वह यह कि अस्तित्व ज्ञान सह-अस्तित्व रूप में होता है. सह-अस्तित्व क्या है? एक व्यापक चेतना है उसमें सभी छोटी चेतना समायी हुई है. आप हम सब उसी व्यापक चेतना में समाये हुए हैं. फलस्वरूप वही चेतना भौतिक संसार में उर्जा के रूप में प्रकट हुई है. वही चेतना मानव परंपरा में ज्ञान के रूप में प्रकट होती है. मानव चेतना में ज्ञान की प्राप्ति के लिए कोई मुश्किल नहीं है. क्योंकि मानव के पास कल्पना शक्ति है इसलिए ज्ञान तो चारों ओर प्रकट है. ऐसा नहीं है कि मानवजाति में कर्म स्वतंत्रता और कल्पना स्वतंत्रता किसी ने पैदा कर दिया हो. वह तो आदिरूप में स्थित है.
आदिकाल से आधुनिक काल तक कर्म स्वतंत्रता को प्रकट करने के लिए मानव जाति ने बहुत प्रयास किया है. आज स्थिति यहां तक पहुंच गयी है कि हम धरती को ही दहकते अंगारे में बदलने के लिए कृतसंकल्प दिखाई दे रहे हैं. हम धरती को ही सूर्य बना देना चाहते हैं. इसकी जो धारण क्षमता है उसको हम निरंतर कमजोर करते जा रहे हैं. धरती पर सारे लोग इसी काम में लगे हुए हैं. फिर भी कुछ लोग ऐसे हैं जो देख रहे हैं कि धरती बीमार हो रही है. वे धरती की बीमार होते देखकर असंतुष्ट हैं. यही लोग हैं जो चाहते हैं कि मनुष्य की जो प्रगति यात्रा है उसके बारे में पूरी तरह से पुनर्विचार करने की जरूरत है. मैं भी जो आपके पास आया हूं, इसी प्रयोजन का हिस्सा है.
मेरा ऐसा मानना है कि धरती को बीमार होने से रोकने के लिए हम सबको भ्रम से मुक्ति चाहिए, मानव अपराध से मुक्ति चाहिए और अपने-पराये के भेद से मुक्ति चाहिए. और मानवजाति इसे प्राप्त कर सकता है. अगर हम इन तीन प्रकार के भ्रमों से मुक्त हो गये तो क्या होगा? हम सीमा सुरक्षा से मुक्त हो जाएंगे. यह सीमा सुरक्षा ही है जिसके कारण अपने पराये का भेद खड़ा होता है, मानव अपराध में बढ़ोत्तरी होती है और सभी प्रकार के अवैध को वैध करार दे दिया जाता है. यह अवैध को वैध मानने का रोग सभी देशों, सभी समुदायों में समान रूप से फैल चुका है. ऐसा नहीं है मानव समाज ने इससे मुक्ति के रास्तों की तलाश नहीं की है. मानव समाज ने इस संकट से मुक्ति के बहुत सारे उपाय खोजे हैं, और आदिकाल से खोजते आ रहे हैं. लेकिन हमने उपाय के नाम जो जीवन दर्शन अपनाया वह सुविधा संग्रह का जीवन दर्शन है. आधुनिक संसार में यह भावना चरम पर है. सुविधा संग्रह को हम समृद्धि मानते हैं. सुविधा संग्रह से जीने की कोई भी विधि वैधानिक नहीं हो सकती है. अगर इस हिसाब से जीवन जीयेंगे तो सभी अवैध को वैध मानना ही होगा. आप न भी चाहें तो मजबूरी में आपको यह करना ही होगा. इससे पार पाने  के लिए हमें सुविधा संग्रह की बजाय समाधान समृद्धि का जीवन जीना सीखना होगा. जिसके लिए हम आपस में मंगल मैत्री से मिलने की शुरूआत करें. इसका सूत्र है कि हर नर नारी समझदार हो सकता है, हर नर-नारी से युक्त परिवार समझदार हो सकते हैं और समाधान समृद्धिपूर्वक जी सकते हैं. समाधान समृद्धि पूर्वक जीनेवाला परिवार दूसरों को भी समाधान समृद्धि पूर्वक जीने का रास्ता दिखा सकता है.

मानव के समाधान समृद्धि का मूल श्रम है. श्रम करने का अधिकार शरीर और जीवन के संयुक्त रूप में ही होता है. यह हर मानव में समाहित है. जीवन की खोज है- ज्ञान. यही बात ध्यान में रखकर ज्ञान की खोज शुरू की थी कि वह कौन सा ज्ञान है जो हर मनुष्य के लिए सुलभ है. मैंने इस खोज में जो अनुभव किया है वह है- सह-अस्तित्वरूपी दर्शन ज्ञान, जीवन ज्ञान और मानवता पूर्ण आचरण ज्ञान. इन तीनों के ज्ञान होने की आवश्यकता है. मानवतापूर्ण आचरण ज्ञान हुए बिना दूसरे मानव से अपना वास्तविक रिश्ता पहचान नहीं पाते हैं. अभी हम समुदाय के रूप में एक दूसरे को जानते-पहचानते हैं, किंतु मानव के रूप में एक दूसरे को नहीं पहचानते हैं. यही मूल रोग है जो अपने पराये का दूरी बनाती है. यह ज्ञान होना जरूरी है कि मानव के आधार पर हमारा आपस में क्या रिश्ता है. दुर्भाग्य से मानव समाज ने अपनी शिक्षा व्यवस्था में इस ज्ञान को समाहित नहीं कर पाया है. इससे क्या हो रहा है? मनुष्य के पास समाधान नहीं है. हमारी शिक्षा हमें किसी प्रकार का समाधान नहीं देती है. अगर हम अपनी स्कूली शिक्षा, प्रौढ़ शिक्षा और समाज शिक्षा में सह-अस्तित्व में जीवन को समाहित कर सकें तो हमें समाधानपूर्वक जीने का रास्ता मिल जाएगा. आज की आधुनिक शिक्षा ठीक इसके उलट है. आज की शिक्षा मनुष्य के स्वाभाविक कर्म श्रम से उसे दूर कर रही है. यह तो आप हम सब देख ही रहे हैं. मैं आपसे सिर्फ इतना ही कहना चाहता हूं कि समृद्धिपूर्वक और समाधानपूर्वक जीने के लिए हमें श्रमपूर्वक और ज्ञानपूर्वक जीना ही होगा, और कोई रास्ता नहीं है.

लेकिन शिक्षण विधि में सिर्फ पढ़ना ही लक्ष्य नहीं है. शिक्षण विधि तब पूर्ण होती है जब पढ़ने, समझने और आचरण में लाने का मौका देता है. समझने का मतलब क्या है? समझने का अर्थ होता है कि जो भी शब्द है उसका एक अर्थ होता है. उस अर्थ के रूप में ही अस्तित्व में वस्तु होती है. वस्तु का ज्ञान हो तो हम शब्द का ठीक अर्थ समझते हैं नहीं तो हम शब्द का अर्थ समझ नहीं पाते हैं. जैसे पानी एक शब्द है और पानी एक वस्तु है. लेकिन पानी शब्द रूप में प्यास नहीं बुझाता है. प्यास तो पानी के अर्थरूप में ही बुझता है. पिता एक नाम है, पिता एक वस्तु है. माता एक नाम है, माता एक वस्तु है. अगर हमें अर्थ समझना है तो हमें वस्तु को समझना होगा. लेकिन अभी तक भारत की आदर्शवादी शिक्षा कहती है कि केवल नाम लेने से ही कल्याण होता है. करीब करीब सभी समुदाय नाम से कल्याण होने की बात करते हैं. क्योंकि इसमें कोई जिम्मेदारी नहीं होती. हम कहते हैं नाम लेते रहो, उद्धार हो जाएगा. न जाने कब से यही होता आ रहा है. लेकिन क्या मनुष्य कहीं पहुंचा है? इस विधि से मनुष्य जहां पहुंचा है वह आप भी देख रहे हैं. मैं खुद इस विधि से गुजरा हूं. लंबे अर्से तक यही किया है. हम लोग वेद पारायण करते हैं, लेकिन क्या मिला? क्या प्रयोजन निकला? अगर नाम लेना ही सब प्रकार का समाधान है तो मनुष्य इतने संकटों से क्यों घिरा हुआ है. मुझे जो उत्तर मिला है वह यह कि मानवजाति परंपरा में ही ज्ञान से वंचित हो गया है. मैं किसी एक समुदाय की बात नहीं कर रहा. सभी समुदाय ज्ञान से वंचित है. ज्ञान से वंचित हैं, इसीलिए विवेक से वंचित हैं, विवेक से वंचित हैं इसीलिए विज्ञान से वंचित हैं. आज जो विज्ञान है वह तो जीवन का नाश करनेवाला विज्ञान है. विज्ञान क्या है? ज्ञान और विवेक को जीवन में क्रियान्वयन करना ही विज्ञान है. मैंने इसी प्रकार विज्ञान को समझा है और विज्ञान को इसी रूप में शिक्षित करने की व्यवस्था भी बनाई है. इसके बारे में आप सब विचार कर सकते हैं, परामर्श कर सकते हैं, अगर सच्चाई नजर आये तो इसको स्वीकार कर सकते हैं, स्वीकार करेंगे तो उपकार हो सकता है.  

ज्ञान के बाद विवेक को प्राप्त होना है. विवेक है जीवन का अमरत्व. हमारे बुजुर्गों ने कहा कि आत्मा अमर है. मैं ऐसा कहता हूं कि जीवन अमर है. जीवन एक गठनपूर्ण परमाणु है. इसलिए इसमें मात्रात्मक परिवर्तन होता रहता है. इसलिए हमने इसे अमर नाम दिया. इस पर आप भी सोच विचार कर सकते हैं. गठनपूर्ण परमाणु होने के कारण परिणाम होना समाप्त हो जाता है क्योंकि परिणाम और गति तो एक परमाणु में होता है. गठन में परिणाम नहीं होता. परिवर्तन होता है. एक अंश परमाणु है और ऐसे अंशों का संगठन परिणाम माना गया है, यह है भी. ऐसे परमाणु संगठन में जब अंशों का घटना-बढ़ना कम हो जाता है तो इसी को माना गया है गठनपूर्णता (सनातन जीवन दर्शन में मोक्ष). यही जीवन का स्वरूप है. अनादिकाल से जीवन की कुल यात्रा में आशा से विचार और इच्छा तक की ही यात्रा हुई है. अभी मानव की यात्रा में संकल्प और प्रमाण. शेष है. मनुष्य संकल्प को प्रमाणित करना चाहता है लेकिन अभी तक कर नहीं पाया है. अगर इस प्रकार हम विचार कर सकें तो शरीर की नश्वरता और जीवन का अमरत्व दोनों ही समझ में आ जाते हैं.


अब यह जरूरी है कि ज्ञान को उपलब्ध होने के लिए हमें कैसा जीवन जीना चाहिए? हमारे मन शरीर का व्यवहार क्या होना चाहिए? हमारे व्यवहार का क्या नियम होना चाहिए? मैंने जो अनुभव किया वह आपको बताता हूं. अगर हमें अखण्ड समाज के रूप में जीना है तो हमें पांच प्रकार के आचरण का पालन करना होगा. १, स्वधन २, स्वनारी, ३, स्वपुरूष, ४, दयापूर्ण ५, कार्यव्यवहार रूप. दूसरा कोई रास्ता नहीं है. दूसरे जो भी रास्ते हैं उसमें हम हमेशा अपने आप को ही ठीक मानेंगे और दूसरे को गलत मानेंगे.हमारे इसी जीवन के कारण समुदाय-समुदाय के बीच में सीमा सुरक्षा बनी हुई है. उसमें सभी प्रकार की अवैध बातें वैध मान ली जाती है. यह आज से नहीं है. अनादिकाल से होता है. राजा बनने से पहले युवराज होता था. युवराज की क्या योग्यता होती थी? वह तभी वीर समझा जाता था जब पड़ोसी राज्य की जमीन हड़प लेता था, पड़ोसी राज्य की स्त्री को वरवश ले आता था तो वह पराक्रमी समझा जाता था. इस प्रकार से कौन सी व्यवस्था रही होगी? यही हमारी मानव जाति का इतिहास है. और इतिहास वह होता है जो वर्तमान से छूए रहता है.  वर्तमान के आचरण जो परिलक्षित हो रहा है वह हमारा इतिहास है. इतिहास वह नहीं है जिस हम मखौल के रूप में लिख-पढ़ लेते हैं. हमें इतिहास समझने के लिए काल और क्रिया को समझना होगा. आप देखेंगे तो काल और क्रिया तो सदैव बना हुआ है. लेकिन हमने जिस तरीके से इतिहास को पढ़ा और जाना वह विखंडन बुद्धि थी जिसने सूर्य के प्रतिदिन के आगमन-प्रस्थान को विखंडन का आधार बना दिया और काल का निर्धारण करना शुरू कर दिया. सूर्य तो नित्यप्रति है तो फिर यह कैसे हो गया? इस विखंडनवादी मानसिकता के कारण हम भ्रम में पड़ गये. यह विखंडनवादी विधि मानव परंपरा के लिए हितकर नहीं हुआ. तो संख्या और गणना का निर्धारण कैसे करना चाहिए? वस्तुमूल्क संख्या का निर्धारण करना चाहिए. जैसे अभी यहां कितने लोग बैठे हैं उसकी संख्या हो सकती है, कितने लोग समझ गये उसकी संख्या हो सकती है या फिर इस बात का कितने लोग विरोध कर सकते हैं उसकी भी संख्या हो सकती है. इसलिए इसी प्रकार वस्तुमूलक संख्या से मानव का उपकार होता है. विखण्डनविधि से मानवजाति का कोई उपकार नहीं होता है. आप केवल भ्रम में पड़ते हैं, समस्या में फंसते हैं. इसी विखंडनवादी मानसिकता से फिशन-फ्यूजन नाम की प्रक्रिया को पा लिया. उसका परिणाम क्या है? आज धरती बीमार हो गयी है. इस बीमार धरती पर आगे क्या होगा? अगली पीढ़ी का क्या होगा?

मेरा विश्वास है इसके बारे में पुण्यशील लोग सोचेंगे. मेरा आपसे यही कहना है कि ज्ञान और विवेक के बाद भी विज्ञान की सही प्राप्ति हो सकती है. यही मनुष्य का कर्मशील व्यवहार है. अगर ज्ञान और विवेक के बाद विज्ञान की प्राप्ति होती है तो हम कालवादी ज्ञान, क्रियावादी ज्ञान और निर्णयवादी ज्ञान को ठीक से समझ पाते हैं. इस विधि से ही हम वस्तु के उपयोग, सदुपयोग और प्रयोजनशील बना सकते हैं. उपयोग परिवार में होता है, सदुपयोग समाज में होता है और प्रयोजनशीलता व्यवस्था में होती है. हम जीते भी वैसे ही हैं. अगर हम इस प्रकार जी पाते हैं तो उपकारपूर्ण जीवन जी सकते हैं. मानव का लक्ष्य होता है समाधान, समृद्धि और सह-अस्तित्व. इसके लिए दिशा निर्धारित करने से सुख, शांति, संतोष और आनंद प्राप्त होता है. समूची मानव शिक्षा में इस ओर आगे बढ़ने के लिए कोई सोच नहीं है, कोई प्रयास नहीं है. समझ का लोकव्यापीकरण होगा तो हर नर-नारी समझधार होगा. उसी के आधार पर समझदार परिवार होगा. समझदार परिवार में ही समाधान, समृद्धि, सह-अस्तित्व, अभय प्रकट होगा. इसके फलस्वरूप सुख, शांति, संतोष, आनंद अपने आप प्रकट होगा. कोई एक बात प्रमाणित होने से दूसरी बात प्रमाणित होती है. इसी को व्यावहारिक माना गया है. इसके बाद ही हम अखण्ड समाज और सार्वभौम व्यवस्था की ओर आगे बढ़ सकते हैं. इसके बिना हम समुदाय ही बने रहेंगे और सीमाओं में ही घिरे रहेंगे और अपने-अपने को सार्वभौम घोषित करते रहेंगे. इसको आप हम सब अच्छी तरह से परख सकते हैं.

जय हो, मंगल हो, कल्याण हो.

(जीवन विद्या सम्मेलन के समापन पर १९ अक्टूबर को दिया गया बाबा नागराज का व्याख्यान.)

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mahendra mishra on 28 October, 2008 18:38;17
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दीपावली पर हार्दिक शुभकामनाएँ
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