भारतीय मुसलमान कभी तालिबान नहीं हो सकते
ये भारत है। इसकी खासियत ही इसे दुनिया के दूसरे मुल्कों से अलग करती है। ये जिनका वतन है उनकी घुट्टी में अमन चैन की बात सर्वोपरि बनकर घुली है। यहां मुसलमानों की सबसे बड़ी आबादी रहती है। लेकिन तालिबान बनने की बात नहीं होती। कोई मुजाहिदीन नही बनता। अपने ही बच्चों को भड़काकर हथियार थमाने की मूर्खता यहां नही होती।इस्लामिक जेहाद की प्रचलित थोथी व्याख्या से कोसों दूर है ये देश। पाकिस्तान,अफगानिस्तान या धू धूकर जल रहे अन्य मुल्कों की तरह इसकी जमीन कमजोर नहीं कि यहां का युथ भटककर भस्मासुर बन जाए। और दुनिया के साथ साथ खुद को स्वाहा करने में लग जाए। ऐसी ही भाव से भरी बातें दिल्ली के इंडिया इस्लामिक इंटरनेशनल सेंटर के कांफ्रेंस हाल में एक सेमिनार में हुई।
हालांकि सेमिनार का विषय था-"ओबामा उम्मीद की नई किरण"। ओबामा के बहाने ये बातें सेमिनार के मुख्य अतिथि ललित मानसिंह.भारत सरकार के पूर्व सचिव के वी राव, इंडिया इस्लामिक सेंटर के अध्यक्ष सिराजुद्दीन कुरैशी और दूसरे वक्ताओं के हवाले से की गई। बातें सिर्फ भारत,भारत मां के आंचल की अद्भूत ताकत और भारतीय सभ्यता की खासियत तक सीमित नहीं रही। बल्कि ओबामा को भारतीय संदर्भ में समझने के लिए ही भारतीयता की तस्वीर खिंची गई। ललित मानसिंह ने सारगर्भित बात कही। उन्होने कहा कि पहले "काले" अमेरिकी राष्ट्रपति होने के नाते बराक हुसैन ओबामा को दुनिया उम्मीदों की किरण भले ही मान रही हो लेकिन वो मुश्किलों से घिरे इंसान हैं। उम्मीद के साथ सेमिनार में ओबामा के सामने की मुश्किलों पर तसल्ली से गौर फरमाया गया। केंद्र सरकार के पूर्व सचिव के वी राव ने बताया कि मंदी से बुरी तरह झुलस रही अमेरिकी अर्थव्यवस्था को बचाने की महती जिम्मेदारी ओबामा पर है।
आतंकवाद से निपटने के नाम पर जार्ज बुश ने दुनिया भर में जो अमेरिकी अधिनायकवाद का रायता फैला रखा है ओबामा को उससे निपटना है। लेकिन सबसे बड़ी चुनौती अमेरिका में निराश बैठे बेरोजगारों की फौज को कम करना है। और साथ ही महज चार साल में ही दुनिया की उम्मीदों पर भी खरे भी उतरना है।
राजनयिक ललित मानसिंह ने दिल से बातें की। अमेरिका में भारत के राजदूत होने के अनुभव के बावजूद पिछले साल सितंबर तक सितंबर तक वो मान रहे थे कि हेलरी क्लिंटन ही अमेरिका की राष्ट्रपति होंगी। लेकिन ओबामा के अचानक पासा पलट दी। ऐन वक्त पर भारत के हिमायती बन गए। ओबामा के चुनाव अभियान के जरिए सबके उम्मीदों का किरण बन जाने की कहानी.ललित मानसिंह ने रोचक अंदाज में कह सुनाया और आगाह किया कि जरूरत के मुताबिक अमेरिकी राष्ट्रपति के अचानक बदल जाने का खेल आगे भी जारी रह सकता है। फिलीस्तीन पर भारत के रूख से बेहद नाराज एक श्रोता के सवाल के जवाब में ललित मानसिंह ने कहा कि फिलीस्तीन को मुस्लिम समस्या के चश्मे से देखना कच्ची बात है। जज्बाती होने की जरूरत नहीं। वो इंसानियत की समस्या है। इसे किसी धर्म के आईने से कोई नही देख रहा। इजरायल के हालिया लड़ाई में फिलीस्तीन ही दो हिस्सों में बंटा है। अरब मुल्कों में समस्या से निपटने में मतयैक नहीं है।
बेहतर डिप्लोमेट का परिचय देते हुए उन्होने भारत इजरायल रिश्ते को लेकर बनी धारणा को भी साफ किया। उन्होंने याद दिलाया कि 1993 में नरसिंह राव की सरकार ने इजरायल को मुल्क का दर्जा फिलस्तीनी नेता यासिर अराफात की सलाह पर दी। राव सरकार ने भारत की मेहमानवाजी के लिए आए अराफात के सामने इजरायल को दर्जा देने का सवाल किया,तो अराफात का कहना था कि मिश्र और अरब के देशों ने इजरायल से संबंध बना लिया है। भारत अगर इजरायल से संबंध बनाता है तो डिप्लोमेसी के लिहाज से फिलीस्तीन के फायदे में रहेगा। भारत ने रिश्ते में फिलीस्तीन की उम्मीदों का हमेशा ख्याल रखा है।
वरिष्ठ नौकरशाह के वी राव ने माना कि इस साल की शुरुआत में फिलीस्तीन पर इजरायल हमले के दौरान भारत भी दुनिया के बाकी मुल्कों की तरह लाचार और बेबस नजर आया। ओबामा के बहाने सेमिनार में वो तमाम बातें हुई जिसपर आने वाले दिनों में भारत से अमेरिकी रिश्ते की इमारत ख़ड़ी होगी। आतंकवाद से पाकिस्तान की परेशानी को उसकी गलत नीतियों का नतीजा बताया गया। समारोह का सार था कि अमेरिका से दुनिया को सीमित उम्मीद ही पालना चाहिए। ओबामा हों या जार्ज बुश या फिर बिल क्लिंटन कोई ज्यादा फर्क नही पड़ता है। क्योंकि अमेरिका के किसी भी राष्ट्रपति को अमेरिकी हितों का संरक्षक सिंडिकेट चलाता है और ताकतवर सिंडिकेट पर भरोसे का ही नतीजा है कि अगले चार साल के लिए राष्ट्रपति की कुर्सी अल्पमत तादाद से आने वाले शख्स के हाथों थमा दी गई है।
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- कांग्रेस अधिवेशन को सफल बनाने में जुटी अकाली भाजपा सरकार
- रामायण, महाभारत और हनुमान पर पाकिस्तान में प्रतिबंध
- भूख के पेट में समा गये मध्य प्रदेश के 28 आदिवासी बच्चे
- 24 सितंबर को आयेगा अयोध्या पर फैसला
- विश्व के 35 फीसदी निरक्षर भारत में
- मुण्डा बनेंगे मुख्यमंत्री, 10 सितंबर तक शपथ ग्रहण की संभावना
- जातिवाद, क्षेत्रवाद, धर्मवाद का शिकार माओवाद
- एक अनोखे किसान आंदोलन का अंत
- बिहार में राजनीतिक घमासान की घोषणा
- लद गये वामपंथ के दिन- राहुल गांधी



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Is kitaab ki theory ke aadhaar par kai log kah sakte hain ki Bharat me abhi itne musalmaan nahi hai ki Taalibaan ke kanoon thop sake...isliye abhi bomb fod rahe hain aur aatankwad faila rahe hain...is baare me lekhika kya kahengi?
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